G-20: दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन इस बार वैश्विक राजनीति और जलवायु मुद्दों के लिहाज़ से बेहद अहम साबित हुआ।
यहां सदस्य देशों ने जलवायु परिवर्तन पर एक ऐतिहासिक संयुक्त घोषणापत्र पारित किया, जिसकी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि यह निर्णय अमेरिका की अनुपस्थिति और विरोध के बावजूद सर्वसम्मति से लिया गया।
जी20 की परंपरागत प्रक्रिया से हटकर इस घोषणापत्र को पारित किया गया, जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जलवायु प्रतिबद्धता का बड़ा संकेत माना जा रहा है।
G-20: अमेरिका का बहिष्कार और कूटनीतिक तनाव
इस सम्मेलन से अमेरिका का दूर रहना अपने-आप में एक बड़ा संकेत था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के बीच हालिया सप्ताहों में कूटनीतिक मतभेद बढ़ गए थे।
दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने बताया कि अमेरिका ने संयुक्त घोषणापत्र की भाषा पर आपत्ति जताई थी और इसी वजह से उसने शिखर सम्मेलन का बहिष्कार किया।
रामफोसा ने यह भी स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन से जुड़ा यह मसौदा दोबारा बातचीत के लिए नहीं खोला जाएगा। इस बयान ने वॉशिंगटन और प्रिटोरिया के बीच बढ़ते तनाव को और उजागर किया।
दक्षिण अफ्रीकी अधिकारियों ने यह भी पुष्टि की कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दक्षिण अफ्रीका पर दबाव बनाया था कि उनकी गैर-मौजूदगी में जी20 घोषणापत्र को स्वीकार न किया जाए।
बावजूद इसके, दक्षिण अफ्रीका ने वैश्विक जलवायु हितों को प्राथमिकता देते हुए दस्तावेज़ को आगे बढ़ाया।
शुरुआत में ही घोषणापत्र पारित होने का असामान्य फैसला
जी20 सम्मेलनों में आमतौर पर संयुक्त घोषणापत्र अंत में स्वीकार किया जाता है, लेकिन इस बार एक असामान्य कदम उठाते हुए इसे शुरुआत में ही मंजूरी दे दी गई।
राष्ट्रपति रामफोसा ने अपने संबोधन में बताया कि इस दस्तावेज़ को लेकर बेहद व्यापक सहमति बनी थी और देरी करने का कोई कारण नहीं था।
उनके प्रवक्ता विंसेंट मैग्वेन्या ने कहा कि पूरे वर्ष इस मसौदे पर लगातार काम हुआ है और पिछले सप्ताह वार्ताएं काफी गहन रहीं।
इसी मजबूती और सामूहिक समर्थन को देखते हुए इसे शुरुआती सत्र में ही पारित किया गया।
मैग्वेन्या ने यह भी बताया कि जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक एकजुटता को देखते हुए इसे टालना सही नहीं होता।
उनकी घोषणा में यह साफ था कि दक्षिण अफ्रीका इसे लेकर पूरी तरह तैयार था और सदस्य देशों ने भी इसे महत्व दिया।
सम्मेलन में शामिल बड़े वैश्विक नेता
यद्यपि अमेरिका शामिल नहीं हुआ, लेकिन दुनिया के लगभग सभी प्रमुख राष्ट्रों के नेता इस शिखर सम्मेलन का हिस्सा बने।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तैयब एर्दोगन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज,
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्योंग और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस सहित कई नेता मौजूद रहे।
इन नेताओं ने जलवायु परिवर्तन को मानवता की सबसे बड़ी चुनौती बताते हुए,
वैश्विक तापमान वृद्धि को रोकने, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने और विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
उनकी उपस्थिति ने इस घोषणापत्र की मजबूती और विश्व समुदाय की संयुक्त प्रतिबद्धता को स्पष्ट किया।
दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन इस बार वैश्विक राजनीति और जलवायु मुद्दों के लिहाज़ से बेहद अहम साबित हुआ।
यहां सदस्य देशों ने जलवायु परिवर्तन पर एक ऐतिहासिक संयुक्त घोषणापत्र पारित किया, जिसकी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि यह निर्णय अमेरिका की अनुपस्थिति और विरोध के बावजूद सर्वसम्मति से लिया गया।
जी20 की परंपरागत प्रक्रिया से हटकर इस घोषणापत्र को पारित किया गया, जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जलवायु प्रतिबद्धता का बड़ा संकेत माना जा रहा है।
अमेरिका का बहिष्कार और कूटनीतिक तनाव
इस सम्मेलन से अमेरिका का दूर रहना अपने-आप में एक बड़ा संकेत था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के बीच हालिया सप्ताहों में कूटनीतिक मतभेद बढ़ गए थे।
दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने बताया कि अमेरिका ने संयुक्त घोषणापत्र की भाषा पर आपत्ति जताई थी और इसी वजह से उसने शिखर सम्मेलन का बहिष्कार किया।
रामफोसा ने यह भी स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन से जुड़ा यह मसौदा दोबारा बातचीत के लिए नहीं खोला जाएगा। इस बयान ने वॉशिंगटन और प्रिटोरिया के बीच बढ़ते तनाव को और उजागर किया।
दक्षिण अफ्रीकी अधिकारियों ने यह भी पुष्टि की कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दक्षिण अफ्रीका पर दबाव बनाया था कि उनकी गैर-मौजूदगी में जी20 घोषणापत्र को स्वीकार न किया जाए।
बावजूद इसके, दक्षिण अफ्रीका ने वैश्विक जलवायु हितों को प्राथमिकता देते हुए दस्तावेज़ को आगे बढ़ाया।
शुरुआत में ही घोषणापत्र पारित होने का असामान्य फैसला
जी20 सम्मेलनों में आमतौर पर संयुक्त घोषणापत्र अंत में स्वीकार किया जाता है, लेकिन इस बार एक असामान्य कदम उठाते हुए इसे शुरुआत में ही मंजूरी दे दी गई।
राष्ट्रपति रामफोसा ने अपने संबोधन में बताया कि इस दस्तावेज़ को लेकर बेहद व्यापक सहमति बनी थी और देरी करने का कोई कारण नहीं था।
उनके प्रवक्ता विंसेंट मैग्वेन्या ने कहा कि पूरे वर्ष इस मसौदे पर लगातार काम हुआ है और पिछले सप्ताह वार्ताएं काफी गहन रहीं।
इसी मजबूती और सामूहिक समर्थन को देखते हुए इसे शुरुआती सत्र में ही पारित किया गया।
मैग्वेन्या ने यह भी बताया कि जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक एकजुटता को देखते हुए इसे टालना सही नहीं होता।
उनकी घोषणा में यह साफ था कि दक्षिण अफ्रीका इसे लेकर पूरी तरह तैयार था और सदस्य देशों ने भी इसे महत्व दिया।
सम्मेलन में शामिल बड़े वैश्विक नेता
यद्यपि अमेरिका शामिल नहीं हुआ, लेकिन दुनिया के लगभग सभी प्रमुख राष्ट्रों के नेता इस शिखर सम्मेलन का हिस्सा बने।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तैयब एर्दोगन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी,
ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्योंग और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस सहित कई नेता मौजूद रहे।
इन नेताओं ने जलवायु परिवर्तन को मानवता की सबसे बड़ी चुनौती बताते हुए, वैश्विक तापमान वृद्धि को रोकने, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने और विकासशील देशों के लिए जलवायु
वित्त सुनिश्चित करने पर जोर दिया। उनकी उपस्थिति ने इस घोषणापत्र की मजबूती और विश्व समुदाय की संयुक्त प्रतिबद्धता को स्पष्ट किया।

