स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद: 3 मार्च को पश्चिम एशिया में तनाव अचानक चरम पर पहुँच गया जब ईरान ने रणनीतिक समुद्री मार्ग Strait of Hormuz को बंद करने की घोषणा कर दी।
यह फैसला उस समय सामने आया जब ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की कथित हत्या के बाद अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच टकराव तीव्र हो चुका था।
ईरान की सैन्य इकाई Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) के वरिष्ठ अधिकारी इब्राहिम जबारी ने चेतावनी दी कि कोई भी जहाज इस जलडमरूमध्य से गुजरने की कोशिश करेगा तो उसे निशाना बनाया जाएगा।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने इन दावों को खारिज किया है, लेकिन क्षेत्र में नौसैनिक गतिविधियाँ बढ़ने से हालात बेहद संवेदनशील हो गए हैं।
क्या है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ईरान और ओमान के बीच स्थित लगभग 21 मील चौड़ा समुद्री मार्ग है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ता है।
यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा गलियारा माना जाता है।
दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20–21 प्रतिशत और बड़ी मात्रा में एलएनजी इसी रास्ते से गुजरती है।
सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत और कतर जैसे खाड़ी देशों का निर्यात इसी मार्ग पर निर्भर है। इसलिए इसकी बंदी का मतलब है वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर।
समुद्री युद्ध और भी घातक
1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान ‘टैंकर वार’ में इसी क्षेत्र में जहाजों को निशाना बनाया गया था, लेकिन आज की स्थिति कहीं अधिक जटिल है।
आधुनिक ड्रोन, एंटी-शिप मिसाइल और स्वार्म तकनीक ने समुद्री युद्ध को अधिक घातक बना दिया है।
ईरान का यह कदम केवल आर्थिक दबाव नहीं बल्कि सैन्य शक्ति प्रदर्शन भी माना जा रहा है।
यदि अमेरिका और उसके सहयोगी बल सक्रिय रूप से दखल देते हैं, तो यह सीमित टकराव से आगे बढ़कर व्यापक युद्ध का रूप ले सकता है।
रोजाना 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल यहां से गुजरता
रोजाना लगभग 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल इस मार्ग से गुजरता है। बंदी की स्थिति में तेल कीमतें 100 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकती हैं। पहले ही युद्ध जोखिम प्रीमियम में 50 प्रतिशत तक उछाल देखा गया है।
बीमा कंपनियाँ इस क्षेत्र में जहाजों को कवर देने से पीछे हट रही हैं, जिससे शिपिंग लागत बढ़ गई है।
वैकल्पिक मार्ग अपनाने पर 10–15 दिन अतिरिक्त लग सकते हैं और ईंधन खपत भी दोगुनी हो सकती है। इससे रसायन, उर्वरक और प्लास्टिक उद्योगों पर भी असर पड़ेगा।
OPEC+ देश उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन अतिरिक्त क्षमता सीमित है। यदि संकट लंबा खिंचता है तो वैश्विक महँगाई और आर्थिक मंदी का खतरा बढ़ जाएगा।
इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत भारत के प्रमुख
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें से लगभग आधा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते आता है।
इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं।
यदि आपूर्ति बाधित होती है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में 20–30 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है। इससे परिवहन, कृषि, लॉजिस्टिक्स और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत बढ़ेगी।
रुपए पर दबाव बढ़ेगा क्योंकि तेल का भुगतान डॉलर में किया जाता है।
हालांकि भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व और रिफाइनरियों में सीमित स्टॉक है, लेकिन लंबी बंदी की स्थिति में रूस, अमेरिका या अफ्रीकी देशों से आयात बढ़ाना पड़ेगा।

