Friday, April 10, 2026

अयोध्या की धूल हटाओ, उस पर रंग मत चढ़ाओ; भविष्य की अयोध्या पर मिथिलेशनन्दिनीशरण महाराज का विचारोत्तेजक व्याख्यान

अयोध्या

‪श्रीअयोध्यान्यास‬ द्वारा दिल्ली में आयोजित वार्षिक महोत्सव के आठवें वर्ष में मुख्यवक्ता के रूप में आचार्य श्री मिथिलेशनन्दिनीशरण जी महाराज (सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास, अयोध्या) का उद्बोधन। अयोध्या पर्व के आठवें संस्करण के सातवें विमर्श सत्र में पूज्य महाराज ने “भविष्य की अयोध्या-शासन और समाज” विषय के अन्तर्गत अयोध्या के पुनरुद्धार में होने वाली व्यवस्था चिन्ताओं को स्पष्ट किया।

आचार्य श्री मिथिलेशनन्दिनीशरण जी महाराज का यह उद्बोधन यथावत यहाँ उद्धृत किया जा रहा है,

भगवान श्री सीतारामचंद्र जी के चरणों में वंदन करते हुए अयोध्या पर्व के आठवें संस्करण के सातवें सत्र में मंच पर विराजमान दोनों विद्वान वक्ता, हम कह सकते हैं यह बहुत प्राणवान मंच है। साक्षात प्राण जी ही बैठे हुए हैं। चंद्रशेखर प्राण जी, श्रीमान ज्ञानेश जी को आपने सुना।

सम्मुख विराजमान भारतीय आत्मवत्ता के अध्येता, लेखक, विचारक, पद्म पुरस्कार से अलंकृत श्रीमान राम बहादुर राय जी; अयोध्या के रामलला के प्रतिनिधि, उनके मुख्य पार्षद, तीर्थ क्षेत्र के महासचिव श्रीमान चंपत जी।

मैं पहले वर्ष जब आया था यहाँ, तब से अब तक जो एक बात मैं बार-बार दोहराता हूँ कि दिल्ली में भी अयोध्या को बसाने की, जगाने की एक यात्रा लेकर चले हुए श्रीमान लल्लू सिंह जी, और इस अर्थ में मैं गत वर्ष भी कह चुका हूँ, यह कोई उनकी प्रशस्ति के लिए नहीं कहता हूँ। पर मुझे लगता है कि कब अयोध्या को दिल्ली का संस्कार मिलेगा और कब दिल्ली को अयोध्या का चरित्र मिलेगा, बड़ा कठिन है मुझे।

मैं थोड़ी निराशा से ही प्रारंभ कर रहा हूँ। मुझे नहीं दिखाई देता कि दिल्ली कभी अयोध्या के चरित्र को थोड़ा बहुत भी आत्मसात कर पाएगी। पर अयोध्या से वितृष्ण हुई, अयोध्या से चिढ़ने वाली दिल्ली में अयोध्या पर्व एक महोत्सव स्थापित कर दिया है लल्लू सिंह जी ने। इसके लिए इनके लिए तालियाँ बजानी चाहिए। दशकों इस देश ने और इस दिल्ली ने अयोध्या से गुरेज किया है। उस दिल्ली की छाती पर जो है, अयोध्या महोत्सव होता है, अयोध्या पर्व होता है। राय साहब इसके लिए बहुत साधुवाद के पात्र हैं। श्रीमान पंकज जी।

अयोध्या जिन बातों के लिए वंदनीय है उनमें से एक प्रमुख बात का प्रतिनिधित्व करती हुई एक परंपरा का, परम आदरणीय श्री मंदाकिनी रामकर जी यहाँ हैं। उनके माध्यम से उस पूरी परंपरा को, जिसमें अभिनव तुलसी, पूज्य पंडित श्री रामकिंकर जी महाराज पूरे देश में प्रतिष्ठित हुए, उनका स्मरण करते हुए, जिनको भगवान श्री राम ने अपना कहा, अपना माना है वे सौभाग्यशाली सभी अयोध्यावासी, मैं अलग-अलग किसका नाम लूँ?

मुझे लगता है, बिल्कुल अंतिम पंक्ति तक, यदि कोई अंतिम पंक्ति होती हो; यह बड़ी राजनीतिक टाइप की बात है, कोई अंतिम पंक्ति होती नहीं होती है। तो मुझे लगता है कि हम अनंत के उपासक हैं। कोई पंक्ति पहली नहीं होती, कोई पंक्ति अंतिम नहीं होती। हमारी दृष्टि यह कहती है कि सृष्टि भी कभी पहली बार नहीं होती। जब भी होती है तो जैसे पहले थी उसी के अनुरूप होती है। हर चीज यहाँ दोहराव है। इसीलिए सनातन है।

फिर भी यहाँ बैठने की दृष्टि से, जहाँ तक पीछे तक जो लोग हैं, उन सबका नामोल्लेख मुझे करना चाहिए। सब मेरे प्रिय हैं। बहुत से सुपरिचित हैं। मैं समय-संकोच में, मैं देखता हूँ कार्य की एक योजना है, सत्र की एक योजना है, तो उस सीमा में मनसा सबका स्मरण करता हूँ। विशेष रूप से संदीप जी सामने खड़े हैं, संदीप जोशी जी, उमेश जी हैं।

अयोध्यावासी कभी कुर्सी के लिए खड़े नहीं रहे। आप लोग जहाँ कहीं हैं, थोड़ी देर के लिए इसको अयोध्या मान लें और वहाँ बैठ जाएँ। तो जो खड़े हैं उनके कारण पीछे लोगों को देखने में कठिनाई हो रही है, ऐसा अनुभव मंच पर से मैं कर रहा था। तो बिना किसी संकोच के आप अपनी जगह बैठ जाइए। देखने लायक कुछ मुझमें बहुत है नहीं। सुनाई आपको बैठे-बैठे भी पड़ेगा। इसलिए आप बैठकर के सुन सकते हैं।

तुलसीदास जी और अयोध्या की वंदना का रहस्य

तो जो संबोधन छूट गए हों आप समझिए, मैं मन में उनका स्मरण करता हूँ। समय-संकोच में मैं सीधे कुछ बातें कहना चाहता हूँ। ज़्यादातर बातें मेरी थोड़ी चिंता को लेकर के हैं। अयोध्या की इतनी स्तुतियाँ हमारे पुरखों ने की हैं कि मुझे लगता है कि मुझे उस स्तुति में आई हुई व्यर्थता, उसके खालीपन की ओर देखना चाहिए। और यदि मैं ऐसा नहीं करता हूँ तो मैं अपने पूर्वजों का ठीक-ठीक उत्तराधिकारी नहीं हूँ।

पूज्य ब्रह्मचारी गुरु जी के पास रामचरितमानस की चर्चा करने के लिए मैं बैठा, तो मैंने कहा कि मानस का वंदना प्रकरण बहुत महत्वपूर्ण है। इतनी लंबी-लंबी वंदनाएँ हुई हैं। और गोस्वामी जी सबसे छोटी वंदना अयोध्या जी की करते हैं। आप सब लोग मानस से परिचित हैं, इसलिए मैं पंक्तियाँ दोहराऊँगा तो समय बचेगा, इसलिए नहीं बोल रहा हूँ। आपको याद आ जाएँगी। एक अर्धाली में अयोध्या जी का काम चला दिया गोस्वामी जी ने।

टीकाकारों ने कुछ कहा है। पूज्य ब्रह्मचारी गुरु जी को मैंने कहा कि इसका क्या रहस्य है? तो उन्होंने कहा कि मैंने अपने पितामह से बाल्यकाल में मानस पढ़ते हुए पूछा था। उन्होंने मुझे इसका उत्तर दिया था कि, परमाचार्य (गोस्वामी जी को ब्रह्मचारी जी परमाचार्य कहते थे), परमाचार्य की छाती जल रही थी अयोध्या का नाम लेते हुए। इसलिए रुककर वंदना नहीं कर पाए।

जो अयोध्या गोस्वामी तुलसीदास जी के सामने है, वह महर्षि वाल्मीकि की अयोध्या नहीं है। वह सम्राट विक्रमादित्य की उद्भाषित की हुई राम मंदिर वाली अयोध्या है, राम जन्मभूमि वाली अयोध्या है। जिस अयोध्या की वंदना करते हुए तुलसीदास जी जन्मभूमि में पूरी सुहावनी कहना चाहते हैं, उस अयोध्या में जन्मभूमि पर जन्मभूमि मंदिर की आरती-पूजा नहीं है। क्या कहकर अयोध्या की वंदना करूँ?

हर बार बोलना ही कोई प्रतिकार नहीं होता। चुप रह जाना भी एक प्रतिकार होता है। गोस्वामी जी के समय में चुनौतियाँ थीं। उन्होंने चुप रहकर एक बात कही कि जो अयोध्या श्री राम जन्मभूमि होने के विरोध के बाद भी राम जन्मभूमि मंदिर से वंचित है, उसकी क्या कहकर मैं वंदना करूँ? आगे बढ़ गए। अगर हम तुलसीदास जी की परंपरा में हैं, उनकी जय बोलते हैं, उनकी परंपरा का तिलक लगाते हैं, तो हमारा थोड़ा कर्तव्य है कि हम उसके प्रति देखें।

राम मंदिर निर्माण: एक पीढ़ियों का पुण्य

एक सौभाग्य है कि श्री रामलला अपनी जगह विराजमान हो गए हैं। यह पीढ़ियों का पुण्य है। यह बलिदानियों के बलिदान का फल है। और अकारण कृपा करने वाले श्री राम की, अपने कहलाने वाले लोगों पर कृपा है। किसी अकेले को इसका श्रेय लेने का दुस्साहस नहीं करना चाहिए। अयोध्या या तो राम बसाते हैं या तो वह उजड़ जाती है। कोई दूसरा नहीं है जो अयोध्या बसा दे। तो यह दंभ किसी और को नहीं करना चाहिए।

अब मैं कुछ बातें कहूँगा, क्योंकि अभी प्राण जी ने एक बात कही थी, ‘अयोध्या का भविष्य’, तो मैं थोड़ा ठिठका। आज जो विषय है वह ‘भविष्य की अयोध्या’ है। ‘अयोध्या का भविष्य’ ऐसा नहीं है। इन दोनों वाक्यों का अलग-अलग अर्थ है। अयोध्या का भविष्य तो अयोध्यानाथ भगवान के सिवा दूसरा कोई नहीं जानता। अयोध्या एक सनातन पुरी है जो भूत-भविष्य की चिंता के पार है।

हम लोगों का एक भविष्य है। हमारे अतीत में एक अयोध्या होती थी। हमारे वर्तमान में एक तरह की अयोध्या है। हमारे भविष्य में भी अयोध्या रहेगी क्या? और हमारी आने वाली पीढ़ियाँ भी कोई अयोध्या पाएँगी क्या? और यदि पाएँगी तो वह अयोध्या कैसी होगी? आज चिंता यह है।

हमारी पीढ़ियाँ दूर-दूर से अपने दिवंगतों को ढोकर लाती थीं और सरयू तट पर संस्कार कर देती थीं, केवल इस बात से जीवन भर का बिगड़ा बन गया है, यह भरोसा करके लौटती थीं। क्या हमारी आने वाली पीढ़ियाँ भी यह सोच पाएँगी? भविष्य की अयोध्या की चिंता यह है।

शासन, संविधान और चरित्र

क. शासन और समाज

मैं ज़्यादा चिंताओं में जाऊँ उसके पहले कुछ मोटे-मोटे शब्द हैं जो मैं भूल न जाऊँ। कुछ थोड़ा अयोध्या को लेकर एक भाव-अतिरेक रहता है मन में तो भूल जाऊँगा। राय साहब सामने बैठे हैं। वह चाहते हैं कि जिम्मेदारीपूर्वक कोई बात कही जाए। तो इसलिए मैं थोड़ा जिम्मेदारी से कुछ बातें आपके ध्यान में लाता हूँ।

शीर्षक है, भविष्य की अयोध्या: शासन और समाज। तो मैं समझता हूँ कि मैं शासन का अर्थ आपको न बताऊँ। श्रीमान चंद्रशेखर प्राण जी ने उसकी चर्चा ठीक से कर दी है। उसकी बहुत ज़रूरत भी नहीं है। शासन आप जैसे समझते हैं मैं उससे राजी हूँ, आप वही समझ लीजिए। समाज कहकर भी आप जो समझते हैं मुझे लगता है मुझे उसकी अलग से व्याख्या नहीं करनी चाहिए, इसलिए वह भी नहीं करता हूँ।

एक बात क्योंकि वह आरंभ के वक्तव्य में आ गई है और मुझे लगता है मुझे उस सूत्र को थोड़ा स्पर्श करना चाहिए। पहले शहर इतने नहीं होते थे। अभी शहरों की संख्या बढ़ गई है। मैं इस बात में थोड़ी एक बात जोड़ता हूँ। नगर और नागर, यह शब्द भारतीय वाङ्मय में कब से आए हैं यह कहना कठिन है। वह हमेशा होते थे।

एक तरह का व्यभिचार आया है, सांस्कृतिक व्यभिचार हम उसे कह सकते हैं। आवास और बाजार एक हो गए हैं। यह पहले एक नहीं होते थे। रहने की जगहें अलग होती थी और हाट अलग होती थी। हमें पता ही नहीं चला। धीरे-धीरे सुविधा के नाम पर बाजार हमारे घरों में घुस गए और सरकारों ने हमारे घर को और बाजार को एक कर दिया। इससे उनको फायदा था। उसके बहुत सारे आधुनिक संस्करण हमारे सामने हैं, ब्लिंककिट हो, चाहे ज़ोमैटो हो, मैं उस पर नहीं जाऊँगा। आप मुझसे बेहतर जानते हैं।

ख. धर्म और संविधान की अस्पृश्यता

चिंताएँ क्या हैं? मैं उधर आपका ध्यान ले जाना चाहता हूँ। नगरीय अवस्थापना और नगर विकास की एक दृष्टि है। किसी भी भूगोल का विकास भारत में उसी दृष्टि से होता है। आप दिल्लीवासी जानते होंगे, सांसद जी जानते होंगे। मुझे नहीं पता है कि भारत सरकार के पास तीर्थ विकास की कोई दृष्टि है। कोई विभाग है, कोई लोग हैं, सचिव स्तर के कोई लोग होते हैं, कोई धर्मार्थ विभाग कहलाता है, और दूसरे-तीसरे-चौथे दर्जे का एक भार होता है, किसी को दे दिया जाता है।

जिस देश में सूअर पालन मंत्रालय हो सकती है, उस देश में कोई धार्मिक मंत्रालय नहीं है। जिस देश में सर्वाधिक राजस्व, सर्वाधिक सोशल इन्फ्लुएंस, सर्वाधिक अचल संपत्तियाँ, सर्वाधिक सोशल कमांड धर्म के पास है, उस देश के संविधान में धर्म एक अस्पृश्य विषय है। और इसके बावजूद हम यह डींग मार रहे हैं कि हम अयोध्या बना रहे हैं, काशी बना रहे हैं, हम पाखंड कर रहे हैं। असल में हम कुछ नहीं बना रहे हैं। क्योंकि हमारे संविधान में न कोई अयोध्या होती है न कोई काशी होती है। हो सकता है यह किसी को बुरा लगे तो मुझे कोई बहुत फर्क नहीं पड़ता। पर यह कहा जाना जरूरी है। अयोध्यावासी इस पीड़ा को भोग रहा है, वो बोल नहीं सकता। मैं बोल सकता हूँ क्योंकि मेरे पास न पाने को कुछ है, न खोने को कुछ है।

ग. संविधान से नहीं, चरित्र से चलता है शासन

शासन कभी भी समाज को एकीकृत नहीं करता। आदरणीय राय साहब बैठे हैं, हो सकता है इस बात पर और विमर्श की ज़रूरत पड़े। पर मैं यह बहुत जिम्मेदारीपूर्वक कहना चाहता हूँ। शासन समाज को एकीकृत नहीं करता। एकीकृत समाज में शासन नष्ट हो जाता है। शासन समाज को वर्गीकृत करता है, इसी से वह जीवित रहता है। और सभी सरकारें करती हैं। बिना वर्गीकरण के संविधान संभव ही नहीं है।

फिर आपको एक बात ध्यान देनी पड़ेगी, शासन या सरकारें या राज्य कानून से नहीं चलते। शासन चरित्र से चलते हैं। और जब समाज और नायकत्व चरित्रहीन हो जाता है तो सेनाएँ कब्जा कर लेती हैं। जिसके पास ताकत होती है वो राष्ट्रपति हो जाता है। दुनिया के जिन देशों में अराजकता चल रही है, सत्ता-परिवर्तन चल रहा है, वहाँ संविधान नहीं है क्या? इसी देश में इमरजेंसी लगी थी, संविधान नहीं था क्या? इमरजेंसी लगाने वालों के पास भी संविधान था और उसके खिलाफ जेल जाने वालों के पास भी संविधान था।

आदरणीय राय साहब बैठे हैं, आपकी पुस्तक है उस पर, आप उसके विशेषज्ञ अध्येता हैं। संविधान से समाज नहीं चलता। संविधान से सरकार नहीं चलती। सरकार चलती है चरित्र से। उस चरित्र की जो घोषणा होती है लोकहित में, उसी घोषणा का एक समुच्चय संविधान कहलाता है।

मैं इसके इतिहास में नहीं जाऊँगा। संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर की जो कुछ बहसें हैं, उसके दो-एक प्रसंग मैंने देखे हैं किसी संदर्भ में। जब धार्मिक शिक्षा प्रतिबंधित कर दी जाए इस बात का प्रस्ताव आया, और बीएचयू में और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में या जामिया में कहीं, कि यह किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा दे नहीं सकते हम अपने राज्य के संविधान के अनुसार। तो डॉ. अंबेडकर ने प्रतिवाद किया कि नहीं, यह राज्य के द्वारा किया गया विश्वासघात होगा। आप जिन संस्थाओं को राज्य का अंग मान चुके हैं, उनके संविधान में परिवर्तन आप नहीं कर सकते। आप अपवाद स्वरूप इन तीनों को चलने दीजिए, इसके बाद किसी को अनुमति मत दीजिएगा। क्यों? एक चरित्र है राज्य और जिस दिन वह चरित्र खोखला हो जाएगा, कोई पोथी, कोई लिखी हुई किताब किसी को शासित नहीं कर सकती।

तो जब इधर हमारा ध्यान जाएगा तो अयोध्या को लेकर के जो संकट है वो हमारे लिए ज़्यादा स्पष्ट हो जाएगा। मैं अयोध्या पर बात करूँ, अपने और आपके भविष्य पर बात करूँ, और कल जो अयोध्या हमने देखी पूर्वजों की आँख से, आज जो अयोध्या हम देख रहे हैं अपनी आँख से, और भविष्य में अपनी आने वाली संततियों की आँख से जो अयोध्या देखेंगे, उसका जो रूपांतरण है, उसे विकास कहेंगे या क्षरण कहेंगे? यही आज के विमर्श का केंद्र है जितना मैं समझ पाया हूँ।

अयोध्या की पहचान, मंदिर नहीं, राम

हमें इस बात पर ध्यान देना पड़ेगा कि अयोध्या मंदिर के कारण जानी नहीं जाती। अयोध्या की पहचान मंदिर नहीं है, न राम जन्मभूमि मंदिर, न कनक भवन मंदिर, न हनुमानगढ़ी मंदिर। इन सबकी आयु बहुत कम है। अयोध्या तब से है जब श्री राम का अवतार ही नहीं हुआ था। आप मंदिर से अयोध्या को कैसे परिभाषित कर सकते हैं?

अयोध्या श्री राम के कारण जानी जाती है। श्री राम मंदिर के कारण नहीं जानी जाती। आप उन दिनों को याद करिए जिन दिनों में श्री राम मंदिर नहीं था और हमारी स्मृति में एक अयोध्या है। जिसने कभी भी राम से रहित अयोध्या का अनुभव नहीं किया। तब हमारा ध्यान इस बात पर जाएगा कि जो मंदिर का मूल्य है वह इसलिए है क्योंकि वह राम की स्मृति को अक्षुण्ण करने में एक बड़ा उपादान है। इस मंदिर होने से राम नहीं है। राम के होने से मंदिर है। यह अंतर तो हमें समझना पड़ेगा।

तो एक बड़ी यात्रा, उसमें बलिदानों का योग है, उसमें इस देश के धार्मिक महापुरुषों के सत्संकल्प और पुण्य का योग है, उसमें इस देश की वह जनता जिसकी स्मृति में पीढ़ियों से राम बसे हैं, उस स्मृति का बल है। उसमें आदरणीय चंपत जी बैठे हैं, इनकी पूरी परंपरा का एक असाधारण संघर्ष है, तपस्या है आपके पास।

अब तो बिल्कुल समय नहीं बचता, लेकिन थोड़ा बहुत जो बचता है उसमें हम लोग कुछ पुरानी बातें सुन लेते हैं तो आप अपने अनुभव बताते हैं। ग्लैमराइज होकर, चमकदार बनकर, बहुत सुंदर बनकर जो कथाएँ आई हैं, उन कथाओं के जो बीज हैं, उनके जो सूत्र हैं, कैसे किसी मनस्वी के भीतर कोई प्रश्न जगा है, कोई पीड़ा जगी है, कोई चिंता जगी है। कैसे कुछ मुट्ठी भर लोगों ने उसके लिए अपने को बलिदान कर देने का एक संकल्प किया है। और एक यात्रा खड़ी हुई है। क्योंकि उस यात्रा के मूल में श्री राम हैं, इसलिए बृहत्तर भारत उस यात्रा का अनुयायी हो गया है।

हमें समझना पड़ेगा, जब हम अयोध्या को मंदिरों की अयोध्या कहेंगे तो यह कबीर की नहीं रह जाएगी। उनको मंदिर से मतलब नहीं है। तो यह मलूक दास की नहीं रह जाएगी। तो यह गुरु नानक देव की, गुरु गोविंद सिंह की नहीं रह जाएगी। यदि अयोध्या सबकी है तो यह राम की अयोध्या होगी। यह मंदिर की अयोध्या नहीं हो सकती। मंदिर तो कंबोडिया में भी है, इंडोनेशिया में भी है। उस रामत्व की ओर हमारा ध्यान जाए।

राजनीति और अयोध्या: एक विश्लेषण

रामलला अपनी जगह विराजमान हुए। एक दौर आया हमारे इतिहास का, सबसे चमकदार, सबसे सुनहरा दौर है, हम कह सकते हैं जब अयोध्या को अस्पृश्य मानने वाली सत्ताओं में परिवर्तन हुआ और ऐसे लोग शासन में आए, राज्यसत्ता में आए जिन लोगों को अयोध्या से वितृष्णा नहीं है। यह बड़े अयोध्याभावी हैं ऐसा भी नहीं है। पर इन्होंने देखा कि इस देश के बहुजन की आकांक्षा में, यह ‘बहुजन’ वह नहीं है जो राजनीति से परिभाषित होता है। मेरे बहुजन का अर्थ है बहुसंख्य जन।

ठीक है? उसकी एक समाजशास्त्रीय परिभाषा अलग है। अभी रूढ़ि की चर्चा हो रही थी। शब्दों की रूढ़ियाँ व्याकरण में बहुत हैं। मैं उस रूढ़ि के बहुजन से नहीं, मेरा आश्रय है बहुत सारे जन, बहुत बड़े बृहत्तर भारत के अंतःकरण में राम और राम मंदिर की जो स्पृहा है वो वेगवती है। इसका नेतृत्व करने पर यह सारा देश हमारे पीछे खड़ा हो जाएगा, राजनीति ने यह सोचा क्यों? लोकतंत्र की राजनीति लोक की आकांक्षा के सहारे जीवित रहती है, उसी का नायकत्व है।

तो विश्व हिंदू परिषद ने, भारत के संत समाज ने, भारत के शंकराचार्यों ने, भारत के धर्माचार्यों ने अयोध्या में राम मंदिर हो, इस बात की जो लालसा व्यक्त की, वो गोस्वामी तुलसीदास से चली आती बात है। वो सिख साधु जिन्होंने आकर के राम मंदिर का उद्धार करने के लिए संघर्ष किया था उनसे जुड़ी हुई बात है। वह समर्थ रामदास गुरु के जो शिष्य आए अयोध्या और संघर्ष किया उन्होंने, उनसे जुड़ी बात है। वह एक दिन की बात नहीं है।

उसने भारतीय चेतना में राम जन्मभूमि पर रामलला क्यों नहीं हों, इस आकांक्षा को जन-जन में जगाया। उसको वेग देने वाले नायकों में एक यहाँ बैठे हैं, हमारे चंपत जी बैठे हैं, पंकज जी बैठे हैं और भी लोग होंगे। लल्लू सिंह जी उस यात्रा के योद्धा हैं। इन्होंने उसका अनुभव किया है।

और तब यह अनुभव हुआ राजनैतिक हलके में कि यह बहुत बड़ा मुद्दा है। जो इसको अपना राजनीतिक विषय बनाएगा वो हीरो बन जाएगा। यह हुआ। और राम जी जिसको देते हैं उसको थोड़ा नहीं देते हैं। अंगद को उन्होंने नौकरी पर नहीं रखा, राजा ही बनाया। आप समझिए, राजाधिराज किसी को बनावेगा तो चपरासी थोड़ी बनावेगा। उन्होंने राजा बना दिया राम-राम करने वालों को। मैं थोड़ा सरलीकृत कर रहा हूँ, बहुत इसको तकनीकी रूप से नहीं कह रहा हूँ।

राजा बने हुए लोगों को यह भ्रम हो गया कि अब हम बदला चुकावेंगे और राम को भी राजा बना देंगे। यह सब आपके अनुभव किए हुए दृश्य हैं। हजारों-हजार करोड़ की परियोजनाएँ, दुनिया भर के बाजार, निरंतर सरकार का इन्वॉल्वमेंट, कितनी यात्राएँ प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति एक नगर की करें, छोटी सी जगह की, हर हफ्ते मुख्यमंत्री वहाँ पहुँचकर के एक-एक चीज को देखते हैं।

मुझे आश्चर्य होता है कि इस देश की पूरी ब्यूरोक्रेसी में पढ़े-लिखे लोग हैं ही नहीं, या वह अयोध्या को अच्छा होने ही नहीं देना चाहते। किसी अच्छी योजना को अच्छी तरह से वहाँ रूपान्वित नहीं होने दिया जाता। मैं आश्चर्य करता हूँ, अयोध्या पर काम करती हुई जो टीम है, केंद्र से लेकर प्रदेश सरकार तक की, उसमें से कितने लोग हैं जो अयोध्या को अभी जानते हैं? और इन काम करने वाले लोगों ने किसके साथ बैठकर बातचीत की है, किससे पूछा है अयोध्या किसे कहते हैं?

विकास की विडंबनाएँ: अयोध्यावासियों का दर्द

क. बाधाएँ और बैरियर

सुंदर सड़कों, अच्छी नालियों, एक बिजली का पोल जहाँ लगा था, अगल-बगल चार बिजली के खंभे लगाकर 6 फीट की सड़क को 4 फीट कर देने को, अयोध्यावासियों से उनकी नागरिकता छीन लेने को, साधुओं को शासन का मोहताज बना देने को, इसी को अयोध्या कहते हैं?

पूरी अयोध्या में अब तक निर्माण का जो सबसे सुंदर आयाम राम मंदिर के बाद है, वह केवल रामपथ है, और वह इस शर्त पर बनाकर जो सबसे कम पैसे में बना देगा वह कंपनी बनाएगी। किसने तय किया है यह? आदरणीय चंपत जी बैठे हैं, मैं गलत कर रहा होऊँगा तो सुधारूँगा मैं उसको।

क्या है शासन और क्या है समाज? मैं दुष्यंत का एक शेर याद करता हूँ, ‘न हो कमीज तो पाँवों से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए?’ अयोध्यावासियों से सरल समाज कहाँ होगा?

श्री राम को त्रेता में अयोध्या से निष्कासित किया, या सौतेली माता ने, अयोध्यावासी लड़ने नहीं गए। कह सकते थे हम भी तुम्हारे साथ जंगल चलेंगे। अयोध्यावासी तब भी नहीं लड़े थे। राम के अनुयायी हैं न, लड़ते नहीं हैं। महारानी जानकी को अग्नि परीक्षा के बाद, राजरानी बनने के बाद महर्षि वाल्मीकि के आश्रम भेज दिया गया। दुनिया भर की कथाएँ हम पढ़ते हैं। कोई यह नहीं पूछता कि अयोध्यावासियों ने घेर करके श्री राम से पूछा क्यों नहीं, आपने यह क्यों किया? और कोई कथा हो तो आप बताइए मुझे, किससे किसने पूछा? अयोध्यावासी तब भी प्रश्न नहीं करते। अयोध्यावासी सह लेते हैं। सह लिया।

प्रश्न यह है कि अयोध्या पर जब हजारों करोड़ की योजनाएँ आईं तो एयरपोर्ट बनना, स्टेशन का वैश्विक रूप से सुंदर हो जाना, चौड़ी सड़कें होना, होटलों का बढ़ जाना, रेस्टोरेंट का बढ़ जाना, बाजार के संसाधनों का बढ़ जाना, नगरीय विकास की दृष्टि से बहुत अच्छा है। शासन की सदिच्छा के लिए उनको बहुत साधुवाद दिया जाएगा। पर यह सब मिलकर के अयोध्या को अयोध्या कैसे बनाएगा? क्या मुंबई में वह नहीं है? क्या दिल्ली में वह नहीं है? क्या चंडीगढ़ में वह नहीं है?

किस शर्त पर अयोध्या ऐसी हो गई है कि आपके मेहमान बिना पुलिस की जी-हुजूरी किए अयोध्या में घुस नहीं सकते? आप अयोध्यावासी यहाँ बैठे हैं, पेशेंट मर जाएगा, वहीं बैरियर नहीं खोला जाएगा कि वो अस्पताल तक जाए। यहाँ अनुभव किए हुए लोग बैठे हुए हैं। सांसद जी साक्षी हैं। हार्ट का पेशेंट मर जाएगा वहीं पर, बैरियर, पुलिस नहीं खोलेगी।

हम लोग सुनते हैं कि कश्मीर के लोगों को सुरक्षा के नाम पर बहुत दुख है, समझ नहीं पाते थे। अब अयोध्यावासी समझते हैं कि वह दुख कैसे होता है। और फिर कैसे आपके अपने लोग आपके शत्रु हो जाते हैं। कोई सुनता नहीं।

ख. पौराणिक स्वरूप की उपेक्षा

10 साल हो गए मुझे। जब अयोध्या आएँगे लोग, हमारी पीढ़ी के कहीं से पढ़कर, गीता प्रेस ने अयोध्या महात्म्य छाप दिया है, ऑनलाइन वाल्मीकि रामायण उपलब्ध है, वह पढ़ेंगे कि अयोध्या आठ खंडों में बसी हुई है। तो क्या बुरा है? अगर कोई विदेश का शोधकर्ता अयोध्या आए और कहे कि यह अष्टचक्रा नवद्वारापुरी है, और सरकार घोषणा करती है कि हमने त्रेता की अयोध्या बसा दी है, इसके नौ दरवाजे कहाँ हैं? सरकार को सीमेंट कम पड़ गया क्या? नौ दरवाजे क्यों नहीं बनते अयोध्या के?

10 वर्ष, 8 वर्ष पहले मैंने सरकारी मीटिंग में हाथ जोड़कर कहा था, ढाँचा ही आप अयोध्या का थोड़ा बना दें। आठ खंडों वाली अयोध्या है। अयोध्या की पूरी आबादी को आप कुछ भी शिफ्ट न करें, नामकरण दे दें, प्रतीकात्मक रूप से। आप तो चुनावों के मद्देनजर अयोध्या के पौराणिक चौराहों के नाम बदलकर जातीय समीकरणों की सुविधा के अनुसार रख रहे हैं। इसमें अयोध्या कहाँ है? राजनैतिक-त्वाकांक्षा का अखाड़ा है।

मैं आश्चर्य करता हूँ, अयोध्या जो हमारे सामने है वह त्रेता की नहीं है। हमें इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा। वो कलयुग की अयोध्या है जहाँ श्री राम राजा नहीं हैं, जहाँ श्री राम आराध्य हैं। और इसलिए उनकी आराधना की प्रथम कोटि में जो खड़े हैं वह अयोध्या के सबसे सम्मानित नागरिक हैं, वो हैं साधु, वो हैं महात्मा, वो हैं संत।

ग. साधु-संत और प्रशासनिक दृष्टि

उनको लेकर अयोध्या की क्या दृष्टि है? अयोध्या के शासन-प्रशासन की क्या दृष्टि है? उनको गनर दे देना। एक आश्रम के शिष्य की गाड़ी सुबह खड़ी होती है, दोपहर तक हम लोग प्रयत्न करते हैं भीतर कराने के लिए। भूसे की ट्राली आने के लिए महंत पागल होकर दिन भर फोन मिलाता है पुलिस अधिकारियों को। क्या शासन को पता नहीं है कि अयोध्या के मठ गौशाला चलाते हैं? इनका भूसा बाहर से आता है। अयोध्या में गेहूँ नहीं बोया हुआ है? क्या हमारे पास कोई योजना है कि जो अयोध्यावासी हैं उनको भीतर आने की, मैं केवल एक पक्ष रख रहा हूँ।

मैं उसके दूसरे पक्ष पर आता हूँ। श्री राम के समय का अयोध्या में क्या है? यह पूछते हुए लोग हम लोगों के पास आते हैं। वो समझते हैं महात्मा है, कुछ बता देंगे। हम क्या बता देंगे? वे श्रद्धालु हैं। कहीं किसी मंदिर के ऊपर लिखा है ‘त्रेताकालीन ठाकुर’। वो पूछते हैं, त्रेता के राम जी हैं? तो मैं कहता हूँ त्रेता में सीमेंट नहीं था। मैं क्या बताऊँ उनको? वह इतने श्रद्धावान हैं कि यह कल्पना ही नहीं करते कि भौतिक निर्माण युगों तक खड़े नहीं रहते, वह नष्ट हो जाते हैं। यह भूमि उस समय की है, इसका पौराणिक आख्यान उस समय का है।

राम जी के समय का अयोध्या में क्या है? तो हम कहते हैं, सरयू जी हैं। आप अयोध्यावासी हैं, जरा बताइए, सरयू जी के लिए जाने के लिए रास्ता कहाँ से बताएँ? कटरा से बताएँ? गोप्रतार घाट से बताएँ? अयोध्या से तो कोई रास्ता सरयू जी को नहीं जा रहा है। आज बनी हुई सीढ़ियों से 1 किलोमीटर दूर धारा है और जो जाएगा पैदल चलकर साहस करके वही नहा पाएगा।

मैं बहुत दिनों से अखबारों में पढ़ रहा हूँ कि सांसद जी संघर्ष कर रहे हैं कि बैराज बने, कोई योजना हो, अयोध्या की सीढ़ियों पर 12 महीने नहाने भर जल हो। ये अयोध्या का विकास नहीं है।

घ. बाजारीकरण और खानपान

आप हमें यह बताते हैं कि मल्टीनेशनल ब्रांड के होटल अयोध्या में खुलेंगे, जमीन आवंटित हो गई है। वह अपने स्टार्स कम करेंगे क्या? और नहीं कम करेंगे तो माँस और मदिरा कैसे बेचेंगे? अयोध्या विकास के चरण में सबसे पहले जो चीजें खुली हैं उनमें डोमिनोज है। प्याज वाला पिज्जा मंदिर की सब कोठरियों में सप्लाई हो रहा है।

मैं अयोध्या जब आया हूँ, कोई 30 वर्ष पहले, तो सभी महत्वपूर्ण मठों पर लोहे की एक तख्ती में लाल रंग की तख्ती पर सफेद से लिखा रहता था, ‘मंदिर में प्याज-लहसुन का प्रवेश वर्जित है।’ एक सामान्य बालक अयोध्या आएगा, किसी कमरे में रुकेगा, मंदिर की पतली दाल उसे पसंद नहीं आएगी, वह ऑर्डर करेगा और जो चाहेगा वह मंदिर की कमरे में बैठकर खाएगा और डस्टबिन में कचरा फेंककर चला जाएगा। कौन सुनिश्चित करेगा ये? और डोमिनोज नहीं खुलता तो अयोध्या का क्या बिगड़ जाता?

जब मैं जिम्मेदार लोगों से पूछता हूँ, हालाँकि मेरी क्या बिसात है कि मैं पूछूँगा, पर कुछ लोग कभी प्रेमवश बैठ जाते हैं, तो मैं उनसे जानना चाहता हूँ कि यह सब कैसे हो रहा है? तो जो त्रासद सच्चाई सामने आती है कि असल में यह सब सरकार की योजना नहीं है, यह बाजार की योजना है। बाजार के लोग सरकार के प्रतिनिधियों के पास जाते हैं, अपना प्रोजेक्ट रखते हैं, उनको लाभ-लोभ दिखाते हैं, उसकी सार्थकता समझाते हैं, पास कराकर ले आते हैं। सरकार तो तब जान पाती है जब अखबारों में छपने लगता है कि यह गड़बड़ हो रहा है।

ङ. गरीब अयोध्यावासियों का विस्थापन

गोप्रतार घाट पर दशकों से वहाँ के निर्धन लोग चाय-पकौड़ी बेचकर यात्रियों को अपनी आजीविका चलाते थे। फूड कोर्ट बन गया। वो लोग निर्धन-विपन्न हो गए। दुकानें बन जाएँगी, उनको अलॉट की जाएँगी।

आप आश्चर्य करेंगे, मैं किसी के व्यक्तिगत विवरण यहाँ नहीं देना चाहता हूँ। सांसद जी बैठे हैं, चर्चा हुई। मैंने दसों लोगों को शासन के फोन किया कि ये बच्चे भीख माँगने की स्थिति में हैं। 15 साल से, 20 साल से यहाँ झुग्गी थी इनकी। इन दुकानों को थोड़ा प्राथमिकता के आधार पर इनको मिल जाए। उन बच्चों ने 30-30, 32-32 लाख लोन किए। कहा, महाराज जी, चाहे जितना पैसा लगेगा, हम दुकान नहीं छोड़ेंगे अपनी।

आप आश्चर्य करेंगे, वो दुकानें 80-80 लाख में आवंटित हुईं। और जिन्होंने आवंटित कीं वो बंद करके रखे हुए हैं, किसी को किराए पर देंगे। 80 लाख अयोध्या का आदमी खरीदकर दुकान चलाने की हैसियत में थोड़े ही होगा।

कौन सी अयोध्या हमारी स्मृति में? बीती शताब्दी में अयोध्या का सबसे प्रसिद्ध दर्शन का मंदिर कनक भवन है, इस नई अयोध्या में कोई खबर उसके बारे में भी छपी है कहीं? वह बाहर है हमारी चर्चा से।

अब आपको अयोध्या में जातीय पहचान के मंदिरों की खबरें मिलेंगी। साधुओं को, पहली बार, रामानंद संप्रदाय में नया शासन जातीय वर्गीकरण के आधार पर परिभाषित कर रहा है ताकि वे साधु अपने-अपने समाजों को वोट के लिए तैयार कर सकें। ऐसा दुर्भाग्य अयोध्या में कभी घटित नहीं हुआ था। किस शासन की बात मैं करूँ आपसे? कहीं नहीं कह सकता हूँ। अयोध्या पर्व में मैं यह बात कह सकता हूँ।

अयोध्या की आत्मवत्ता: साधु-परंपरा और महापुरुष

मुझे नहीं पता इसके आयोजकों को इससे क्या परेशानी होगी। पर मुझे लगता है मैं यहाँ कह सकता हूँ, राय साहब की उपस्थिति में मैं अपनी परेशानी के लिए तो राजी हूँ। चंपत जी बैठे हैं, इसलिए कुछ ज़्यादा विवरण के साथ मैं कह दे रहा हूँ इसको।

वह अयोध्या जो श्री राम मंगल दास जी से जानी जाती थी, और हमारी पीढ़ी की अयोध्या में, हमसे थोड़ा पहले उमेश जी यहाँ बैठे हैं। इन्होंने लिखा है ‘अयोध्या के ध्रुवतारे’ और उसमें एक सिद्ध हमारे सामने बैठा हुआ है जो दिवंगत हुई हज़ार वर्षों के महापुरुषों की वाणियाँ अपनी ध्यानकाल में सुनता है, उनको फिर से लिपिबद्ध कर देता है। यह नई अयोध्या कहाँ खोज रही है? राम मंगल दास और उनकी परंपरा को, मैं इस बात से चिंतित हो जाता हूँ।

स्वामी विवेकानंद अपने गुरुभाई स्वामी अखंडानंद को लेकर के अयोध्या आए, लक्ष्मण किला के प्रथम महंत पूज्य पंडित श्री जानकीवर शरण जी महाराज से मिलने। रात में भेंट नहीं हो पाई। वो जाना चाहते थे। अखंडानंद जी ने कहा, इनसे मिलाए बिना मैं आपको ले नहीं जाऊँगा। यह स्वामी अखंडानंद जी हैं जिनके पास पूज्य गुरु जी गए थे। आपको रुकना पड़ेगा, मैं इनसे मिलाए बिना ले नहीं जाऊँगा।

यह वह समय है जब स्वामी विवेकानंद बहुत उद्विग्न थे। पंडित जानकीवर शरण जी से उनकी भेंट हुई। स्वामी जी अभिभूत हो गए उनसे मिलकर। आप उनकी चिट्ठी पढ़ें, उमेश जी आपको उपलब्ध करा देंगे, इंटरनेट पर भी मिल जाएगी। एक पूरा लेख है स्वामी विवेकानंद का जो इस पंक्ति पर खत्म होता है कि ‘I have seen a real holy man.’

कहीं गलती से कोई दूसरा विवेकानंद किसी काल में अयोध्या आएगा तो कौन से पंडित जानकीवर शरण के पास जाएगा? कहाँ है लक्ष्मण किला? जहाँ यात्री-सुविधा और पार्किंग बनी है। जो पौराणिक तीर्थ थे उनकी जगह पर मल्टीलेवल पार्किंग बन रही है।

पाँच कोस की अयोध्या के भीतर आप पूरा विश्व उतार देना चाहते हैं। वाल्मीकि कहते हैं, ‘न आयते दृष्ट द्वादश योजन महापुरी’, यह 12 योजन लंबी है, तीन योजन चौड़ी है। आप इतना छोटा मन क्यों करते हैं? 12 योजन की अयोध्या क्यों उद्भाषित नहीं करते?

तो धन्यवाद है सांसद जी को, नितिन गडकरी जी को कि 84 कोसी परिक्रमा को इन्होंने जीवित करने का काम किया है।

अयोध्या की आत्मवत्ता आपके बजट से परिभाषित नहीं होती। यह सारा बजट काल के गाल में चला जाएगा। अयोध्या परिभाषित होती है उस सनातन स्मृति से जिसको हमारे पूर्वजों ने बचाकर रखा है, जिसको तपस्वियों ने बचाकर रखा है। साल भर भिक्षा माँगकर 360 दिन अपने यहाँ आए हर व्यक्ति को बिना उसका परिचय पूछे भोजन कराने वाली अयोध्या, सब जगह रेट कार्ड लगाने लग गई है। यही हमारी अयोध्या है।

दो कमरों के जो घर थे उनमें भी एक कमरा किसी होटल को दे दिया गया है। यही हमारी अयोध्या है। 1 इंच जमीन किसी के लिए खाली बचने वाली नहीं है खड़े रहने के लिए। कहाँ रहेंगे मधुकरिया जो जमीन रजिस्ट्री नहीं करा सकते?

सैकड़ों-सैकड़ों मधुकरिया, 1 बजे, डेढ़ बजे, अयोध्या की सड़कों पर नंगे बदन, कमर में गमछा लपेटे, लंगोटी लगाए, तुम भी लौकी के लिए हुए, मधुकरी माँगने निकलते थे। जिन्होंने अयोध्या देखी है वह जानते हैं। वो कहाँ गए? आप कह सकते हैं कि हमने भगाया नहीं उनको, वातावरण भी नहीं बनाया आपने कि वह रह पाएँ।

मैं बहुत दुख के साथ यह कहता हूँ, अयोध्या में रहते हुए यदि प्रशासन के कुछ लोगों से आपका व्यवहार नहीं है तो आपका जीना दूभर हो जाएगा। यह आत्मवत्ता है महात्मा की! सारे भारत में घूमकर जिन महात्माओं के पाँव धोकर पिए जाते हैं, वह अयोध्या के प्रशासन के लिए केवल ‘आसामी’ हैं, साधु भी नहीं हैं। यह दृष्टि आप बना रहे हैं अयोध्या के बारे में, उनको गनर देकर के।

पर्यावरण, सरयू और अयोध्या का भूगोल

भविष्य में जो लोग, मैं इस बात को इस तरह भी कहना चाहता हूँ कि एक नए तरह के अर्थ का विकास हुआ है। पैसे उड़ाने वाला समाज कई तरह की प्राकृतिक, राजनैतिक, सामरिक आपदाओं के कारण धीरे-धीरे फाइनेंशियल मोड के लिए बहुत अवेयर हुआ है, कम खर्चे की ओर बढ़ रहा है। आज भी आपके सामने तेल-पेट्रोल के संकट हैं। तो हनीमून के लिए गोवा जाने वाले जोड़े यदि अयोध्या आने लगेंगे तो आप खुश हो जाएँगे कि अयोध्या बहुत विकसित हो गई है। अयोध्या आए हुए व्यक्ति को क्या मिलेगा अयोध्या में?

इतने दिनों में अवध विश्वविद्यालय नाम का एक संस्थान, जो अयोध्या का विश्वविद्यालय है, उसके अपने पास हिंदी विभाग की कक्षाएँ नहीं हैं। ठीक है? आप अभी अयोध्या में घूमने लग जाइए कि सभी प्रकार के रामायण का संग्रह किस पुस्तकालय में है। तो आदरणीय जनपद जी बैठे हैं, अभी आपने एक बड़ा संस्थान लिया है, उस पर काम शुरू कर रहे हैं, कौन सी जगह है जो सभी प्रकार के रामायण को एकत्र करके देगी पढ़ने के लिए?

कहाँ है रामानंदी लहरी? कहाँ है स्वामी? इतनी बड़ी अयोध्या, हजारों करोड़ का कारोबार, रामानंद संप्रदाय की, गोस्वामी तुलसीदास की समस्त टीकाओं का, एक आचार्य, स्वामी श्रीकांत शरण जी, किसने छापा उन टीकाओं को? क्या अयोध्या के संतों की महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन अयोध्या का विकास नहीं है? क्या अयोध्या की परंपराओं का अनुसंधान अयोध्या का विकास नहीं है?

नजूल की जमीनें पर्चाशुदा और पट्टाशुदा के लिए राजस्व के लोग नाच रहे हैं अयोध्या में। अयोध्या में संत परंपरा के कितने लोग हैं? उनकी क्या श्रेणियाँ हैं? उनकी क्या मर्यादाएँ हैं? इस पर कौन सा काम हो रहा है? कहाँ है लश्करी? कहाँ है जमाती? कहाँ है आचारी? कहाँ है बैरागी? कौन पूछता है? अयोध्या इनसे बनती है।

जब सरकार एक भी पैसा नहीं देती थी तब भी अयोध्या आया हुआ आदमी किसी मठ में जाकर मुफ्त का भोजन पा लेता था। हमें वजीफा देकर संस्कृतियों को जिंदा रखने की कुंठा के बाहर निकलना पड़ेगा। संस्कृतियों की अपनी एक आत्मवत्ता होती है। उनके संरक्षण की दिशा में शासन को काम करना पड़ेगा। अभी शासन के पास ऐसी दृष्टि मुझे दिखाई नहीं पड़ती।

तो मुझे ध्यान नहीं है कि मैं कितनी देर बोल चुका हूँ और मुझे कब पूरा करना है। लेकिन सब अयोध्यावासियों की आवाज है न, इसलिए सबको ठीक लग रहा है। ये भारतवासियों की आवाज है।

आप यह मत समझना कि मैं कोई अयोध्यावासियों का वकील बनकर खड़ा हुआ हूँ। भारत की स्मृति में एक अयोध्या है।

थोड़ा पुराण काल में चले जाइए, और महाराजा नल के जब दुर्दिन आते हैं और अपना बुरा समय मुझे काटना है, मेरा सर्वस्व छिन गया है, मैं कहाँ जाऊँगा? तो मेरा पार्थिवत्व छिप जाएगा। वह राजा हैं। उनके चलने से, फिरने से, उठने से, बैठने से, बोलने से दिखता है कि यह पार्थिव हैं। और जुए में सब कुछ हार गए हैं। जुए में अपना सर्वस्व खो चुका एक सम्राट आश्रय खोजता है, मैं कहाँ जाऊँगा? तो मुझे छिपाया जा सकता है, मुझे संभाला जा सकता है। तो अयोध्या आकर साई होकर अपना साल काट लेते हैं।

वह आज जिसके जेब में माल नहीं होगा अयोध्या क्यों आएगा? अयोध्या तो आश्रय है, जिनके लिए जो सब छोड़ चुके हैं, वह अयोध्या आएँ। वानप्रस्थ के लोग यहाँ आते हैं। संन्यास के लोग यहाँ आते हैं। अपना सर्वस्व खो चुके लोग यहाँ आते हैं। अयोध्या राजनैतिक-त्वाकांक्षा से परिभाषित नहीं होती। अयोध्या पाने के संघर्ष का नगर नहीं है। अयोध्या सब कुछ त्याग देने पर भी आपको हीन नहीं बनने देने की आत्मवत्ता का नगर है।

14 वर्ष तक अयोध्या का राजा धरती में गड्ढा बनाकर, अश्वपूरित होकर बैठता है, और अयोध्या अराजक नहीं होती। पहले आपने कहा कि बहुत संकट है, खराब सरकारें थीं, अधिग्रहित करके छेड़ दिया था, यहाँ यह बैरियर, यहाँ यह बैरियर, यहाँ बैरियर आपने बढ़ाए ही हैं। बैरियर कम तो हुए नहीं हैं। और उन बैरियर्स पर खड़े हुए लोग सीधे मुँह बात नहीं करते, न साधु से, न गृहस्थ से। किसी को अच्छा लगे, बुरा लगे, यह दुख है अयोध्या का।

इतने दिनों में भी, अभी आदरणीय चंपत जी बैठे हुए हैं, तो मैं फिर यह बात कह रहा हूँ। श्री राम मंदिर में देश भर से आए हुए साधुओं के लिए कोई एक अलग मर्यादापूर्ण पंक्ति हो, मुझे इसका ज्ञान नहीं है। जटाधारी बाबा जी को भी वहाँ पब्लिक के रेले के बीच ही आना है। या तो इनसे हम कह दें, तो यह मेहरबानी करते हैं तो हम लोगों को कहीं अलग से भी दर्शन करा देते हैं। पर इसकी कोई व्यवस्थागत योजना अभी नहीं है। ये पहले दिन से होनी चाहिए थी।

ये वो राम हैं जो अपने यहाँ महात्मा के आने पर अपना पीतांबर उतारकर नीचे बिछा देते हैं कि इस पर बैठिए। सारी दुनिया तो अयोध्या में साधुओं को लाइन से बाहर कर ही चुकी है। अगर अयोध्या भी, मथुरा भी साधुओं को लाइन में लगने के लिए कर देगी तो फिर हम कहाँ जाएँगे? साधु होना बंद हो जाएँगे लोग।

एक खराब वातावरण शासन ने निर्मित किया है जहाँ साधुओं की नागरिकता निरस्त है। यह तीर्थ हमारे आश्रय हैं। इन तीर्थों में भी नगरीय कुंठाओं का प्रभाव इतना हो गया है कि साधु अपने को दोयम दर्जे का, तीसरे दर्जे का, चौथे दर्जे का रखेगा।

आज मुझे स्मरण होता है, पूज्य स्वामी किलाधीश जी, स्वामी सीताराम शरण जी महाराज। साकेत महाविद्यालय बना तो महाराज जी ने कहा था, इसको बाहर ले जाना चाहिए। वो प्रतिगामी नहीं थे। बीएचयू में प्रतिवर्ष उनका व्याख्यान होता था। भारत की प्रथम पंक्ति की जो विद्वत्-परंपरा थी वो किलाधीश जी महाराज का समादर करती थी, स्वागत करती थी।

तो मुझे लगता है कि बहुत अच्छे मुहूर्त में मैंने बोलना प्रारंभ किया है। तो हम लोगों के अभिभावकत्व की भूमिका में जो माननीय हैं, मनीषी, आदरणीय बड़े दिनेश जी भी यहाँ हैं, तो मैं भरोसा करता हूँ कि अयोध्या की चिंताएँ सुनने वाले इतनी विभूतियाँ हैं तो इनका कुछ मार्ग भी कहीं बन जाएगा।

स्वामी सीताराम शरण जी महाराज ने कहा था कि कॉलेज बने, थोड़ा पंचकोशी के बाहर बन जाए। वो विद्या-विरोधी नहीं थे। वो अयोध्या के अपने युग थे स्वाध्याय के। क्यों? उन्होंने कहा कॉलेज में लड़के-लड़कियाँ साथ पढ़ेंगे और यह युवक-युवतियाँ होते हैं, इनकी एक तरह की रिहाइश है, यह अयोध्या के पूरे चरित्र को बदल देंगे।

रेला अयोध्या का चलता था शाम को कनक भवन दर्शन करने के लिए महात्माओं का। गृहस्थ देखते थे, 2:30 बजे, 3:00 बजे रात से साधुओं के जत्थे सरयू नहाने के लिए जाते थे। और गृहस्थ महात्मा नदी में प्रवेश करें तो जरा किनारे हो जाते थे। आज यह स्थिति है कि साधु डरकर नहाएगा सरयू में। यह जो पर्यटक भीड़ आपने आमंत्रित की है, यह तीर्थों की भीड़ नहीं है।

राम की पैड़ी पर जो अवांछित दृश्य सामने आया और पूरे विश्व में जिसकी भर्त्सना हुई और अयोध्यावासियों को जिसके लिए लांछित किया गया, और युगल वहाँ दुर्व्यवहार कर रहे थे पानी में। बीबीसी ने उस पर रिपोर्ट की है। हम यह परिस्थिति क्यों बना रहे हैं?

क. नौकाएँ और पर्यावरण

अयोध्या के तट पर, मैं आश्चर्य करता हूँ, को कुछ चीजें देखते रहने का शौक है। हरित ईंधन की एक क्रांति विश्व में चल रही है। और दुनिया भर में जो सबसे लग्जरी क्रूज हैं उनको कैसे सोलर पर शिफ्ट किया जाए इसके लिए एक बड़ी डॉक्यूमेंट्री मैंने देखी। तो मैं आश्चर्यचकित था कि दुनिया के बड़े-बड़े पानी के जहाजों को सोलर पर शिफ्ट करने का काम कर रहे हैं। हरित ईंधन की ओर जाने की बात हो रही है।

इतने दिन से अयोध्या में काम हो रहा है, आप अयोध्या की हजारों नौकाओं से पेट्रोल-डीजल वाला मोटर नहीं निकलवा पाए हैं। कौन सी दृष्टि से आप अयोध्या बना रहे हैं? सरयू के घाट से मछलियाँ भाग गई हैं क्योंकि धारदार ब्लेड वाले पंखे लगाकर हजारों नाव में पेट्रोल भरकर नाचती हैं। समुद्र में चलती हुई नौकाएँ हरित ईंधन की हो सकती हैं, अयोध्या की नौकाएँ कोई विदेश यात्रा तो कर नहीं रही हैं। आधे घंटे घूमने के लिए पर्यटक बैठते हैं। सरकार क्यों आदेश नहीं कर सकती कि मोटर नौकाएँ नहीं चलेंगी, चप्पू नाव में चलाओ।

एक और, हम पर्यावरण संरक्षण की बात करते हैं, अयोध्या के विकास के नाम पर कहीं-कहीं के थके-हारे बीमार जहाज लाकर सरयू की रेत में पाट दिए गए हैं। यह जटायु हैं, यह गरुड़ हैं। यह तमाशा करने की, अयोध्या क्रूज, नदी में नहाने का पानी नहीं है, आप क्रूज चला रहे हैं। क्यों चला रहे हैं? क्योंकि बाजार वाले ने समझा दिया है और जिनको क्रूज चलाने की अनुमति देनी है वह लाभान्वित हैं, इसलिए चल रहा है।

सरयू में क्रूज चलाने की क्या ज़रूरत आपको है? कहाँ जाना है आपको? साल के आठ महीने जिस नदी में गहरा पानी नहीं रहता, न गुप्तार घाट पर पानी है, न नया घाट पर पानी है।

ख. घाटों के नाम और पहचान

मैं कितने दिनों से कह रहा हूँ कि अयोध्या ब्रह्मांड की सबसे पुरानी नगरी है, विष्णु अध्यापुरी, इसको नया घाट क्यों कहते हो? ये नया कब से हो गया? इस घाट पर हमारी पीढ़ियाँ नहाकर चली गईं। ये पुराना घाट है। आपने पत्थर नहीं लगाए, घाट को नया घाट कर दिया। कोई संगमरमर घाट हो जाएगा, कोई ग्रेनाइट घाट हो जाएगा।

और इस पर हम क्या कर रहे हैं? डेढ़-दो वर्ष पहले माँगा गया था, अयोध्या के चौराहों के नाम क्या हो सकते हैं? अपनी शक्ति के अनुसार मैंने पूरी फाइल बनाकर दी। पूछा गया कि इसकी रीजनिंग करिए। आपने जो नाम रखे हैं उनके लिए पूरा औचित्य लिखा मैंने। मुझे कहा गया कि बहुत संस्कृत और बहुत पसंद किया गया है और बहुत शीघ्र अयोध्या के चौराहे रामायणकालीन परिचयों के साथ जाने जाएँगे।

लंबा समय बीत गया। एक दिन वो महानुभाव फिर मिल गए, कहीं और चले गए हैं, बड़े पद पर। मैंने उनसे पूछा कि बाबू जी आपने इतनी मेहनत करवाई हमसे। तो वो बोले, अयोध्या का चुनाव परिणाम बदल गया, सरकार जरा ठिठक गई है।

यही निष्ठा अयोध्या बनाती है? मर गए पिता दशरथ, अयोध्या अनाथ हो गई, भरत ने कहा गद्दी पर नहीं बैठूँगा, अयोध्या रहे चाहे धंस जाए। मेरा संबंध अयोध्या राजधानी से नहीं है, मेरा संबंध श्री राम के चरणों से है। और मेरी प्रतिबद्धता एक है।

जिनकी सीट गई है, वह अयोध्या में पूर्ववत लगे हैं, बैठे हैं यहाँ अयोध्या पर। यह भी छोड़ देते कि, छोड़ो, अब अयोध्या का कोई दूसरा सांसद अयोध्या पर्व करे। आप इतनी हीन भावना से भरे हुए हैं कि यहाँ से हमको वांछित परिणाम नहीं मिले हैं, तो इस अयोध्या के प्रति हमारी सेवापरायणता कुंठित हो गई। इसी से अयोध्या बनती है।

ग. दक्षिण के वृक्ष और अयोध्या का भूगोल

तब मैं कहता हूँ कि यह राजनीतिक-त्वाकांक्षा से जो प्रयोग हो रहे हैं, यह अयोध्या को अयोध्या नहीं बनाते। तब हमें पहचानना पड़ेगा। अयोध्या बैरागियों की सराय कहलाती है। देश इन साधुओं के पास आना चाहता है। आपके लोग इनके पास कब गए?

इतना हीन आपने कर दिया है कि 10-10, 20 साधु लोग लाइन लगाए खड़े हैं किसी महानुभाव के यहाँ फोटो खिंचाने। एक सर्वे करिए, अभी देश-प्रदेश के बड़े मंत्रियों के यहाँ घूमिए और बताइए उनके यहाँ कितने साधुओं के फोटो लगे हुए हैं। और फिर एक बार मठों में घूमिए और फिर देखिए कितने मंत्रियों के फोटो लगे हैं। आपने कौन सा चरित्र बनाया है अयोध्या का? यह हीन भावना कहाँ से पैदा हुई है?

‘राजा का आलस्य कारणम’, आप यह नहीं कह सकते कि साधु बिगड़ गए हैं, साधु बहक गए हैं। आपने उनको इस अवस्था में ले जाने का वातावरण निर्मित किया है। आपने यह कुंठा पैदा की है कि यदि आपके प्रिय नहीं होंगे तो जीवन सुलभ नहीं होगा। यह आपका कर्तव्य था कि अयोध्या को उसकी आत्मवत्ता लौटाइए।

श्री राम राज्य की बात हम करते हैं। श्री राम लौटकर आए। जनता के नाम संदेश उन्होंने जब जारी किया, श्री राम ने पहली बार ‘मन की बात’ बोली थी, तो कहा ‘जो अनीति कछु भाखो भाई, तो मोहि बरजहु भय बिसराई।’ मैं कोई राजा नहीं हूँ, आप प्रजा नहीं हैं। यह अयोध्या वैसे ही आपकी है जैसे मेरी है, या मुझसे कुछ ज़्यादा आपकी है। उन 14 वर्षों में जब पिता के वचनों की रक्षा के लिए मैं वन चला गया था, अयोध्या के प्रति अपनी सेवा नहीं कर पाया था। उन विपरीत, प्रतिकूल परिस्थितियों के 14 वर्षों में आप लोगों ने इस अयोध्या को अयोध्या बनाकर रखा है।

श्री राम अयोध्यावासियों के ऋणी हैं। मैं 14 वर्ष बाद लौटता और यह अयोध्या मेरे बैठने लायक नहीं होती तो मैं नहीं लौटता। मैंने हनुमान को पहले भेजा था। मुझे अयोध्या ने भरोसा दिलाया कि मैं 14 वर्ष बाद भी लौटकर यहाँ सिंहासन पर बैठ सकता हूँ। तो मैं अयोध्या आया हूँ। मैं वन में रहकर देख चुका हूँ, मुझे अनुकूलता है, यह अयोध्या है।

14 वर्ष बाद लौटने के बाद राम को अपनी अयोध्या मिलती है, वैसी जिस अयोध्या में राम राजा हो सकते हैं। और वह कहते हैं कि यह तुम सब की है।

श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, परब्रह्म हैं। और वे श्री राम अपनी सारी मर्यादा को ताक पर रख देते हैं। भारतीयता के इतिहास में, मनुष्यता के इतिहास में, धर्म और अध्यात्म के इतिहास में, जहाँ हमको पढ़ाया गया है कोई न संग मरे। हमारे धर्मशास्त्र कहते हैं एकाकी आता है व्यक्ति, एकाकी जाता है। श्री राम ने सारे लिखे-पढ़े को एक किनारे कर दिया, सारे अयोध्यावासी मेरे साथ जाएँगे।

आप दुनिया का इतिहास उठाकर देखिए, कभी कहीं नहीं हुआ है। क्यों किया श्री राम ने? यदि मैं इनको पीछे छोड़ जाऊँगा तो मेरे वनवास आदि को आरोप करके इन अयोध्यावासियों का तिरस्कार किया जाएगा। यह अयोध्यावासी उतने ही पवित्र और सुयोग्य हैं जितने श्री राम हैं, यह बात विश्व के सम्मुख प्रमाण हो जाए। ब्रह्मा को उन्होंने कहा, सब मेरे साथ जाएँगे। और ले गए।

ऐसे अयोध्यावासियों के प्रति आपकी दृष्टि कैसी है? और भविष्य की अयोध्या कैसी होने वाली है जो अयोध्यावासियों से पानी नहीं खरीदना है, ये बड़े कृत्घ्न हैं, जो अयोध्यावासियों से कहती है कि हमने राम मंदिर बना दिया है, इसलिए तुम हमको अपना प्रत्याशी जिता करके दो।

डील की है आपने। दिल्ली भी अयोध्या ने दी है आपको, यह बात भूलना नहीं चाहिए। और जिस दिन इस पुण्य का क्षय हो जाएगा सारे समीकरण धरे रह जाएँगे। भारत अपनी आत्मवत्ता को श्री राम से पाता है। आप उस आत्मवत्ता को छीन लेना चाहते हैं।

अयोध्या को अयोध्या बनाना

अयोध्या को अयोध्या बनाने का अर्थ है, इसे भारत की आध्यात्मिक पुरी के रूप में स्थापित होने देना। आप कर नहीं सकते। मैं करना नहीं कह रहा हूँ। आप ध्यान रखिएगा, आप नहीं कर सकते। आप आध्यात्मिक नहीं हैं, आप राजनीतिक हैं। जो कर सकते हैं उनको आप यह अवसर दीजिए या अवकाश दीजिए कि वह कर सकें। और इस करने में जो बाधा है उनका आप निग्रह करिए, आपके पास शक्ति है।

कोई सीमा है, कोई मीटर है जो बताए अयोध्या किससे बनती है, किससे बिगड़ती है? वर्षों पहले सरकारी मीटिंग में ऑफिशियली मैंने कहा था, आप लखनऊ में रिवर फ्रंट देखते हैं, गुजरात में रिवर फ्रंट देखते हैं। अयोध्या में कटरा की तरफ रिवर फ्रंट बनाइए और विश्व की कंपनियों को, लग्जरी की कंपनियों को बुला दीजिए कि जो कर सकते हो करो। उनसे पैसा वसूली, वहाँ टैक्स रखिए। घूमने वाले लोग आएँ, समाज वैसा है, उसकी रुचि वैसी है।

अयोध्या के घाट तो छोड़ दीजिए, वो वेडिंग शूट के लिए नहीं बने हैं। वो मस्ती करने आए युवाओं के लिए नहीं बने हैं। वो रील बाजों के लिए नहीं बने हैं। भला आदमी रामपैड़ी पर आधे घंटे ठहर नहीं सकता, ऐसी रामपैड़ी हो गई है। और आप खुश हैं भीड़ का वीडियो चलाकर कि अयोध्या हमने बनाई है। यह धोखा है।

अयोध्या का एक चरित्र है, वो अध्यात्म से, वो धर्म से, वो शील से, वो सदाचार से जन्म लेता है। और इसके लिए शासन एक अनुकूल वातावरण दे सकता है। अभिभावक निर्माण नहीं करता, कुमार की तरह बैठकर, वह संतानों की संभावना के अनुरूप वातावरण दे सकता है। फिर वह विकसित होते हैं अपने पुण्यबल से। और वह वातावरण अभी तक अयोध्या में नहीं बना है।

छोटी सी बात मैं कहता हूँ आपके सामने। हाईवे पर अयोध्या के, आप शाहादतगंज से प्रवेश करिए, नया घाट तक जाइए। हाईवे के बीच के डिवाइडर पर रामभद्र, हनुमान जी महाराज, महर्षि वाल्मीकि, वर्षों से बैठे हैं। किसलिए? न सिर पर छतरी है, न कोई आवरण है। ट्रकों की धूल फाँकते हुए और गाड़ियों से शीशा खोलकर थूकते हुए ड्राइवर उनके 2 फीट दूर से गुजरते हैं। सब कुछ आपके लिए तमाशा है, सब आपके लिए सिंबल है।

सब जगह आप खेल की तरह देवी-देवताओं को। फिर मंदिरों में बैठे रामभद्र क्या करेंगे? यदि सड़कों पर भी उन्हीं से ही सजावट होती है, तो दक्षिण के पेड़ मँगाकर भर दिए गए सड़कों पर। यह पाम ट्री हैं। अरे उत्तर भारत में, अयोध्या की भूमि में, जिसकी चर्चा महर्षि वाल्मीकि करते हुए पेड़ों का नाम गिनाते हैं, वहाँ आप मलयालम के, केरल के वृक्ष क्यों लगा रहे हैं? ये अयोध्या है क्या? अयोध्या की जलवायु में कौन से वृक्ष होते हैं?

आप पाँच गुना, 10 गुना अधिक पेमेंट करते हैं, फिर उन पेड़ों की रखवाली करते हैं, छायादार वृक्ष वहाँ क्यों नहीं लगते? अयोध्या के भूगोल में होने वाला अन्न, अयोध्या के भूगोल में होने वाली फसल, अयोध्या के भूगोल में हवन।

इतने दिनों की परंपरा में अयोध्या से रामायणियों की कथा-परंपरा लगभग शून्य होने को है। पूरे भारतवर्ष में रामायण की कथा कहने के लिए अयोध्या के मानस-रामायणी जाते थे और वे प्रामाणिक थे। पूज्य पंडित रामकिंकर जी महाराज बैठकर कहते थे और वो सारे भारत का साधु उनको सुनता था। श्री रामचरित की दार्शनिक निष्पत्तियाँ जो उन्होंने की हैं वह असाधारण है और उसकी एक परंपरा है।

अयोध्या में रामचरितमानस ‘पढ़ी’ नहीं जाती, ‘लगाई’ जाती है। वृंदावन में भागवत ‘पढ़ी’ नहीं जाती, ‘लगाई’ जाती है। आपके लोगों को तो यही पता नहीं है कि पढ़ने में और लगाने में अंतर क्या है। कौन सा संस्थान आपने बनाया जहाँ अयोध्या के पारंपरिक पद्धति से रामचरितमानस और गोस्वामी जी के द्वादश ग्रंथों के लगाने की पद्धति चलेगी?

कहीं भी, आपने, मैंने पहले भी कहा, अयोध्या को निर्मित नहीं करना है। अयोध्या को रिस्टोर करना है। हमारे धर्म की और अध्यात्म की सप्तपुरियों में जो मस्तकस्थ पुरी है, कालक्रम से उस पर धूल पड़ गई है। आपको वो धूल हटानी थी। अयोध्या तो स्वतः चमकने लगती। आपने रंग चढ़ाना शुरू कर दिया।

इतनी समझ आपके लोगों को नहीं है कि भित्तिचित्रों में क्या बनाया जाता है। कहीं राम बना दिए हैं, कहीं सीता बना दिए हैं, कहीं हनुमान बना दिए हैं, चाहे लोग थूकें, चाहे लोग गंदगी करें, चाहे लोग कूड़ा फेंकें। हमारे मोबाइल में कहीं फोटो पड़ी होगी तो मैं आपको दिखाऊँगा, ओवरब्रिज की साइडवाल पर रामायण सीन बने हुए हैं और ऊपर से किसी ने फेंका है, धागे में फँसकर जूता सिर पर लटका हुआ है। मैंने मोबाइल में चित्र करके रखा है।

दीवारें सजाने के लिए रामायण कथाएँ नहीं हैं। उनके लिए आप चित्र दीर्घा बनाइए, उनकी सुरक्षा रखिए, उनकी मर्यादा रखिए, उनके पीछे-सामने से रेलिंग वाल्व बनाइए कि कोई उन्हें टच न करे। राम हमारे आराध्य हैं। आप उनको सिंबल बनाकर मिसयूज करते हैं, उनका अवमूल्यन करते हैं। राम प्रतीक नहीं हैं, उनके प्रतीकात्मक अर्थ भी हैं, वह चरित्र को ठीक करने की दृष्टि से हैं।

तो अयोध्या बनाने के विश्वकर्मा जो भी हैं, मुझे पता भी नहीं है ठीक से कि कौन हैं, पर मुझे लगता है कि मैं यहाँ कहूँगा तो हो सकता है कहीं से वह सुन लें क्योंकि पहुँच होती है, लोग सुन लेते हैं। आदरणीय बड़े दिनेश जी बैठे हैं तो मुझे लगता है मेरी बात पूरी हो जाएगी।

मैं कह दे रहा हूँ इसलिए, एक बार बहुत धैर्यपूर्वक इस बात का एक अनुसंधान करना चाहिए। कोई आयोग बनाकर, कोई कमेटी बनाकर, कि क्या करने से अयोध्या अयोध्या जैसी हो जाएगी। हो सकता है शासन ने किया हो, मुझे पता नहीं है। जितने शोज बने हैं, जितनी डॉक्यूमेंट्रीज बनी हैं, जो लिखा-पढ़ी हुई है, वो इतनी सतही और गैर-जिम्मेदार है कि उसको देखकर लज्जा होती है।

हम जब भविष्य देखने जाते हैं तो हमें अतीत देखना पड़ता है। ब्रिटिशर्स आए, उनके समय में गोप्रतार तीर्थ पर पत्थर लगाया गया। ‘इस घाट पर कपड़े धोना, मछली पकड़ना दंडनीय अपराध है।’ धन्य है वह कि उनको इतनी तमीज थी। अयोध्या के साधुओं की माँग पर उन्होंने एक कार्यक्रम किया, अयोध्या के तीर्थों में हम एक संरक्षण की विधि के लिए स्मारक पत्थर लगवा देंगे। उन्होंने पत्थर लगवा दिए।

इतने दिनों के कार्यकाल में आपकी सरकार ने उन पत्थरों की लिस्टिंग करके अगर उनका मौका-मुयना करवा लिया हो तो मुझे बताइए। कहाँ है वामदेव? कहाँ है शतबलि? कहाँ है दुर्भर सरोवर? कहाँ खो गए हमारे कुंड? कहाँ खो गए हमारे पौराणिक महत्व के स्थल? कहाँ है वाल्मीकि आश्रम? यह आपकी रुचि का विषय नहीं है क्योंकि बाजार इस पर कोई प्रोजेक्ट लेकर नहीं आते।

अयोध्या में होने वाले अधिकांश काम बाजारों के प्रपोजल से पास हुए हैं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

मुझे याद आता है, जब मैं देखता हूँ बाजार की बात मैं दोबारा कर रहा हूँ। नगर की बात कर रहा हूँ। एक शब्द है ग्राम, एक शब्द है नगर। हमारे शास्त्रकार कहते हैं कि ग्राम किसे कहते हैं? गाँव किसे कहते हैं? और आपको रोमांच होगा, वह इसकी परिभाषा करते हुए कहते हैं कि जिस बस्ती में दुकान न हो, दुकान-रहित बस्ती को गाँव कहते हैं। क्यों? मनुष्य के चरित्र को दुर्बल करने में बाजार मुख्य भूमिका निभाते हैं। इन्हें हमेशा आबादी से दूर होना चाहिए। बिना योजना के कोई व्यक्ति बाजार न पहुँचे।

हमने घर और बाजार एक कर दिए हैं। अयोध्या में बाजार क्या है, पता ही नहीं है। कोई रेगुलेशन है क्या कि कहाँ दुकान खुल सकती है, कहाँ नहीं खुल सकती? आपने एक सीमा बनाई है कि इसके भीतर अंडा नहीं बिकेगा। आपको सीमा चेक करनी हो तो जहाँ अंडे का ठेला खड़ा हो वहाँ से जान लीजिएगा कि यहाँ सीमा खत्म हो गई। यह प्रत्यक्ष बता रहा हूँ मैं, कोई कल्पना नहीं है।

हमारी दृष्टि क्या है? और इस अयोध्या के प्रति हमारी निष्ठा क्या है? और यह अयोध्या यदि इस उपकार से उपकृत होकर हमको लौटाकर वोट का उपहार नहीं दे तो अयोध्या अयोध्या नहीं रहेगी, यह ठीक नहीं है।

निश्चित रूप से अयोध्यावासी और मैं, हम सब इस व्यवस्था के हज़ार बार कृतज्ञ हैं, इसके ऋणी हैं। बिना राजनैतिक इच्छाशक्ति के अयोध्या में जो काम हुआ है, यह नहीं हो सकता। और इसके लिए मैं अयोध्या में बहुत लांछित हुआ हूँ, इतनी प्रशस्तियाँ मैंने लिखी हैं सरकार की। हमारे लोगों ने हमें टोका है कि इतने गुणगान सरकार को नहीं करने चाहिए। तो मैंने कहा, हम ऋणी हैं, इसलिए करते हैं।

इन आंदोलनों को, लोकतंत्र में बहुत सारी शक्ति अंततः संविधान और सरकार में होती है, उन लोगों को ठीक है, पूरा करना है, धन्यवाद दिया जाना चाहिए। लेकिन कोई उपकार, उपकार नहीं रह जाता जब आप बदला लेते हैं। कोई दान, दान नहीं रह जाता जब आप प्रतिदान लेते हैं। और किसी सरकार को, ‘हमने यह किया है, इसलिए हमको आप यह लौटाएँ’, ऐसी अपेक्षा लोक से नहीं रखनी चाहिए। यह डील है, यह बाजार है, यह चरित्र नहीं है।

अयोध्या को अयोध्या की आत्मवत्ता में प्रतिष्ठित होना चाहिए और भविष्य में हमारी आने वाली पीढ़ियाँ जब अयोध्या आएँ तो उन्हें राम की अयोध्या मिले, सरकार की और पार्टियों की अयोध्या न मिले। मेरी चिंता इतनी ही है।

इस आशय को आप समझ पाए। इतने धैर्यपूर्वक आपने मेरी इस वेदना को सुन लिया। इसके लिए मैं आप सबका आभारी हूँ। विशेष रूप से श्री राम बहादुर राय जी का, लल्लू सिंह जी का, जो वो यहाँ आयोजन करते हैं।

कुछ बातें मेरे कहने में किसी को कम अच्छी लगी हों तो उसके लिए मैं संकोच व्यक्त करता हूँ। पर आप जानते हैं, चीख की कोई लय नहीं होती। मैं इसे ऐसे ही कह सकता था, इसलिए मैंने इसे ऐसे कहा है।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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