सोमनाथ मंदिर
सोमनाथ मंदिर में महादेव प्रतिष्ठा के अवसर पर तारीख 11 मई 1951 को राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी द्वारा दिया गया भाषण :
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का भाषण
बहनों और भाइयों,
हमारे शास्त्रों में श्री सोमनाथ जी को बारह ज्योतिलिंगों में से एक माना गया है, और इस लिये पुरातन काल में भारत की समृद्धि, श्रद्धा और संस्कृति का प्रतीक भगवान सोमनाथ का यह मन्दिर था, जिस के चरण विशाल सागर घोता था, जिस का उन्नत ललाट स्वर्ग को छूता था, और जिस के विराट कक्ष में श्रद्धाल जन भारत के विभिन्न प्रदेशों और प्रान्तों से एकत्रित हो कर भगवान शंकर के चरणों में अपरिमित श्रद्धा और भक्ति और अक्षय धन धान्य की भेंट चढ़ाया करते थे; इस तरह यह भारत में श्रद्धा और धन का केन्द्र तथा भंडार बना हुआ था।
दूर दूर तक तथा देश देश में इस के अतुलनीय वैभव की ख्याति फैली हुई थी किन्तु दुर्भाग्यवश इस पर एक युग के पश्चात् बार बार विपत्ति पड़ी। यह टूटा। किन्तु जातीय श्रद्धा का वाह्य प्रतीक चाहे विध्वंस किया जा सके पर उस का स्त्रोत तो कभी टूट नहीं सकता।
यही कारण है कि सब विपत्तियां पड़ने पर भी भारत के लोगों के हृदय में भगवान सोमानाय के इस मन्दिर के प्रति श्रद्धा बनी रही है और उन का यह स्वप्न बराबर रहा कि वे इस मन्दिर की प्राण-प्रतिष्ठा पुनः कर दें और समय समय पर वे ऐसा करते भी रहे और आज इस ऐतिहासिक मन्दिर के जीर्णोद्धार के पश्चात् इस के प्रांगण में भारत के कोने कोने से आये हुए अनेक नर नारियों का कलरव फिर सुनाई दे रहा है।
हमें यह पुनीत अवसर देखने का सौभाग्य इस लिये प्राप्त हुआ है कि जिस प्रकार भगवान विष्णु के नाभिकमल में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा वास करते हैं उसी प्रकार मानव के हृदय में भी सृजनात्मक शक्ति और श्रद्धा सर्वदा वास करती है और वह सब शस्त्रास्त्रों से, सब सेनाओं से और सब सम्राटों से अधिक शक्तिशाली होती है।
सोमनाथ का यह मन्दिर आज फिर अपना मस्तक ऊंचा कर के संसार के. सामने यह घोषित कर रहा है कि जिसे जनता प्यार करती है, जिस के लिये जनता के हृदय में अक्षय श्रद्धा और स्नेह है, उसे संसार में कोई भी मिटा नहीं सकता। आज इस मन्दिर की प्राण-प्रतिष्ठा पुनः हो रही है और जब तक इस का आधार जनता के हृदय में बना रहेगा तब तक यह मन्दिर अमर रहेगा ।
इस पुनीत, पावन और ऐतिहासिक अवसर पर हम सब के लिए यह उचित है कि हम धर्म के इस महान् तत्व को समझ लें कि भगवान की, सत्य की झांकी पाने के लिए कोई एक ही मार्ग मनुष्य के लिए अनिवार्य नहीं है वरत्व यदि श्रद्धा पूर्वक और लगन से मनुष्य जन जीवन की सेवा करने के लिये तत्पर होता है, और यदि वह अपने जीवन को संसार में स्नेह और सौन्दर्य का साम्राज्य स्थापित करने के लिये उत्सर्ग करता है तो फिर चाहे वह किसी ढंग से भगवान की पूजा क्यों न करे उस को भगवान और सत्य की झांकी अवश्य मिल जाती है।
हमारे प्राचीन ऋषियों ने इस तथ्य को पहचाना था और मनुष्य जाति के सामने इस को रखा था। वैदिक काल में ही इस बात की साग्रह घोषणा कर दी गई थी कि वह एक है, किन्तु मनीषी लोग उस का वर्णन बहुत प्रकार से करते हैं। इसी प्रकार महाभारत में भी यह कहा गया था कि जिस प्रकार सब नदियां समुद्र ही में मिल जाती हैं उसी प्रकार विभिन्न धर्म भी भगवान के पास ही मनुष्य को पहुंचा देते हैं।
दुर्भाग्यवश धर्म और जीवन के इस तथ्य को विभिन्न युगों और विभिन्न जातियों में ठीक ठीक नहीं अपनाया गया और इसी कारण धर्म के नाम पर संसार के विभिन्न देशों और विभिन्न जातियों में अत्यन्त विनाशकारी और वीभत्स संघर्ष और युद्ध हुए। धार्मिक असहिष्णुता से सिवाय विद्वेष और अनाचार बढ़ने के अतिरिक्त और कोई फल नहीं होता है- यही इतिहास की शिक्षा है और इस को हम सब को गांठ बांध रखना चाहिये।
हमारे देश में इस बात की आज विशेष आवश्यकता है कि हम में से प्रत्येक यह समझ ले कि हमारे देश में जितने सम्प्रदाय और समुदाय हैं उन सब के प्रति हमें समता और आदर का व्यवहार करना है। क्यों कि ऐसा करने में ही हमारी सारी जाति और देश का तथा प्रत्येक व्यक्ति का कल्याण निहित है।
इसी विश्वास और श्रद्धा के कारण हमारे भारतीय संघ ने धर्मनिरपेक्षता की नीति अपनायी है, और इस बात का आश्वासन दिया है कि इस देश में बसने वाले प्रत्येक सम्प्रदाय के लोगों को राज्य की ओर से एक समान सुविधायें प्राप्त होंगी।
इसी नीति के अनुसार मेरी श्रद्धा और भक्ति सभी धर्मों के प्रति रहती है। यद्यपि में विश्वास और अपनी दिन चर्या में सनातनी हिन्दू हूं और साधारणतः उसी धर्म की रीति से भगवान की उपासना और अर्चना करता हूं तथापि में यह भी मानता हूं कि अन्य धर्मावलम्बी अपनी रीति से भगवान की पूजा कर उस को पा सकते हैं और इसी लिये सभी धर्मों के पवित्र स्थानों के प्रति में केवल आदर का ही भाव नहीं रखता हूं वरन् अवसर पा कर उस आदर को व्यक्त करने में भी कभी नहीं हिचकता।
मौका मिलने पर मैं दरगाह और मस्जिद, गिर्जाघर और गुरुद्वारे में भी उसी श्रद्धा के साथ जाता हूं जिस से कि मैं अपने मन्दिरों में जाता हूं। आज का वह उत्सव भी इसी नीति की सत्यता को पुष्ट करता है आज यह स्पष्ट है कि धार्मिक असहिष्णुता की नीति असफल सिद्ध हुई है और होती रहेगी।
साथ ही हमें यह भी समझ लेना चाहिये कि इतिहास की टूटी हुई लड़ी को जोड़ने का अर्थ यह नहीं है और न हो सकता है कि हम इस बात का प्रयास करें कि वे सब मानसिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक अवस्थायें यहां फिर स्थापित हो जायें जो इतिहास के गत युग में यहां वर्तमान थीं।
मानव के लिये यह तो सम्भव है कि वह पृथ्वीतल पर पिछले स्थान पर लौट सके किन्तु यह सम्भव नहीं कि वह विगत घड़ी के पास लौट जाये। कालक्षेत्र में तो उस को निरतन्र आगे ही बढ़ना होता है।
हां वह पीछे दृष्टि डाल कर आगे के लिये प्रकाश और ज्योति पा सकता है। अतः आज के उत्सव का यह अर्थ न तो है और न हो सकता है कि हम विलुप्त राजनैतिक और सामाजिक युग की पुनः स्थापना करना चाहते हैं, और न इस का यह अर्थ है कि हम उस मानसिक और शारीरिक घाव को फिर खोलना चाहते हैं जो शताब्दियों के व्यतीत होने के कारण बहुत कुछ भर या ढक चुका है।
हमारा ध्येय पुरातन इतिहास के अन्याय को दूर करना नहीं है वरन् केवल यही है कि हम आज अपनी उस आस्था, उस विश्वास और उस श्रद्धा के प्रति अपनी लगन फिर से प्रकट करें जिस आस्था, या विश्वास पर अंनन्त काल से हमारा धर्म स्थापित रहा है और हम फिर यह दुहाई कर दें कि धार्मिक जीवन का सर्वोपरि सत्य यही है कि प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक जाति को वह पूर्ण स्वतन्त्रता और वे सुविधायें प्राप्त हों जिन में कि वह अपनी अनुभूति और अपनी नैसर्गिक बुद्धि के अनुसार अपने जीवन का चरम उत्कर्ष प्राप्त कर सके और वह सत्य है पूर्ण धार्मिक सहिष्णुता।
इस पुनीत अवसर पर हम सब के लिये यह उचित है कि हम आज इस बात का व्रत लें कि जिस प्रकार हम ने आज अपनी ऐतिहासिक श्रद्धा के इस प्रतीक में फिर से प्राण-प्रतिष्ठा की है उसी प्रकार हम अपने देश के जन साधारण के उस समृद्धि मन्दिर में भी प्राण-प्रतिष्ठा पूरी लगन से करेंगे जिस समृद्धि मन्दिर का एक चिन्ह सोमनाथ का पुरातन मन्दिर था।
उस ऐतिहासिक काल में हमारा देश सभ्य जगत का औद्योगिक केन्द्र था। यहां के बने हुए माल से लदे हुए कारवां दूर दूर देशों को जाते थे। और संसार का चांदी सोना इस देश में अत्यधिक मात्रा में खिंचा चला आता था। हमारा निर्यात उस युग में बहुत था और आयात बहुत कम।
इस लिये भारत उस युग में स्वर्ण और चांदी का भंडार बना हुआ था। आज जिस प्रकार समृद्ध देशों के बैंकों के तहखानों में संसार का स्वर्ण पर्याप्त मात्रा में पड़ा रहता है उसी प्रकार शताब्दियों पूर्व हमारे देश में संसार के स्वर्ण का अधिक भाग हमारे देवस्थानों में होता था।
मैं समझता हूं कि भगवान सोमनाथ के मन्दिर का पुर्नामाण उसी दिन पूरा होगा जिस दिन न केवल इस प्रस्तर की बुनियाद पर यह भव्य भवन खड़ा हो गया होगा, वरन् भारत की उस समृद्धि का भी भवन तैयार हो गया होगा जिस का प्रतीक वह पुरातन सोमनाथ का मन्दिर था।
साथ ही सोमनाथ के मंदिर का पुर्निर्माण तब तक भी मेरी समझ में पूरा नहीं होगा जब तक कि इस देश की संस्कृति का स्तर इतना ऊंचा न हो जाये कि यदि कोई वर्तमान अलबरूनी हमारी वर्तमान स्थिति को देखे तो हमारी संस्कृति के बारे में आज की दुनिया के मुक़ाबले में वही भाव प्रकट करे जो लगभग एक सहस्त्र वर्ष पूर्व उस समय के भारत के सम्बन्ध में अलबरूनी ने प्रकट किये थे ।
नवनिर्माण का यह यज्ञ स्वर्गीय सरदार वल्लभभाई पटेल ने आरम्भ किया था। भारत की विच्छिन्न एकता को पुनः एक सूत्र और अखण्ड करने में उन का निर्णायक हाथ था । और उन के हृदय में यह आकांक्षा उत्पन्न हुई थी कि नव निर्माण के प्रतीक स्वरूप भारत की पुरातन श्रद्धा का यह प्रतीक फिर से निर्मित किया जाये।
वह स्वप्न भगवान की कृपा से आज एक सीमा तक पूरा हो गया है किन्तु वह पूर्ण रूपेण उसी समय पूरा हो सकेगा जब भारत के जन जीवन का वैसा ही सुन्दर मन्दिर बन गया होगा जैसा यह भगवान का मन्दिर है। जय भारत।

