ए आर रहमान
दिलीप कुमार से ए आर रहमान बनने की मनोवैज्ञानिक यात्रा और धर्मांतरण का सच
वर्तमान समय में जब देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एक नई बयार बह रही है और समाज अपने मूल और जड़ों की ओर लौटने का प्रयास कर रहा है, तब ए आर रहमान का हालिया बयान एक विशेष मानसिकता का परिचायक बनकर उभरा है। यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि ए आर रहमान जन्मजात मुस्लिम नहीं थे, बल्कि उनका जन्म एक हिंदू परिवार में दिलीप कुमार के रूप में हुआ था। उनके जीवन की यह घटना केवल एक व्यक्तिगत धर्मांतरण का मामला नहीं है, अपितु यह उस भयावह सत्य को उजागर करती है जिसमें विपत्ति के समय हिंदू परिवारों को किस प्रकार लक्ष्य बनाया जाता है।
ए आर रहमान के पिता का निधन उस समय हुआ था जब रहमान और उनकी बहनें बहुत छोटी थीं और यह किसी भी परिवार के लिए एक अत्यंत कष्टकारी समय होता है। एक विधवा मां और छोटे बच्चों वाला परिवार स्वभाविक रूप से मानसिक और आर्थिक रूप से असुरक्षित होता है और इसी असुरक्षा का लाभ उठाने के लिए समाज में कुछ तत्व सदैव तत्पर रहते हैं।
ए आर रहमान की बहन की बीमारी और परिवार की मानसिक अशांति के दौर में एक सूफी पीर का आगमन उनके जीवन में हुआ जिसने उनकी परेशानियों का इलाज करने का दावा किया। यह एक स्थापित मनोवैज्ञानिक सत्य है कि जब मनुष्य घोर निराशा में होता है तो उसे तिनके का सहारा भी पर्वत जैसा प्रतीत होता है और इसी प्लेसिबो प्रभाव के चलते उनकी बहन की तबीयत में कुछ सुधार हुआ जिसे चमत्कार मान लिया गया। लोहबान और ताबीज के माध्यम से उस सूफी पीर ने न केवल उस परिवार का विश्वास जीता बल्कि धीरे-धीरे दिलीप कुमार की मां का ब्रेनवाश करके पूरे परिवार को धर्मांतरण के कुचक्र में फंसा दिया।
यह घटनाक्रम सिद्ध करता है कि यह धर्मांतरण किसी आध्यात्मिक ज्ञान या ईश्वर की खोज का परिणाम नहीं था, बल्कि यह मजबूरी और भय का दोहन करके किया गया एक सुनियोजित षड्यंत्र था जिसमें एक असहाय हिंदू परिवार को अपनी पहचान खोनी पड़ी।
कट्टरपंथ का विष और हिंदू प्रतीकों के प्रति असहिष्णुता
धर्मांतरण के बाद यह परिवार न केवल मुस्लिम बना बल्कि इनके भीतर कट्टरपंथ के बीज भी बहुत गहरे बो दिए गए जिसका प्रमाण समय-समय पर देखने को मिलता रहा है। ए आर रहमान जो स्वयं को सूफीवाद का चेहरा बताते हैं, उनके घर का माहौल इस कदर कट्टरपंथी है कि वहां हिंदू प्रतीकों के लिए कोई स्थान नहीं है। उनकी बेटी खदीजा का बुर्के में रहना उनकी व्यक्तिगत पसंद हो सकती है लेकिन जब ए आर रहमान के घर आने वाले हिंदू संगीतकारों को अपमानित किया जाता है तो यह मामला व्यक्तिगत स्वतंत्रता से आगे बढ़कर धार्मिक असहिष्णुता का बन जाता है।
एक प्रसिद्ध प्रसंग के अनुसार जब एक हिंदू संगीतकार ए आर रहमान के घर माथे पर तिलक लगाकर पहुंचा तो उसे स्पष्ट रूप से यह निर्देश दिया गया कि इस घर में तिलक लगाकर प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। यह वही मानसिकता है जो गंगा जमुनी तहजीब का लबादा ओढ़कर समाज के सामने आती है लेकिन अंदर ही अंदर अपनी मूल संस्कृति और हिंदू परंपराओं के प्रति घोर घृणा का भाव रखती है।
जिस हिंदू धर्म और संस्कृति ने उन्हें संगीत के स्वर दिए उसी संस्कृति के प्रतीकों को अपने घर में प्रतिबंधित करना ए आर रहमान की संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है। यह विडंबना ही है कि जो व्यक्ति आज अपने मुस्लिम होने के कारण काम न मिलने का रोना रो रहा है उसने अपने ही घर में हिंदुओं की धार्मिक पहचान को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। यह दोगलापन उस तथाकथित सेक्युलर जमात का असली चेहरा है जो दूसरों से तो सहिष्णुता की अपेक्षा करती है परंतु स्वयं घोर असहिष्णु व्यवहार करती है।
योग्यता बनाम मजहब और बॉलीवुड में काम न मिलने का मिथ्या विमर्श
ए आर रहमान का यह कहना कि सत्ता परिवर्तन के कारण बॉलीवुड के विचारों में परिवर्तन आ गया है और उन्हें मुस्लिम होने के कारण काम नहीं मिल रहा है, यह एक सफेद झूठ और समाज को बांटने वाला बयान है। फिल्म उद्योग एक ऐसा निष्ठुर जगत है जहां केवल वही टिकता है जो समय के साथ चलता है और जिसकी कला में दम होता है।
इसी बॉलीवुड में अनगिनत ऐसे प्रतिभाशाली हिंदू कलाकार हुए हैं जिन्हें एक समय के बाद काम मिलना बंद हो गया और वे नेपथ्य में खो गए लेकिन उन्होंने कभी इसे धार्मिक भेदभाव का नाम नहीं दिया। सोनू निगम जैसे अद्भुत गायक, शान जैसे बेहतरीन कलाकार और कुमार सानू जैसे दिग्गज जिन्होंने दशकों तक श्रोताओं के दिलों पर राज किया, आज उन्हें भी बॉलीवुड में उतना काम नहीं मिलता जितना पहले मिलता था। क्या इन कलाकारों ने कभी यह कहा कि वे हिंदू हैं इसलिए उन्हें काम नहीं दिया जा रहा है या उनके साथ भेदभाव हो रहा है।
अतीत के पन्नों को पलटें तो सुमन कल्याणपुर और हेमलता जैसी विलक्षण प्रतिभाओं का उदाहरण हमारे सामने है। नदिया के पार जैसी फिल्मों में अपने सुरों का जादू बिखेरने वाली हेमलता और लता मंगेशकर जैसी आवाज वाली सुमन कल्याणपुर को भी उद्योग की राजनीति और गुटबाजी का शिकार होना पड़ा था। सुमन कल्याणपुर का गाया गीत “हम इंतजार करेंगे तेरा कयामत तक” आज भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करता है और कई बार लोग धोखा खा जाते हैं कि यह लता मंगेशकर की आवाज है।
इतनी प्रतिभा होने के बावजूद जब उन्हें काम मिलना बंद हुआ तो उन्होंने कभी विक्टिम कार्ड नहीं खेला और न ही अपनी विफलता का ठीकरा अपने धर्म पर फोड़ा। ए आर रहमान का यह बयान उन हजारों संघर्षरत कलाकारों का अपमान है जो अपनी योग्यता के बल पर स्थान बनाने का प्रयास कर रहे हैं चाहे वे किसी भी धर्म के हों।
बॉलीवुड का इस्लामीकरण और हिंदू विरोधी नैरेटिव का इतिहास
सच्चाई तो यह है कि ए आर रहमान जिस बॉलीवुड पर आज भेदभाव का आरोप लगा रहे हैं वह दशकों तक एक विशेष प्रकार के इस्लामीकरण और वामपंथी एजेंडे का गढ़ रहा है। एक लंबा दौर ऐसा रहा है जब इस उद्योग में हिंदू पात्रों का उपहास उड़ाना और हिंदू धर्म को अपमानित करना सफलता की कुंजी माना जाता था। फिल्मों में पंडितों को लालची और ढोंगी दिखाना और मौलवियों को दयालु और रहमदिल दिखाना एक अघोषित नियम बन गया था।
ऐसे वातावरण में भी हिंदुओं ने अपनी सहिष्णुता का परिचय देते हुए मुस्लिम कलाकारों को सर आंखों पर बिठाया। दिलीप कुमार से लेकर शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान तक को इस देश की बहुसंख्यक हिंदू आबादी ने ही स्टार और सुपरस्टार बनाया। यदि भारत का हिंदू समाज और बॉलीवुड इतना ही सांप्रदायिक होता तो क्या दशकों तक खान तिकड़ी का राज इस उद्योग पर संभव हो पाता।
आज यदि बॉलीवुड में कुछ परिवर्तन आया है और वहां राष्ट्रवाद या हिंदू संस्कृति को सम्मान देने वाली फिल्में बन रही हैं तो यह समय की मांग और दर्शकों की रुचि में आए बदलाव का परिणाम है। ए आर रहमान को यह स्वीकार करना चाहिए कि उनकी रचनात्मकता में अब वह पहले जैसी ताजगी नहीं रही और नए संगीतकार उनसे बेहतर काम कर रहे हैं। अपनी रचनात्मक क्षीणता को छिपाने के लिए धर्म की आड़ लेना एक कायरतापूर्ण कृत्य है।
जिस देश ने और जिस समाज ने उन्हें इतना सम्मान दिया, इतना प्रेम दिया, आज उसी समाज के सिर पर खड़े होकर वे अपमानजनक बातें कर रहे हैं। यह कृतघ्नता की पराकाष्ठा है और यह दर्शाता है कि धर्मांतरण केवल पूजा पद्धति का बदलाव नहीं होता बल्कि यह निष्ठा और राष्ट्रबोध को भी बदल देता है।
गुरु परंपरा का अपमान और कृतघ्नता का प्रमाण
ए आर रहमान को यह कदापि विस्मृत नहीं करना चाहिए कि संगीत की दुनिया में उन्हें खड़ा करने वाले और उन्हें तराशने वाले कोई और नहीं बल्कि महान संगीतकार इलैयाराजा थे जो एक निष्ठावान हिंदू हैं। इलैयाराजा ने उन्हें संगीत की बारीकियां सिखाईं और उन्हें एक साधारण कीबोर्ड प्लेयर से संगीतकार बनने की दिशा दिखाई। यदि इलैयाराजा ने ए आर रहमान को अपनी छत्रछाया में न लिया होता और उन्हें संगीत का ज्ञान न दिया होता तो संभव है कि रहमान आज भी उसी सूफी पीर की तरह झाड़-फूंक और धर्मांतरण के धंधे में लिप्त होते।
एक हिंदू गुरु से ज्ञान प्राप्त करके आज उसी हिंदू समाज और तंत्र को कोसना ए आर रहमान की ओछी मानसिकता का प्रदर्शन है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च होता है और कृतज्ञता मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण मानी जाती है। ए आर रहमान ने विक्टिम कार्ड खेलकर न केवल अपने गुरु का अपमान किया है बल्कि उस महान भारतीय परंपरा का भी निरादर किया है जो कला को धर्म और जाति से ऊपर मानती है।
यह स्पष्ट है कि ए आर रहमान का दर्द काम न मिलना नहीं है बल्कि उनका दर्द यह है कि अब बॉलीवुड में वह नरेटिव नहीं चल रहा जो दशकों तक हिंदुओं को अपमानित करता रहा। उनकी छटपटाहट उस विशेषाधिकार के खो जाने की है जो उन्हें अब तक तुष्टीकरण की राजनीति के तहत मिलता रहा था। यह देश अब जाग चुका है और अब योग्यता ही सफलता का एकमात्र मापदंड होगी न कि किसी विशेष समुदाय से होना या विक्टिम कार्ड खेलना।

