Monday, February 16, 2026

कलकत्ता हाई कोर्ट के जज ने पहनी अंग्रेजी विग, कब होगा उपनिवेशवाद का अंत?

विग विवाद

सोशल मीडिया पर कलकत्ता हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश के विग की तेज चर्चा है। शपथ ग्रहण के समय वे ब्रिटिश काल के जज के गेटअप में नजर आए। इसी दृश्य ने बहस छेड़ दी कि अदालतों में यह पोशाक परंपरा है या उपनिवेशी मानसिकता का अवशेष।

यूरोप में विग की शुरुआत और पंद्रहवीं सोलहवीं सदी का चलन

पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी में बरतनिया और ब्रिटेन के दरबार तथा अदालतों में वकीलों और जजों ने विग पहनने का नया फैशन शुरू किया। उस दौर में विग केवल दिखावे का सामान नहीं था, कई बार जरूरत भी मानी जाती थी।

महंगे विग और रसूख का प्रदर्शन

उस समय विग महंगे होते थे और उन्हें पहनना रसूख का संकेत माना जाता था। सामान्य व्यक्ति के लिए यह खर्च आसान नहीं था, इसलिए प्रभावशाली वर्ग ने इसे अपनाया। जजों ने भी अपने सामाजिक कद और अधिकार का प्रदर्शन करने के लिए विग पहनना शुरू किया।

चार्ल्स द्वितीय का दौर और अदालत की शालीनता

चार्ल्स द्वितीय के समय, यानी 1660 से 1685 के बीच, विग शालीन समाज की पहचान बन गया था। बिना विग आदमी ऐसा लगता था जैसे शादी में चप्पल पहन कर आ गया हो, कानूनी रूप से सही, सामाजिक रूप से अपराध।

जज का लंबा विग और चोगे के रंग

इसी कारण अदालत में जज लंबा विग पहन कर आते थे और उनके चोगे के रंग भी अलग होते थे, जैसे लाल या बैंगनी। पोशाक का यह संयोजन न्यायिक अधिकार की दृश्य भाषा बन गया, जिसे देखकर आम व्यक्ति स्वतः ही सत्ता का अहसास करे।

विग के पीछे व्यावहारिक कारण भी

विग पहनना केवल सोशल स्टेटस नहीं था, इसके व्यावहारिक कारण भी बताए जाते हैं। गंजे जज टकले न दिखें, यह एक वजह थी। जो गंजे नहीं थे, वे अपने गंदे बाल ढक लेते थे, जिनमें जुएं तक होने की चर्चा मिलती है।

घोड़े के बाल से बने विग और उस समय की वास्तविकता

अमूमन ऐसे विग घोड़े के बाल से बने होते थे। उस दौर की स्वच्छता और जीवनशैली में बालों की देखभाल आज जैसी नहीं थी, इसलिए विग ने एक तरह से बाहरी सभ्यता का मुखौटा भी बनाया, जो अदालत की गंभीरता से जोड़ा गया।

जॉर्ज तृतीय के समय फैशन का यू टर्न

फिर जॉर्ज तृतीय का समय आया, 1760 से 1820, और फैशन ने यू टर्न ले लिया। विग धीरे धीरे आउट ऑफ सिलेबस होने लगी। सदी के अंत तक इसे सिर्फ तीन वर्ग ढो रहे थे, बिशप, कोचवान और वकील।

1830 के दशक में बिशपों की विदाई और तंज

बाद में बिशपों को भी 1830 के दशक में इससे छुट्टी मिल गई, एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी के साथ कि अब सिर पर भगवान का बोझ काफी है, विग मत ढो। यह बताता है कि समाज में प्रतीकों का बोझ कब और कैसे उतरता है।

1780 तक फुल बॉटम्ड विग और भारत तक पहुंच

1780 तक जज प्रायः केवल फुल बॉटम्ड विग पहनते थे। इसी कालखंड में जब ब्रिटिश कानून ने भारत में पैर फैलाए, तो अंग्रेजी जजों का यह फैशन भारत भी आया। देखते ही देखते भारतीय जजों ने भी विग धारण करना शुरू कर दिया।

परंपरा के नाम पर उपनिवेशी संकेतों का टिकना

कहा गया कि यह केवल परंपरा का निर्वाह है, इसलिए इसे चलने दिया गया। परंपरा का यह तर्क वही है जो अक्सर उपनिवेशी संस्थानों के प्रतीकों को वैध बना देता है। अदालत का ढांचा बदला, पर दृश्य प्रतीक लंबे समय तक जमे रहे।

1840 के बाद बड़ा विग और आज का चलन

बरतनिया में आपराधिक मुकदमों में बड़ा विग 1840 तक चलता रहा। आज वह अधिकतर केवल समारोहों में निकलता है, जैसे बुजुर्गों की पगड़ी साल में दो बार। हिंदी की कई पुरानी फिल्मों में भी जजों को ऐसे विग में देखा गया है।

कलकत्ता का दृश्य और आज के संदर्भ में विग का अर्थ

कुल मिलाकर, जिस न्यायाधीश की चर्चा हो रही है, उन्होंने ब्रिटिश कालीन परंपरा निभाई है। पर आज के समय में ऐसे विग पहनने का न फैशन है, न सोशल स्टेटस। अब गिने चुने मौकों पर ही यह विग अदालतों की शान बढ़ाता है।

ब्रिटिश वर्दी का उदाहरण और विग का न हथियाया जाना

दिलचस्प यह है कि ब्रिटिश काल के सिपाहियों की वर्दी हमारे बैंड वालों ने धारण कर ली, लेकिन जज का यह विग किसी ने नहीं हथियाया। यानी कुछ प्रतीक लोक संस्कृति में घुल गए, पर कुछ केवल सत्ता के मंच पर टिके रहे।

यह उपनिवेशवाद और मैकॉलेवाद का चिह्न क्यों

अदालतों में विग का टिके रहना केवल कपड़े का सवाल नहीं, यह उपनिवेशवाद का चिह्न है। यह उस मैकॉलेवाद का भी संकेत है जिसने भारतीय संस्थाओं को अंग्रेजी ढांचे और प्रतीकों के सामने छोटा बनाकर प्रस्तुत किया, मानो न्याय की गरिमा विदेशी पोशाक से ही आती हो।

इसे खत्म करना जरूरी क्यों

इसलिए बहस केवल परंपरा बनाम आधुनिकता की नहीं, मानसिक गुलामी बनाम आत्मसम्मान की है। यदि भारत का न्याय तंत्र भारतीय संविधान और भारतीय समाज के प्रति जवाबदेह है, तो उपनिवेशी प्रतीकों की जरूरत नहीं। विग का त्याग इसी प्रतीकात्मक सफाई का हिस्सा माना जा रहा है।

मुंशी जी का शेर और पूरे विवाद का सार

मुंशी जी अर्ज करते हैं, जुल्फों में उलझा रहा मुद्दत से मुकदमा मेरा, अब अक्ल यह कहती है, यह भी कोई जाल था। इस शेर की तरह विग भी एक ऐसा जाल है जो दिखने में गरिमा, पर भीतर में इतिहास का बोझ और उपनिवेशी छाया ढोता है।

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Samudra
Samudra
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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