पंकज कपूर बायोग्राफी: वह कौन है जो कभी एक आम आदमी की बेबसी बनकर सिस्टम से लड़ता है, तो कभी हाथ में गाजर लिए एक शातिर जासूस बनकर पेचीदा गुत्थियां सुलझा देता है?
आखिर कौन है वह शख्स, जिसने इंजीनियरिंग की सुनहरी दुनिया को छोड़कर कैमरे के पीछे के संघर्ष को चुना और अपनी खामोशी से भी अभिनय की नई परिभाषा लिख दी?
लुधियाना का वह नौजवान, जिसके पास न तो फिल्मी बैकग्राउंड था और न ही कोई गॉडफादर, फिर भी अपनी रूहानी अदाकारी से वह भारतीय सिनेमा का ‘लिविंग लेजेंड’ बन गया।
क्या कोई कलाकार इतना माहिर हो सकता है कि वह पर्दे पर आते ही गायब हो जाए और हमारे सामने छोड़ जाए सिर्फ एक जीता-जागता किरदार?
जिसकी एक नज़र में मासूमियत भी है और एक डरावनी गहराई भी। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं अभिनय के उस्ताद, पंकज कपूर की।
व्यक्तिगत परिचय
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पूरा नाम | पंकज कपूर |
| जन्म तिथि | 29 मई 1954 |
| जन्म स्थान | लुधियाना, पंजाब, भारत |
| पेशा | अभिनेता, निर्देशक |
| राष्ट्रीयता | भारतीय |
| शिक्षा | नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD), नई दिल्ली |
| वैवाहिक स्थिति | विवाहित |
| जीवनसाथी | सुप्रिया पाठक (वर्तमान); नीलिमा अज़ीम (पूर्व पत्नी) |
| बच्चे | शाहिद कपूर (पुत्र), रुहान कपूर (पुत्र), सनाह कपूर (पुत्री) |
| सक्रिय वर्ष | 1982 – वर्तमान |
| प्रमुख पहचान | थिएटर, टीवी और फिल्मों में सशक्त अभिनय |
शुरुआती जीवन और शिक्षा
पंकज कपूर के शुरुआती जीवन और उनकी शिक्षा की कहानी किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं है।
जन्म: पंकज कपूर का जन्म 29 मई 1954 को पंजाब के लुधियाना में हुआ था।
पारिवारिक पृष्ठभूमि: उनका परिवार एक मध्यमवर्गीय पंजाबी परिवार था। बचपन से ही उनमें चीजों को गहराई से समझने और परखने का हुनर था।
कला से लगाव: हालांकि उनके परिवार का फिल्मों से कोई दूर-दूर तक नाता नहीं था, लेकिन पंकज के अंदर एक कलाकार छिपा था जो सही मौके का इंतज़ार कर रहा था।
शिक्षा
इंजीनियरिंग की पढ़ाई: पंकज कपूर पढ़ाई में बहुत होशियार थे। उन्होंने लुधियाना से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। उनके माता-पिता चाहते थे कि वह एक सुरक्षित भविष्य चुनें।
दिल का बुलावा: इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद भी उनका मन मशीनों में नहीं लगा। उन्होंने तय किया कि वह वही करेंगे जो उनका दिल कहता है, यानी अभिनय (Acting)।
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD): अपनी कला को तराशने के लिए वह दिल्ली आ गए और मशहूर ‘नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा’ में दाखिला लिया।
गोल्ड मेडलिस्ट: उनकी प्रतिभा का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1976 में उन्होंने NSD से अपनी एक्टिंग की पढ़ाई गोल्ड मेडल के साथ पूरी की।
संघर्ष के दिन
NSD से निकलने के बाद उन्होंने लगभग 4 साल तक थिएटर (नाटक) किए। उन्होंने उस दौर में बहुत संघर्ष किया, लेकिन कभी हार नहीं मानी। यही वह समय था जब उन्होंने अभिनय की उन बारीकियों को सीखा, जो आज उन्हें दुनिया के महान कलाकारों की कतार में खड़ा करती हैं।
करियर की शुरुआत
पंकज कपूर के फिल्मी करियर की शुरुआत किसी सपने जैसी नहीं, बल्कि कड़ी मेहनत और संघर्ष की कहानी थी।
अभिनय के सफर का आगाज़ (1980 का दशक) :
थिएटर से शुरुआत: नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) से गोल्ड मेडल जीतने के बाद, पंकज कपूर ने लगभग 4 साल तक दिल्ली में थिएटर किया। उन्होंने कई नाटकों में काम किया, जिससे उनकी एक्टिंग में गजब की गहराई आई।
पहला बड़ा ब्रेक (1982): पंकज कपूर की किस्मत तब बदली जब उन्हें मशहूर हॉलीवुड डायरेक्टर रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ में काम मिला। इस फिल्म में उन्होंने गांधीजी के दूसरे सेक्रेटरी ‘प्यारेलाल’ का रोल निभाया। इस छोटी सी भूमिका ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
समानांतर सिनेमा (Art Films): उसी साल (1982) उन्होंने फिल्म ‘अरोहण’ से भारतीय सिनेमा में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने ‘मंडी’ और ‘जाने भी दो यारो’ जैसी फिल्मों में छोटे लेकिन यादगार रोल किए।
पहला राष्ट्रीय पुरस्कार (1989) :
पंकज कपूर को अपनी असली पहचान फिल्म ‘राख’ से मिली। इस फिल्म में उन्होंने एक इंस्पेक्टर का रोल निभाया था, जिसके लिए उन्हें अपना पहला नेशनल फिल्म अवॉर्ड (Best Supporting Actor) मिला।
टेलीविजन के सुपरस्टार
फिल्मों के साथ-साथ पंकज कपूर ने टीवी पर भी अपनी धाक जमाई
करमचंद (1985): यह भारत का पहला जासूसी सीरियल था। इसमें ‘करमचंद’ बनकर गाजर चबाने वाले पंकज कपूर रातों-रात घर-घर में मशहूर हो गए। उनका डायलॉग “शट अप, किटी!” आज भी लोगों को याद है।
ज़बान संभाल के (1993): इस शो में उन्होंने एक हिंदी टीचर का रोल निभाया, जिसने उनकी कॉमेडी टाइमिंग का लोहा मनवाया।
- पैरेलल सिनेमा के सरताज :
जहाँ 80 और 90 के दशक में हर अभिनेता ‘एक्शन हीरो’ बनकर हवा में गोलियां चलाना चाहता था, वहीं पंकज कपूर ने सच्ची और गहरी कहानियों को चुना।
अर्थपूर्ण फिल्में: उन्होंने ‘मसाला फिल्मों’ के बजाय ऐसी फिल्में कीं जो समाज का आईना थीं। उन्होंने साबित किया कि बिना नाच-गाने और मार-धाड़ के भी दर्शकों का दिल जीता जा सकता है।
एक डॉक्टर की मौत (1990): इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे डॉक्टर का किरदार निभाया जो अपनी रिसर्च के लिए सिस्टम से लड़ता है। इस फिल्म में उनकी गंभीर और भावुक अदाकारी ने सबको हैरान कर दिया।
चेहरे के हाव-भाव: उन्हें बड़े-बड़े डायलॉग्स की ज़रूरत नहीं थी। उनकी आँखों की नमी और चेहरे की शिकन ही पूरी कहानी बयां कर देती थी।
- ‘अब्बाजी’ का खौफनाक अवतार :
पंकज कपूर के करियर का सबसे बड़ा और यादगार पल तब आया जब उन्होंने फिल्म ‘मकबूल’ (2003) में काम किया। यह फिल्म शेक्सपियर के नाटक ‘मैकबेथ’ पर आधारित थी।
अब्बाजी का किरदार: इस फिल्म में उन्होंने एक अंडरवर्ल्ड डॉन ‘अब्बाजी’ का रोल निभाया। उनका यह किरदार इतना असली था कि उसे देखकर लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते थे।
खामोश विलेन: उन्होंने दिखाया कि एक विलेन को डरावना दिखने के लिए चिल्लाने की ज़रूरत नहीं होती। उनकी शांत आवाज़ और धीमी चाल ही काफी थी।
इतिहास रच दिया: ‘अब्बाजी’ के रूप में उनके अभिनय को आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे बेहतरीन प्रदर्शनों में गिना जाता है। उन्होंने साबित कर दिया कि वह एक आम आदमी के रोल में जितने मासूम दिखते हैं, एक विलेन के रोल में उतने ही खतरनाक।
एक वर्सटाइल सफर: हर किरदार में नई जान
पंकज कपूर का फिल्मी सफर विविधता (Versatility) की एक ऐसी मिसाल है, जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। उन्होंने कॉमेडी से लेकर गंभीर किरदारों तक, हर सांचे में खुद को बड़ी बखूबी से ढाला है।
उनका करियर हर तरह के रंगों का मिश्रण है, चाहे वह हंसाने वाली कॉमेडी हो, दिल को छू लेने वाला ड्रामा हो, समाज पर तीखा व्यंग्य (Satire) हो या फिर रूह कंपा देने वाली ट्रेजेडी।
कभी गुदगुदाया, कभी डराया: एक तरफ जहाँ उन्होंने ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ में एक छोटे शहर के सपने देखने वाले आदमी का मजेदार किरदार निभाकर सबको हंसाया, वहीं दूसरी तरफ ‘राख’ जैसी फिल्म में अपनी इंटेंस और गंभीर एक्टिंग से सबको चुप करा दिया।
कभी खुद को दोहराया नहीं: पंकज कपूर की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने कभी भी एक जैसा काम नहीं किया। अगर एक फिल्म में वह एक सीधे-साधे टीचर बने, तो दूसरी में एक चालाक जासूस। उन्होंने हमेशा ऐसे किरदारों की तलाश की, जो उन्हें एक कलाकार के तौर पर चुनौती दें।
कलाकारों के कलाकार : इसी वर्सटाइल खूबी की वजह से उन्हें सिर्फ आम दर्शक ही नहीं, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री के बड़े-बड़े दिग्गज और आलोचक (Critics) भी सम्मान की नजर से देखते हैं। वह एक ऐसे अभिनेता हैं जिनसे आज की पीढ़ी के एक्टर्स अभिनय की बारीकियां सीखते हैं।
अभिनय के बाद निर्देशन का सफर :
- टेलीविजन के कुशल निर्देशक :
पंकज कपूर ने खुद को सिर्फ एक्टिंग तक सीमित नहीं रखा; वह कैमरे के पीछे रहकर अपनी कहानियाँ सुनाना चाहते थे।
छोटे पर्दे पर बड़ा काम: उन्होंने अपने निर्देशन के सफर की शुरुआत टेलीविजन से की। आपको जानकर हैरानी होगी कि उन्होंने टीवी के लिए 74 से भी ज्यादा नाटक और सीरियल्स का निर्देशन किया।
मोहनदास बी.ए.एल.एल.बी. (1998): इस मिस्ट्री सीरीज में उनकी बहुमुखी प्रतिभा (Multi-talent) देखने को मिली। इस शो में उन्होंने न केवल एक जासूस का मुख्य किरदार निभाया, बल्कि इसके निर्देशक और निर्माता की जिम्मेदारी भी संभाली। इसने साबित कर दिया कि वह एक प्रोजेक्ट के हर पहलू को बारीकी से संभाल सकते हैं।
- बड़े पर्दे पर शुरुआत: फिल्म ‘मौसम’ (2011) :
टीवी और थिएटर के सालों के अनुभव के बाद, उन्होंने फिल्म निर्देशक के रूप में अपना बड़ा डेब्यू फिल्म ‘मौसम’ के साथ किया।
एक खास प्रोजेक्ट: यह फिल्म पंकज कपूर के लिए बहुत भावुक और खास थी क्योंकि इसमें उन्होंने अपने बेटे, शाहिद कपूर को मुख्य भूमिका में लिया था। उनके साथ सोनम कपूर नजर आई थीं।
बड़े पैमाने की प्रेम कहानी: ‘मौसम’ एक साधारण लव स्टोरी नहीं थी। यह एक विशाल और भावुक कहानी थी जो 10 साल के लंबे समय को दिखाती थी। इस फिल्म की कहानी को भारत की बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं (जैसे कारगिल युद्ध) के बीच बुना गया था।
निर्देशन की शैली और विजन
- संजीदगी और बारीकियों पर ध्यान :
एक निर्देशक के तौर पर पंकज कपूर अपनी ईमानदारी और बारीकियों (Attention to detail) के लिए जाने जाते हैं।
गहरे जज्बात: जिस तरह उनकी एक्टिंग में गहराई होती है, वैसे ही उनके निर्देशन में भी भावनाओं और असल जिंदगी जैसे दिखने वाले सेट (Realistic settings) पर पूरा जोर रहता है।
मौसम का जादू: अपनी फिल्म ‘मौसम’ में उन्होंने बॉलीवुड के पुराने दौर के रोमांस को एक नए और कविता जैसे सुंदर (Poetic style) अंदाज में पेश करने की कोशिश की।
सिनेमा की रूह: वह एक ‘परफेक्शनिस्ट’ हैं जो अपना काम तसल्ली से करते हैं। उनका मकसद हमेशा ऐसी फिल्में बनाना रहा है जिनमें ‘रूह’ यानी जान हो।
रचनात्मक लीडर :
फिल्मों और टीवी के अलावा, उन्होंने अनगिनत स्टेज नाटकों का भी निर्देशन किया है, जो हमेशा से उनका पहला प्यार रहा है।
हर माध्यम के उस्ताद: उनके निर्देशन का काम यह साबित करता है कि वह एक ‘कम्प्लीट आर्टिस्ट’ हैं। उन्हें कहानी की नब्ज पकड़ना आता है, चाहे वह कहानी थिएटर के मंच पर हो, टीवी के पर्दे पर या सिनेमा हॉल की बड़ी स्क्रीन पर।
युवाओं के लिए प्रेरणा: वह आज भी एक सम्मानित हस्ती हैं जो नए फिल्ममेकर्स को यह सिखाते हैं कि कहानी सुनाना एक ‘कला’ (Craft) है, जिसमें चमक-धमक से ज्यादा गहराई जरूरी है।
अन्य महत्वपूर्ण कार्य :
पंकज कपूर का काम सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है। वह एक ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने कला के हर रूप में अपना लोहा मनवाया है।
- थिएटर:
बड़े स्टार बनने के बाद भी पंकज कपूर ने कभी रंगमंच (Stage) का साथ नहीं छोड़ा। उनके लिए थिएटर ही वह जगह है जहाँ वह सबसे ज्यादा सुकून महसूस करते हैं।
74 से ज्यादा नाटक: अपने करियर में उन्होंने 74 से अधिक नाटकों में अभिनय और निर्देशन किया है।
थिएटर ग्रुप ‘थिएट्रॉन’ (Theatron): वह अपने इस ग्रुप के जरिए पुरानी और क्लासिक कहानियों को मंच पर जीवंत करने के लिए मशहूर हैं।
शुद्ध कला: उनके लिए थिएटर सिर्फ काम नहीं, बल्कि बिना कैमरे और ‘रीटेक’ के अभिनय की शुद्ध कला से जुड़े रहने का एक जरिया है।
- निर्माण की दुनिया :
अपनी कहानियों पर पूरी रचनात्मक पकड़ रखने के लिए उन्होंने निर्माण (Production) के क्षेत्र में भी कदम रखा।
इंटेलिजेंट कंटेंट: उन्होंने अपने प्रोडक्शन हाउस के तले ‘मोहनदास बी.ए.एल.एल.बी.’ जैसी जासूसी सीरीज बनाई।
प्राथमिकता: निर्माता बनकर उन्होंने यह पक्का किया कि टीवी पर आने वाले आम शोज़ के मुकाबले उनकी कहानियों और एक्टिंग की क्वालिटी सबसे ऊपर रहे।
- लेखक की कलम :
बहुत कम लोग जानते हैं कि पंकज कपूर एक बहुत ही प्रतिभाशाली लेखक भी हैं। उन्हें कविता और साहित्य से गहरा लगाव है।
‘दोपहरी’ (Dopehri): साल 2019 में उन्होंने ‘दोपहरी’ नाम का एक उपन्यास (Novella) रिलीज किया। यह मूल रूप से एक कहानी थी जिसे उन्होंने मंच के लिए लिखा था।
संवेदनशीलता: यह एक बुजुर्ग महिला की दिल छू लेने वाली कहानी है, जो दिखाती है कि पंकज कपूर इंसानी भावनाओं को कितनी गहराई से समझते और लिखते हैं।
- आवाज का जादू और शिक्षण :
पंकज कपूर की दमदार और साफ आवाज की वजह से उन्हें अक्सर वॉयस-ओवर और कहानियाँ सुनाने (Narration) के लिए चुना जाता है।
नई पीढ़ी को सीख: वह अपना ज्ञान अगली पीढ़ी के साथ साझा करना पसंद करते हैं।
वर्कशॉप्स: वह NSD जैसे संस्थानों में वर्कशॉप आयोजित करते हैं और युवा कलाकारों को सिखाते हैं कि अभिनय एक गंभीर साधना है, जिसके लिए निरंतर अभ्यास की जरूरत होती है।
निजी जीवन और परिवार
- पहली शादी और पहले बेटे का जन्म :
पंकज कपूर के निजी जीवन का सफर तब शुरू हुआ जब वह ‘नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा’ (NSD) में एक प्रतिभाशाली डांसर और अभिनेत्री नीलिमा अज़ीम से मिले।
शादी (1979): उन्होंने 1979 में शादी की और दिल्ली में बस गए।
शाहिद कपूर का जन्म: 1981 में उनके घर बेटे शाहिद कपूर का जन्म हुआ, जो आज बॉलीवुड के बहुत बड़े सुपरस्टार हैं।
तलाक: आपसी अनबन की वजह से 1984 में यह जोड़ा अलग हो गया और उन्होंने तलाक ले लिया। उस समय शाहिद बहुत छोटे थे।
- दोबारा मिला प्यार: सुप्रिया पाठक के साथ सफर :
1986 में फिल्म ‘नया मौसम’ पर काम करते समय पंकज कपूर की मुलाकात अभिनेत्री सुप्रिया पाठक से हुई। दोनों ने अपनी पिछली जिंदगी में काफी उतार-चढ़ाव देखे थे और एक-दूसरे के साथ में उन्हें सुकून मिला।
ईमानदारी और शादी: परिवारों की शुरुआती हिचकिचाहट के बावजूद, दोनों एक-दूसरे के साथ खड़े रहे और 1988 में शादी कर ली। सुप्रिया बताती हैं कि पंकज ने शुरू से ही साफ कर दिया था कि उनके बेटे शाहिद उनकी पहली प्राथमिकता रहेंगे।
एक बड़ा और खुशहाल परिवार :
पंकज और सुप्रिया के दो बच्चे हैं: एक बेटी सना कपूर और एक बेटा रुहान कपूर।
कलाकारी का विरासत: उनके बच्चे भी कला की इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। बेटी सना ने फिल्म ‘शानदार’ में अपने पिता और भाई शाहिद के साथ एक्टिंग डेब्यू किया। बेटा रुहान भी क्रिएटिव आर्ट्स और अभिनय की दुनिया से जुड़े हुए हैं।
रिश्तों की गरिमा और विरासत :
आज पंकज कपूर बॉलीवुड की चकाचौंध और पार्टियों से दूर एक शांत और गरिमामय जीवन जीते हैं।
बच्चों से लगाव: वह अपने सभी बच्चों के साथ बहुत सम्मानजनक और प्यारा रिश्ता साझा करते हैं। हालांकि वह नीलिमा से सालों पहले अलग हो गए थे, लेकिन दोनों परिवारों के बीच आज भी एक ऐसी गरिमा बनी हुई है जो फिल्म इंडस्ट्री में बहुत कम देखने को मिलती है।
फैमिली मैन: वह अक्सर त्योहारों और खास मौकों पर अपनी पत्नी, बच्चों और पोते-पोतियों के साथ समय बिताते नजर आते हैं। यह साबित करता है कि वह जितने महान अभिनेता हैं, उतने ही समर्पित पारिवारिक इंसान भी हैं।
विरासत और प्रभाव (Legacy and Impact)
- नए कलाकारों के लिए एक ‘गुरु’ :
पंकज कपूर को अक्सर “एक्टर्स का एक्टर” कहा जाता है। इसका मतलब है कि इंडस्ट्री के बड़े-बड़े मशहूर सितारे भी उनसे अभिनय की बारीकियां सीखते हैं।
हुनर के उस्ताद: उनकी विरासत लाखों फैंस वाला “सुपरस्टार” बनने के बारे में नहीं, बल्कि अपने काम (क्राफ्ट) का मास्टर बनने के बारे में है।
सीखने का जरिया: आज भी युवा कलाकार ‘मकबूल’ जैसी उनकी फिल्मों को देखते हैं ताकि वे समझ सकें कि बिना ज्यादा शब्द बोले, सिर्फ आँखों से गहरी भावनाएं कैसे दिखाई जाती हैं।
‘रियलिज्म’ (असलियत) के राजा
उन्होंने भारतीय सिनेमा में “रियलिज्म” यानी वास्तविकता लाकर उसे पूरी तरह बदल दिया। उनसे पहले, पर्दे पर हीरो अक्सर जादुई और नामुमकिन काम करने वाले होते थे।
आम आदमी ही हीरो: पंकज कपूर ने दिखाया कि ‘ऑफिस ऑफिस’ में दिखने वाला एक सीधा-साधा मिडिल क्लास आदमी भी कहानी का हीरो हो सकता है।
सादगी की ताकत: उन्होंने साबित किया कि अच्छे दिखने या महंगे कपड़ों से कहीं ज्यादा जरूरी कलाकार का हुनर होता है। उन्होंने साधारण दिखने को भी “कूल” बना दिया।
टीवी और फिल्मों के बीच की दीवार तोड़ी
1980 के दशक में लोग सोचते थे कि टीवी एक्टर कभी बड़े फिल्मी सितारे नहीं बन सकते, लेकिन पंकज कपूर ने इस सोच को गलत साबित कर दिया।
करमचंद से नेशनल अवार्ड तक: उन्होंने टीवी पर ‘करमचंद’ बनकर घर-घर में अपनी पहचान बनाई और फिर फिल्मों में 3 नेशनल अवार्ड जीतकर सबको हैरान कर दिया।
रास्ता दिखाया: उन्होंने आने वाले भविष्य के सितारों (जैसे उनके बेटे शाहिद कपूर और अन्य) के लिए टीवी से बड़े पर्दे तक पहुँचने का रास्ता आसान बना दिया।
एक सदाबहार प्रेरणा
आज 70 साल की उम्र में भी वह उतने ही सक्रिय हैं। हाल ही में 2024 की सीरीज “IC 814: द कंधार हाईजैक” जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स में उनका काम इसकी मिसाल है।
हर पीढ़ी के पसंदीदा: उनका प्रभाव ऐसा है कि वह हर पीढ़ी के दर्शकों के साथ जुड़े रहते हैं।
फिल्मी सफर :
शुरुआती दौर और यादगार फिल्में :
पंकज कपूर ने अपने करियर की शुरुआत 1982 में ‘गांधी’ फिल्म से की थी, जहाँ उन्होंने प्यारेलाल का छोटा लेकिन प्रभावशाली रोल निभाया। उसी साल उन्होंने ‘अरोहण’ जैसी गंभीर फिल्म में काम किया। 1983 की फिल्म ‘जाने भी दो यारों’ में उनके द्वारा निभाया गया भ्रष्ट बिल्डर ‘तरनेजा’ का किरदार आज भी एक मिसाल माना जाता है।
1986 में फिल्म ‘एक रुका हुआ फैसला’ आई, जो पूरी तरह से एक बंद कमरे में डायलॉग्स पर आधारित थी, इसमें उनकी एक्टिंग ने सबको हैरान कर दिया। इसके बाद 1989 की फिल्म ‘राख’ के लिए उन्हें अपना पहला नेशनल अवॉर्ड मिला।
90 के दशक की संजीदगी
1990 में आई फिल्म ‘एक डॉक्टर की मौत’ उनके करियर का एक बड़ा मोड़ साबित हुई। इसमें उन्होंने एक ऐसे वैज्ञानिक का किरदार निभाया जो सिस्टम की लापरवाही से लड़ता है। इस फिल्म के लिए उन्हें फिर से नेशनल अवॉर्ड (Special Jury) से नवाजा गया। 1992 में आई फिल्म ‘रोजा’ में उन्होंने एक आतंकवादी का बेहद गंभीर और डरावना रोल निभाया, जिसे आज भी याद किया जाता है।
करियर का सबसे बेहतरीन समय (2000 के बाद)
साल 2003 में आई फिल्म ‘मकबूल’ ने पंकज कपूर को अभिनय का ‘भगवान’ बना दिया। इसमें उन्होंने अंडरवर्ल्ड डॉन ‘अब्बाजी’ का रोल निभाया, जिसके लिए उन्हें अपना तीसरा नेशनल अवॉर्ड मिला। इसके बाद 2005 में रस्किन बॉन्ड की कहानी पर आधारित फिल्म ‘द ब्लू अंब्रेला’ में उन्होंने एक लालची दुकानदार ‘नंदकिशोर खत्री’ का दिल छू लेने वाला रोल किया।
टेलीविजन के बेताज बादशाह :
फिल्मों के साथ-साथ उन्होंने टीवी पर भी इतिहास रचा
करमचंद (1985): भारत का पहला जासूसी सीरियल, जिसमें वह हाथ में गाजर लिए केस सुलझाते थे।
नीम का पेड़ (1991): एक बंधुआ मजदूर की बहुत ही भावुक कहानी।
ज़बान संभाल के (1993): एक हिंदी टीचर की मजेदार कॉमेडी।
ऑफिस ऑफिस (2001): ‘मुसद्दीलाल’ के रूप में उन्होंने एक आम आदमी के दर्द और संघर्ष को पूरी दुनिया के सामने रखा।
हाल के प्रमुख काम :
आज भी वह लगातार सक्रिय हैं। उन्होंने अपने बेटे शाहिद कपूर के साथ ‘शानदार’ और ‘जर्सी’ जैसी फिल्मों में काम किया है। साल 2024 में आई वेब सीरीज ‘IC 814: द कंधार हाईजैक’ में उन्होंने एक सख्त अधिकारी की भूमिका निभाकर साबित कर दिया कि 70 साल की उम्र में भी उनका जादू बरकरार है।
कुल संपत्ति :
1 पंकज कपूर की कुल संपत्ति लगभग 35 से 40 करोड़ रुपये ($5 Million) के आसपास मानी जाती है।
2 सालाना कमाई: उनकी सालाना कमाई लगभग 4 से 5 करोड़ रुपये के करीब रहती है, जो उनके प्रोजेक्ट्स और विज्ञापनों पर निर्भर करती है।
संपत्ति के मुख्य स्रोत :
फिल्में और वेब सीरीज: वह एक फिल्म के लिए अच्छी खासी फीस लेते हैं। हाल के वर्षों में उन्होंने ‘जर्सी’ जैसी फिल्मों और ‘IC 814’ जैसी बड़ी वेब सीरीज में काम किया है।
ब्रांड एंडोर्समेंट: वह चुनिंदा ब्रांड्स के विज्ञापनों में भी नजर आते हैं, जिससे उन्हें अच्छी आय होती है।
प्रोडक्शन हाउस: उनका अपना प्रोडक्शन हाउस भी है, जिसके जरिए वह टीवी और अन्य प्रोजेक्ट्स पर काम करते हैं।
थिएटर और वर्कशॉप: हालांकि थिएटर से वह मुख्य रूप से अपनी खुशी के लिए जुड़े हैं, लेकिन उनके शोज़ और एक्टिंग वर्कशॉप्स भी उनकी आय का एक हिस्सा हैं।
शानदार जीवनशैली :
घर: पंकज कपूर मुंबई के एक आलीशान और सुंदर घर में अपनी पत्नी सुप्रिया पाठक के साथ रहते हैं। उनका घर अपनी सादगी और कलात्मक सजावट के लिए जाना जाता है।
कारें: उनके पास कुछ लग्जरी कारें भी हैं, जिनमें मर्सिडीज-बेंज (Mercedes-Benz) जैसी गाड़ियाँ शामिल हैं।
विवाद :
पंकज कपूर उन चुनिंदा कलाकारों में से हैं जिनका करियर विवादों से कोसों दूर रहा है। वह अपनी सादगी और काम के प्रति गंभीरता के लिए जाने जाते हैं।
- फिल्म ‘मौसम’ को लेकर विवाद (2011) :
पंकज कपूर ने जब अपने निर्देशन में पहली फिल्म ‘मौसम’ बनाई, तो इसे रिलीज से पहले कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा:
टाइटल विवाद: एक लेखक ने दावा किया था कि ‘मौसम’ टाइटल और उसकी कहानी उनकी है। यह मामला कोर्ट तक भी पहुँचा था।
वायु सेना (Air Force) की आपत्ति: फिल्म में शाहिद कपूर ने एक पायलट का रोल निभाया था। भारतीय वायु सेना ने फिल्म के कुछ एरियल फाइट (हवा में लड़ाई) सीन्स पर आपत्ति जताई थी, जिसके कारण फिल्म की रिलीज में देरी हुई।
रेलवे बोर्ड की चेतावनी: फिल्म के एक सीन में शाहिद कपूर को ट्रेन के आने से ठीक पहले रेलवे क्रॉसिंग पार करते दिखाया गया था। रेलवे बोर्ड ने इसे ‘गलत उदाहरण’ बताते हुए आपत्ति जताई थी।
- ‘कबीर सिंह’ का बचाव :
साल 2019 में जब उनके बेटे शाहिद कपूर की फिल्म ‘कबीर सिंह’ पर ‘टॉक्सिक मस्कुलैनिटी’ (मर्दानगी का गलत चित्रण) को लेकर विवाद हुआ, तो पंकज कपूर अपने बेटे के समर्थन में खड़े हुए।
उन्होंने तर्क दिया कि फिल्म समाज का आईना होती है। अगर समाज में ऐसे लोग मौजूद हैं, तो उन्हें पर्दे पर दिखाने में कोई बुराई नहीं है। उन्होंने इसे एक कलाकार का बेहतरीन प्रदर्शन बताया था।
- ‘मुश्किल अभिनेता’ की छवि :
इंडस्ट्री में कुछ लोग उन्हें ‘डिफिकल्ट एक्टर’ (जिनके साथ काम करना मुश्किल हो) मानते थे।
वजह: पंकज कपूर बिना स्क्रिप्ट के काम करना पसंद नहीं करते थे। वह अपने किरदार की गहराई और बारीकियों को लेकर बहुत सख्त रहते थे। खुद पंकज कपूर ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह तब तक परफॉर्म नहीं कर सकते जब तक वह पूरी कहानी और अपने रोल को अच्छी तरह समझ न लें।
- निजी जीवन और तलाक :
नीलिमा अज़ीम से उनके तलाक (1984) के समय काफी चर्चा हुई थी। हालांकि, पंकज कपूर और नीलिमा दोनों ने ही इस मामले में बहुत गरिमा बनाए रखी और कभी भी एक-दूसरे पर कीचड़ नहीं उछाला। आज भी शाहिद कपूर के साथ उनके और सुप्रिया पाठक के रिश्ते बहुत सुलझे हुए और मजबूत हैं।
पंकज कपूर के बारे में 5 रोचक तथ्य :
- एक काबिल इंजीनियर (A Brilliant Engineer) :
एक्टर बनने से पहले पंकज कपूर पढ़ाई में ‘स्टार स्टूडेंट’ थे। उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और 1973 में अपने कॉलेज में टॉप किया था। टेक्नोलॉजी की दुनिया में उनका भविष्य बहुत सुनहरा था, लेकिन उन्होंने अपने दिल की सुनी और एक्टिंग के रास्ते पर चल पड़े।
- ‘गाजर’ वाला जासूस (The “Carrot” Detective)
उनके मशहूर टीवी शो ‘करमचंद’ में केस सुलझाते समय गाजर चबाने की उनकी आदत सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं थी, बल्कि यह पूरे देश में एक ट्रेंड बन गया था। उस समय भारत भर के दुकानदारों ने बताया था कि बच्चों ने अपने इस हीरो की नकल करने के चक्कर में बहुत ज्यादा गाजर खाना शुरू कर दिया था!
- महान आवाज़ के मालिक (Voice of a Legend) :
पंकज कपूर ने न केवल ऑस्कर जीतने वाली फिल्म ‘गांधी’ (1982) में अभिनय किया, बल्कि उन्होंने मुख्य अभिनेता सर बेन किंग्सले के लिए हिंदी वॉयस-ओवर भी किया। अगर आप ‘गांधी’ फिल्म का हिंदी वर्जन देखें, तो महात्मा गांधी के किरदार के लिए जो आवाज़ आप सुनते हैं, वह असल में पंकज कपूर की है।
- “लुक्स” की वजह से हुए थे रिजेक्ट :
जब उन्होंने शुरुआत की थी, तो कुछ फिल्म संस्थानों और निर्माताओं ने उन्हें यह कहकर रिजेक्ट कर दिया था कि उनका चेहरा किसी ‘हीरो’ जैसा चमक-धमक वाला नहीं है। उन्होंने अपने बेमिसाल हुनर के दम पर उन सबको गलत साबित किया और भारत के सबसे सम्मानित अभिनेताओं में से एक बन गए।
- एक छुपे हुए लेखक :
ज्यादातर लोग उन्हें सिर्फ एक एक्टर के रूप में जानते हैं, लेकिन वह एक बहुत ही गहरे लेखक और कवि भी हैं। उन्होंने ‘दोपहरी’ (Dopehri) नाम की एक कहानी लिखने में कई साल बिताए, जिसे बाद में उन्होंने एक सफल किताब और एक नाटक का रूप दिया। इस नाटक में वह अकेले ही मंच पर सारे किरदारों को निभाते हैं।
लेखिका – आरुषि शर्मा
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