राजादित्य मोहन: जब ज़्यादातर किशोर अपनी ज़िंदगी को कोचिंग, एग्ज़ाम और मोबाइल स्क्रीन के बीच समेट रहे होते हैं, उसी उम्र में जयपुर का एक छात्र दुनिया की सबसे बड़ी छात्र विज्ञान प्रतियोगिता के मंच पर खड़ा था- और उससे भी आगे, भारत के सबसे प्रतिष्ठित शोध संस्थान की प्रयोगशालाओं में कैंसर को मारने का नया तरीका खोज रहा था।
उस छात्र का नाम है राजादित्य मोहन।
मई 2025, अमेरिका का ओहायो राज्य। कोलंबस शहर में आयोजित हो रहा था Regeneron International Science and Engineering Fair (ISEF), जिसे विज्ञान की दुनिया में “छात्रों का ओलंपिक्स” कहा जाता है। 60 से अधिक देशों के 1700 सर्वश्रेष्ठ छात्र। हर प्रोजेक्ट भविष्य बदलने का दावा कर रहा था।
और उसी भीड़ में भारत से जयपुर के दो छात्र एक ऐसा डिवाइस लेकर आए थे, जो बिना सुई, बिना खून, सिर्फ लार से इंसान की सेहत पढ़ सकता था।
उस प्रोजेक्ट का नाम था, VitalEdge।
ISEF: जहाँ सिर्फ आइडिया नहीं, भविष्य टकराते हैं
ISEF कोई स्कूल प्रदर्शनी नहीं है। यह वह मंच है जहाँ:
- नोबेल विजेता जज करते हैं
- MIT, Stanford जैसे संस्थानों की नज़र छात्रों पर रहती है
- और कई प्रोजेक्ट्स आगे चलकर स्टार्टअप या मेडिकल टेक्नोलॉजी बनते हैं
2025 में यह प्रतियोगिता अपने 75वें संस्करण में थी, यानी तीन पीढ़ियों से यह मंच दुनिया के सर्वश्रेष्ठ युवा वैज्ञानिकों को चुन रहा है।
और उसी मंच पर भारत का झंडा उठता है।
भारत से दुनिया तक का रास्ता: IRIS
ISEF तक पहुँचना भारत में आसान नहीं है।
इसका एकमात्र आधिकारिक रास्ता है IRIS (Initiative for Research and Innovation in Science)।
2025 में:
- हज़ारों भारतीय छात्रों में से सिर्फ 23 छात्र 20 प्रोजेक्ट्स के साथ ISEF पहुँचे
इनमें से एक प्रोजेक्ट, VitalEdge, Grand Award जीतता है।
यही वो पल था, जब भारत की स्कूली विज्ञान शिक्षा ने दुनिया को बता दिया ” हम सिर्फ सीखते नहीं,इंनोवेट भी करते हैं।
VitalEdge: खून नहीं, सुई नहीं, फिर भी पूरी हेल्थ रिपोर्ट
राजादित्य मोहन और उनके साथी राजल अचलावत ने जो बनाया, वह सिर्फ एक डिवाइस नहीं था, वह एक सोच का बदलाव था।
VitalEdge एक नॉन-इनवेसिव बायोसेंसर है जो लार (saliva) से शरीर के ज़रूरी बायोमार्कर्स पहचानता है:
ग्लूकोज़ — डायबिटीज़ मॉनिटरिंग
लैक्टेट — शरीर की मेटाबोलिक स्थिति
टेस्टोस्टेरोन — हार्मोनल बैलेंस
विटामिन C — पोषण स्तर
इसका मतलब?
- ग्रामीण भारत
- टेलीहेल्थ
- बुज़ुर्ग, बच्चे, सुई से डरने वाले मरीज़
सबके लिए तेज़, सस्ता और सुरक्षित हेल्थ मॉनिटरिंग सिस्टम।
AI-सक्षम एनालिसिस इसे रियल-टाइम में डेटा समझने लायक बनाता है।
ISEF का Grand Award: जब जयपुर की आवाज़ दुनिया तक पहुँची
ISEF 2025 में VitalEdge को मिला Grand Award सिर्फ एक व्यक्तिगत जीत नहीं था।
यह उस बदलाव का संकेत था, जहाँ भारत का अगला हेल्थटेक भविष्य किसी कॉर्पोरेट लैब से नहीं, बल्कि स्कूल की बेंच से निकल रहा है।
जयपुर से शुरू हुई यह यात्रा अब वैश्विक मंच पर पहुँच चुकी थी। लेकिन राजादित्य मोहन के लिए यह अंत नहीं था, बल्कि असली विज्ञान अब शुरू होने वाला था।
ISEF के बाद अगला कदम: कैंसर से सीधी टक्कर
जहाँ VitalEdge स्वास्थ्य की निगरानी करता है, वहीं राजादित्य का अगला लक्ष्य था, कैंसर का इलाज।
और इसके लिए उन्होंने चुना भारत का सबसे प्रतिष्ठित शोध संस्थान, Indian Institute of Science (IISc), बेंगलुरु।
यहीं से उनकी कहानी एक छात्र से आगे बढ़कर युवा शोधकर्ता की बनती है।
RSI-India: जहाँ पढ़ाया नहीं जाता, खोजने को कहा जाता है
RSI-India, MIT के Research Science Initiative पर आधारित, भारत का सबसे कठोर ग्रीष्मकालीन शोध कार्यक्रम है। हर साल 800 से अधिक प्रतिभाशाली छात्र आवेदन करते हैं, लेकिन चुने जाते हैं केवल 31, यानी चयन दर 4% से भी कम।
राजादित्य उन्हीं चुनिंदा छात्रों में थे।
यह कोई सामान्य ट्रेनिंग प्रोग्राम नहीं था। यहाँ छात्रों से उम्मीद की जाती है कि वे नया और मौलिक विज्ञान पैदा करें, ऐसा काम करें जो आगे चलकर प्रकाशित हो सके।
कैंसर उपचार की सबसे बड़ी विडंबना
कैंसर चिकित्सा दशकों से एक कठोर सच्चाई से जूझ रही है।
कीमोथेरेपी और रेडिएशन ट्यूमर को नष्ट करते हैं, लेकिन साथ ही मरीज़ के शरीर को भी गहरे स्तर पर नुकसान पहुँचाते हैं।
राजादित्य का मूल सवाल यही था, क्या हम कैंसर को मारे बिना इंसान को तोड़े, ऐसा इलाज खोज सकते हैं?
अल्ट्रासाउंड से इलाज: LIPUS का विचार
उनका शोध Low-Intensity Pulsed Ultrasound (LIPUS) पर आधारित था। यह विचार इस सिद्धांत पर टिका है कि कैंसर कोशिकाएँ संरचनात्मक रूप से कमजोर होती हैं और नियंत्रित यांत्रिक दबाव पर स्वस्थ कोशिकाओं की तुलना में अलग प्रतिक्रिया देती हैं।
सही तीव्रता पर दिया गया अल्ट्रासाउंड कैंसर कोशिकाओं में
Mechanoptosis, यानी प्रोग्राम्ड सेल डेथ, को सक्रिय कर सकता है, जबकि स्वस्थ कोशिकाएँ सुरक्षित रहती हैं।
ऑर्गन-ऑन-चिप: लैब में मानव ऊतक जैसा माहौल
पारंपरिक पेट्री डिश के बजाय राजादित्य ने PDMS आधारित ऑर्गन-ऑन-चिप सिस्टम का उपयोग किया।
इस तकनीक में कोशिकाओं को ऐसे माइक्रो-एनवायरनमेंट में रखा जाता है जो असली मानव ऊतक के बहुत क़रीब होता है।
अध्ययन में दो सेल लाइनें ली गईं, एक आक्रामक स्तन कैंसर सेल लाइन (MDA-MB-231) और दूसरी स्वस्थ स्तन कोशिकाएँ (MCF-10A)।
50 kPa: जहाँ इलाज और सुरक्षा का संतुलन मिला
10 से 70 kPa की रेंज में अल्ट्रासाउंड परीक्षण के बाद
50 kPa वह बिंदु निकला जहाँ परिणाम निर्णायक थे।
इस दबाव पर:
- लगभग 55% कैंसर कोशिकाएँ नष्ट हुईं
- जबकि स्वस्थ कोशिकाओं पर असर केवल 0.86% रहा
इसी अंतर को चिकित्सा विज्ञान में Therapeutic Window कहा जाता है, जहाँ इलाज प्रभावी भी हो और सुरक्षित भी।
मेटास्टेसिस पर भी असर
शोध यहीं नहीं रुका। लाइव-सेल माइग्रेशन अध्ययनों में यह भी सामने आया कि LIPUS उपचार के बाद कैंसर कोशिकाओं की फैलने की गति घट गई।
यानी यह तकनीक:
- कैंसर कोशिकाओं को मारती भी है
- और बचे हुए कोशिकाओं की फैलने की क्षमता को भी कमजोर करती है
IRIS और INSEF: राष्ट्रीय स्तर पर दोहराई गई सफलता
राजादित्य का यही शोध:
- IRIS National Fair में स्वर्ण पुरस्कार
- INSEF Regional और National दोनों स्तरों पर प्रथम स्वर्ण लेकर आया।
राष्ट्रीय स्तर पर जीव विज्ञान श्रेणी में यह पूरे भारत की एकमात्र विजेता परियोजना रही।


अगला पड़ाव: अंतरराष्ट्रीय ओलंपियाड
इन उपलब्धियों के बाद राजादित्य मोहन अब जुलाई 2026 में अमेरिका के रोचेस्टर शहर में होने वाले Genius Olympiad 2026 में टीम इंडिया का प्रतिनिधित्व करेंगे।
राजादित्य मोहन की यह यात्रा किसी एक प्रतियोगिता, एक पदक या एक मंच तक सीमित नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है जहाँ भारतीय छात्र उपभोक्ता नहीं, निर्माता बन रहे हैं; जहाँ विज्ञान केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि मानवीय समस्याओं के समाधान का औज़ार है।
जयपुर की एक स्कूल बेंच से लेकर Indian Institute of Science की प्रयोगशालाओं और अब अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचा यह सफ़र बताता है कि जब प्रतिभा को सही मार्गदर्शन और अवसर मिलता है, तो उम्र, संसाधन और सीमाएँ मायने नहीं रखतीं।
आने वाले वर्षों में यह शोध किस रूप में दुनिया की ज़िंदगियाँ बदलेगा, यह अभी लिखा जाना बाकी है, लेकिन इतना तय है कि भारतीय विज्ञान के भविष्य की दिशा में यह क़लम चल चुकी है।

