राजेश खन्ना बायोग्राफी: 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत में भारतीय फिल्म उद्योग में एक ऐसा दौर आया जिसने स्टारडम की परिभाषा ही बदल दी।
सिनेमाघर केवल फिल्म देखने की जगह नहीं रह गए थे, बल्कि वे किसी उत्सव या मेले की तरह लगने लगे थे।
जब उनकी कोई फिल्म रिलीज होती थी, तो सिनेमाघरों के बाहर हजारों लोग घंटों तक कतार में खड़े रहते थे। टिकटें कई हफ्ते पहले ही बिक जाती थीं।
प्रशंसकों की दीवानगी इतनी ज्यादा थी कि युवतियाँ उन्हें अपने खून से लिखे प्रेम पत्र भेजती थीं। कुछ ने तो उनकी तस्वीरों से शादी करने तक की बातें कही थीं।
कई बार जब वे किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में पहुंचते, तो उन्हें देखकर कुछ प्रशंसक बेहोश भी हो जाते थे।
उनकी कार अक्सर लिपस्टिक के निशानों से भर जाती थी, क्योंकि प्रशंसक उसे चूमकर अपना प्यार जताते थे।
मुंबई में उनके प्रसिद्ध बंगले “आशीर्वाद” के बाहर रोज़ लोगों की भीड़ जमा रहती थी।
लोग केवल इस उम्मीद में खड़े रहते कि शायद एक बार अपने प्रिय अभिनेता को बालकनी से हाथ हिलाते देख सकें।
सिनेमा हॉल के अंदर भी माहौल अलग ही होता था। जैसे ही वे पर्दे पर आते, दर्शक तालियों और सीटियों से पूरा हॉल गूंजा देते थे।
उनके संवाद दर्शक खुद दोहराने लगते थे और उन पर फिल्माए गए गाने पूरे देश में लोकप्रिय हो जाते थे और उस अभिनेता का नाम था राजेश खन्ना।
व्यक्तिगत जानकारी
| पूरा नाम | जतिन खन्ना |
|---|---|
| फिल्मी नाम | राजेश खन्ना |
| उपनाम | काका |
| जन्म | 29 दिसंबर 1942 |
| जन्मस्थान | अमृतसर, पंजाब |
| पेशा | अभिनेता, निर्माता, राजनीतिज्ञ |
| सक्रिय वर्ष | 1966 – 2012 |
| पहली फिल्म | आखिरी खत |
| राजनीतिक दल | Indian National Congress |
| पत्नी | डिंपल कपाडिया |
| बच्चे | ट्विंकल खन्ना , रिंकी खन्ना |
| राष्ट्रीयता | भारतीय |
| धर्म | हिन्दू धर्म |
बचपन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
राजेश खन्ना का जन्म 29 दिसंबर 1942 को अमृतसर में हुआ था और तब उनका नाम जतिन खन्ना रखा गया था।
उनके जन्म के कुछ समय बाद ही एक बड़ा पारिवारिक बदलाव हुआ।
उनके असली माता-पिता, लाला हीरानंद और चांद रानी ने उन्हें अपने ही अमीर रिश्तेदारों चुन्नीलाल और लीलावती खन्ना को गोद दे दिया।
इसके बाद उनका बचपन मुंबई के गिरगाँव इलाके में बड़े लाड़-प्यार और अमीरी के बीच बीता।
उनके दत्तक पिता रेलवे के एक बड़े ठेकेदार थे, जिसकी वजह से जतिन को कभी किसी अभाव का सामना नहीं करना पड़ा।
उनकी शुरुआती पढ़ाई मुंबई के सेंट सेबेस्टियन गोअन हाई स्कूल में हुई, जहाँ बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता जीतेंद्र उनके क्लासमेट और जिगरी दोस्त हुआ करते थे।
स्कूल और फिर कॉलेज के दिनों में ही जतिन को नाटकों और थिएटर का जबरदस्त शौक लग गया था।
उनके पास उन दिनों भी अपनी खुद की स्पोर्ट्स कार थी, जिससे वे कॉलेज और बाद में फिल्म स्टूडियोज़ के चक्कर लगाया करते थे।
जब उन्होंने अभिनय को ही अपना करियर बनाने की ठानी, तो अपने चाचा की सलाह पर उन्होंने अपना नाम ‘जतिन’ से बदलकर ‘राजेश’ रख लिया।
भले ही उनके पिता चाहते थे कि वे उनका कारोबार संभालें, लेकिन राजेश के मन में तो सिनेमाई पर्दे पर छा जाने का सपना पल रहा था,
जिसने आगे चलकर उन्हें भारत का पहला सुपरस्टार बना दिया।
शिक्षा
राजेश खन्ना की पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत मुंबई के गिरगाँव स्थित सेंट सेबेस्टियन गोअन हाई स्कूल से हुई थी। स्कूल के दिनों से ही उनके भीतर का कलाकार बाहर आने लगा था,
वे अक्सर स्कूल के नाटकों में हिस्सा लेते और पुरस्कार भी जीतते थे। दिलचस्प बात यह है कि बॉलीवुड के “जंपिंग जैक” कहे जाने वाले
मशहूर अभिनेता जीतेंद्र उनके स्कूल के सबसे करीबी दोस्त थे और उन दोनों की यह गहरी दोस्ती ताउम्र बनी रही।
स्कूल के बाद राजेश खन्ना ने अपनी उच्च शिक्षा के लिए पुणे और मुंबई के चक्कर लगाए। उन्होंने 1959 से 1961 के बीच पुणे के नवरोजी वाडिया कॉलेज में बीए के शुरुआती दो सालों की पढ़ाई की।
इसके बाद वे मुंबई लौट आए और यहाँ के मशहूर केसी (किशिनचंद चेल्लाराम) कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन पूरी की।
कॉलेज के दिनों में वे पढ़ाई से ज्यादा अपनी एक्टिंग और कॉलेज के ड्रामों के लिए जाने जाते थे। उस दौर में भी उनके पास अपनी कार थी, जिससे वे कॉलेज जाते थे।
कॉलेज के अंतर-विद्यालय नाटक प्रतियोगिताओं में वे इतने मंझे हुए कलाकार माने जाते थे कि कई बार उन्हें देखते ही दूसरी टीमें अपना नाम वापस ले लेती थीं।
यहीं से उनके भीतर वह आत्मविश्वास पैदा हुआ जिसने उन्हें आगे चलकर सुपरस्टार बनने की प्रेरणा दी।
करियर की शुरुआत
राजेश खन्ना के करियर की शुरुआत किसी फिल्मी कहानी की तरह ही काफी शानदार रही। 1965 में ‘यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स’ और ‘फिल्मफेयर’ ने देशभर में एक टैलेंट हंट प्रतियोगिता रखी थी।
इस मुकाबले में करीब 10,000 लड़कों ने हिस्सा लिया था, लेकिन राजेश खन्ना ने अपनी प्रतिभा से सबको पीछे छोड़ दिया और आठ फाइनलिस्टों में जगह बना ली।
अंत में वे इसके विजेता बने और यहीं से उनका नाम जतिन से बदलकर ‘राजेश’ कर दिया गया।
इस जीत के साथ ही उन्हें जीपी सिप्पी और नासिर हुसैन जैसे बड़े फिल्म मेकर्स के साथ काम करने का मौका मिल गया।
उनकी पहली फिल्म 1966 में आई ‘आखिरी खत’ थी, जिसका निर्देशन चेतन आनंद ने किया था।
हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई खास कमाल नहीं दिखा पाई, लेकिन इसे ऑस्कर के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री के रूप में चुना गया, जो एक बड़ी उपलब्धि थी।
इसके बाद 1967 में उनकी फिल्म ‘राज़’ रिलीज हुई, जिसे वे अपनी असली शुरुआत मानते थे क्योंकि इसमें वे एक मुख्य अभिनेता के तौर पर मजबूती से उभरे थे।
शुरुआती दिनों में वे कैमरे के सामने थोड़े शर्मीले थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपनी चाल और गर्दन झुकाने के अंदाज़ से अपनी एक अलग पहचान बनानी शुरू कर दी।
असली धमाका हुआ साल 1969 में, जब उनकी फिल्म ‘आराधना’ रिलीज हुई। इस एक फिल्म ने राजेश खन्ना को रातों-रात पूरे देश का चहेता बना दिया।
फिल्म के गाने, खासकर “मेरे सपनों की रानी”, हर गली-मोहल्ले में गूंजने लगे।
इसके ठीक बाद आई ‘दो रास्ते’ ने उनकी कामयाबी पर मुहर लगा दी।
यहीं से उस ऐतिहासिक दौर की शुरुआत हुई जहाँ उन्होंने लगातार 15 सुपरहिट फिल्में देकर पूरी दुनिया को हैरान कर दिया और भारतीय सिनेमा के पहले ‘सुपरस्टार’ कहलाए।
करियर टाइमलाईन
1960 का दशक: शुरुआत और पहचान
राजेश खन्ना के करियर की नींव 1965 में पड़ी जब उन्होंने ‘ऑल इंडिया टैलेंट कॉन्टेस्ट’ जीता। इसके बाद 1966 में उनकी पहली फिल्म ‘आखिरी खत’ आई।
शुरुआती एक-दो साल उन्होंने अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष किया। इस दौरान ‘राज़’ और ‘बहारों के सपने’ जैसी फिल्में आईं,
जिनसे लोगों को पता चला कि एक नया और प्रभावशाली अभिनेता इंडस्ट्री में आ चुका है।
1969 से 1975: सुपरस्टारडम का सुनहरा दौर
यह राजेश खन्ना के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था। 1969 में ‘आराधना’ रिलीज हुई और पूरा देश उनके पीछे पागल हो गया।
इसी दौर में उन्होंने लगातार 15 सोलो हिट फिल्में देने का वो वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया, जो आज भी कायम है।
‘आनंद’, ‘कटी पतंग’, ‘अमर प्रेम’ और ‘हाथी मेरे साथी’ जैसी फिल्मों ने उन्हें सुपरस्टार से भगवान जैसा दर्जा दिला दिया।
किशोर कुमार की आवाज और राजेश खन्ना का अंदाज घर-घर की पसंद बन गया था।
1970 के दशक का उत्तरार्ध: रुझानों में बदलाव
70 के दशक के आखिरी सालों में दर्शकों की पसंद बदलने लगी थी। अब लोग रोमांटिक हीरो के बजाय ‘एंग्री यंग मैन’ यानी अमिताभ बच्चन के एक्शन को पसंद करने लगे थे।
इस दौर में राजेश खन्ना का जादू बॉक्स ऑफिस पर थोड़ा कम होने लगा, हालांकि ‘नमक हराम’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया।
1980 का दशक: शानदार वापसी के प्रयास
80 के दशक में राजेश खन्ना ने एक बार फिर साबित किया कि उनका सिक्का पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है।
उन्होंने ‘अवतार’, ‘सौतन’ और ‘अमृत’ जैसी सुपरहिट फिल्में देकर शानदार वापसी की।
अब वे रोमांटिक लड़के के बजाय ज्यादा परिपक्व और गंभीर भूमिकाओं में नजर आने लगे थे, जिन्हें दर्शकों ने खूब सराहा।
1990 से 2012: राजनीति और आखिरी सफर
90 के दशक में उन्होंने अभिनय से थोड़ा ब्रेक लिया और राजनीति का रुख किया। वे 1992 से 1996 तक सांसद रहे, जिस वजह से फिल्मों में उनकी मौजूदगी कम हो गई।
इसके बाद के सालों में वे कभी-कभार फिल्मों, विज्ञापनों और टीवी शोज में नजर आते रहे।
उनका आखिरी स्क्रीन अपीयरेंस एक विज्ञापन में था। 2012 में उनके निधन के साथ ही भारतीय सिनेमा के एक सबसे चमकदार युग का अंत हो गया।
स्टारडम युग
राजेश खन्ना का सुपरस्टारडम वाला दौर भारतीय सिनेमा के इतिहास का वो पन्ना है, जिसे चाहकर भी कोई दूसरा दोहरा नहीं पाया।
1969 से 1975 के बीच का यह समय ‘राजेश खन्ना के जादू’ का समय था।
इसकी शुरुआत फिल्म ‘आराधना’ से हुई, जिसने रातों-रात उन्हें एक ऐसा सितारा बना दिया जिसकी चमक के आगे सब फीके पड़ गए।
इस फिल्म के बाद राजेश खन्ना ने लगातार 15 सोलो हिट फिल्में दीं, जो आज भी एक वर्ल्ड रिकॉर्ड है।
उस दौर में बॉलीवुड में एक कहावत मशहूर हो गई थी “ऊपर आका और नीचे काका।”
इस दौर की दीवानगी का आलम यह था कि राजेश खन्ना सिर्फ एक एक्टर नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय जुनून बन गए थे।
लड़कियां उनकी तस्वीरों से शादी कर लेती थीं और उनकी कार के गुजरने के बाद उसकी धूल से अपनी मांग भरती थीं।
उनकी एक मुस्कुराहट और गर्दन टेढ़ी करने के अंदाज़ पर पूरा देश फिदा था।
‘आनंद’, ‘कटी पतंग’, ‘अमर प्रेम’, ‘हाथी मेरे साथी’ और ‘दुश्मन’ जैसी फिल्मों ने उन्हें सफलता के उस मुकाम पर पहुँचा दिया जहाँ आज तक कोई नहीं पहुँच सका है।
उनकी इस कामयाबी के पीछे एक बड़ी वजह थी किशोर कुमार और आर.डी. बर्मन के साथ उनकी तिगड़ी।
किशोर कुमार की आवाज राजेश खन्ना के चेहरे पर इतनी सटीक बैठती थी कि लोगों को लगता था कि गाना खुद राजेश खन्ना गा रहे हैं। इस दौर में उन्होंने रोमांस को एक नई परिभाषा दी।
वे पर्दे पर जब भावुक संवाद बोलते थे, तो सिनेमाघरों में सिसकियां सुनाई देती थीं और जब वे मुस्कुराते थे, तो तालियों की गूँज रुकती नहीं थी।
1975 तक उनका राज बेरोकटोक चला और उन्होंने दिखा दिया कि एक सुपरस्टार का असली मतलब क्या होता है।
“किशोर-राजेश-आरडी” की संगीत क्रांति
एक रूह और दो शरीर (किशोर-राजेश की जुगलबंदी)
किशोर कुमार की आवाज राजेश खन्ना के व्यक्तित्व पर इस कदर फिट बैठती थी कि लगता ही नहीं था कि कोई पार्श्व गायक गा रहा है।
राजेश खन्ना के चेहरे के भाव, उनकी आँखों का झपकना और गर्दन टेढ़ी करने का अंदाज़, किशोर दा की आवाज के उतार-चढ़ाव से पूरी तरह मेल खाता था।
राजेश खन्ना खुद कहते थे कि किशोर मेरी ‘आधिकारिक आवाज’ हैं।
पंचम दा का म्यूजिकल एक्सपेरिमेंट
आर.डी. बर्मन (पंचम दा) ने पारंपरिक भारतीय संगीत में वेस्टर्न बीट्स, जैज़ और लैटिन संगीत का ऐसा मेल कराया जो युवाओं के लिए बिल्कुल नया था।
“मेरे सपनों की रानी” में माउथ ऑर्गन का इस्तेमाल हो या “रूप तेरा मस्ताना” का सस्पेंस भरा संगीत, पंचम दा ने राजेश खन्ना की रोमांटिक इमेज को संगीत के जरिए अमर बना दिया।
गानों का सुपरस्टार होना
उस दौर में फिल्म की कहानी से ज्यादा उसके गाने फिल्म को हिट कराते थे। इस तिकड़ी के गाने फिल्म रिलीज होने से पहले ही रेडियो पर छा जाते थे, जिससे सिनेमाघरों में भारी भीड़ उमड़ती थी।
“ये जो मोहब्बत है”, “प्यार दीवाना होता है” और “चिन्गारी कोई भड़के” जैसे गानों ने साबित किया कि संगीत ही फिल्म की असली मार्केटिंग है।
भावुक जुड़ाव और अंत
इन तीनों के बीच केवल प्रोफेशनल रिश्ता नहीं था, बल्कि वे गहरे दोस्त थे। वे अक्सर रात-रात भर बैठकर धुनों पर चर्चा करते थे।
यही वजह थी कि जब किशोर कुमार का निधन हुआ, तो राजेश खन्ना एकदम टूट गए थे।
उन्होंने भारी मन से कहा था कि “आज मैंने अपनी आवाज खो दी है।” वाकई, उन तीनों के बिना आज भी हिंदी सिनेमा का संगीत अधूरा सा लगता है।
दो सितारों का टकराव
शुरुआत और असुरक्षा
इन दोनों ने पहली बार फिल्म ‘आनंद’ (1971) में साथ काम किया। राजेश खन्ना उस समय सुपरस्टार थे और अमिताभ एक नए कलाकार।
फिल्म हिट हुई, लेकिन जब अमिताभ की तारीफ होने लगी, तो काका को अपनी कुर्सी छिनने का डर सताने लगा।
कहा जाता है कि सेट पर राजेश अक्सर अमिताभ को घंटों इंतज़ार करवाते थे और उन्हें ‘लंबू’ कहकर चिढ़ाते थे।
‘नमक हराम’ और दौर का बदलना
1973 में आई फिल्म ‘नमक हराम’ ने इस कड़वाहट को और बढ़ा दिया। इस फिल्म में अमिताभ की दमदार एक्टिंग और ‘एंग्री यंग मैन’ वाली छवि ने राजेश खन्ना के सॉफ्ट रोमांस को पीछे छोड़ दिया।
फिल्म देखने के बाद काका ने खुद स्वीकार किया था कि अब उनका दौर खत्म हो चुका है और इंडस्ट्री को नया सुपरस्टार मिल गया है।
रोमांस बनाम गुस्सा
70 के दशक के आखिर में दर्शकों की पसंद बदल गई। लोग अब राजेश खन्ना के गर्दन झुकाने वाले अंदाज के बजाय अमिताभ के मार-धाड़ वाले एक्शन को ज्यादा पसंद करने लगे।
राजेश खन्ना की सेट पर देरी से आने की आदत और अमिताभ की समय की पाबंदी ने भी फिल्म मेकर्स को अमिताभ की तरफ मोड़ दिया।
भले ही इनके बीच सालों तक शीत युद्ध चला, लेकिन अंत में अमिताभ ने काका को ‘पहला असली सुपरस्टार’ मानकर अपनी श्रद्धांजलि दी।
विवाद
अहंकार और देरी की आदत: काका अपनी कामयाबी के नशे में सेट पर 4-5 घंटे देरी से आने के लिए मशहूर थे। उनका मानना था कि पूरी इंडस्ट्री उनके इंतज़ार के लिए बनी है।
इसी वजह से फिल्म ‘जनता हवलदार’ के सेट पर कॉमेडियन महमूद ने उन्हें थप्पड़ तक जड़ दिया था।
अंजू महेंद्रू से ‘बदले’ वाली शादी: जब उनका एक्ट्रेस अंजू महेंद्रू से ब्रेकअप हुआ, तो उन्होंने डिंपल कपाड़िया से शादी की।
अपनी अकड़ दिखाने के लिए उन्होंने जानबूझकर अपनी बारात अंजू के घर के ठीक नीचे से निकलवाई थी।
डिंपल से अनबन: 16 साल की डिंपल से शादी के बाद उनका स्वभाव काफी कंट्रोल करने वाला हो गया था।
उन्होंने डिंपल को फिल्मों में काम करने से मना कर दिया, जिसकी वजह से शादी के कुछ साल बाद ही दोनों 30 साल तक अलग रहे।
अमिताभ से जलन: अमिताभ बच्चन की कामयाबी से वे काफी असुरक्षित थे। सेट पर वे अक्सर अमिताभ का मजाक उड़ाते थे,
जिसकी वजह से दोनों के बीच बरसों तक ‘कोल्ड वॉर’ चला।
मौत के बाद संपत्ति का विवाद: उनके निधन के बाद अनीता आडवाणी नाम की महिला ने दावा किया कि वे काका की लिव-इन पार्टनर थीं।
उन्होंने उनके आलीशान बंगले ‘आशीर्वाद’ और 600 करोड़ की संपत्ति पर अपना हक जताते हुए कानूनी लड़ाई शुरू कर दी थी।
10 सबसे बड़ी फिल्में
आराधना (1969)
दो रास्ते (1969)
सफ़र (1970)
कटी पतंग (1971)
आनंद (1971)
हाथी मेरे साथी (1971)
अमर प्रेम (1972)
बावर्ची (1972)
दाग (1973)
नमक हराम (1973)
पुरस्कार और सम्मान
नागरिक सम्मान
पद्म भूषण (2013): भारत सरकार द्वारा उन्हें मरणोपरांत देश का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान दिया गया।
फिल्मफेयर पुरस्कार (Filmfare Awards)
राजेश खन्ना को कुल 14 बार बेस्ट एक्टर के लिए नॉमिनेट किया गया, जिनमें से उन्होंने ये मुख्य पुरस्कार जीते:
बेस्ट एक्टर: ‘सच्चा झूठा’ (1971)
बेस्ट एक्टर: ‘आनंद’ (1972)
बेस्ट एक्टर: ‘आविष्कार’ (1975)
स्पेशल अवार्ड (1991): फिल्म इंडस्ट्री में 25 साल पूरे करने और 101 फिल्मों में लीड रोल निभाने के लिए।
लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड (2005): भारतीय सिनेमा में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए।
अन्य महत्वपूर्ण सम्मान
दादा साहब फाल्के एकेडमी अवार्ड (2013): मरणोपरांत उन्हें “भारतीय सिनेमा का पहला सुपरस्टार” खिताब से सम्मानित किया गया।
BFJA अवार्ड्स: बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन की तरफ से उन्हें 4 बार बेस्ट एक्टर (आनंद, बावर्ची, नमक हराम और अमृत) का पुरस्कार मिला।
IIFA लाइफटाइम अचीवमेंट (2009): अंतरराष्ट्रीय भारतीय फिल्म अकादमी द्वारा सम्मानित किया गया।
राजनीतिक सफर (सांसद के रूप में)
90 के दशक में राजेश खन्ना ने अभिनय छोड़कर राजनीति का रुख किया। वे कांग्रेस पार्टी से जुड़े और 1992 में नई दिल्ली सीट से लोकसभा सांसद चुने गए।
उन्होंने उपचुनाव में अपने ही साथी कलाकार शत्रुघ्न सिन्हा को हराया था। वे 1996 तक सांसद रहे और उसके बाद भी कांग्रेस के लिए प्रचार करते रहे।
बिजनेस और संपत्ति
राजेश खन्ना के पिता रेलवे के बड़े ठेकेदार थे, इसलिए बिजनेस उनके खून में था। वे अपने दौर के सबसे महंगे एक्टर थे।
उनका सबसे बड़ा बिजनेस निवेश उनका मशहूर बंगला ‘आशीर्वाद’ था, जिसे उन्होंने राजेंद्र कुमार से खरीदा था।
अपनी मृत्यु के समय वे करीब 1000 करोड़ रुपये की संपत्ति के मालिक थे, जिसे उन्होंने अपनी दोनों बेटियों के नाम किया था।
अनसुने और रोचक तथ्य
असली नाम: उनका जन्म का नाम जतिन खन्ना था। फिल्मों में आने के लिए उनके चाचा ने उनका नाम बदलकर ‘राजेश’ रखा था।
गोद लिया जाना: उन्हें उनके ही सगे चाचा-चाची (चुन्नीलाल खन्ना और लीलावती) ने गोद लिया था और उन्होंने ही उनकी परवरिश की।
अमीर स्ट्रगलर: संघर्ष के दिनों में भी राजेश खन्ना अपनी स्पोर्ट्स कार (MG) से ऑडिशन देने जाते थे, जो उस समय के बड़े स्टार्स के पास भी नहीं थी।
टैलेंट हंट विजेता: वे 1965 के ‘फिल्मफेयर टैलेंट हंट’ के विजेता थे, जिसमें 10,000 लड़कों को पीछे छोड़कर उन्हें चुना गया था।
ऑस्कर कनेक्शन: उनकी पहली फिल्म ‘आखिरी खत’ (1966) भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए भेजी जाने वाली पहली फिल्म थी।
सलीम-जावेद का ब्रेक: मशहूर राइटर जोड़ी सलीम-जावेद को पहला बड़ा ब्रेक राजेश खन्ना ने ही फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ में दिलवाया था।
दीवार फिल्म: फिल्म ‘दीवार’ के लिए वे पहली पसंद थे, लेकिन मनमुटाव के कारण फिल्म अमिताभ को मिली और वहीं से दौर बदल गया।
अस्पताल का किस्सा: जब वे बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हुए, तो प्रोड्यूसर्स ने अस्पताल के बाकी कमरे बुक कर लिए थे ताकि डिस्चार्ज होते ही उन्हें साइन कर सकें।
By: Snigdha
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