Wednesday, January 7, 2026

बंगाल चुनाव 2026: भारत का औद्योगिक इंजन से आर्थिक बोझ तक, कैसे वामपंथ और TMC ने पश्चिम बंगाल को गर्त में धकेला

बंगाल चुनाव 2026: कभी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा पश्चिम बंगाल आज आर्थिक बदहाली की मिसाल बन चुका है।

जहाँ 1960 के दशक में यह राज्य भारत का तीसरा सबसे अमीर राज्य हुआ करता था, वहीं आज इसकी गिनती देश के सबसे पिछड़े राज्यों में होने लगी है।

बीते छह दशकों में बंगाल की यह गिरावट अचानक नहीं हुई, बल्कि यह वामपंथी वैचारिक हठधर्मिता और ममता बनर्जी की तुष्टिकरण-आधारित नीतियों का नतीजा है।

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के आँकड़े इस सच्चाई को बेनकाब करते हैं कि कैसे एक समय निवेशकों की पहली पसंद रहा बंगाल, आज पूंजी पलायन, कर्ज और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर निर्भर राज्य बन गया है।

जब बंगाल देश की आर्थिक राजधानी हुआ करता था

बंगाल चुनाव 2026: 1960-61 में पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से लगभग 28 प्रतिशत अधिक थी।

उस दौर में कलकत्ता बंदरगाह, जूट उद्योग, इंजीनियरिंग कंपनियाँ जैसे जेसप और ब्रेथवेट, और भारी उद्योग बंगाल की पहचान थे। देश में होने वाला बड़ा औद्योगिक निवेश मुंबई और दिल्ली के साथ-साथ कोलकाता में केंद्रित रहता था।

उस समय बंगाल की GDP में हिस्सेदारी 10.5 प्रतिशत थी, जो उसकी आर्थिक ताकत को दर्शाती थी। लेकिन यह स्वर्णिम दौर ज्यादा समय तक नहीं टिक सका।

राजनीतिक अस्थिरता और नक्सल हिंसा ने रखी गिरावट की नींव

बंगाल चुनाव 2026: 1967 के बाद कांग्रेस सरकार के पतन से राज्य में राजनीतिक अस्थिरता शुरू हुई।

नक्सल आंदोलन और हिंसक संघर्षों ने औद्योगिक माहौल को असुरक्षित बना दिया। कंपनियाँ या तो उत्पादन घटाने लगीं या राज्य छोड़कर जाने को मजबूर हो गईं।

1977 में जब ज्योति बसु के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में आया, तब शुरुआत में उम्मीद जगी थी, लेकिन जल्द ही कम्युनिस्ट विचारधारा ने राज्य को उद्योग-विरोधी दिशा में धकेल दिया।

कम्युनिस्ट शासन: उग्र यूनियनिज्म और पूंजी का पलायन

वामपंथी शासन के दौरान बंगाल में मिलिटेंट ट्रेड यूनियनिज्म को खुली छूट दी गई।

‘घेराव’ जैसी हिंसक रणनीतियाँ आम हो गईं, जहाँ फैक्ट्रियों को बंधक बनाकर उद्योगपतियों पर दबाव डाला जाता था।

मुनाफे को अपराध और उद्योगपतियों को वर्ग-शत्रु की तरह देखा गया।

परिणामस्वरूप निवेशकों ने बंगाल से दूरी बनानी शुरू कर दी। 1970 के दशक में जहाँ सैकड़ों हड़तालें होती थीं, वहीं बाद में लॉकआउट्स की संख्या तेजी से बढ़ी, जिससे करोड़ों मैन-डे बर्बाद हुए।

1991 की आर्थिक क्रांति में भी बंगाल पीछे रह गया

बंगाल चुनाव 2026: जब 1991 में भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति अपनाई, तब कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने आईटी और मैन्युफैक्चरिंग में छलांग लगाई।

लेकिन बंगाल अब भी 1970 के दशक की वैचारिक कैद में फँसा रहा।

निवेशकों के लिए राज्य की छवि अस्थिर, असुरक्षित और उद्योग-विरोधी बनी रही।

जहाँ गुजरात और दक्षिणी राज्यों में प्रति व्यक्ति निजी निवेश तेजी से बढ़ा, वहीं बंगाल इस दौड़ में बहुत पीछे छूट गया।

सिंगुर: जहाँ से शुरू हुई ‘डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन 2.0’

बंगाल चुनाव 2026: 2008 में सिंगुर में टाटा नैनो प्लांट का विरोध बंगाल के लिए निर्णायक मोड़ साबित हुआ।

ममता बनर्जी के नेतृत्व में चले आंदोलन ने रतन टाटा को बंगाल छोड़कर गुजरात जाने पर मजबूर कर दिया।

इस घटना ने वैश्विक निवेशकों को साफ संदेश दिया कि पश्चिम बंगाल में निवेश राजनीतिक जोखिम से भरा है।

यहीं से राज्य में दूसरी बार बड़े पैमाने पर उद्योग पलायन शुरू हुआ।

ममता सरकार में उद्योगों का पलायन और निवेश की कमी

बंगाल चुनाव 2026: 2011 से 2025 के बीच लगभग 6,600 कंपनियाँ पश्चिम बंगाल छोड़ चुकी हैं, जिनमें 100 से ज्यादा सूचीबद्ध कंपनियाँ शामिल हैं।

राज्य में FDI बेहद सीमित रही और बंगाल देश के टॉप-10 निवेशक राज्यों में जगह तक नहीं बना पाया।

बंद, राजनीतिक हिंसा और अस्थिर नीतियों ने उद्योगों के लिए माहौल और खराब कर दिया।

आर्थिक आँकड़े जो डराते हैं

बंगाल चुनाव 2026: आज बंगाल की स्थिति बेहद चिंताजनक है—

  • 1960 में रैंक 3 से गिरकर 2024 में रैंक 24
  • प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 16.3 प्रतिशत कम
  • कर्ज-से-GSDP अनुपात 37 प्रतिशत से अधिक
  • टैक्स कलेक्शन बेहद कमजोर
  • अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक सेक्टर पर निर्भर

इसके बावजूद सरकार सामाजिक योजनाओं पर भारी खर्च कर रही है, जिसे आलोचक वोटबैंक राजनीति करार देते हैं।

इंसेंटिव्स की वापसी और उद्योगों पर नया प्रहार

बंगाल चुनाव 2026: 2025 में ममता सरकार द्वारा पुराने औद्योगिक इंसेंटिव्स वापस लेने के फैसले ने डालमिया और बिड़ला जैसे समूहों को सैकड़ों करोड़ का नुकसान पहुँचाया।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन भी हो सकता है।

छह दशक की नीतियों की कीमत चुका रहा बंगाल

बंगाल चुनाव 2026: आज पश्चिम बंगाल उस विरासत को भुगत रहा है, जो वामपंथी वर्ग-संघर्ष और TMC की राजनीतिक जिद ने छोड़ी है।

राज्य की अर्थव्यवस्था अब रिटेल, कंस्ट्रक्शन और कृषि जैसे कम-उत्पादक क्षेत्रों पर टिकी है, जिससे न रोजगार की गुणवत्ता सुधर रही है और न राजस्व बढ़ रहा है।

अब फैसला जनता के हाथ में

बंगाल चुनाव 2026: सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बंगाल इस आर्थिक अंधकार से बाहर निकल पाएगा?

इसका जवाब नीतियों में बदलाव और राजनीतिक इच्छाशक्ति में छिपा है।

आगामी विधानसभा चुनाव बंगाल के लिए सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि आर्थिक भविष्य तय करने का मौका है।

अब यह निर्णय बंगाल की जनता को करना है कि वह विकास का रास्ता चुनेगी या उन नीतियों को दोहराएगी, जिन्होंने राज्य को छह दशकों तक पीछे धकेल दिया।

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Muskaan Gupta
Muskaan Guptahttps://reportbharathindi.com/
मुस्कान डिजिटल जर्नलिस्ट / कंटेंट क्रिएटर मुस्कान एक डिजिटल जर्नलिस्ट और कंटेंट क्रिएटर हैं, जो न्यूज़ और करंट अफेयर्स की रिपोर्टिंग में सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 2 साल का अनुभव है। इस दौरान उन्होंने राजनीति, सामाजिक मुद्दे, प्रशासन, क्राइम, धर्म, फैक्ट चेक और रिसर्च बेस्ड स्टोरीज़ पर लगातार काम किया है। मुस्कान ने जमीनी रिपोर्टिंग के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए प्रभावशाली कंटेंट तैयार किया है। उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनाव और अन्य राजनीतिक घटनाक्रमों की कवरेज की है और जनता की राय को प्राथमिकता देते हुए रिपोर्टिंग की है। वर्तमान में वह डिजिटल मीडिया के लिए न्यूज़ स्टोरीज़, वीडियो स्क्रिप्ट्स और विश्लेषणात्मक कंटेंट पर काम कर रही हैं। इसके साथ ही वे इंटरव्यू, फील्ड रिपोर्टिंग और सोशल मीडिया जर्नलिज़्म में भी दक्ष हैं। मुस्कान का फोकस तथ्यात्मक, प्रभावशाली और जनहित से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने लाने पर रहता है।
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