श्रृंगेरी शंकराचार्य थे जिहादी टीपू सुल्तान के समर्थक!
जब से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने या न होने का विवाद छिड़ा है, तब से अविमुक्तेश्वरानंद समर्थकों का दावा है कि श्रृंगेरी शंकराचार्य पीठ ने उन्हें शंकराचार्य बनाया है। यद्यपि पुरी के शंकराचार्य इन्हें शंकराचार्य मानने से इंकार कर चुके हैं।
परन्तु यहाँ श्रृंगेरी शंकराचार्य पीठ का काला इतिहास जानना आवश्यक हो जाता है, ये वही श्रृंगेरी पीठ है जो लाखों हिन्दुओं की हत्या और धर्मान्तरण करने वाले आतंकवादी टीपू सुल्तान की गुलामी करती थी और उसकी विजय के लिए यज्ञ करती थी। धर्मद्रोह का यह काला इतिहास आज भी श्रृंगेरी शंकराचार्य पीठ स्वयं अपनी वेबसाईट पर गर्व से बताती है, आइए जानते हैं इस काले इतिहास को!
टीपू सुल्तान का खूनी जिहाद और श्रृंगेरी पीठ का ऐतिहासिक धर्मद्रोह (1782-1799)
असुर टीपू का अभ्युदय और कोडागु में नृशंस नरसंहार (1785)
1782 में मैसूर की गद्दी पर बैठते ही टीपू सुल्तान ने अपना असली जिहादी रंग दिखाना शुरू किया। उसका उद्देश्य राज्य विस्तार नहीं, बल्कि दक्षिण भारत को ‘दारुल इस्लाम’ बनाना था। 1785 में उसने कोडागु (Coorg) पर आक्रमण कर वहां के मूल निवासी कोडावों हिन्दुओं के अस्तित्व को मिटाने का अभियान चलाया।
उसने देवत परमे नामक स्थान पर धोखे से निहत्थे कोडावों को घेरकर उन पर गोलियां चलवाईं। 80,000 से अधिक कोडावों को बंदी बनाकर जबरन इस्लाम में धर्मांतरित किया गया। गो-मांस खिलाकर उनका धर्म भ्रष्ट किया गया। यह केवल युद्ध नहीं, एक सुनियोजित जातीय सफाया था, जिसे टीपू अपनी ‘विजय’ मानता था।
और इस जिहाद की सफलता के लिए श्रृंगेरी शंकराचार्य पीठ हवन करती थी। श्रृंगेरी पीठ के शिष्य की पुस्तक में 50 से अधिक पन्नों में हैदर अली और टीपू सुल्तान के शंकराचार्य के साथ मधुर सम्बन्धों के साक्ष्य दिए गए हैं।
18 सितंबर, 1791 को हिन्दू हत्यारा टीपू सुल्तान श्रृंगेरी शंकराचार्य सच्चिदानंद भारती को अपने पत्र में प्रसन्नता व्यक्त कर अपने शत्रुओं के विनाश और सरकार (टीपू की सरकार) की सफलता व समृद्धि के लिए जप, प्रार्थना, होम, हवन आदि करवाने का आदेश देता है।

इस आदेश को मानकर श्रृंगेरी के शंकराचार्य टीपू सुल्तान के शत्रुओं अर्थात हिन्दुओं के विनाश और टीपू की सफलता के लिए सहस्रचंडी जप यानि दुर्गा सप्तशती के 1000 पाठ कराने का निर्णय लेते हैं, जिस्केक जवाब में टीपू इस यज्ञ के लिए आवश्यक सामग्री आसफ से लेने को कहता था।
एक ओर तो ये शंकराचार्य 90 प्रतिशत हिन्दुओं को अछूत मानते थे और दूसरी ओर अपवित्र मलेछों के धन और सामग्री से उनकी विजय और हिन्दुओं की पराजय के लिए हवन किया करते थे। ऐसे लोग अगर अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य बना दें तो उसमें क्या आश्चर्य है ?

22 नवंबर, 1791 को टीपू सुल्तान उसकी हिन्दुओं के खिलाफ विजय के लिए शंकराचार्य द्वारा किए गए सहस्रचंडी-जप अनुष्ठान से खुश होकर श्रृंगेरी शंकराचार्य की यात्रा के लिए एक अच्छी और आरामदायक पालकी भेजता है।

मालाबार में मंदिरों का ध्वंस और ब्राह्मणों का नरसंहार (1788-1790)
मालाबार क्षेत्र में टीपू का कहर 1788 से 1792 के बीच अपनी चरम सीमा पर था। टीपू ने अपनी सेना को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि काफिरों का सफाया किया जाए। मालाबार मैनुअल के अनुसार, अकेले मालाबार में 70,000 हिंदुओं को तलवार की नोक पर मुसलमान बनाया गया।
19 जनवरी 1790 को टीपू ने कालीकट के गवर्नर को लिखित आदेश भेजा: “सभी ब्राह्मणों को घेर लो और उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बनाओ, जो न माने उसे मार डालो।” मंदिरों को तोड़कर मस्जिदों में बदलना और मूर्तियों को गटर में फेंकना उसका शगल था। उसने हिंदुओं पर ‘जजिया’ कर लगाया, जिससे हिंदू अपनी ही भूमि पर गुलामों जैसा जीवन जीने को विवश हो गए। और इस आतंकवादी की जी हुजूरी श्रृंगेरी पीठ करती थी।
एक ओर टीपू सुल्तान ब्राह्मणों का नरसंहार कर रहा था दूसरी ओर इसी कालखंड में अक्टूबर 1791 के एक पत्र में टीपू सुल्तान श्रृंगेरी के शंकराचार्य के प्रति आभार व्यक्त करता है कि उन्होंने टीपू सुल्तान की सफलता के लिए ‘सहस्रचंडी जप’ और अनुष्ठान करने का निर्णय लिया है। 3 दिसंबर 1792 को टीपू सुल्तान ने श्रृंगेरी शंकराचार्य से निवेदन दिया कि वे दिन में तीन बार आशीर्वाद दें।

वैष्णवों का नरसंहार: मेलकोटे की रक्तरंजित दीपावली (1790)
टीपू सुल्तान घोर हिन्दू विरोधी था। 1790 में दीपावली के पवित्र दिन उसने मेलकोटे में अयंगर ब्राह्मणों (वैष्णवों) का सामूहिक नरसंहार किया। 800 से अधिक मंडियम अयंगर ब्राह्मणों को, जो निहत्थे थे और पूजा कर रहे थे, काट डाला गया।
उनकी लाशों को पेड़ों पर लटकाया गया ताकि हिंदुओं में दहशत फैले। श्रीरंगपट्टनम के वराह नरसिंह मंदिर और कोल्लूर मूकाम्बिका मंदिर को टीपू ने अपवित्र किया और लूटा।
जब दक्षिण भारत में हिन्दुओं को टीपू सुल्तान चुन चुनकर मार रहा था तब श्रृंगेरी के शंकराचार्य टीपू सुल्तान की दिए हुए हाथी घोड़े पालकी और धन लेकर ऐशो आराम कर रहे थे।

श्रृंगेरी के शंकराचार्यों का महा-धर्मद्रोह: हत्यारे की विजय की कामना (1791)
जब टीपू सुल्तान मेलकोटे में वैष्णवों का रक्त बहा रहा था और मालाबार में ब्राह्मणों का धर्म भ्रष्ट कर रहा था, ठीक उसी समय श्रृंगेरी के शंकराचार्य सच्चिदानंद भारती तृतीय उस राक्षस के साथ गठबंधन कर रहे थे। 1791 में जब मराठा और अंग्रेज टीपू को घेर रहे थे, तब यह पीठ टीपू की रक्षा के लिए ढाल बनकर खड़ी हो गई।
शंकराचार्य ने एक ऐसे ‘म्लेच्छ’ और गो-हत्यारे (टीपू) की सत्ता बचाने के लिए ‘शतचंडी’ और ‘सहस्रचंडी’ महायज्ञ का अनुष्ठान किया। यह वही परंपरा है जो एक ओर शूद्रों और दलितों को वेद मंत्रों के उच्चारण और यज्ञ का अधिकारी नहीं मानती, उन्हें धर्म से दूर रखती है, लेकिन चंद सिक्कों और जागीरों के लालच में उसने एक विधर्मी म्लेच्छ (टीपू सुल्तान), जो गो-हत्यारा और ब्राह्मण-हंता है, को अपना ‘यजमान’ बना लिया।
मराठों का प्रतिशोध: पाप के केंद्र पर प्रहार (1791)
इतिहासकार जिसे ‘मराठों द्वारा श्रृंगेरी की लूट’ कहते हैं, वह वास्तव में धर्मद्रोहियों को दंड देने की कार्रवाई थी। मराठा सेनापति परशुराम भाऊ और रघुनाथ राव पटवर्धन जानते थे कि श्रृंगेरी पीठ अब धर्म का केंद्र नहीं, बल्कि टीपू जैसे असुर की आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत बन चुका है।
मराठा सेनापति परशुराम भाऊ और रघुनाथ राव पटवर्धन, ये दोनों स्वयं ब्राह्मण थे, फिर भी कुछ लोग श्रृंगेरी के हिन्दू द्रोही चरित्र को छिपाकर इन्हीं ब्राह्मण मराठों को ब्राह्मण विरोधी कहने का पाप करते हैं।
जो पीठ हिंदुओं के हत्यारे की विजय के लिए यज्ञ कर रही हो, उसका विनाश आवश्यक था ताकि टीपू सुल्तान को मिल रहा आध्यात्मिक कवच तोड़ा जा सके। मराठों ने वहां हमला करके उस पाप-गठबंधन को चुनौती दी। यह हमला धन के लिए नहीं, बल्कि उस स्थान को नष्ट करने के लिए था जहां से टीपू की जीत के लिए मंत्र पढ़े जा रहे थे।
पर इतना ही नहीं श्रृंगेरी के शंकराचार्य टीपू सुल्तान के आदेश मानकर मराठों से वसूली भी करते थे, टीपू सुल्तान ने श्रृंगेरी शंकराचार्य को परशुराम भाऊ से 60 लाख की वसूली करने का आदेश दिया था।

स्मार्त-वैष्णव विद्वेष और टीपू-श्रृंगेरी गठबंधन
श्रृंगेरी के शंकराचार्यों का टीपू को समर्थन देना उनकी संकीर्ण स्मार्त मानसिकता और वैष्णव विरोध को भी उजागर करता है। जब टीपू मेलकोटे और श्रीरंगम में वैष्णवों को चुन-चुन कर मार रहा था, तब श्रृंगेरी पीठ मौन थी।
उन्हें वैष्णवों के संहार से कोई पीड़ा नहीं हुई, उल्टे, उन्होंने उस संहारक टीपू से उपहार, हाथी, और ‘साड़ियां’ स्वीकार कीं। टीपू ने श्रृंगेरी को जो ‘स्फटिक लिंग’ भेजा, उसे शंकराचार्य ने स्वीकार कर पूजा, जो यह सिद्ध करता है कि वे पूरी तरह टीपू के अधीन हो चुके थे।
जिन म्लेच्छ धर्मद्रोहियों को शिवलिंग छूने का भी अधिकार नहीं है, जो हजारों मूर्तियों को तोड़ देते थे, उनके दिए हुए शिवलिंग को शंकराचार्य पूजते थे और अधिकांश हिन्दुओं को मंदिर प्रवेश का भी अधिकारी नहीं मानते थे।
म्लेच्छों की चाटुकारिता की विषैली परंपरा और वर्तमान उत्तराधिकारी
टीपू सुल्तान द्वारा श्रृंगेरी को दिए गए दान, 400 राहती (स्वर्ण मुद्राएं) और आभूषण कोई सम्मान नहीं था, बल्कि उस ‘सेवा’ की दक्षिणा थी जो शंकराचार्यों ने यज्ञों के माध्यम से उसे दी थी। टीपू के पत्रों में शंकराचार्य को ‘जगद्गुरु’ कहना जिहादी अल तकैया चाल थी, और शंकराचार्य का उसे आशीर्वाद देना हिन्दू धर्म का सौदा।
यही वह कलंकित पीठ और परंपरा है जिसने मुगलों और टीपू जैसे अत्याचारियों के आगे घुटने टेके। आज अविमुक्तेश्वरानंद और सदानंद का शंकराचार्य बनना इसी गुलाम मानसिकता और धर्मद्रोही परंपरा का विस्तार है।
जिस पीठ की नींव में ही टीपू सुल्तान जैसे हिंदू-हंतियारे के लिए की गई प्रार्थनाएं हों, वहां से धर्म की रक्षा की अपेक्षा करना व्यर्थ है। ये वर्तमान शंकराचार्य उसी वंशवेल के फल हैं जिसने 18वीं सदी में हिंदुओं की लाशों पर खड़े होकर टीपू सुल्तान की जय-जयकार की थी।
संदर्भ (References):
- Logan, William. “Malabar Manual” (Statistics on forced conversions in Malabar).
- Shastry, A.K. “The Records of the Sringeri Dharmasamsthana,” 2009 (Letters between Tipu and Sringeri regarding Sahasrachandi Japa and temple restoration).
- Sardesai, G.S. “New History of the Marathas,” Vol-III (Maratha raid and Tipu’s intervention).
- Chetty, A. Subbaraya. “Tippu’s Endowments to the Hindus and the Hindu institutions” (Details on grants to temples).
- Rao, M. Shama. “Modern Mysore” (Details on charities and endowments).
- Wilks, Mark. “Historical Sketches of the South of India” (Accounts of Coorg and Melkote massacres).
- Sen, Surendranath (1930) The Shringeri Letters of Tipu Sultan, Studies in Indian History, pp.155-159.


