॥ वागीश्वरी विलास ॥
जगत में चेतना का जो अजस्र स्रोत प्रवाहित है उसका मूल भगवती वागीश्वरी की कृपा दृष्टि ही तो है। उनकी उपासना का ही यह प्रतिफल था कि एक नितांत जड़मूर्ख भी कालिदास जैसा महाकवि बनकर न केवल विद्वत समाज अपितु काल के भाल पर भी तिलक बनकर प्रतिष्ठित हो गया। उस महाशक्ति की महिमा अनिर्वचनीय है।
जिस ओर उनकी करणामयी दृष्टि एक बार भी पड़ जाती है वहाँ की जड़ता तत्काल चैतन्य में परिणत हो जाती है वह जड़मति भी वेदज्ञ हो जाता है। उनकी उपस्थिति मात्र से वन की शुष्क और नीरस लकड़ियाँ भी मृदंग और वीणा बनकर अदृश्य संगीत का सृजन करने लगती हैं मार्ग में पड़े उपेक्षित पाषाण भी उनकी चितवन पाते ही बहुमूल्य रत्न बन जाते हैं और रणभूमि में क्षण मात्र में युद्ध के अंतिम और निर्णायक फल घोषित हो जाते हैं।

धवल वस्त्र धारिणी इन सरस्वती देवी का रहस्य अत्यंत निगूढ़ और विरोधाभासों से परिपूर्ण है। उस पूर्ण श्वेत में अनुस्यूत है पूर्ण कालिमा। सृष्टि के आदि में तमोगुण की अधिष्ठात्री महाकाली के गर्भ से ही श्वेतवर्णा त्रयीमयी विद्यास्वरूपिणी अक्षरा सरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ। अतएव वे बाहर से सौम्य हैं किंतु अंतस में प्रलयंकारी रौद्र भाव छिपाए हुए हैं वे बाहर से धवल हैं तो अभ्यंतर से गहन कृष्ण।
देवी सरस्वती के वाहन और स्वरूप का परिवर्तन ही जगत की दिशा तय करता है। जब वे सौम्य रूप में श्वेत हंस पर आरूढ़ होती हैं तो करुणा की ऐसी वृष्टि करती हैं कि मात्र एक पीला पुष्प चढ़ाने वाला भक्त भी धन्य हो उठता है। किंतु जब वही देवी रौद्र रूप धारण कर कुमारवाहन मयूर पर आरूढ़ होती हैं तो प्रलय निश्चित है। मयूर जो सर्पभक्षी है उसका वाहन होना इस बात का द्योतक है कि अब शत्रु की बुद्धि का विनाश आसन्न है। वे ठीक युद्ध के मध्य में शत्रु की मति भ्रमित कर उसे रसातल में गिरा देती हैं। यह वाग्देवी की ही माया थी कि मधु और कैटभ जैसे अजेय असुर स्वयं भगवान श्रीविष्णु को वरदान देने की धृष्टता कर बैठे। ऐसी विपरीत बुद्धि का खेल केवल तुम ही कर सकती हो हे वाग्देवी वरदायिनी शारदे! हम बारम्बार तुम्हारी शरण में हैं।
यह शक्ति बाहर के स्थूल जगत से पूर्व प्राणी के सूक्ष्म अन्तःजगत में अपना खेल रचती है। कुम्भकर्ण आदि महाबली असुर बाहर के रणक्षेत्र में तो बाद में पराजित होते हैं पर मनोन्मनी सुरसेविता सरस्वती के प्रभाव से अपने अन्तःजगत में वे बहुत पहले ही पराजित हो चुके होते हैं। हे महोत्साहे महाबले महाविद्ये देवी श्यामले! हमारी रक्षा करें। हे सौम्य सी दिखने वाली सरस्वती आपका चरित्र गगनवत विस्तृत है और आपकी रौद्र शक्ति अदृश्य है। वही शक्ति बुद्धि में भेद उत्पन्न करके जीव को उत्कर्ष अथवा विनाश की ओर ले जाती है।
संसार जिसे युद्ध कहता है वह तो केवल एक कार्य है उसका मूल कारण तो विचार है जिसका आधान भगवती सरस्वती की इच्छा के बिना संभव ही नहीं। शुम्भ आदि समस्त दैत्यों की मति में स्वविनाश का बीज रोपने वाली और देवताओं की बुद्धि को धर्म में नियोजित कर उनका उत्कर्ष कराने वाली वह चतुरानना साम्राज्यबुद्धिदा महासरस्वती ही हैं।
माता सरस्वती की अष्टभुजाओं में घण्टा शूल हल मूसल चक्र धनुष और बाण सुशोभित हैं पर उस परम करुणामयी शक्ति को इनके उपयोग की आवश्यकता ही कहाँ है। जहाँ अन्य देवता शस्त्रों की टंकार से युद्ध करते हैं वहीं हंसयुक्त विमान पर कमंडल लेकर बैठी देवी ब्रह्माणी तो युद्धक्षेत्र में दौड़ दौड़कर केवल अपने कमण्डलु का अभिमंत्रित जल कुशा से छिड़कती हैं। वह आपः असुरों के ओज का अपहरण कर लेता है। उस जल के स्पर्श मात्र से असुर अपने ओज और पराक्रम से हीन होकर निर्वीर्य हो जाते हैं। बिना रक्त की एक बूँद बहाए शत्रु को परास्त कर देना कितनी अहिंसक और कितनी दिव्य है यह युद्ध शैली! यह उस दिव्यांगना आह्लादकारिणी सुन्दरी सौम्या माँ शारदा का ही सामर्थ्य है। तुम्हें हमारा कोटिशः नमन है।
हे निखिलवाङ्मयदेवते! हे जननी! हे वीणावादिनी! तुम्हारी जय हो। हे नवमृणालसुकोमले! हे विनत जनों के मुख पर आह्लाद लाने वाली देवी! तुम्हारी जय हो। तुम ही साक्षात् विद्या हो तुम ही वेदवाणी हो और तुम ही सनातनी कल्याणी हो। आदिकवि वाल्मीकि के मुखकमल से निःसृत, व्यासदेव के काव्य में वरण की गई और नवीन मृणाल की भाँति पवित्र तुम ही श्रेष्ठ वरुणा हो।
हे शारदे माँ! हे शारदे माँ! अज्ञानता के सघन तिमिर से हमें तार दें माँ। हम इस संसार में अकेले हैं हम अपूर्ण और अधूरे हैं। हम तेरी शरण में आए हैं हमें तार दें माँ। हे शारदे माँ! देवी पाहि शरणं शरणं!
वसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

