Wednesday, February 11, 2026

लालू के किडनी ट्रांसप्लांट की असलियत! रोहिणी आचार्य की भूमिका को लेकर उठे गंभीर सवाल

एक समय ऐसा था जब दावा किया गया कि रोहिणी आचार्य ने लालू प्रसाद यादव को किडनी दान किया है। लेकिन आरोप है कि असलियत कुछ और थी।

कहा गया कि लालू ने एक नौकर को पैसे देकर उसकी किडनी ट्रांसप्लांट कराई। इस दावे को आधार देने के लिए कई तर्क पेश किए गए।

सबसे बड़ा तर्क यह दिया गया कि अगर ब्लड रिलेटिव किडनी देता, तो ऑपरेशन भारत में ही संभव था। यहां देश के डॉक्टर सिंगापुर से कमतर नहीं हैं।

लेकिन भारत में कानून के अनुसार केवल रक्त संबंधियों के बीच ही अंग प्रत्यारोपण संभव है और इसके लिए कानूनी दस्तावेजों व सबूतों की जरूरत होती है।

वहीं सिंगापुर में ऐसा कोई कानून नहीं है। वहां किसी भी इच्छुक व्यक्ति से किडनी लगवाई जा सकती है।

अमर सिंह ने भी अपनी किडनी वहीं प्रत्यारोपित कराई थी और खुलकर कहा था कि यह उन्होंने श्रीलंका के एक व्यक्ति से खरीदी थी। इस तुलना के जरिए लालू मामले पर संदेह गहराया।

रोहिणी को महान बनाने का प्रचार और मेडिकल प्रक्रियाओं की हकीकत

लालू परिवार ने यह प्रचारित किया कि बेटी रोहिणी आचार्य ने पिता को किडनी देकर त्याग और सेवा की मिसाल कायम की।

लेकिन चिकित्सकीय दृष्टि से देखा जाए तो किडनी दान देने वाले का ऑपरेशन कहीं ज्यादा बड़ा होता है। शरीर को एक किडनी पर ढलने में लंबा समय लगता है।

किडनी डोनर के घाव देर से भरते हैं और शरीर बार-बार ऑटो इम्यून प्रतिक्रिया देता है, मानो उस पर वायरस ने हमला किया हो।

इसी कारण भारी मात्रा में एंटीबायोटिक्स और इम्यूनिटी घटाने वाली दवाएं दी जाती हैं। यही कारण है कि डोनर और रिसीवर दोनों को संक्रमण से बचाने के लिए महीनों मास्क पहनना पड़ता है।

इम्यूनिटी को घटाने का कारण यह होता है कि रिसीवर का शरीर बाहरी किडनी को दुश्मन मानकर उससे लड़ाई करता है।

वहीं डोनर का शरीर भी किडनी निकलने के बाद प्रतिक्रिया करता है। यही वजह है कि दोनों को सालभर तक बेहद सतर्क रहना पड़ता है।

रोहिणी की तस्वीरों पर संदेह और विरोधियों का बदला सुर

इन तमाम प्रक्रियाओं के बावजूद रोहिणी आचार्य की तस्वीरें सामने आईं, जिनमें वह किडनी दान के तुरंत बाद सेल्फी लेती और अस्पताल में टहलती दिखीं।

उन्होंने न कभी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट दिखाई और न ही किडनी निकालने के ऑपरेशन का कोई निशान मीडिया में साझा किया। यहां तक कि उन्हें मास्क लगाते भी नहीं देखा गया।

अब वही लोग, जो पहले लालू परिवार के बचाव में हमलावर रहते थे, आज लिख रहे हैं कि रोहिणी ने किडनी दान नहीं किया था।

उनका कहना है कि यह झूठी अफवाह फैलाई गई थी ताकि उन्हें महान दिखाया जा सके। इस बदलाव ने चर्चा को और गहरा दिया है।

परिवारवाद वाली पार्टियों में बिखराव की दस्तक

यह मामला केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है। आरोप है कि जिन दलों में नेता-कार्यकर्ता का रिश्ता नहीं, बल्कि मालिक-नौकर की संस्कृति चलती है।

वहां ऐसे ही बिखराव की कहानी लिखी जाती है। लालू परिवार और उनकी पार्टी पर लगे आरोप इसी प्रवृत्ति का उदाहरण माने जा रहे हैं।

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Samudra
Samudra
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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