Friday, March 13, 2026

चकदा एक्सप्रेस से लेकर WPL के खिताब तक, जानें कौन है झूलन गोस्वामी

चकदा एक्सप्रेस से लेकर WPL के खिताब तक: ज़रा सोचिए सुबह 4:30 बजे उठकर भीड़भरी लोकल ट्रेन में 80 किलोमीटर का सफर सिर्फ क्रिकेट खेलने के लिए और वह भी तब जब लोग कहते थे कि क्रिकेट लड़कियों का खेल नहीं है।

आज वहीं लड़की मुंबई इंडियंस की बॉलिंग कोच है वह टीम जो दो बार WPL का खिताब जीत चुकी है। वह लड़की और कोई नहीं बल्कि झूलन गोस्वामी हैं जिन्हें “चकदा एक्सप्रेस” के नाम से भी जाना जाता है.

चकदा एक्सप्रेस से लेकर WPL के खिताब तक: एक दिन मैं भी भारत के लिए खेलूंगी

झूलन गोस्वामी का नाम सुनते ही दिमाग में एक ही तस्वीर उभरती है फास्ट बॉलिंग विकेट्स और वह मुस्कान जो कभी गायब नहीं होती, लेकिन उनकी असली कहानी कोचिंग मैन्युअल या रिकॉर्ड बुक्स में नहीं मिलती।

वह कहानी मिलती है उन सुबह की ट्रेन यात्राओं में मांगे हुए क्रिकेट गियर्स में और उस छोटी सी लड़की के सपने में जो ईडन गार्डन्स में बॉल गर्ल बनकर खड़ी थी और सोच रही थी “एक दिन मैं भी भारत के लिए खेलूंगी।”

आज WPL में जब वह युवा गेंदबाज़ों को यॉर्कर और बाउंसर की टिप्स देती हैं तो साथ-साथ उन्हें यह भी सिखाती हैं कि दबाव को कैसे संभालना है और अपने सपनों के लिए डेडिकेटेड और पैशनेट कैसे रहना है।

क्योंकि गोस्वामी ने यह सब कुछ इसी सोच के साथ हासिल किया है तो चलिए जानते हैं उस जर्नी के बारे में जो चकदहा के एक छोटे से घर से शुरू हुई और लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड तक पहुँची एक ऐसे वक्त में जब भारतीय महिला क्रिकेट की कोई पहचान नहीं थी।

विमेंस वर्ल्ड कप में बॉल गर्ल बनीं

25 नवंबर 1982 पश्चिम बंगाल के छोटे से शहर चकदहा में एक लड़की का जन्म हुआ जिसे क्रिकेट से प्यार था,

लेकिन वहां क्रिकेट खेलने की कोई सुविधा नहीं थी कम से कम लड़कियों के लिए तो बिल्कुल नहीं।

झूलन को असली प्रेरणा 1997 में मिली जब वह ईडन गार्डन्स में विमेंस वर्ल्ड कप के ऑस्ट्रेलिया बनाम न्यूज़ीलैंड मैच में बॉल गर्ल बनीं।

ग्राउंड पर खड़े होकर जब उन्होंने बेलिंडा क्लार्क को ट्रॉफी के साथ विजय परेड लेते देखा उसी पल उन्होंने ठान लिया कि वह भी भारत के लिए क्रिकेट खेलेंगी।

तड़के सुबह घर से निकलना

सफर आसान नहीं था। गोस्वामी एक मिडिल क्लास परिवार में पली-बढ़ीं। छोटे शहर में न क्रिकेट अकादमी थी न कोई सुविधा।

वह हर हफ्ते तीन दिन सुबह 80 किलोमीटर दूर कोलकाता के विवेकानंद पार्क में स्वपन साधु से ट्रेनिंग लेने जाती थीं।

सुबह 4:30 बजे उठना 5 बजे ट्रेन पकड़ना भीड़ में खड़े होकर सफर करना और 7:30 बजे प्रैक्टिस पर पहुँचना फिर वही लंबा सफर कर वापस घर आना सिर्फ अपने सपने को पूरा करने की ख्वाहिश दिल में लेकर झूलन निकल पड़ती थीं।

कितनी स्लो बॉलिंग करती है

घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी लेकिन मां झरना और पापा ने कभी हिम्मत नहीं हारने दी।

एक बार बंगाल टीम के सिलेक्शन ट्रायल में पहले दिन के बाद झूलन इतनी थक गईं कि वापस जाने का मन नहीं था, लेकिन उनकी मां ने उन्हें पुश किया “कल फिर जाओ” और उसी फैसले से उनका सिलेक्शन हुआ।

मोहल्ले में वह लड़कों के साथ टेनिस बॉल से क्रिकेट खेलती थीं। जब लड़के कहते “कितनी स्लो बॉलिंग करती है” तो वह उदास नहीं होतीं बल्कि और ज़्यादा मेहनत करने लगतीं।

वही लड़की आगे चलकर महिला क्रिकेट की सबसे तेज़ गेंदबाज़ों में से एक बनी।

शुरुआती दिनों में जब उनका सिलेक्शन भारतीय टीम में हुआ तो उनके पास क्रिकेट शूज़ तक नहीं थे।

उनके कोच तारक सिन्हा मेल प्लेयर्स से जूते लाकर देते थे कभी-कभी आशीष नेहरा के भी। साइज बड़ा होने के बावजूद उसी से काम चलाना पड़ता था।

शुरुआती दिनों में महिला टीम के लिए न कोई सुविधा थी न आरक्षित ट्रेन टिकट। वह जनरल ट्रेन के डिब्बे में ही सफर करती थीं।

2007 में विमेंस प्लेयर ऑफ द ईयर का अवॉर्ड मिला

2002 में 19 साल की उम्र में झूलन ने भारत के लिए डेब्यू चेन्नई में इंग्लैंड के खिलाफ ODI में किया।

उसी साल टेस्ट क्रिकेट में भी उन्होंने खुद को साबित किया, मिताली राज के साथ 157 रन की साझेदारी करते हुए अपनी पहली टेस्ट अर्धशतकीय पारी खेली,

लेकिन दुनिया ने झूलन गोस्वामी को असल पहचान 2006 में दी।

टॉन्टन में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट मैच में उन्होंने यादगार स्पेल डाला। पहली पारी में 5/33 और दूसरी पारी में 5/45। इस 10 विकेट हॉल के साथ भारत ने इंग्लैंड की धरती पर अपनी पहली टेस्ट सीरीज़ जीती।

झूलन इस सीरीज़ की प्लेयर ऑफ द सीरीज़ रहीं। इसके बाद 2007 में उन्हें ICC विमेंस प्लेयर ऑफ द ईयर का अवॉर्ड मिला जो उन्हें एमएस धोनी ने प्रदान किया।

उस साल किसी भी पुरुष खिलाड़ी को व्यक्तिगत ICC अवॉर्ड नहीं मिला था। बाद में उन्हें भारतीय महिला टीम की कप्तानी भी सौंपी गई।

250 ODI विकेट लेने वाली पहली महिला

झूलन ने 355 इंटरनेशनल विकेट लिए जो किसी भी महिला क्रिकेटर से सबसे ज़्यादा हैं। वह अकेली गेंदबाज़ हैं जिन्होंने 10,000 से ज्यादा डिलीवरी डाली हैं।

ODI वर्ल्ड कप में 43 विकेट लेकर वह सबसे आगे रहीं। 200 और 250 ODI विकेट तक पहुँचने वाली पहली महिला क्रिकेटर बनीं।

तीनों फॉर्मैट में फाइव-विकेट हॉल लेने वाली सिर्फ दो गेंदबाज़ों में से एक हैं।

अप्रैल 2018 में वह पहली भारतीय महिला क्रिकेटर बनीं जिनका पोस्टेज स्टाम्प बना जो बहुत कम लोगों को नसीब होता है।

गार्ड ऑफ ऑनर

24 सितंबर 2022 को लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड में झूलन गोस्वामी ने अपना आखिरी इंटरनेशनल मैच खेला। इंग्लैंड के खिलाफ तीसरा ODI था और वह दिन शुरू से ही बेहद इमोशनल था।

जब वह बैटिंग करने आईं तो इंग्लैंड के प्लेयर्स अंपायर्स और बैटिंग पार्टनर्स ने उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया।

फिर जब वह अपना लास्ट ओवर डालने गईं तो उनकी अपनी टीममेट्स ने एक और मूविंग गार्ड ऑफ ऑनर बनाया।

मैच से पहले इंडियन टीम ने लॉन्ग हडल किया जहाँ हर प्लेयर ने अपना ट्रिब्यूट दिया।

अपने आखिरी मैच में झूलन ने जबरदस्त परफॉर्मेंस दी। 10 ओवर में दो विकेट लेकर सिर्फ 30 रन दिए और 3 मेडन ओवर डाले।

भारत ने 169 रन डिफेंड किए और 16 रन से जीत दर्ज कर इंग्लैंड में पहली बार 3-0 ODI सीरीज़ क्लीन स्वीप की। पूरा लॉर्ड्स स्टेडियम खड़े होकर उन्हें सलामी दे रहा था।

सचिन तेंदुलकर विराट कोहली मिथाली राज सभी ने सोशल मीडिया पर ट्रिब्यूट दिए। BCCI ने उनके दो दशक के करियर को मॉन्यूमेंटल कहा।

मैच से पहले गोस्वामी ने कहा था कि उन्हें नेशनल एंथम और इंडियन जर्सी पहनना सबसे ज़्यादा मिस होगा और उस दिन लॉर्ड्स पर पूरी दुनिया ने उन्हें आखिरी बार उस जर्सी में देखा और सलाम किया।

जनरल डिब्बों से बिज़नेस क्लास तक

आज झूलन गोस्वामी मुंबई इंडियंस की डगआउट में बैठकर वह काम कर रही हैं जो शायद विकेट लेने से भी बड़ा है अगली पीढ़ी को तैयार करना।

WPL में वह मुंबई इंडियंस को 2023 और 2025 में दो खिताब दिला चुकी हैं। लेकिन उनका असली योगदान है युवा खिलाड़ियों को मानसिक मजबूती दबाव संभालना अनुशासन और निरंतरता सिखाना।

जब 2025 में भारत ने ODI वर्ल्ड कप जीता और हरमनप्रीत कौर ने ट्रॉफी उठाई तो गोस्वामी की आँखों में खुशी के आँसू थे।

उन्हें याद थे कि 2006-07 में हालात कैसे थे और आज महिला क्रिकेट कहाँ पहुँच चुका है।

सुबह 4:30 बजे उठने से लेकर लॉर्ड्स में सलामी तक जनरल डिब्बों से बिज़नेस क्लास तक “लड़कियाँ क्रिकेट नहीं खेलती” से लेकर अपने नाम का पोस्टेज स्टाम्प तक।

झूलन गोस्वामी की कहानी सिर्फ एक क्रिकेटर की कहानी नहीं है यह भारतीय महिला क्रिकेट के बदलाव और संघर्ष की कहानी है और सबसे खूबसूरत बात यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।

मुंबई इंडियंस की डगआउट में बैठकर वह आज भी लिखती जा रही हैं नए चैप्टर्स नए हीरोज नई कहानियाँ।

चकदहा की उस छोटी सी लड़की ने सपना देखा था। उसने अपना सपना पूरा किया और रास्ते में हज़ारों लड़कियों के लिए दरवाज़े खोल दिए। यही तो होती है असली लेगसी।

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Madhuri
Madhurihttps://reportbharathindi.com/
पत्रकारिता में 6 वर्षों का अनुभव है। पिछले 3 वर्षों से Report Bharat से जुड़ी हुई हैं। इससे पहले Raftaar Media में कंटेंट राइटर और वॉइस ओवर आर्टिस्ट के रूप में कार्य किया। Daily Hunt के साथ रिपोर्टर रहीं और ETV Bharat में एक वर्ष तक कंटेंट एडिटर के तौर पर काम किया। लाइफस्टाइल, इंटरनेशनल और एंटरटेनमेंट न्यूज पर मजबूत पकड़ है।
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