नेपाल
राजाओं के शासन में लगातार गिरती अर्थव्यवस्था, फिर भी स्वर्णकाल का भ्रम कायम
नेपाल के सामाजिक राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार राजा महेंद्र, राजा वीरेन्द्र और राजा ज्ञानेन्द्र तीनों के शासनकाल में देश की आर्थिक स्थिति लगातार खराब होती गई।
महेंद्र के दौर में नेपाल दुनिया का पाँचवाँ सबसे गरीब देश था, वीरेन्द्र के शासन में यह चौथे स्थान पर जा पहुंचा और ज्ञानेन्द्र के समय नेपाल विश्व का दूसरा सबसे गरीब देश बन गया।
इसके बावजूद एक वर्ग इस कालखंड को राजशाही का स्वर्णकाल बताने की जिद पर अड़ा हुआ है।
विकास पर नहीं, पहचान और nostalgia पर टिकी मौजूदा बहस
नेपाली विशेषज्ञों के अनुसार आज राजतंत्र वापसी को लेकर उठ रही आवाजों का संबंध विकास, सुशासन या आर्थिक सुधारों से कतई नहीं है।
पूरी बहस पहचान की राजनीति, सांस्कृतिक वर्चस्व और अतीत की कल्पित छवि पर केंद्रित है।
यदि चर्चा सचमुच विकास पर केंद्रित होती, तो बहस का केंद्र अर्थनीति, जवाबदेही, संस्थागत मजबूती और पारदर्शिता जैसे विषय होते, जो कि इस पूरे विमर्श से लगभग गायब हैं।
1961 में महेंद्र शासन की खर्चीली पंचायती व्यवस्था और IMF कर्ज की मजबूरी
इतिहासकार बताते हैं कि 1961 में राजा महेंद्र के अधीन पंचायती शासन की फिजूलखर्ची ने सरकारी खजाने पर गंभीर दबाव डाल दिया।
हालात इतने बिगड़ गए कि नेपाल को पहली बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष IMF से कर्ज लेना पड़ा। इस कर्ज की शर्त यह थी कि विदेशी अनुदान और पूँजी से बने राज्य स्वामित्व वाले सभी कारखानों का निजीकरण किया जाए।
नतीजा यह हुआ कि नेपाल के प्रमुख उद्योग टूटने लगे, रोजगार के अवसर सिकुड़ गए और आर्थिक ढाँचा कमजोर होता गया।
राजतंत्र की मांग में समाधान नहीं, सिर्फ प्रतीकवाद का विस्तार
नेपाल के समाजशास्त्रियों का कहना है कि मौजूदा मांगों में तर्क और समाधान कम हैं और प्रतीकवाद तथा भावनात्मकता कहीं अधिक है।
यह मांग उस कल्पित अतीत से प्रेरित दिखाई देती है, जिसमें एक ही शक्ति संरचना और एक ही सांस्कृतिक पहचान को सर्वोच्च माना जाता था।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की राजनीति वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकाती है और जनता को आसान लेकिन भ्रमित करने वाले उत्तर देती है।
अस्थिरता, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने सरल उत्तरों की तलाश बढ़ाई
आज नेपाल में बेरोजगारी, महँगाई, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता लगातार बढ़ रही है। विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे समय में लोग अक्सर सरल समाधान खोजने लगते हैं और राजतंत्र को एक आसान उत्तर के रूप में पेश किया जा रहा है।
जबकि इतिहास यह साफ दिखाता है कि राजशाही इन जमीनी समस्याओं को कभी दूर नहीं कर सकी।
नेपाली युवाओं की स्पष्ट राय, देश को आवरण नहीं बल्कि सिस्टम चाहिए
नेपाल के युवा वर्ग और शहरी मध्यमवर्ग का दृष्टिकोण स्पष्ट है। उनका कहना है कि देश की प्रगति शिक्षा, अवसरों की समानता, सशक्त संस्थानों और जवाबदेह शासन से आएगी, न कि सिंहासन या किसी राजतंत्रीय प्रतीक से।
युवा मानते हैं कि पहचान आधारित राजनीति देश के संसाधनों और ऊर्जा को वास्तविक सुधारों से दूर ले जा रही है।
भविष्य की राह आधुनिक सोच, जवाबदेही और समानता पर आधारित व्यवस्था
विशेषज्ञों का निष्कर्ष यह है कि नेपाल को अतीत की ओर लौटने की नहीं बल्कि आगे बढ़ने की जरूरत है। समावेशी विकास, पारदर्शी शासन, मजबूत संस्थाएँ और आधुनिक नीतियाँ ही देश की आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का समाधान कर सकती हैं।
nostalgia आधारित राजनीति न तो रोजगार देगी, न भ्रष्टाचार घटाएगी और न ही देश को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर पाएगी।
नेपाल के विश्लेषक मानते हैं कि देश को किसी ऐतिहासिक पहचान की पुनर्स्थापना से नहीं बल्कि काम करने वाली व्यवस्था, जवाबदेही और आधुनिक दृष्टि से उन्नति मिलेगी।
राष्ट्र तभी आगे बढ़ेगा जब नीतियाँ सबके लिए समान अवसर पैदा करें और सिस्टम आम नागरिक के हित में प्रभावी ढंग से काम करे।

