विनोद खन्ना बायोग्राफी: सोचिए एक ऐसे नौजवान को जिसके पास ऐशो-आराम की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उसके दिल में एक अलग ही आग दहक रही थी।
क्या आप यकीन करेंगे कि जिस सुपरस्टार को दुनिया ने पलकों पर बिठाया, उसे अपनों से ही सबसे बड़ी चुनौती मिली थी?
जब उसने अभिनय की दुनिया में कदम रखने की बात की, तो उसके पिता ने गुस्से में यहाँ तक कह दिया था, “अगर फिल्मों में गए, तो गोली मार दूँगा!”
यह कहानी एक ऐसे विद्रोही की है जिसने बिजनेस की गद्दी छोड़कर मुंबई की गलियों का संघर्ष चुना।
पिता ने उसे खुद को साबित करने के लिए सिर्फ 730 दिन यानी दो साल की मोहलत दी थी और जानते हैं क्या हुआ?
अपनी पहली ही फिल्म में इस लड़के ने विलेन का किरदार ऐसा निभाया कि लोग फिल्म के हीरो को ही भूल गए!
देखते ही देखते वह बॉलीवुड का सबसे हैंडसम विलेन और फिर सबसे चहेता ‘मचो-मैन’ बन गया।
वह इकलौता ऐसा अभिनेता था जिसने उस दौर में अमिताभ बच्चन के सिंहासन को हिला कर रख दिया था, लेकिन जब कामयाबी उनके कदमों में थी, तब उन्होंने एक और ऐसा फैसला लिया।
जिसने दुनिया को सन्न कर दिया, सब कुछ छोड़कर सन्यासी बनने का फैसला। एक खूंखार विलेन, एक रोमांटिक सुपरस्टार, एक भगवाधारी साधु और फिर एक कद्दावर राजनेता…
उनका जीवन किसी भी फिल्मी कहानी से कहीं ज्यादा रोमांचक और नाटकीय रहा। जी हाँ, यह दास्ताँ है बॉलीवुड के ‘असली सुल्तान’ विनोद खन्ना की।
व्यक्तिगत परिचय :
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पूरा नाम | विनोद खन्ना |
| जन्म तिथि | 6 अक्टूबर 1946 |
| जन्म स्थान | पेशावर (ब्रिटिश भारत, वर्तमान पाकिस्तान) |
| मृत्यु तिथि | 27 अप्रैल 2017 |
| आयु | 70 वर्ष |
| पेशा | अभिनेता, राजनीतिज्ञ |
| राष्ट्रीयता | भारतीय |
| धर्म | हिंदू |
| पिता का नाम | किशन चंद खन्ना |
| माता का नाम | कमला खन्ना |
| वैवाहिक स्थिति | विवाहित |
| पहली पत्नी | गीतांजलि खन्ना |
| दूसरी पत्नी | कविता खन्ना |
| बच्चे | अक्षय खन्ना (अभिनेता), राहुल खन्ना (अभिनेता), अन्य 2 |
| राजनीतिक दल | भारतीय जनता पार्टी |
| प्रसिद्धि | 1970–80 के दशक के बॉलीवुड सुपरस्टार |
| निधन का कारण | ब्लेडर कैंसर (मूत्राशय का कैंसर) |
शुरुआती जीवन
विनोद खन्ना का शुरुआती जीवन किसी फिल्मी कहानी की तरह उतार-चढ़ाव भरा रहा। एक रईस खानदान में जन्म लेने के बावजूद, उन्हें अपनी पहचान बनाने के लिए अपनों से ही लड़ना पड़ा।
जन्म और बंटवारे का दर्द
विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 को पेशावर (जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ था। उनके पिता, किशनचंद खन्ना, एक बहुत बड़े कपड़ा व्यापारी थे।
जब 1947 में भारत का बंटवारा हुआ, तो उनके परिवार को अपना सब कुछ छोड़कर मुंबई आना पड़ा। मुंबई आने के बाद उनके पिता ने फिर से अपना बिजनेस खड़ा किया और वे बेहद अमीर बन गए।
पढ़ाई और कॉलेज के दिन
विनोद खन्ना बचपन से ही पढ़ाई और खेलकूद में बहुत अच्छे थे। उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई नासिक और दिल्ली से की। इसके बाद वे मुंबई के मशहूर सिडनहम कॉलेज (Sydenham College) पहुँचे।
कॉलेज के दिनों में वे अपनी लंबी कद-काठी और गुड लुक्स की वजह से काफी लोकप्रिय थे, लेकिन उस समय तक उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे एक्टर बनेंगे।
पिता की सख्त ज़िद और ‘गोली मारने’ की धमकी
विनोद के पिता चाहते थे कि उनका बेटा बिजनेस संभाले और करोड़ों का साम्राज्य आगे बढ़ाए, लेकिन विनोद का मन ऑफिस की फाइलों और कपड़ों के व्यापार में नहीं लगता था। जब
उन्हें फिल्म का ऑफर मिला और उन्होंने घर पर बताया, तो उनके पिता आगबबूला हो गए।
उनके पिता ने यहाँ तक कह दिया था – “अगर तुम फिल्मों में गए, तो मैं तुम्हें गोली मार दूँगा!”
पिता की नज़र में फिल्म लाइन एक ‘बुरा काम’ था और वे नहीं चाहते थे कि उनके खानदान का नाम खराब हो।
माँ का सहारा और 2 साल का ‘चैलेंज’
जब पिता और पुत्र के बीच दीवार खड़ी हो गई, तब उनकी माँ कमला खन्ना ढाल बनकर सामने आईं। उन्होंने विनोद के पिता को मनाया और एक समझौता कराया।
पिता ने विनोद को सिर्फ 2 साल का समय दिया और कहा, “जाओ, अपनी किस्मत आजमा लो। अगर इन दो सालों में कुछ नहीं कर पाए, तो वापस आकर गद्दी संभालनी होगी।”
बिना किसी गॉडफादर का संघर्ष
विनोद खन्ना के पास न तो कोई फिल्मी सिफारिश थी और न ही कोई गॉडफादर। वे मुंबई की सड़कों पर एक आम स्ट्रगलर की तरह घूमते थे। उनकी आँखों में कुछ कर गुजरने की आग थी।
किस्मत ने तब पलटी मारी जब सुनील दत्त ने उन्हें एक पार्टी में देखा और उन्हें अपनी फिल्म ‘मन का मीत’ (1968) में विलेन का रोल ऑफर किया।
विनोद खन्ना ने अपने पिता की दी हुई उस 2 साल की चुनौती को न सिर्फ जीता, बल्कि आने वाले समय में वे बॉलीवुड के ‘किंग’ बनकर उभरे।
पढ़ाई और स्कूल के दिन
विनोद खन्ना सिर्फ पर्दे पर ही ‘रफ एंड टफ’ नहीं थे, बल्कि वे असल जिंदगी में काफी पढ़े-लिखे और अनुशासन प्रिय थे।
उनका बचपन और पढ़ाई का दौर किसी बड़े रईस खानदान के चिराग जैसा था, लेकिन उसी दौर में उनके भीतर का कलाकार भी जन्म ले रहा था।
विनोद खन्ना की शुरुआती शिक्षा मुंबई के मशहूर सेंट मैरी स्कूल से हुई। इसके बाद वे दिल्ली चले गए, जहाँ उन्होंने सेंट जेवियर्स हाई स्कूल में पढ़ाई की
लेकिन उनकी जिंदगी का सबसे अहम मोड़ तब आया जब वे नासिक (देवलाली) के बार्न्स स्कूल में बोर्डिंग के लिए गए।
एक्टिंग का पहला शौक: इसी बोर्डिंग स्कूल में उन्होंने पहली बार स्टेज पर नाटक किए। स्कूल के प्ले (Plays) में हिस्सा लेते-लेते उन्हें अभिनय से प्यार हो गया।
जो लड़का पर्दे पर विलेन बनकर डराने वाला था, वह असल में स्कूल के नाटकों का स्टार था।
ग्रेजुएशन: स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने मुंबई के प्रतिष्ठित सिडनहम कॉलेज से कॉमर्स (B.Com) की डिग्री हासिल की।
फिल्मी दुनिया में कदम रखना :
फिल्मी पर्दे पर अक्सर हीरो की एंट्री धमाके के साथ होती है, लेकिन विनोद खन्ना की कहानी थोड़ी अलग थी।
वे बॉलीवुड के उन गिने-चुने सितारों में से हैं जिन्होंने नफरत बटोरने वाले ‘विलेन’ के तौर पर शुरुआत की और अपनी काबिलियत के दम पर दुनिया के सबसे चहेते ‘हीरो’ बन गए।
वह किस्मत वाली पार्टी (सुनील दत्त से मुलाकात) :
विनोद खन्ना उस समय कॉलेज में थे और अपनी लाइफ एन्जॉय कर रहे थे। एक पार्टी के दौरान उन पर मशहूर अभिनेता सुनील दत्त की नज़र पड़ी। सुनील दत्त उस समय अपने होम प्रोडक्शन के लिए एक नए चेहरे की तलाश में थे।
विनोद का ऊंचा कद, कसरती बदन और उनकी गहरी आँखों ने दत्त साहब को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने तुरंत उन्हें फिल्म का ऑफर दे दिया।
- पहली फिल्म: ‘मन का मीत’ (1968) :
विनोद खन्ना ने साल 1968 में फिल्म ‘मन का मीत’ से अपना सफर शुरू किया।
किरदार: इस फिल्म में वे हीरो नहीं, बल्कि विलेन बने थे। वे सुनील दत्त के भाई, सोम दत्त (जो फिल्म के हीरो थे) के खिलाफ नेगेटिव रोल में थे।
नतीजा: फिल्म रिलीज हुई और एक अजीब करिश्मा हुआ। लोग हीरो को छोड़कर उस हैंडसम विलेन की बातें करने लगे। विनोद खन्ना रातों-रात चर्चा का विषय बन गए।
उनकी पर्सनैलिटी इतनी दमदार थी कि लोगों को उनसे नफरत के बजाय प्यार होने लगा।
- विलेन जो हीरो से ज्यादा चमक गया :
उस दौर में यह माना जाता था कि अगर कोई एक बार विलेन बन गया, तो वह कभी हीरो नहीं बन पाएगा। लेकिन विनोद खन्ना ने इस नियम को तोड़ दिया।
उन्होंने पूरब और पश्चिम और मस्ताना जैसी फिल्मों में छोटे और विलेन वाले रोल किए।
मेरा गांव मेरा देश (1971): इस फिल्म में उन्होंने डाकू ‘जब्बार सिंह’ का रोल निभाया। उनका यह अंदाज इतना मशहूर हुआ कि लोग उन्हें भविष्य का ‘सुपरस्टार’ मानने लगे।
4 विलेन बनने के लिए “बहुत ज्यादा हैंडसम” :
फिल्म डायरेक्टर्स को जल्द ही समझ आ गया कि इतना सुंदर और प्रभावशाली दिखने वाला शख्स विलेन के रोल के लिए बना ही नहीं है।
वे विलेन बनने के लिए “जरूरत से ज्यादा हैंडसम” थे। जल्द ही उन्हें हम तुम और वो और ऐलान जैसी फिल्मों में लीड हीरो के रोल मिलने शुरू हो गए।
1970 के दशक के बीच तक, विनोद खन्ना बॉलीवुड के सबसे सफल और डिमांड में रहने वाले हीरो बन चुके थे।
शोहरत हासिल करना
विलेन के तौर पर अपनी धाक जमाने के बाद, विनोद खन्ना का एक ‘सुपरस्टार’ के रूप में उभरना किसी चमत्कार से कम नहीं था। 70 के दशक के मध्य तक,
वे भारत के सबसे महंगे और सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले अभिनेताओं की लिस्ट में शामिल हो चुके थे।
जब विलेन, हीरो से ज्यादा “हैंडसम” लगने लगा :
फिल्म निर्देशकों को जल्द ही यह अहसास हो गया कि जनता फिल्म के हीरो से ज्यादा इस ‘खूबसूरत विलेन’ पर दिल हार रही है।
अनोखा संगम: विनोद खन्ना के पास एक रफ-एंड-टफ कसरती शरीर और एक बेहद डैशिंग चेहरा था (खासकर उनकी ठुड्डी का वह मशहूर डिंपल)।
उनकी इसी खूबी ने उन्हें विलेन की कतार से निकालकर सीधे हीरो की कतार में खड़ा कर दिया।
बड़ा मोड़: 1971 की फिल्म ‘मेरा गांव मेरा देश’ ने सब कुछ बदल दिया। उन्होंने डाकू ‘जब्बार सिंह’ का किरदार निभाया था।
भले ही वह एक बुरा आदमी था, लेकिन विनोद के स्टाइल और उनकी पर्सनैलिटी ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया।
नायक का उदय: इसके बाद उन्होंने विलेन बनना छोड़ दिया और मेरे अपने, हम तुम और वो जैसी फिल्मों में लीड हीरो के तौर पर अपनी चमक बिखेरी।
अमिताभ बच्चन के इकलौते प्रतिद्वंद्वी :
70 के दशक के आखिर में, अगर कोई एक शख्स था जो ‘एंग्री यंग मैन’ अमिताभ बच्चन के सिंहासन को हिला सकता था, तो वो सिर्फ विनोद खन्ना थे।
सुपरहिट जोड़ियाँ: इन दोनों दिग्गजों ने अमर अकबर एंथनी, मुकद्दर का सिकंदर और हेरा फेरी जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में साथ काम किया।
मुकाबला: जहाँ अमिताभ एक गंभीर और गुस्सैल नायक के रूप में जाने जाते थे, वहीं विनोद खन्ना को एक स्टाइलिश, सोफिस्टिकेटेड और पावरफुल विकल्प के तौर पर देखा जाता था।
उस समय के फिल्म समीक्षकों का मानना था कि विनोद खन्ना बॉलीवुड के नंबर-1 पायदान की तरफ बहुत तेजी से बढ़ रहे थे।
एक्शन और स्टाइल के बेताज बादशाह
विनोद खन्ना उस दौर के ‘कूल’ एक्शन हीरो बन गए थे। चाहे वो सूट पहनें या पुलिस की वर्दी, उनका अंदाज हमेशा रॉयल और कमांडिंग होता था।
स्टाइल आइकन: 1980 की फिल्म ‘कुर्बानी’ ने उन्हें एक ग्लोबल स्टाइल आइकन बना दिया। उनकी चाल, उनकी आवाज़ और स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी का कोई मुकाबला नहीं था।
चौंकाने वाला फैसला
जब वे अपनी कामयाबी के बिल्कुल शिखर पर थे, जब प्रोड्यूसर्स उनके घर के बाहर कतार लगाकर खड़े रहते थे, तब उन्होंने कुछ ऐसा किया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।
साल 1982 में, विनोद खन्ना ने अचानक ऐलान कर दिया कि वे फिल्म इंडस्ट्री छोड़ रहे हैं। उन्होंने अपने आध्यात्मिक गुरु ओशो रजनीश के पीछे चलने का फैसला किया।
उन्होंने अपनी लग्जरी गाड़ियाँ, शोहरत, अपना चमकता हुआ करियर और यहाँ तक कि अपने परिवार को भी छोड़ दिया और अमेरिका के एक आश्रम में जाकर रहने लगे।
प्रमुख फिल्म और उपलब्धियां
विनोद खन्ना का फिल्मी करियर सफलताओं की एक लंबी दास्तान है। उन्होंने विलेन से शुरुआत की, लेकिन जल्द ही वे अपनी शानदार एक्टिंग और ‘मचो-मैन’ लुक की वजह से सुपरस्टार बन गए।
यादगार फिल्में (Major Films) :
विनोद खन्ना ने अपने करियर में 140 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। उनकी कुछ सबसे बड़ी फिल्में ये थीं
मेरा गांव मेरा देश (1971): इस फिल्म में उन्होंने डाकू ‘जब्बार सिंह’ का किरदार निभाया। उनका यह विलेन वाला अंदाज इतना हिट हुआ कि लोग नायक (धर्मेंद्र) के साथ-साथ उनके भी दीवाने हो गए।
अमर अकबर एंथनी (1977): इस फिल्म में उन्होंने ‘अमर’ (पुलिस ऑफिसर) का किरदार निभाया। अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर के साथ उनकी केमिस्ट्री जबरदस्त थी और यह फिल्म ब्लॉकबस्टर रही।
मुकद्दर का सिकंदर (1978): इस फिल्म में उन्होंने अमिताभ बच्चन के दोस्त ‘वकील विशाल’ की भूमिका निभाई। उनके गंभीर और मैच्योर अभिनय की बहुत तारीफ हुई।
कुर्बानी (1980): यह उनके करियर की सबसे बड़ी सोलो हिट मानी जाती है। फिरोज खान के साथ उनकी जोड़ी और “लैला ओ लैला” जैसे गानों ने उन्हें उस दौर का सबसे स्टाइलिश सुपरस्टार बना दिया।
चांदनी (1989): सन्यास से लौटने के बाद, इस फिल्म में ऋषि कपूर और श्रीदेवी के साथ उनका ‘ललित’ वाला किरदार बेहद गरिमापूर्ण और भावुक था।
दबंग (2010): नई पीढ़ी ने उन्हें सलमान खान के पिता ‘प्रजापति पांडे’ के रूप में देखा और बहुत प्यार दिया।
प्रमुख उपलब्धियां और पुरस्कार
| वर्ष | पुरस्कार / सम्मान | फिल्म |
|---|---|---|
| 1975 | फिल्मफेयर पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता) | फिल्म: हाथ की सफाई |
| 1999 | फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड | भारतीय सिनेमा में बेमिसाल योगदान के लिए |
| 2005 | स्टारडस्ट अवार्ड | रोल मॉडल ऑफ द ईयर |
| 2007 | ज़ी सिने लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड | सिनेमा में लंबी और सफल पारी के लिए |
| 2017 | दादा साहब फाल्के पुरस्कार (मरणोपरांत) | भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान |
राजनीतिक उपलब्धियां
विनोद खन्ना ने पर्दे के बाहर देश की सेवा में भी बड़ी भूमिका निभाई
संसद सदस्य (MP): वे पंजाब की गुरदासपुर सीट से 4 बार (1998, 1999, 2004 और 2014) लोकसभा सांसद चुने गए।
केंद्रीय मंत्री: अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उन्होंने केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री तथा विदेश राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया।
विकास कार्य: गुरदासपुर में पुलों और बुनियादी ढांचे के विकास के कारण उन्हें स्थानीय लोग प्यार से ‘पुलों का राजा’ भी कहते थे।
निजी जीवन
विनोद खन्ना की निजी जिंदगी किसी फिल्म की स्क्रिप्ट जैसी थी, जिसमें बेतहाशा प्यार, गहरा दुख, अचानक आया वैराग्य और फिर एक नई शुरुआत की कहानी छिपी है।
वे एक ऐसे इंसान थे जिनके पास दुनिया की हर सुख-सुविधा थी, लेकिन उनके दिल में एक अनसुलझी बेचैनी थी।
पहली शादी और खुशहाल परिवार
1971 में, जब विनोद खन्ना का करियर ऊंचाइयों को छू रहा था, उन्होंने अपनी कॉलेज की दोस्त गीतांजलि तल्यारखान से शादी की।
दो बेटे: इस शादी से उनके दो बेटे हुए, अक्षय खन्ना और राहुल खन्ना। आज ये दोनों ही बॉलीवुड के मंझे हुए कलाकार माने जाते हैं।
उस दौर में विनोद और गीतांजलि की जोड़ी को फिल्म जगत की सबसे ‘ग्लैमरस’ जोड़ियों में गिना जाता था।
वो मोड़ जिसने सब बदल दिया (आध्यात्मिक सफर) :
सब कुछ होने के बावजूद, पैसा, शोहरत और सुंदर परिवार, विनोद अंदर से खालीपन महसूस कर रहे थे।
बड़ा सदमा: अपनी माँ की मृत्यु ने उन्हें अंदर से हिला दिया। वे जीवन और मृत्यु के गहरे सवालों के जवाब ढूंढने लगे।
ओशो का प्रभाव: वे आध्यात्मिक गुरु ओशो रजनीश के विचारों से इतने प्रभावित हुए कि 1982 में उन्होंने वह किया जो आज तक किसी सुपरस्टार ने नहीं किया।
उन्होंने चलती हुई फिल्मों को बीच में छोड़ा, साइनिंग अमाउंट वापस किए और संन्यासी बन गए।
बर्तन मांजना और माली का काम: अमेरिका के ओरेगन में ओशो के आश्रम में वे एक आम सेवक की तरह रहते थे। सुपरस्टार विनोद खन्ना वहाँ बर्तन साफ करते थे और पौधों को पानी देते थे।
सन्यास की भारी कीमत
उनकी इस लंबी गैर-मौजूदगी और सन्यास के फैसले का असर उनके परिवार पर पड़ा। वे 5 साल तक भारत से दूर रहे, जिससे उनकी पत्नी गीतांजलि के साथ उनके रिश्तों में दरार आ गई।
तलाक: आखिरकार 1985 में इस मशहूर जोड़ी का तलाक हो गया और उनका पहला घर टूट गया।
दूसरी शादी और नई शुरुआत
जब 1987 में अमेरिका का वह आश्रम बंद हुआ, तो विनोद वापस भारत लौटे। उन्होंने न केवल फिल्मों में वापसी की, बल्कि अपनी जिंदगी को भी दूसरा मौका दिया।
कविता से मुलाकात: 1990 में उनकी मुलाकात कविता दफ्तरी से हुई। दोनों को एक-दूसरे से प्यार हुआ और उन्होंने शादी कर ली।
छोटा परिवार: इस दूसरी शादी से उनके दो बच्चे हुए, एक बेटा साक्षी और एक बेटी श्रद्धा। विनोद खन्ना अपनी आखिरी सांस तक कविता के साथ एक खुशहाल वैवाहिक जीवन जीते रहे।
आध्यात्मिक और व्यक्तिगत यात्रा :
विनोद खन्ना की यात्रा बॉलीवुड के इतिहास की सबसे चर्चित कहानियों में से एक है। यह केवल एक छोटा सा बदलाव नहीं था, बल्कि एक ऐसा पूर्ण परिवर्तन था जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
बेचैन सुपरस्टार: 1970 के दशक के अंत तक विनोद खन्ना के पास वह सब कुछ था जो एक इंसान चाहता है, पैसा, शोहरत और एक सुंदर परिवार। लेकिन अंदर से वे खुद को खाली महसूस कर रहे थे।
जीवन के अर्थ की तलाश: अपनी माँ और बहन की मृत्यु ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया था। वे ‘जीवन के अर्थ’ की तलाश करने लगे।
इसी खोज ने उन्हें आध्यात्मिक गुरु ओशो रजनीश के चरणों में पहुँचा दिया, जहाँ उन्होंने शांति की तलाश में अपने करियर की ऊंचाइयों को भी दांव पर लगा दिया।
अंतिम दिन और विदाई :
अपने अंतिम वर्षों में, विनोद खन्ना राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हो गए थे, लेकिन उन्होंने दबंग जैसी फिल्मों में काम करना जारी रखा।
बीमारी से जंग: उन्होंने ब्लैडर कैंसर (Bladder Cancer) के साथ एक लंबी और बेहद निजी लड़ाई लड़ी। वे एक योद्धा की तरह इस बीमारी से मुकाबला करते रहे।
महाप्रयाण: 27 अप्रैल 2017 को, 70 वर्ष की आयु में मुंबई में इस दिग्गज अभिनेता का निधन हो गया।
एक युग का अंत: उनकी मृत्यु ने भारतीय सिनेमा के एक महान युग का अंत कर दिया। लेकिन उन्हें आज भी “मर्सिडीज वाला साधु” (The Monk in a Mercedes) के रूप में याद किया जाता है, एक ऐसा व्यक्ति जो सच की तलाश में अपना सब कुछ पीछे छोड़ने से कभी नहीं डरा।
ताज और तख्त को ठोकर मारना (1982) :
जब विनोद खन्ना अपने करियर के उस शिखर पर थे जहाँ वे अमिताभ बच्चन के इकलौते असली प्रतिद्वंद्वी माने जाते थे, तब उन्होंने कुछ ऐसा किया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और ऐलान कर दिया कि वे फिल्मों की दुनिया छोड़ रहे हैं।
अपनी पत्नी, अपने छोटे बेटों (राहुल और अक्षय) और अपनी कीमती गाड़ियों को पीछे छोड़ दिया। वे सब कुछ त्याग कर अमेरिका के ओरेगन रेगिस्तान में ओशो के आश्रम ‘रजनीशपुरम’ चले गए।
सुपरस्टार से ‘माली’ तक का सफर :
अमेरिका में, जिस इंसान के पीछे हजारों फैंस दीवाने होकर भागते थे, वह एक बेहद साधारण जीवन जी रहा था।
बदला हुआ अंदाज: उन्होंने अपने महंगे डिजाइनर कपड़े छोड़कर ‘भगवा चोला’ पहन लिया।
मिट्टी से जुड़ाव: करोड़ों कमाने वाला यह सुपरस्टार वहाँ एक माली (Gardener) के तौर पर काम करने लगा।
साधना और सेवा: वे अपना पूरा दिन आश्रम में शौचालय साफ करने, बर्तन धोने और पौधों की देखभाल करने में बिताते थे। आध्यात्मिक दुनिया में उन्हें ‘स्वामी विनोद भारती’ के नाम से जाना जाने लगा।
आइकॉनिक विनोद खन्ना की वापसी (1987) :
पाँच साल बाद, जब अमेरिका में ओशो का आश्रम कानूनी मुश्किलों के कारण बंद हो गया, तब 1987 में विनोद खन्ना भारत लौटे।
खाली हाथ वापसी: जब वे लौटे, तो उनके पास न पैसा था और न ही फिल्म इंडस्ट्री में वह पुराना रुतबा। वे आर्थिक रूप से काफी कमजोर हो चुके थे।
बॉलीवुड का प्यार: लेकिन उनका करिश्मा इतना जबरदस्त था कि फिल्म इंडस्ट्री ने अपनी बाहें फैलाकर उनका स्वागत किया।
धमाकेदार शुरुआत: उन्होंने फिल्म ‘इंसाफ’ के साथ अपना दूसरा सफर शुरू किया और यह फिल्म सुपरहिट रही। उन्होंने साबित कर दिया कि पाँच साल की खामोशी के बाद भी, यह ‘सन्यासी’ आज भी एक ‘सुपरस्टार’ है।
‘सेक्सी संन्यासी’ (Sexy Sanyasi) की विरासत
विनोद खन्ना को अक्सर “सेक्सी संन्यासी” कहा जाता है, क्योंकि वे शायद इकलौते ऐसे शख्स थे जो एक पुलिस की वर्दी और एक संन्यासी के चोले, दोनों में ही उतने ही प्रभावशाली और दमदार नजर आते थे।
उनका यह पूरा सफर दिखाता है कि वे शोहरत के भूखे नहीं थे; वे एक ऐसे इंसान थे जिन्होंने हमेशा अपने दिल की सुनी, फिर चाहे इसके लिए उन्हें अपना सब कुछ दांव पर क्यों न लगाना पड़ा हो।
राजनीति में कदम (एक नई शुरुआत) :
साल 1997 में, विनोद खन्ना ने अपनी जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू किया और भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया।
उनकी बेमिसाल लोकप्रियता और साफ-सुथरी छवि की वजह से, वे बहुत जल्द एक सम्मानित राजनेता के रूप में उभरकर सामने आए।
गुरदासपुर के शेर (जनता के लाडले) :
उन्होंने पंजाब की गुरदासपुर सीट से चुनाव लड़ा और कई बार सांसद (MP) चुने गए।
जीत का सिलसिला: उन्होंने 1998, 1999, 2004 और फिर 2014 के लोकसभा चुनावों में शानदार जीत हासिल की।
गुरदासपुर के राजा: गुरदासपुर की जनता उन्हें इतना प्यार करती थी कि उन्हें अक्सर “गुरदासपुर का राजा” कहा जाता था। उन्होंने अपने इलाके में सड़कों, पुलों और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए जी-तोड़ मेहनत की।
केंद्रीय मंत्री के रूप में सेवा
उनकी बुद्धिमानी और काम के प्रति समर्पण को देखते हुए, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपीं
संस्कृति और पर्यटन मंत्री: उन्होंने दुनिया भर में भारत की विरासत और खूबसूरती को बढ़ावा देने के लिए काम किया।
विदेश राज्य मंत्री: उन्होंने दूसरे देशों के साथ भारत के रिश्तों को संभालने में मदद की, जहाँ उनका प्रोफेशनल और प्रभावशाली अंदाज साफ झलकता था।
राजनीति और फिल्में: एक साथ दो दुनिया
एक व्यस्त राजनेता होने के बावजूद, उन्होंने अपने पहले प्यार यानी एक्टिंग को कभी नहीं भुलाया। वे एक साथ दो अलग-अलग दुनिया को बखूबी संभाल रहे थे।
एक तरफ वे दबंग और वॉन्टेड जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में नजर आते थे, तो दूसरी तरफ संसद सत्र में हिस्सा लेते और अपने क्षेत्र की जनता की समस्याओं को सुलझाते थे।
वापसी और करियर का दूसरा दौर
जब 1987 में विनोद खन्ना भारत लौटे, तो हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल था: “क्या एक ‘संन्यासी’ फिर से ‘सुपरस्टार’ बन सकता है?” वक्त बदल चुका था, ले
किन विनोद का जादू रत्ती भर भी कम नहीं हुआ था। उनकी वापसी को बॉलीवुड इतिहास की सबसे सफल वापसी माना जाता है।
धमाकेदार एंट्री (1987)
अमेरिका में पाँच साल तक बर्तन धोने और माली का काम करने के बाद, विनोद के पास कुछ नहीं बचा था। उन्हें शून्य से शुरुआत करनी थी।
पहली हिट: उन्होंने फिल्म ‘इंसाफ’ (1987) से वापसी की। फैंस उन्हें देखने के लिए इतने बेताब थे कि सिनेमाघरों के बाहर टिकट खिड़की पर 1 किलोमीटर लंबी लाइनें लगी थीं। फिल्म ब्लॉकबस्टर रही।
लगातार कामयाबी: इसके तुरंत बाद फिल्म ‘सत्यमेव जयते’ आई, जो फिर से सुपरहिट रही।
हैरान रह गई इंडस्ट्री: फिल्म एक्सपर्ट्स दंग थे! महज कुछ ही महीनों के भीतर, विनोद खन्ना एक बार फिर भारत के ‘नंबर 2’ स्टार बन गए थे, ठीक अमिताभ बच्चन के पीछे।
एक परिपक्व हीरो के रूप में नई पहचान
विनोद समझ चुके थे कि अब उनकी उम्र बढ़ रही है, इसलिए उन्होंने ऐसे रोल चुने जो उनकी मैच्योरिटी (परिपक्वता) को सूट करें।
दयावान (1988): उन्होंने एक ताकतवर अंडरवर्ल्ड डॉन का किरदार निभाया जो गरीबों की मदद करता है। उनका यह अभिनय आज भी उनके सबसे बेहतरीन काम में गिना जाता है।
चांदनी (1989): श्रीदेवी और ऋषि कपूर के साथ इस फिल्म में विनोद खन्ना के ‘सन-किस्ड’ लुक्स और गहरी आवाज ने महफिल लूट ली थी।
जुर्म (1990): इसमें उन्होंने एक गंभीर पुलिस ऑफिसर की भूमिका निभाई और साबित कर दिया कि वे आज भी अकेले अपने दम पर फिल्म हिट करा सकते हैं।
मॉडर्न क्लासिक्स में सहायक भूमिकाएँ :
जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ी, उन्होंने नई पीढ़ी के सितारों के लिए “शक्तिशाली पिता” और “गुरु” (Mentor) की भूमिकाएँ निभाना शुरू कर दिया। उनके आने से फिल्म में एक अलग ही वजन आ जाता था।
वॉन्टेड (2009): इस फिल्म में उन्होंने सलमान खान के पिता का किरदार निभाया, जो एक कड़क रिटायर्ड पुलिस ऑफिसर थे।
दबंग (2010): प्रजापति पांडे (सलमान के पिता) के रूप में उनकी भूमिका बहुत प्रसिद्ध हुई। उन्होंने इन किरदारों में एक तरह की “शाही गरिमा” (Royal Grace) भर दी थी।
दिलवाले (2015): यह उनके द्वारा शूट की गई आखिरी फिल्म थी, जिसमें उन्होंने शाहरुख खान के पिता की भूमिका निभाई थी।
कुल संपत्ति :
अनुमानित कुल संपत्ति: लगभग $50 मिलियन (करीब ₹400+ करोड़ के बराबर)। यह आज के दौर के हिसाब से उनकी वैश्विक और घरेलू संपत्तियों का एक अनुमान है।
घोषित संपत्ति (2014 चुनाव के समय): विनोद खन्ना ने 2014 के लोकसभा चुनावों में अपनी कुल संपत्ति लगभग ₹66.9 करोड़ घोषित की थी। इसमें उनकी पत्नी की संपत्ति भी शामिल थी।
प्रमुख संपत्तियां :
विनोद खन्ना ने मुंबई के सबसे महंगे इलाकों में निवेश किया था
मालाबार हिल, मुंबई: उनका सबसे मुख्य घर ‘इल पालाज्जो’ (Il Palazzo) बिल्डिंग में था, जो मुंबई का एक बेहद पॉश इलाका है।
2008 में उन्होंने यहाँ एक फ्लैट करीब ₹30 करोड़ में खरीदा था, जिसकी कीमत आज बहुत ज्यादा है।
रायगढ़, महाराष्ट्र: यहाँ के पोयनाड गाँव में उनका एक आलीशान फार्महाउस भी है।
उनके पास कल्याण (मुंबई के पास) और पठानकोट में भी संपत्तियां थीं।
आखिरी जंग (The Final Battle) :
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में, विनोद खन्ना ने ब्लैडर कैंसर के साथ एक बहुत ही निजी और बहादुर लड़ाई लड़ी।
मजबूत इरादा: वे नहीं चाहते थे कि दुनिया उन्हें कमजोर देखे, इसलिए उन्होंने अपनी बीमारी को लंबे समय तक राज ही रखा।
दिल दहला देने वाली तस्वीर: उनके निधन से कुछ समय पहले अस्पताल से उनकी एक बहुत ही दुबली और कमजोर तस्वीर वायरल हुई थी।
इसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था, क्योंकि लोग उन्हें हमेशा एक ताकतवर और कसरती एक्शन हीरो के रूप में देखने के आदी थे।
महाप्रयाण: 27 अप्रैल 2017 को, 70 वर्ष की आयु में, इस दिग्गज सितारे ने मुंबई के सर एच.एन. रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में अपनी अंतिम सांस ली।
एक अविश्वसनीय विरासत (Incredible Legacy) :
विनोद खन्ना अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ गए हैं, जिसकी बराबरी बहुत कम लोग कर सकते हैं।
अल्टीमेट स्टाइल आइकन: उन्हें बॉलीवुड का “सबसे हैंडसम व्यक्ति” माना जाता था। उनकी खास चाल से लेकर उनकी ठुड्डी के डिंपल तक, उन्होंने एक सुपरस्टार कैसा दिखना चाहिए, इसके मानक तय किए थे।
साहस की मिसाल: वे इकलौते ऐसे सुपरस्टार थे जिनमें शोहरत और पैसे को उसके शिखर पर छोड़कर खुद को खोजने के लिए जाने का दम था। उन्होंने साबित किया कि उनके लिए ‘आंतरिक शांति’ फिल्मी ताज से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण थी।
जनता के सेवक: अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने केवल भाषण नहीं दिए; उन्होंने असलियत में गुरदासपुर में पुल और सड़कें बनवाईं, जिससे हजारों लोगों की जिंदगी आसान हुई।
विवाद :
- करियर के शिखर पर सन्यास (1982) :
यह बॉलीवुड इतिहास का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला विवाद था। जब वे अमिताभ बच्चन को कड़ी टक्कर दे रहे थे और नंबर-1 बनने वाले थे, तब अचानक उन्होंने फिल्में छोड़ दीं।
विवाद: लोगों और फिल्म मेकर्स ने इसे एक ‘गैर-जिम्मेदाराना’ फैसला माना क्योंकि उनकी कई फिल्में बीच में अटक गई थीं और प्रोड्यूसर्स का करोड़ों रुपया दांव पर लगा था।
- ओशो और रजनीशपुरम विवाद :
अमेरिका के ओरेगन में ओशो के आश्रम (रजनीशपुरम) से जुड़ना काफी विवादों में रहा।
विवाद: उस समय ओशो और उनके अनुयायियों पर अमेरिकी सरकार ने कई गंभीर आरोप लगाए थे।
विनोद खन्ना का एक सुपरस्टार होकर वहां बर्तन मांजना और माली का काम करना उनके फैंस को रास नहीं आया। भारत में कई लोगों ने इसे ‘ब्रेनवॉश’ (दिमाग फिर जाना) करार दिया था।
- परिवार से दूरी और तलाक :
अपने आध्यात्मिक सफर की वजह से विनोद खन्ना 5 साल तक भारत नहीं लौटे।
विवाद: इस दौरान उन्होंने अपनी पहली पत्नी गीतांजलि और छोटे बच्चों (राहुल और अक्षय) को अकेला छोड़ दिया था। इस वजह से उनकी काफी आलोचना हुई और अंत में उनका तलाक हो गया।
- फिल्म ‘दयावान’ का किसिंग सीन (1988) :
जब विनोद खन्ना ने सन्यास से लौटकर फिल्म ‘दयावान’ की, तो उसमें माधुरी दीक्षित के साथ उनका एक इंटीमेट (किसिंग) सीन था।
विवाद: माधुरी दीक्षित उस समय बहुत छोटी और नई थीं, जबकि विनोद खन्ना सीनियर थे। इस सीन को लेकर काफी विवाद हुआ और सालों बाद माधुरी ने भी कहा था कि उन्हें वह सीन नहीं करना चाहिए था।
- ‘इंसाफ’ फिल्म के दौरान विवाद :
सन्यास से लौटने के बाद जब उन्होंने ‘इंसाफ’ फिल्म साइन की, तो कुछ लोग उनके खिलाफ थे। लोगों का कहना था कि जो शख्स अपनी मर्जी से इंडस्ट्री छोड़ गया, उसे दोबारा मौका नहीं मिलना चाहिए। हालांकि, फिल्म सुपरहिट रही और विवाद शांत हो गया।
विनोद खन्ना के 5 दिलचस्प और अनसुने तथ्य :
- विलेन से शुरुआत करने वाले पहले सुपरस्टार
आमतौर पर जो एक्टर विलेन बनता है, वह विलेन ही रह जाता है। लेकिन विनोद खन्ना बॉलीवुड के पहले ऐसे विलेन थे जो अपनी लोकप्रियता के दम पर मुख्य हीरो बने और अमिताभ बच्चन को टक्कर दी।
- ओशो के आश्रम में ‘माली’ और ‘बर्तन मांजने वाले’
जब वे अमेरिका में ओशो के आश्रम (रजनीशपुरम) में थे, तो वहां वे कोई सुपरस्टार नहीं थे। उन्होंने वहां कई सालों तक बर्तन धोए, कपड़े साफ किए और बगीचे में माली का काम किया। वहां उनका नाम ‘स्वामी विनोद भारती’ था।
- “मर्सिडीज वाला संन्यासी”
विनोद खन्ना को ‘सिक्स पैक एब्स’ और मस्कुलर बॉडी वाला पहला असली ‘मचो-मैन’ माना जाता था। सन्यास लेने के बाद भी उनका स्वैग कम नहीं हुआ, इसलिए उन्हें अक्सर “मर्सिडीज वाला संन्यासी” (The Monk in a Mercedes) कहा जाता था।
- माधुरी दीक्षित के साथ विवादित सीन
फिल्म ‘दयावान’ (1988) में माधुरी दीक्षित के साथ उनका एक किसिंग सीन बहुत विवादों में रहा था। उस समय माधुरी उनसे काफी छोटी थीं। सालों बाद माधुरी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें उस सीन का पछतावा है।
- फिरोज खान के साथ गहरी दोस्ती
विनोद खन्ना और फिरोज खान की दोस्ती मिसाल मानी जाती थी। इत्तेफाक देखिए कि दोनों की मौत एक ही तारीख (27 अप्रैल) को हुई थी। फिरोज खान का निधन 27 अप्रैल 2009 को हुआ और विनोद खन्ना का 27 अप्रैल 2017 को।
By- Arushi Sharma
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