ओ रोमियो ने 13 फरवरी को सिनेमाघरों में दस्तक दी है। नाम सुनते ही शेक्सपीयर की मोहब्बत याद आती है, लेकिन विशाल भारद्वाज की यह फिल्म इश्क को गुलाब नहीं, बंदूक के साए में परोसती है। सवाल यही है—क्या यह रोमांस आपको छू पाएगा या सिर्फ शोर बनकर रह जाएगा?
90 के दशक की मुंबई और एक खतरनाक हीरो
कहानी हमें 1995 की मुंबई में ले जाती है, जहां अंडरवर्ल्ड और सिस्टम के बीच की लकीर धुंधली है। शाहिद कपूर का किरदार उस्तरा एक सुपारी किलर है, जो पर्दे के पीछे इंटेलिजेंस एजेंसियों के लिए काम करता है। उसका काम है—अपराधियों को खत्म करना, चाहे तरीका कितना ही बेरहम क्यों न हो।
उस्तरा की जिंदगी तब तक बेलगाम है, जब तक उसकी मुलाकात तृप्ति डिमरी से नहीं होती। एक कॉन्ट्रैक्ट, एक बातचीत और फिर ऐसा रिश्ता, जो उसे खुद से लड़ने पर मजबूर कर देता है। यहीं से फिल्म प्यार और तबाही के बीच झूलने लगती है।
माहौल और मेकिंग: स्टाइल भरपूर, संतुलन कमजोर
फिल्म का टोन शुरू से ही गहरा और डार्क रखा गया है। विशाल भारद्वाज की दुनिया में चमक कम और सन्नाटा ज्यादा बोलता है। कैमरा वर्क, लोकेशन्स और प्रोडक्शन डिजाइन फिल्म को भव्य बनाते हैं। 90 के दशक के गानों का बैकग्राउंड में इस्तेमाल माहौल को और असरदार करता है।
एक्शन सीन को स्टाइलिश तरीके से शूट किया गया है, खासकर शुरुआती हिस्से में। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा खिंचे हुए लगते हैं। यही वो जगह है, जहां फिल्म अपनी पकड़ ढीली करती है।
किरदारों की लड़ाई: यहां कोई मासूम नहीं
‘ओ रोमियो’ की खास बात यह है कि यहां कोई भी किरदार पूरी तरह पाक-साफ नहीं है। हर इंसान अपने फायदे और डर के हिसाब से फैसले लेता है। यही वजह है कि दर्शक किसी एक को जज नहीं कर पाता।
शाहिद कपूर अपने चिर-परिचित इंटेंस अंदाज़ में नजर आते हैं। गुस्सा, टूटन और बेचैनी—ये सब वह ईमानदारी से निभाते हैं, लेकिन कहीं-कहीं ऐसा लगता है कि हमने उन्हें पहले भी ऐसे ही देखा है।
इसके उलट तृप्ति डिमरी चौंकाती हैं। उनका किरदार कहानी को नई दिशा देता है। कई मौकों पर वह फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी बनकर उभरती हैं। सच कहें तो यह रोमियो से ज्यादा जूलियट की कहानी लगने लगती है।
सपोर्टिंग कास्ट: कम वक्त, गहरा असर
नाना पाटेकर हर सीन में अपने अनुभव की छाप छोड़ते हैं। उनका किरदार छोटा होते हुए भी वजनदार है। फरीदा जलाल, तमन्ना भाटिया और दिशा पाटनी सीमित स्क्रीन टाइम में अपनी मौजूदगी दर्ज कराती हैं।
अविनाश तिवारी और राहुल देशपांडे जैसे कलाकार फिल्म की दुनिया को और विश्वसनीय बनाते हैं। ये वो चेहरे हैं जो कहानी को सहारा देते हैं, भले ही सुर्खियों में न हों।
निर्देशन पर सवाल: शानदार सीन, बिखरी फिल्म
विशाल भारद्वाज से हमेशा कुछ अलग की उम्मीद रहती है। ‘ओ रोमियो’ में भी उनके सिग्नेचर एलिमेंट्स दिखते हैं—म्यूजिक, साइलेंस और विजुअल प्रतीक। लेकिन पूरी फिल्म एकसाथ जुड़ नहीं पाती।
इंटरवल के बाद कहानी धीमी पड़ जाती है और भावनात्मक बोझ बढ़ने लगता है। ऐसा लगता है कि एडिटिंग टेबल पर थोड़ी सख्ती होती, तो फिल्म कहीं ज्यादा असर छोड़ सकती थी।
आख़िरी बात: देखें या छोड़ें?
‘ओ रोमियो’ एक ऐसी फिल्म है, जो अपने कुछ हिस्सों में कमाल करती है और कुछ जगह खुद से ही जूझती नजर आती है। यह परफेक्ट लव स्टोरी नहीं है, बल्कि मोहब्बत के नाम पर बर्बादी की दास्तान है।
अगर आपको गहरे रंगों वाली प्रेम कहानियां, क्राइम ड्रामा और दमदार परफॉर्मेंस पसंद हैं, तो यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है। लेकिन अगर आप हल्का-फुल्का वैलेंटाइन रोमांस ढूंढ रहे हैं, तो शायद यह रोमियो आपका दिल न जीत पाए।

