आधुनिक व्यवस्थित राष्ट्रीय दर्शन का आदि स्रोत हैं स्वामी विवेकानंद। इन्हीं के अनुगामी श्रीअरविन्द, श्रीसावरकर, महामना मालवीय, श्रीगुरुजी गोलवलकर से लेकर नरेन्द्र मोदी तक हुए हैं। इससे पहले राष्ट्रीय अवधारणा बहुत समय से छिन्न भिन्न हो गई थी जिसे उन्होंने व्यवस्थित रूप दिया था। न राष्ट्रीय उद्देश्य बचा था, न राष्ट्रीय भाव बचा था, यद्यपि तात्कालिक परिस्थिति आधारित उन्माद समय समय पर अवश्य होता था।
उन्होंने स्पष्ट कहा, “राष्ट्रीय जीवनरूपी यह जहाज लाखों लोगों को जीवनरूपी समुद्र के पार करता रहा है। और इसकी सहायता से लाखों आत्माएं इस संसार के उस पार अमृतधाम में भी पहुंची हैं। पर शायद तुम्हारे ही दोष से उसमें कुछ खराबी आ गई है, इसमें एक दो छेद हो गए हैं, तो क्या तुम इसे कोसोगे?
“संसार में जिसने तुम्हारा सबसे अधिक उपकार किया है, उसके विरुद्ध खड़े होकर उसके विरुद्ध गाली बरसाना क्या तुम्हें उचित लगता है? यदि हमारे इस समाज के राष्ट्रीय जीवन रूपी जहाज में छेद हैं, तो हम उसकी संतान हैं, आओ चलें उन छेदों को बंद कर दें। उसके लिए हंसते हंसते रक्त बहाएं, और यदि हम ऐसा ना कर सकें तो हमें मर जाना ही उचित है।”

राष्ट्र का आधार सिर्फ हिन्दू धर्म
इस राष्ट्र का आधार उन्होंने सिर्फ हिन्दू धर्म को घोषित किया,
“हमारा धर्म ही हमारे तेज, हमारे बल, यही नहीं, हमारे राष्ट्रीय जीवन का भी मूल आधार है।”
“धर्म ही हमारे राष्ट्र की जीवन शक्ति है। यह शक्ति जब तक सुरक्षित है, तब तक विश्व की कोई भी शक्ति हमारे राष्ट्र को नष्ट नहीं कर सकती।”
“यदि कोई हिन्दू धार्मिक नहीं है तो मैं उसे हिन्दू ही नहीं कहूँगा।”
“तुम जो युगों के धक्के सहकर भी अक्षय हो, इसका कारण केवल यही है कि धर्म के लिए तुमने बहुत कुछ प्रयत्न किया था, उस पर सब कुछ निछावर किया था। तुम्हारे पूर्वजों ने धर्मरक्षा के लिए सब कुछ साहसपूर्वक सहन किया था, मृत्यु को भी उन्होंने हृदय से लगाया था।”
“विदेशी विजेताओं द्वारा मन्दिर के बाद मन्दिर तोड़े गये, परन्तु उस बाढ़ के बह जाने में देर नहीं हुई कि मन्दिर के कलश फिर खड़े हो गये। दक्षिण के ये ही कुछ पुराने मन्दिर और गुजरात के सोमनाथ के जैसे मन्दिर तुम्हें विपुल ज्ञान प्रदान करेंगे। वे जाति के इतिहास के भीतर वह गहरी अन्तर्दृष्टि देंगे, जो ढेरों पुस्तकों से भी नहीं मिल सकती।
देखो कि किस तरह ये मन्दिर सैकड़ों आक्रमणों और सैकड़ों पुनरुत्थानों के चिह्न धारण किये हुए हैं, ये बार बार नष्ट हुए और बार बार ध्वंसावशेष से उठकर नया जीवन प्राप्त करते हुए अब पहले ही की तरह अटल रूप से खड़े हैं। इसलिए इस धर्म में ही हमारे राष्ट्र का मन है, हमारे राष्ट्र का जीवनप्रवाह है। इसका अनुसरण करोगे तो यह तुम्हें गौरव की ओर ले जाएगा। इसे छोड़ोगे तो मृत्यु निश्चित है।”
- -स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद की हिन्दुओं के लिए भविष्यवाणी
बहुत समय से छिन्न भिन्न हिन्दू राष्ट्र के अनिवार्य निर्माण को सबसे पहले स्वामी विवेकानंद ने देखा था, उनकी आंखों के आगे मानो कोई चित्रपट चल रहा था। सम्पूर्ण विश्व को ही हिन्दू राष्ट्र के अधीन रहना पड़ेगा। जरा देखें वे क्या घोषणा कर गए हैं, यद्यपि सुधार का कोई भी चिह्न उस आपदकाल में न था,
“सुदीर्घ रजनी अब समाप्त होती हुई जान पड़ती है। महादुःख का प्रायः अन्त ही प्रतीत होता है। महानिद्रा में निमग्न शव मानो जागृत हो रहा है। इतिहास की बात तो दूर रही, जिस सुदूर अतीत के घनान्धकार का भेद करने में किंवदन्तियाँ भी असमर्थ हैं, वहीं से एक आवाज हमारे पास आ रही है।
ज्ञान, भक्ति और कर्म के अनन्त हिमालय-स्वरूप हमारी मातृभूमि भारत की हर एक चोटी पर प्रतिध्वनित होकर यह आवाज मृदु, दृढ़ परन्तु अभ्रान्त स्वर में हमारे पास तक आ रही है। जितना समय बीतता है, उतनी ही वह और भी स्पष्ट तथा गम्भीर होती जाती है और देखो, वह निद्रित भारत अब जागने लगा है। मानो हिमालय के प्राणप्रद वायु-स्पर्श से मृतदेह के शिथिलप्राय अस्थिमांस तक में प्राणसंचार हो रहा है।
जड़ता धीरे धीरे दूर हो रही है। जो अन्धे हैं, वे ही देख नहीं सकते और जो विकृतबुद्धि हैं वे ही समझ नहीं सकते कि हमारी मातृभूमि अपनी गम्भीर निद्रा से अब जाग रही है। अब कोई उसे रोक नहीं सकता। अब यह फिर सो भी नहीं सकती। कोई बाह्य शक्ति इस समय इसे दबा नहीं सकती क्योंकि यह असाधारण शक्ति का देश अब जागकर खड़ा हो रहा है।”
“धर्म की बाढ़ आ गयी है। मैं देखता हूँ कि वह दुनिया को बहा ले जा रही है और कोई भी वस्तु उसको रोक नहीं सकती, वह अनन्त और सर्वग्रासी है।”
-स्वामी विवेकानंद
राष्ट्र व राष्ट्रीयता सदैव रही है
राष्ट्र व राष्ट्रीयता सदैव रही है, सदा थी, कभी प्रबल तो कभी शिथिल। परन्तु बहुत समय तक संघर्ष करता करता हिन्दू राष्ट्र जब सुप्तावस्था में जाने लगा तो एक नरपुंगव विवेकानंद सिंहनाद करने के लिए उठ खड़ा हुआ। कन्याकुमारी के ज्ञान वन की चट्टानों पर भविष्य का ज्ञान उन्हें हुआ और 1000 वर्षों का सन्देश दे गए।
राष्ट्रीय दर्शन को व्यवस्थित करना यह किसी के मनोविलास का काम नहीं है। शास्त्रों पर आधारित और इतिहास में प्रमाणित सुचिंतित विचारों को ही स्वामी विवेकानंद ने गूंथा है। इसमें श्रुतियों से सतियों तक की गूंज है। इस देश के मार्गदर्शक ऋषिगण ही हैं। उन्होंने इसे बार बार कहा,
“दूसरे देशों में बड़े बड़े धर्माचार्य अपने को किसी राजा का वंशधर कहने की बड़ी चेष्टा करते हैं, पर भारत में बड़े बड़े राजा अपने को किसी प्राचीन ऋषि की संतान प्रमाणित करने की चेष्टा ही करते हैं।”
“हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि हमारे समाज के नेता कभी सेनानायक या राजा नहीं थे, वे थे ऋषि। और ऋषि कौन हैं? उनके सम्बन्ध में उपनिषद् कहते हैं, ‘ऋषि कोई साधारण मनुष्य नहीं, वे मन्त्रद्रष्टा है।”
“ऋषि की शक्ति को कोई नहीं रोक सकेगा।”
हजारों सालों के धार्मिक राष्ट्रीय जीवन को इसी आधार पर उन्होंने मात्र समायोजित कर दिया, और यह पूर्णतः सफल हुआ। कोई विवेकानंद की कितनी भी आलोचना करता रहे, सारे दार्शनिक फेल हो गए, पर विवेकानंद के मानस पुत्रों को ही हिन्दू राष्ट्र का उत्तरदायित्व मिला और मिलता रहेगा। निश्छल और सबसे उदात्त विचार ही सफल होते हैं, यही राष्ट्र की नियति है।

