हर-हर महादेव की गूंज के साथ सजा गिरनार: गुजरात के जूनागढ़ स्थित पवित्र गिरनार पर्वत की तलहटी एक बार फिर “हर-हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठी है।
सुवर्णरेखा नदी के तट पर बसे प्राचीन भावनाथ महादेव मंदिर में 11 फरवरी 2026 से आरंभ हुआ भावनाथ मेला आस्था, तप, सेवा और सनातन परंपराओं का विराट संगम बन गया है।
महा वद नौम से लेकर महाशिवरात्रि तक चलने वाला यह आयोजन केवल एक धार्मिक मेला नहीं, बल्कि संत-समागम और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत केंद्र है। इसकी भव्यता और साधु-संतों की विशाल उपस्थिति के कारण इसे गुजरात का ‘मिनी कुंभ’ भी कहा जाता है।
गिरनार की गोद में बसा भावनाथ धाम
हर-हर महादेव की गूंज के साथ सजा गिरनार: गिरनार पर्वत सदियों से योगियों और तपस्वियों की साधना स्थली रहा है। इसी पावन भूमि पर स्थित है भावनाथ महादेव मंदिर, जहाँ स्थापित शिवलिंग स्वयंभू माना जाता है।
‘भावनाथ’ शब्द का अर्थ है, ‘भाव’ यानी सृष्टि और उसके ‘नाथ’ अर्थात भगवान शिव। मान्यता है कि यही वह स्थान है जहाँ शिव स्वयं प्रकट हुए और मानवता के कल्याण का संकल्प लिया।
इस वर्ष मेले का आयोजन पहले से अधिक भव्य रूप में किया गया है। राज्य सरकार के प्रबंधन में हो रहे इस आयोजन को राष्ट्रीय और वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में भी प्रयास हो रहे हैं।
व्यवस्थाओं, सुरक्षा और संतों के आवास से लेकर श्रद्धालुओं की सुविधाओं तक हर स्तर पर विशेष ध्यान दिया गया है।
पौराणिक कथाएँ जो बढ़ाती हैं महिमा
हर-हर महादेव की गूंज के साथ सजा गिरनार: भावनाथ मंदिर से जुड़ी अनेक प्राचीन कथाएँ इसकी आध्यात्मिक गरिमा को और भी गहरा करती हैं। एक मान्यता के अनुसार, प्रलय के बाद जब ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ, तब शिव ने सृष्टि, पालन और संहार का दायित्व बांटकर संतुलन स्थापित किया।
ब्रह्मा के आग्रह पर शिव ने पृथ्वी पर निवास के लिए गिरनार को चुना।
कहा जाता है कि जब माता पार्वती को शिव कैलाश पर नहीं मिले, तो वे क्रोधित होकर गिरनार पहुँचीं।
उसी दिन वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को शिव ‘भावनाथ’ रूप में प्रकट हुए।
लोकमान्यता है कि माता पार्वती ने यहाँ अंबिका रूप में वास किया और अन्य देवताओं ने भी गिरनार के विभिन्न स्थलों को अपना निवास बनाया।
मृगीकुंड की रोचक कथा
भावनाथ मंदिर के समीप स्थित मृगीकुंड से जुड़ी कथा भी अत्यंत प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि कान्यकुब्ज के राजा भोज ने एक ऐसी स्त्री को देखा जिसका चेहरा हिरण जैसा और शरीर मनुष्य का था।
ऋषि ऊर्ध्वरेत की कृपा से उसे मनुष्य की वाणी प्राप्त हुई और उसने अपने पूर्वजन्म की कथा बताई।
अंततः सुवर्णरेखा नदी में विसर्जन के बाद उसका पूर्ण रूप मानव हो गया। उसी स्थान पर राजा भोज ने मृगीकुंड का निर्माण करवाया। आज भी शिवरात्रि के दिन साधु इस कुंड में स्नान को अत्यंत पवित्र मानते हैं।
क्यों कहा जाता है ‘वस्त्रपूत क्षेत्र’?
स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार आकाश मार्ग से जाते समय माता पार्वती का दिव्य वस्त्र इस स्थान पर गिर गया था।
तभी से यह क्षेत्र ‘वस्त्रपूत क्षेत्र’ कहलाया। गुजरात सरकार की प्रकाशित पुस्तकों में भी इस लोककथा का उल्लेख मिलता है, जो इस स्थान की धार्मिक महत्ता को और सुदृढ़ करता है।
साधुओं का शाही स्नान, मेले का मुख्य आकर्षण
भावनाथ मेले की सबसे अनूठी पहचान है महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में निकलने वाली साधुओं की भव्य शोभायात्रा।
नागा साधु, अघोरी और विभिन्न अखाड़ों के संत घोड़ा-गाड़ियों और हाथियों पर सवार होकर शंखनाद के साथ मृगीकुंड की ओर प्रस्थान करते हैं। पंचदशनाम जूना अखाड़ा इस शाही स्नान का नेतृत्व करता है।
तलवारबाजी, लाठी-कला और पारंपरिक प्रदर्शन इस यात्रा को अद्भुत दृश्य बना देते हैं। स्नान के बाद भावनाथ मंदिर में महाआरती और महापूजा होती है।
लोकविश्वास है कि गिरनार की गुफाओं में रहने वाले कई नागा साधु स्नान के बाद अदृश्य हो जाते हैं, जिनका रहस्य आज तक अनसुलझा है।
सेवा, समर्पण और सत्संग की परंपरा
भावनाथ मेला केवल साधुओं का उत्सव नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण का भी महापर्व है।
देशभर से सामाजिक संस्थाएँ यहाँ भोजन, चिकित्सा, विश्राम और सत्संग की व्यवस्था करती हैं।
दिन-रात भजन, संतवाणी और प्रवचन चलते रहते हैं। विभिन्न रातों का आयोजन अलग-अलग संस्थाओं द्वारा किया जाता है, जिनमें जेरामबापा की रात, तोरानिया की रात और खोडियार रस मंडल की रात प्रमुख हैं।
श्रद्धालुओं के लिए सुबह, दोपहर और शाम तीनों समय भोजन की व्यवस्था होती है। यह आयोजन सौराष्ट्र की सेवा परंपरा का जीवंत उदाहरण बन जाता है।
आस्था का जीवंत संगम
सदियों से आयोजित होता आ रहा भावनाथ मेला समय के साथ बदलते परिवेश में भी अपनी मूल आत्मा को संजोए हुए है।
यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का उत्सव है। गिरनार की पवित्र भूमि पर जब हजारों कंठों से “हर-हर महादेव” का उद्घोष होता है, तब वातावरण शिवमय हो उठता है।
इसी आध्यात्मिक गरिमा, संत-समागम और शाही स्नान की परंपरा के कारण भावनाथ मेला आज भी गुजरात के ‘मिनी कुंभ’ के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।

