Tuesday, January 13, 2026

‘मन की बात’ में पीएम मोदी का नमन: ओडिशा की वीरांगना पार्वती गिरी, जिनका जीवन संघर्ष और सेवा की मिसाल है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ के 129वें एपिसोड में ओडिशा की महान स्वतंत्रता सेनानी पार्वती गिरी को श्रद्धापूर्वक याद किया। पीएम मोदी ने बताया कि जनवरी 2026 में पार्वती गिरी की जन्म-शताब्दी मनाई जाएगी। उन्होंने आजादी की लड़ाई में उनके योगदान और स्वतंत्र भारत में समाजसेवा के उनके संकल्प को रेखांकित किया।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने उड़िया भाषा में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि ऐसे नायक-नायिकाएं, जिन्हें इतिहास में अपेक्षित सम्मान नहीं मिला, आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा हैं।

कम उम्र, बड़ा साहस

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में देश के हर कोने से लोगों ने बलिदान दिया, लेकिन कई चेहरे गुमनामी में रह गए।

पार्वती गिरी उन्हीं में से एक हैं। उन्होंने मात्र 16 वर्ष की आयु में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लिया और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खुलकर खड़ी रहीं।

आजादी के बाद भी उन्होंने समाज के वंचित वर्गों के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

कौन थीं पार्वती गिरी?

पार्वती गिरी का जन्म 19 जनवरी 1926 को ओडिशा के संबलपुर जिले में हुआ था। उनके पिता धनंजल गिरी गाँव के मुखिया थे, जबकि उनके चाचा रामचंद्र गिरी कांग्रेस से जुड़े नेता थे। राजनीतिक और देशभक्ति से भरे माहौल में पली-बढ़ीं पार्वती गिरी के मन में बचपन से ही आजादी की लौ जलने लगी थी।

11 साल की उम्र में आंदोलन की राह

बहुत कम उम्र में ही पार्वती गिरी ने पढ़ाई छोड़ दी और स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ीं। महज 11 वर्ष की उम्र से वे कांग्रेस के कार्यक्रमों, बैठकों और प्रचार कार्यों में सक्रिय हो गईं। महात्मा गांधी के विचारों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया और उन्होंने खुद को पूरी तरह राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित कर दिया।

भारत छोड़ो आंदोलन में अहम भूमिका

साल 1942 में शुरू हुए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान पार्वती गिरी पश्चिमी ओडिशा के इलाकों में सक्रिय रहीं।

वे गांव-गांव जाकर लोगों को अंग्रेजी शासन के खिलाफ संगठित करती थीं।

खादी अपनाने, विदेशी सामान के बहिष्कार और ब्रिटिश आदेशों की अवहेलना का उन्होंने खुला संदेश दिया। उनकी निर्भीकता ने हजारों लोगों में जोश भर दिया।

16 साल की उम्र में जेल यात्रा

अंग्रेज सरकार को पार्वती गिरी की सक्रियता खतरनाक लगने लगी। आंदोलन को दबाने के लिए उन्हें 16 वर्ष की उम्र में गिरफ्तार कर संबलपुर जेल भेज दिया गया।

लगभग दो साल तक जेल में रहने के बावजूद उनका हौसला नहीं डिगा। वे जेल के भीतर भी अन्य महिला बंदियों को आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित करती रहीं।

नाबालिग होने के कारण अंततः उन्हें रिहा करना पड़ा, लेकिन उनका संघर्ष थमा नहीं।

ब्रिटिश अदालतों को दी खुली चुनौती

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पार्वती गिरी ने अंग्रेजी न्याय व्यवस्था का भी विरोध किया। उन्होंने लोगों और वकीलों से अपील की कि वे ब्रिटिश अदालतों का बहिष्कार करें, क्योंकि ये अदालतें न्याय नहीं बल्कि अंग्रेजी सत्ता की रक्षा कर रही हैं। उनके आह्वान का असर हुआ और कई जगहों पर अदालतों का कामकाज प्रभावित हुआ। इससे ब्रिटिश प्रशासन की मुश्किलें और बढ़ गईं।

आजादी के बाद सेवा का संकल्प

देश आजाद होने के बाद पार्वती गिरी ने समाजसेवा को अपना लक्ष्य बनाया। उन्होंने महसूस किया कि राजनीतिक गुलामी खत्म हो गई है, लेकिन सामाजिक असमानताएं अब भी जिंदा हैं।

अनाथ बच्चों, गरीब महिलाओं, आदिवासियों और कैदियों के लिए उन्होंने निरंतर काम किया।

पश्चिमी ओडिशा में अनाथालय और आश्रम स्थापित कर सैकड़ों बच्चों को नया जीवन दिया।

जेल सुधार और मानवीय संवेदना

जेल जीवन के अपने अनुभवों के कारण पार्वती गिरी कैदियों की पीड़ा को भली-भांति समझती थीं। उन्होंने जेल सुधार की दिशा में काम किया, कैदियों के पुनर्वास के लिए प्रयास किए और उनके परिवारों की सहायता की। उनका जीवन सादगी से भरा था, लेकिन सेवा के प्रति उनका समर्पण अटूट रहा।

सम्मान और विरासत

पार्वती गिरी के सामाजिक योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1984 में राष्ट्रीय सामाजिक सेवा पुरस्कार से सम्मानित किया। संबलपुर विश्वविद्यालय ने भी उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान की। 17 अगस्त 1995 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका संघर्ष, साहस और सेवा आज भी जीवित है।

प्रेरणा की अमर कहानी

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ‘मन की बात’ में पार्वती गिरी को याद किया जाना सिर्फ एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि इतिहास के उन पन्नों को फिर से खोलने का प्रयास है, जिनमें कई वीरांगनाओं की गाथाएं दब गई थीं। पार्वती गिरी का जीवन यह सिखाता है कि उम्र नहीं, बल्कि संकल्प किसी को भी इतिहास बदलने की ताकत देता है।

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Karnika Pandey
Karnika Pandeyhttps://reportbharathindi.com/
“This is Karnika Pandey, a Senior Journalist with over 3 years of experience in the media industry. She covers politics, lifestyle, entertainment, and compelling life stories with clarity and depth. Known for sharp analysis and impactful storytelling, she brings credibility, balance, and a strong editorial voice to every piece she writes.”
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