Iran Women Celebrates Freedom: ईरान के आसमान में आज एक अलग तरह की गूँज है। बरसों से मजहबी बंदिशों की बेड़ियों में जकड़ी ईरानी महिलाएँ आज सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर ‘जश्न’ मना रही हैं।
यह जश्न केवल एक व्यक्ति के जाने का नहीं, बल्कि उस दमनकारी युग के अंत की उम्मीद का है जिसने आधी आबादी को उनके वजूद से ही बेदखल कर दिया था।
खामेनेई की तस्वीर से सिगरेट सुलगाती और सड़कों पर नाचती महिलाओं की तस्वीरें इस बात की गवाह हैं कि कट्टरपंथ के थोपे गए काले पर्दे के पीछे विद्रोह की आग कभी बुझी नहीं थी।
पिछले कुछ दशकों से ईरान की पहचान केवल तेल और संघर्ष नहीं, बल्कि अपनी आजादी के लिए लड़ती उन महिलाओं से रही है, जिन्होंने धर्म के नाम पर थोपे गए जुल्म को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
1979 की वह ‘भूल’, जब रौशनी से अंधेरे की ओर बढ़ा ईरान
Iran Women Celebrates Freedom: साल 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले ईरान की तस्वीर आज से बिल्कुल उलट थी। मुहम्मद रज़ा पहलवी के शासनकाल में ईरान तेज़ी से आधुनिकता की ओर बढ़ रहा था। उस दौर में ईरान को ‘मध्य-पूर्व का पेरिस’ कहा जाता था।
महिलाओं को पढ़ने, लिखने और अपनी मर्जी के कपड़े पहनने की पूरी आजादी थी। वे बिना किसी खौफ के मिनी स्कर्ट और पश्चिमी परिधान पहनकर सड़कों पर निकलती थीं।
धर्म एक निजी विषय था और सत्ता किसी मजहबी किताब के आधार पर नहीं चलती थी। 8 जनवरी 1936 को लागू किए गए ‘कश्फ-ए-हिजाब’ कानून ने सार्वजनिक स्थानों पर हिजाब की अनिवार्यता को खत्म कर दिया था ताकि महिलाएँ आधुनिक समाज का सक्रिय हिस्सा बन सकें।
उन्हें वोट देने का अधिकार था, वे संसद में चुनी जाती थीं और वैज्ञानिक व वकील बनकर देश के विकास में योगदान दे रही थीं।
शिक्षा पर मजहबी ताला और हिजाब की जबरदस्ती
लेकिन 1979 की क्रांति ने जैसे वक्त का पहिया 200 साल पीछे घुमा दिया। क्रांति के बाद सबसे बड़ा प्रहार शिक्षा व्यवस्था और शिक्षिकाओं पर हुआ।
जो अध्यापिकाएँ कल तक स्कर्ट-टॉप में आत्मविश्वास के साथ कक्षाओं में पढ़ाती थीं, उन्हें रातों-रात नकाब और बुर्के में खुद को ढंकने पर मजबूर कर दिया गया।
कट्टरपंथियों ने सह-शिक्षा (Co-education) का अंत कर दिया और लड़कों व लड़कियों के स्कूल अलग कर दिए गए। लड़कियों के स्कूलों में पुरुषों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया और शिक्षा का पूरा ढांचा ही बदल दिया गया।
फ्रांसीसी और अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषाओं को ‘पश्चिमी प्रभाव’ और ‘बुराई’ बताकर पाठ्यक्रम से हटा दिया गया।
ग्राफिक नॉवेल लेखिका मरजान सतरापी के संस्मरण बताते हैं कि कैसे शुरुआत में कई बच्चियाँ हिजाब पहनने से हिचकिचाती थीं, लेकिन सत्ता के खौफ और कट्टरपंथियों की शारीरिक हिंसा ने उन्हें मजबूर कर दिया।
छोटी-छोटी बच्चियों, जो कल तक अपनी पसंद के कपड़ों में मैदानों में खेलती थीं, उनके लिए काला हिजाब पहनना कानूनन अनिवार्य कर दिया गया। जिसने विरोध किया, उसे सलाखों के पीछे डाल दिया गया।
9 साल की उम्र में निकाह
खामेनेई और उनके पूर्ववर्ती खोमैनी के शासन ने महिलाओं की कानूनी स्वायत्तता पर सबसे घातक हमला उनकी उम्र और पारिवारिक अधिकारों पर किया।
1967 के जिस ‘विमेन पर्सनल लॉ’ ने महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए थे, उसे कट्टरपंथ की वेदी पर चढ़ा दिया गया।
सबसे डरावना बदलाव निकाह की उम्र में हुआ। जो न्यूनतम उम्र पहले 18 वर्ष थी, उसे घटाकर सीधे 13 वर्ष कर दिया गया। इतना ही नहीं, कानून में यह प्रावधान भी जोड़ दिया गया कि पिता की मर्जी या कानूनी इजाजत से 8 साल और 9 महीने (यानी लगभग 9 साल) की मासूम बच्ची का निकाह भी किया जा सकता है।
आंकड़े रूह कंपा देने वाले हैं। ईरान के स्टेटिस्टिकल सेंटर के मुताबिक, केवल 2023 में ही 1.35 लाख से ज्यादा नाबालिग लड़कियों के निकाह रजिस्टर्ड हुए।
असल संख्या, जो कागजों पर नहीं आई, वह इससे कहीं अधिक डरावनी है। जहाँ पुरुषों को 4 शादियों और ‘अस्थायी पत्नियाँ’ (सिघेह) रखने की खुली छूट दी गई, वहीं महिलाओं को केवल एक ‘बच्चा पैदा करने वाली मशीन’ और ‘पति की सेवा’ करने वाली संपत्ति की तरह सीमित कर दिया गया।
पुरुष गार्जियनशिप, अपने ही घर में ‘कैदी’ बनी महिलाएँ
ईरान में ‘मेल गार्जियनशिप’ (पुरुष अभिभावक) कानून लागू कर महिलाओं को जीवनभर के लिए किसी पुरुष के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया।
आज एक ईरानी महिला, चाहे वह कितनी भी शिक्षित क्यों न हो, वह अपने स्तर पर स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकती।
उसे बैंक खाता खुलवाने, विदेश यात्रा करने, उच्च शिक्षा के लिए दाखिला लेने या यहाँ तक कि पासपोर्ट बनवाने के लिए भी घर के पुरुष (पिता, पति या भाई) की लिखित अनुमति अनिवार्य है।
जिस देश में महिलाएँ कभी नेतृत्व करती थीं, वहाँ उन्हें एक सामान्य फॉर्म भरने के लिए भी पुरुष की गुलामी स्वीकारनी पड़ती है। इस कानून ने महिलाओं के सामाजिक पंख काट दिए और उन्हें घरों की चारदीवारी के भीतर एक कैदी बनाकर रख दिया।
मोरैलिटी पुलिस और सुंदरता पर पाबंदी
खामेनेई के शासन को महिलाओं की सुंदरता और उनकी पसंद से भी नफरत थी। सजना-संवरना महिलाओं का नैसर्गिक हक माना जाता है, लेकिन इस्लामी क्रांति ने इसे ‘गुनाह’ बना दिया।
ब्यूटी पार्लर गैरकानूनी घोषित कर दिए गए और कॉस्मेटिक्स के इस्तेमाल पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए।
2006 में ‘गश्त-ए-एरशाद’ यानी मोरैलिटी पुलिस के गठन ने दमन के इस चक्र को पूरा कर दिया। ये पुलिस सड़कों पर घूमकर यह सुनिश्चित करती थी कि किसी महिला का एक बाल भी हिजाब से बाहर न दिखे या किसी ने लिपस्टिक तो नहीं लगाई।
महसा अमीनी जैसी कई युवतियों ने इसी मोरैलिटी पुलिस की बर्बरता के कारण अपनी जान गँवाई, जिसने पूरे ईरान में गुस्से की आग को भड़का दिया।
एक नई सुबह की पुकार
ईरानी महिलाओं का आज का विद्रोह केवल एक कपड़े (हिजाब) के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस सोच के खिलाफ है जिसने उनकी गरिमा और मानवाधिकारों को कुचल दिया।
अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद जो जश्न सड़कों पर दिख रहा है, वह उस दमघोंटू माहौल से बाहर निकलने की तड़प है।
ईरान का समाज आज एक चौराहे पर खड़ा है, एक तरफ सदियों पुराना कट्टरपंथ है और दूसरी तरफ अपनी खोई हुई आजादी को पाने की जिद्द।

