नीतीश नीति: बिहार विधानसभा में नाबालिगों के बढ़ते स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया की लत को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई।
जनता दल यूनाइटेड के विधायक समृद्ध वर्मा ने प्रश्नकाल के दौरान कहा कि बच्चों की दुनिया अब किताबों और खिलौनों से सिमटकर मोबाइल स्क्रीन तक सीमित होती जा रही है, जो उनके मानसिक और सामाजिक विकास के लिए खतरे की घंटी है।
‘अदृश्य महामारी’ बनता डिजिटल नशा
विधायक ने इस समस्या को “अदृश्य महामारी” बताते हुए कहा कि यह धीरे-धीरे बिहार के भविष्य की जड़ों को कमजोर कर रही है।
लगातार स्क्रॉलिंग और ऑनलाइन गेमिंग बच्चों का ध्यान खींच रही है, जिससे व्यवहार में बदलाव, एकाग्रता में कमी और चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 में भी इस प्रवृत्ति को राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट के रूप में चिन्हित किया गया है।
सरकार की स्वीकारोक्ति: बहु-क्षेत्रीय चुनौती
इस पर जवाब देते हुए उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम केवल शिक्षा या परिवार तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, तकनीक और समाज से जुड़ा बहु-आयामी विषय है।
इसलिए सरकार जल्दबाजी में नहीं, बल्कि विशेषज्ञों की राय के आधार पर नीति बनाना चाहती है।
निम्हांस से मांगी गई विशेषज्ञ रिपोर्ट
उपमुख्यमंत्री ने बताया कि बेंगलुरु स्थित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान से इस विषय पर विस्तृत अध्ययन रिपोर्ट मांगी गई है।
रिपोर्ट मिलने के बाद सभी संबंधित विभागों और हितधारकों की बैठक कर एक समग्र नीति का खाका तैयार किया जाएगा।
डोपामाइन, एकाग्रता और बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य
विधायक समृद्ध वर्मा ने सदन में यह भी कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मिलने वाला त्वरित आनंद (डोपामाइन) बच्चों के मानसिक नियंत्रण को प्रभावित कर रहा है।
इसका परिणाम यह हो रहा है कि वास्तविक जीवन उन्हें नीरस लगने लगा है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब बच्चों को एआई और नई तकनीकें सिखाई जा रही हैं, तो डिजिटल विषाक्तता से बचाव की शिक्षा क्यों नहीं दी जा रही।
‘डिजिटल हाइजीन’ और परामर्श केंद्रों का सुझाव
समस्या के समाधान के लिए विधायक ने सरकार से कुछ ठोस कदम उठाने का आग्रह किया।
इनमें सभी सरकारी स्कूलों में ‘डिजिटल हाइजीन’ को अनिवार्य पाठ के रूप में शामिल करना, हर जिला अस्पताल में लत परामर्श केंद्र खोलना और ग्रामीण माताओं को बच्चों के स्क्रीन टाइम प्रबंधन के प्रति जागरूक करने के लिए जीविका दीदी नेटवर्क का उपयोग करना शामिल है।
नीति निर्माण की दिशा में पहला कदम
सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्रेयसी सिंह ने भी सदन को भरोसा दिलाया कि विशेषज्ञ रिपोर्ट के आधार पर इस विषय पर स्पष्ट और प्रभावी नीति बनाई जाएगी।
कुल मिलाकर, विधानसभा में हुई यह चर्चा संकेत देती है कि बिहार सरकार अब बच्चों की डिजिटल दुनिया को गंभीर सामाजिक चुनौती मानते हुए, उससे निपटने के लिए संरचित और दीर्घकालिक रणनीति अपनाने की तैयारी में है।

