Tuesday, March 3, 2026

70 वर्षीय बुजुर्ग से कश्मीर में बलात्कार, आरोपी जुबैर की जमानत खारिज

श्रीनगर: अनंतनाग की प्रिंसिपल सेशंस कोर्ट ने शुक्रवार को पहलगाम के एक होटल में महाराष्ट्र से आई 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला पर्यटक से बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी।

आरोपी जुबैर अहमद भट, जो गनेशबल पहलगाम का निवासी है, फिलहाल न्यायिक हिरासत में है और उस पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64 और 331(4) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

न्यायाधीश का सख्त रुख, नैतिक पतन पर चिंता

कोर्ट की अध्यक्षता कर रहे प्रिंसिपल सेशंस जज ताहिर खुर्शीद रैना ने इस घटना को केवल एक आपराधिक कृत्य न मानते हुए, कश्मीर समाज में व्याप्त नैतिक क्षरण का दर्पण बताया।

उन्होंने कहा कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि समाज में फैली “गहन विकृति और बीमार मानसिकता” का चिंताजनक संकेत है, जिस पर पूरे समाज को शर्म आनी चाहिए और आत्ममंथन की आवश्यकता है।

“यह एकाकी कृत्य नहीं, बल्कि सामाजिक सड़न का चिन्ह”

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा, “यह कोई ऐसी घटना नहीं है जिसे अनदेखा किया जाए। यह समाज में व्याप्त अत्यधिक नैतिक पतन और मानसिक विकृति का चिंताजनक प्रतीक है — जिसे शर्म के साथ स्वीकार करना होगा और गहराई से आत्मावलोकन करना होगा कि हम क्या थे, और अब किस ओर गिर चुके हैं।”

घटना की पूरी जानकारी

यह दिल दहला देने वाली घटना पहलगाम के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल स्थित होटल चिनार इन में घटित हुई, जहां बुजुर्ग महिला अपने बेटे के परिवार के साथ ठहरी हुई थीं।

पुलिस जांच के अनुसार, जब महिला कमरे में अकेली थी, तब आरोपी जुबैर भट अवैध रूप से कमरे में घुसा, कंबल से उसका मुंह दबाया, बलात्कार किया, उसे गंभीर चोटें पहुंचाईं और खिड़की के रास्ते भाग गया। इस हमले के कारण महिला कई दिनों तक बिस्तर पर पड़ी रहीं और अत्यधिक पीड़ा में थीं।

“मेहमाननवाज़ी की भूमि की छवि धूमिल”

जज रैना ने अपने फैसले की शुरुआत एक मार्मिक उर्दू शेर से की, जिसमें कश्मीर की पारंपरिक अतिथि-सत्कार की भावना का उल्लेख था।

उन्होंने टिप्पणी की कि एक समय “अतुलनीय मेहमाननवाज़ी” के लिए प्रसिद्ध कश्मीर, अब नैतिकता के मोर्चे पर गंभीर चुनौती झेल रहा है। उन्होंने कहा, “कश्मीर की हर बूँद मेहमाननवाज़ी की पालना है,” लेकिन अब ये मूल्य “स्पष्ट रूप से कलंकित हो रहे हैं।”

जमानत याचिका के पक्ष और अदालत की प्रतिक्रिया

आरोपी के वकील सुहैल बेग ने जमानत की मांग करते हुए तर्क दिया कि यह मामला झूठे आरोप और पुलिस से व्यक्तिगत दुश्मनी का परिणाम है। उन्होंने टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड न होने और आरोपी द्वारा जांच में सहयोग देने का हवाला भी दिया।

लेकिन कोर्ट ने केस डायरी, मेडिकल और फॉरेंसिक सबूतों तथा पीड़िता के बयान का गहन अवलोकन करने के बाद इन तर्कों को अस्वीकार कर दिया।

कोर्ट ने कहा, “रिकॉर्ड में उपलब्ध सामग्री सामूहिक रूप से और प्रथम दृष्टया आरोपी के पक्ष में प्रस्तुत जमानत के आधारों को नकारती है। जांच अभी जारी है और चार्जशीट दाखिल होना बाकी है।”

“जेल नहीं, बेल” सिद्धांत पर न्यायाधीश की स्पष्टता

कोर्ट ने माना कि “बेल, नॉट जेल” न्याय का स्वीकृत सिद्धांत है, लेकिन यह भी जोड़ा कि गंभीर अपराधों, संभावित सजा की गंभीरता, आरोपी द्वारा जांच में हस्तक्षेप की संभावना और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे कारकों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

न्यायाधीश रैना ने कहा, “जमानत का सिद्धांत आंख मूंदकर नहीं अपनाया जा सकता, खासकर जब इससे बाकी गंभीर कारक अनदेखे रह जाएं।”

न्यायिक टिप्पणी: “धरती का स्वर्ग तभी बचेगा, जब आत्मा बचेगी”

फैसले के अंत में न्यायाधीश ने कश्मीरी समाज की आत्मा पर सीधा प्रहार करते हुए टिप्पणी की कि जिस महिला को “संतों और सूफियों की भूमि” में “आदरनीय अतिथि” के रूप में देखा जाना चाहिए था, उसे जिस तरह “बेहद अपमानजनक और भयावह” अनुभव हुआ, वह निंदनीय है।

उन्होंने चेताया, “सिर्फ मैदान, पर्वत, हरे-भरे खेत, जंगल, झरने, नदियां और बाग-बगीचे ही कश्मीर को फिर से वांछनीय पर्यटन स्थल नहीं बना सकते। जब तक इस समाज के अंतरात्मा के रखवाले, नैतिक प्रहरी और सेवाभावी लोग सामने नहीं आते और नैतिक दिशा को सुधारने की कोशिश नहीं करते, तब तक कश्मीर का ‘धरती का स्वर्ग’ कहलाना भी खोखला रहेगा।”

इस मामले में अगली सुनवाई तब होगी जब जांच पूरी कर अदालत में चार्जशीट पेश की जाएगी।

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Samudra
Samudra
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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