Saturday, February 14, 2026

अफगानिस्तान में 13 वर्षीय बच्चे से गोली मरवाकर दी गई सजा

अफगानिस्तान

सार्वजनिक फांसी का भयावह दृश्य, 80 हजार लोगों की मौजूदगी

अफगानिस्तान से सामने आए एक वीडियो ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया, जहां एक विशाल स्टेडियम में करीब 80 हजार लोग जमा हुए थे।

उन्हें बुलाया ही इसलिए गया था कि वे एक युवक को दी जाने वाली सार्वजनिक सजा को अपनी आंखों से देखें। यह दृश्य बेहद खौफनाक था।

13 साल के बच्चे के हाथों दी गई मौत, आरोप हत्या का

इस घटना का सबसे विचलित करने वाला पहलू यह था कि गोली चलाने का काम एक 13 वर्षीय बच्चे को सौंपा गया।

जिस युवक को गोली मारी गई, उस पर आरोप था कि उसने इसी बच्चे के परिवार के कुछ सदस्यों की हत्या की थी। इस कारण उसे पीड़ित परिवार की ओर से बदले का अधिकार दिया गया।

तालिबानी न्यायिक प्रक्रिया, सुप्रीम कोर्ट से लेकर सर्वोच्च नेता की मंजूरी तक

तालिबानी अधिकारियों ने आरोपी की पहचान की और उसे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश किया। अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद उसे दोषी करार दे दिया।

इसके बाद तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने दोषी को मृत्युदंड देने की मंजूरी जारी कर दी, जिससे फांसी की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।

बच्चे से पूछा गया माफ करने का विकल्प, सख्त इनकार

सजा से पहले अधिकारियों ने परंपरा के अनुसार 13 वर्षीय लड़के से पूछा कि क्या वह दोषी को माफ करना चाहता है। बच्चे ने इस प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से ठुकरा दिया।

इसके बाद फांसी को सार्वजनिक रूप से देने के लिए प्रशासन ने नोटिस जारी किया और लोगों को उपस्थित होने के लिए प्रोत्साहित किया।

स्टेडियम में तैयार किया गया मंच, अधिकारियों ने बच्चे को दी बंदूक

निर्धारित दिन पर विशाल भीड़ स्टेडियम में इकट्ठा हुई। तालिबान अधिकारियों ने 13 वर्षीय लड़के के हाथ में बंदूक पकड़ा दी और उसे दोषी को मौत की सजा देने का आदेश दिया।

थोड़ी ही देर में बच्चा मंच पर पहुंचा और स्टेडियम के भीतर गोलियां चलाते हुए युवक को मौत के घाट उतार दिया।

मृतक की पहचान, हत्या के मामले में था दोषी

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, फांसी दिए गए व्यक्ति की पहचान तलाह खान के पुत्र मंगल के रूप में हुई।

अदालत ने उसे अब्दुल रहमान की हत्या का दोषी पाया था। इसी आरोप को आधार बनाकर उसे सार्वजनिक रूप से मौत की सजा दी गई।

इस पूरी घटना ने अफगानिस्तान में कानून व्यवस्था, मानवाधिकार और तालिबानी न्याय प्रणाली पर कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

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Samudra
Samudra
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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