मोहन भागवत बायोग्राफी: क्या आपने कभी सोचा है कि कोई साधारण व्यक्ति चुपचाप, लेकिन स्थिर कदमों से पूरे राष्ट्र की सोच बदल सकता है? क्या यह संभव है कि कुछ छोटे-छोटे निर्णय और विचार इतने प्रभावशाली बन जाएँ कि इतिहास उन्हें याद रखे?
क्या कोई ऐसे साधारण जीवन में छुपा रहस्य खोज सकता है, जो समाज और संस्कृति को नया आकार दे? एक ऐसा ही व्यक्तित्व है, जिसने अनुशासन, दृष्टि और सेवा भाव के जरिए असाधारण पहचान बनाई।
उनकी कहानी केवल पद और शक्ति की नहीं , यह रहस्य, प्रेरणा और परिवर्तन की गाथा है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मोहन भागवत की।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भगवत अक्सर खबरों में रहते हैं, फिर भी वे एक सादा जीवन जीते हैं, कम सामान के साथ यात्रा करते हैं और चुपचाप संस्कृति, समाज और राष्ट्रवाद पर राष्ट्रीय चर्चाओं को आकार देते हैं।
चंद्रपुर में साधारण शुरुआत मोहन भागवत बायोग्राफी: मोहन भागवत का जन्म 11 सितंबर 1950 को महाराष्ट्र के चंद्रपुर में एक मध्यमवर्गीय मराठी परिवार में हुआ।
उनके पिता मधुकर राव भागवत आरएसएस के प्रचारक थे और उनकी माता मालती भागवत आरएसएस की महिला शाखा में सक्रिय थीं।
यही वातावरण बचपन से ही उन्हें सेवा, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी की ओर प्रेरित करता रहा।
भगवत पढ़ाई में होशियार और जिज्ञासु थे। उन्होंने नागपुर के सरकारी पशु चिकित्सा महाविद्यालय से पशु चिकित्सा विज्ञान और पशुपालन में अध्ययन किया।
यह उनके जीवन के प्रति व्यवस्थित और व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
हालांकि उन्होंने सरकारी पशु चिकित्सा अधिकारी के रूप में अपना करियर शुरू किया और स्नातकोत्तर की पढ़ाई भी की, लेकिन नियति की योजना कुछ और ही थी। उनके जीवन की राह उन्हें राष्ट्रीय सेवा और नेतृत्व की ओर खींच रही थी।
करियर के बजाय सेवा को चुना
मोहन भागवत बायोग्राफी: 1975 में, जब भारत में राष्ट्रीय आपातकाल लगा हुआ था, मोहन भागवत ने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने अपने चिकित्सा करियर और आगे की पढ़ाई को छोड़कर आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक बनने का साहसिक कदम उठाया।
उस उथल-पुथल भरे समय में उन्होंने भूमिगत रूप से भी कार्य किया, चुनौतियों का सामना किया और अपने आदर्शों पर अडिग रहे।
इस साहसी फैसले ने उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल दी। यह कदम सिर्फ करियर छोड़ने का निर्णय नहीं, बल्कि व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र की सेवा करने की प्रतिबद्धता का प्रतीक था। यही निर्णय उन्हें आरएसएस में आगे बढ़ने और समाज में बदलाव लाने की राह पर ले गया।
परंपरा और आधुनिकता का मेल
मोहन भागवत बायोग्राफी: मोहन भागवत का नेतृत्व एक ऐसी ‘ब्रिज’ (पुल) की तरह है, जो संघ के पुराने आदर्शों को आज की नई पीढ़ी से जोड़ता है। उनकी शैली के तीन प्रमुख स्तंभ हैं:
बदलाव के साथ तालमेल: उन्होंने 90 साल पुराने ‘खाकी शॉर्ट्स’ को हटाकर ‘फुल पैंट’ अपनाई। यह सिर्फ कपड़ों का नहीं, बल्कि सोच का बदलाव था ,यह दिखाने के लिए कि संघ समय के साथ चलने को तैयार है।
खुला संवाद (Open Dialogue): उन्होंने संघ की ‘रहस्यमयी’ छवि को तोड़कर उसे पारदर्शी बनाया। विज्ञान भवन में तीन दिनों तक देश के बुद्धिजीवियों के तीखे सवालों का सीधा जवाब देना उनके इसी साहसी नेतृत्व का हिस्सा था।
समावेशी पहुंच (Social Harmony): वे केवल एक वर्ग तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने ‘सामाजिक समरसता’ (Social Unity) पर जोर दिया और युवाओं, अल्पसंख्यकों और आधुनिक विचारकों तक संघ की पहुंच बढ़ाई ताकि संगठन समाज के हर हिस्से में सर्वमान्य हो सके।
भागवत जी का मंत्र है – “जड़ें परंपरा में, नज़रें भविष्य पर।” वे एक ऐसे नेता हैं जो अनुशासन के सख्त हैं, लेकिन व्यवहार में बेहद व्यावहारिक (Practical) हैं।
व्यक्तिगत झलक
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पूरा नाम | मोहन मधुकर भागवत |
| जन्म तिथि | 11 सितंबर 1950 |
| जन्म स्थान | चंद्रपुर, महाराष्ट्र |
| आयु (वर्ष 2026 तक) | 75 वर्ष |
| पिता का नाम | मधुकर राव भागवत |
| माता का नाम | मालती भागवत |
| शिक्षा | पशु चिकित्सा विज्ञान और पशुपालन में स्नातक |
| अल्मा मेटर | सरकारी पशु चिकित्सा महाविद्यालय, नागपुर |
| वर्तमान पद | वर्ष 2009 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक |
| पूर्व भूमिकाएँ | अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख, सरकार्यवाह (महासचिव) |
मोहन भागवत: जीवन और करियर यात्रा
- 1950 जन्म महाराष्ट्र के चंद्रपुर में एक निष्ठावान संघ परिवार में जन्म।
- 1970 के दशक शिक्षा & करियर पशु चिकित्सा (Veterinary Science) में डिग्री। सरकारी नौकरी छोड़कर समाज सेवा चुनी।
- 1975 – 1977 आपातकाल भूमिगत होकर काम किया; पढ़ाई छोड़कर पूर्णकालिक ‘प्रचारक’ बने।
- 1977 – 1991 क्षेत्रीय नेतृत्व अकोला और नागपुर में विभिन्न संगठनात्मक पदों पर कार्य किया।
- 1991 – 2000 अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख देशभर के स्वयंसेवकों के अनुशासन और शारीरिक प्रशिक्षण का नेतृत्व किया।
- 2000 – 2009 सरकार्यवाह (महासचिव) संघ के दूसरे सबसे बड़े पद पर रहकर प्रशासनिक और जमीनी मजबूती दी।
- 2009 – वर्तमानसरसंघचालक (प्रमुख) संघ के छठे प्रमुख बने। संगठन को आधुनिक, पारदर्शी और समावेशी बनाया।
- 2016 बड़ा बदलाव 90 साल पुराने खाकी शॉर्ट्स को बदलकर फुल पैंट लागू करने का फैसला।
- 2018 संवाद की नई शुरुआत दिल्ली के विज्ञान भवन में ‘भविष्य का भारत’ व्याख्यान माला के जरिए सीधा संवाद किया।
- 2025 – 2026 शताब्दी वर्ष संघ के 100 वर्ष पूरे होने पर संगठन के विस्तार का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
प्रमुख सम्मान और मान्यताएँ
1. राष्ट्रीय नेतृत्व में योगदान – मोहन भागवत को आरएसएस के सर्वोच्च पद पर रहते हुए संगठन और समाज के विकास के लिए उनके योगदान के लिए व्यापक सम्मान प्राप्त है।
2. समाज सेवा और राष्ट्रभक्ति – उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सद्भाव के क्षेत्र में कार्य करके समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए मान्यता प्राप्त की।
3. सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जागरूकता – विभिन्न मंचों पर भारतीय संस्कृति और राष्ट्रभक्ति को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों को सराहा गया।
4. युवा प्रेरणा – युवाओं को राष्ट्रसेवा और सामाजिक कार्यों के लिए प्रेरित करने में उनकी भूमिका को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली।
5. अंतरराष्ट्रीय सम्मान – विदेशों में भारतीय संस्कृति और समाज सेवा को प्रस्तुत करने के लिए उन्हें सम्मानित किया गया।
मोहन भागवत के ये सम्मान और मान्यताएँ यह दिखाते हैं कि उनका जीवन केवल नेतृत्व और पद के लिए नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और राष्ट्र के लिए सेवा और योगदान का प्रतीक है।
विवाद:
- आरक्षण पर पुनर्विचार (2015)
बिहार चुनाव के दौरान उन्होंने आरक्षण की समीक्षा की बात कही थी। इससे बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ और विपक्ष ने इसे दलित-पिछड़ा विरोधी करार दिया। हालांकि बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि वे आरक्षण के पूरी तरह समर्थक हैं।
- समावेशी हिंदुत्व और DNA (2021)
उन्होंने कहा कि “हिंदू और मुसलमानों का DNA एक ही है” और जो लोग लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) में शामिल हैं, वे हिंदुत्व के खिलाफ हैं। इस पर कट्टरपंथी समूहों और मुस्लिम नेताओं, दोनों ने अलग-अलग कारणों से आपत्ति जताई।
- मंदिर-मस्जिद विवाद (2022)
ज्ञानवापी विवाद के दौरान उन्होंने कहा कि “हर मस्जिद में शिवलिंग क्यों ढूंढना?” और “हमें रोज एक नया झगड़ा नहीं पालना चाहिए।” इस बयान ने उन लोगों को चौंका दिया जो उम्मीद कर रहे थे कि संघ इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाएगा।
मोहन भगवत के बारे में रोचक तथ्य
- डॉ. मोहन भागवत (पशु चिकित्सक)
वे सिर्फ एक राजनैतिक या सामाजिक विचारक नहीं, बल्कि पेशे से एक डॉक्टर (Veterinary Surgeon) हैं। उन्होंने पशु चिकित्सा में स्नातक किया और कुछ समय तक सरकारी पशु चिकित्सा अधिकारी के रूप में नौकरी भी की थी।
- ‘मोदी’ के पिता से गहरा नाता
मोहन भागवत के पिता, मधुकर राव भागवत, गुजरात में संघ के प्रचारक थे। दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शुरुआती दिनों में उनके पिता के मार्गदर्शन में ही काम किया था। इस नाते दोनों का रिश्ता दशकों पुराना और गहरा है।
- सबसे युवा सरसंघचालक
जब 2009 में उन्होंने संघ प्रमुख की कमान संभाली, तब उनकी उम्र 59 वर्ष थी। गोलवलकर जी के बाद वे इस पद को संभालने वाले सबसे युवा नेताओं में से एक बने।
- ‘फिल्म’ और ‘संगीत’ का शौक
वे एक गंभीर नेता होने के साथ-साथ कला प्रेमी भी हैं। उन्होंने एक बार बताया था कि थियेटर में देखी गई उनकी आखिरी फिल्म ‘हे राम’ थी। इसके अलावा, उन्हें शास्त्रीय संगीत सुनना बेहद पसंद है।
- सादगी और अनुशासन
पद मिलने से पहले वे अक्सर ट्रेनों के स्लीपर क्लास में यात्रा करते थे। आज भी वे अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने 9 साल तक संघ के ‘शारीरिक प्रमुख’ के रूप में काम किया, इसलिए अनुशासन उनकी जीवनशैली का हिस्सा है।
ये भी पढ़ें: प्रेमचंद बैरवा बायोग्राफी: राजनीति, संघर्ष और जनसेवा की कहानी

