ईरान अमेरिका युद्ध
श्रीलंका के तट तक पहुँचा युद्ध का असर
ईरान की राजधानी तेहरान से हजारों मील दूर पश्चिम एशिया में शुरू हुआ युद्ध अब श्रीलंका के दक्षिणी तट तक महसूस किया जाने लगा है। बुधवार को गॉल के पास समुद्र में हुई सैन्य घटना ने साफ कर दिया कि यह संघर्ष अब सीमित क्षेत्रीय टकराव नहीं रहा।
आमतौर पर मछली पकड़ने वाली नौकाओं, पर्यटकों और शांत समुद्री गतिविधियों के लिए पहचाना जाने वाला ऐतिहासिक शहर गॉल अचानक युद्ध के मानवीय और सामरिक प्रभावों का केंद्र बन गया। यहाँ उस ईरानी युद्धपोत के बचे हुए नाविकों का इलाज किया गया, जिसे अमेरिकी पनडुब्बी ने डुबो दिया।
आईआरआईएस डेना पर हमला और बचाव अभियान
ईरानी फ्रिगेट आईआरआईएस डेना को श्रीलंका के दक्षिणी तट से केवल 19 समुद्री मील दूर टॉरपीडो से निशाना बनाया गया। इस हमले में 87 नाविकों की मौत हो गई, जबकि श्रीलंकाई नौसेना ने 32 लोगों को समुद्र से बचाकर गॉल के अस्पताल पहुँचाया।
अस्पताल में भर्ती कराए गए घायल नाविकों की स्थिति ने स्थानीय लोगों को झकझोर दिया। दर्जनों नाविक अब भी लापता बताए जा रहे हैं। समुद्र में हुए इस हमले ने श्रीलंका में सुरक्षा, समुद्री सीमा और युद्ध के फैलते दायरे को लेकर गहरी बेचैनी पैदा कर दी है।
स्थानीय समाज में डर और अविश्वास
गॉल स्थित एक स्थानीय सहायता संगठन के प्रमुख डॉ. चथुरा वेलिवितिया के अनुसार, इलाके के लोगों में भय और अविश्वास का माहौल है। समुद्र किनारे बसे समुदायों को अब यह एहसास होने लगा है कि दूर लगने वाले भू राजनीतिक संघर्ष छोटे द्वीपीय देशों को भी सीधे प्रभावित कर सकते हैं।
स्थानीय स्तर पर सबसे बड़ी चिंता यह है कि पश्चिम एशिया की बढ़ती अस्थिरता समुद्री व्यापार, ईंधन आपूर्ति और रोजमर्रा की आर्थिक गतिविधियों को बाधित कर सकती है। हाल के वर्षों में आर्थिक संकट झेल चुका श्रीलंका ऐसे बाहरी झटकों के प्रति पहले से ही संवेदनशील बना हुआ है।
अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद बढ़ा युद्ध
यह युद्ध शनिवार सुबह उस समय शुरू हुआ, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले किए। इसके बाद संघर्ष ने तेजी से व्यापक रूप लिया और कुछ ही दिनों में अनेक देशों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपने घेरे में ले लिया।
ईरान ने जवाबी कार्रवाई में क्षेत्र के कई अमेरिकी सहयोगी देशों को निशाना बनाया। संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कतर, जॉर्डन, ओमान, सऊदी अरब और तुर्किये तक हमलों का असर पहुँचने से यह टकराव अब साफ तौर पर बहुस्तरीय और बहुराष्ट्रीय संघर्ष बन चुका है।
साइप्रस पर हमले के बाद यूरोप की सक्रियता
यूरोपीय शक्तियाँ भी अब इस युद्ध की सीधी सुरक्षा चुनौती महसूस कर रही हैं। रविवार को साइप्रस में स्थित एक ब्रिटिश सैन्य अड्डे पर ड्रोन हमला हुआ। साइप्रस यूरोपीय संघ का सदस्य देश है, इसलिए इस घटना ने पूरे यूरोप की रणनीतिक चिंता बढ़ा दी।
ब्रिटेन के आरएएफ अक्रोतिरी अड्डे की एक विमानन हैंगर दीवार में छेद दिखने के बाद ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने कहा कि हमले में कोई हताहत नहीं हुआ और क्षति बेहद सीमित है। फिर भी इस घटना ने यूरोपीय रक्षा ढाँचे को सचेत कर दिया।
स्पेन, इटली, फ्रांस और ब्रिटेन की तैयारी
स्पेन के रक्षा मंत्रालय ने गुरुवार को घोषणा की कि वह साइप्रस की सुरक्षा के लिए एक फ्रिगेट भेजेगा। इटली और फ्रांस ने भी क्षेत्र में रक्षात्मक सैन्य तैनाती की पुष्टि की, जबकि ब्रिटेन ने अगले सप्ताह एक युद्धपोत भेजने की योजना बताई।
इस सामूहिक तैयारी का उद्देश्य केवल किसी एक अड्डे की रक्षा नहीं, बल्कि भूमध्यसागर और पूर्वी यूरोप के आसपास उभरती सैन्य अस्थिरता को नियंत्रित करना है। यूरोप को अब यह आशंका है कि पश्चिम एशिया का संघर्ष उसके सुरक्षा तंत्र को सीधे चुनौती दे सकता है।
अमेरिका के साथ रिश्तों पर यूरोप की नई परीक्षा
यूरोपीय देशों के सामने एक जटिल प्रश्न यह भी है कि वे अमेरिका की एकतरफा सैन्य कार्रवाइयों के साथ किस सीमा तक खड़े रहें। पश्चिमी गठबंधन के भीतर यह बहस तेज हो रही है कि समर्थन, दूरी और रणनीतिक स्वायत्तता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तेज और आक्रामक निर्णयों ने यूरोप के पारंपरिक सहयोगियों को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार के लिए मजबूर किया है। अब यह सवाल गंभीर हो गया है कि अमेरिकी कार्रवाइयों के बाद यूरोपीय देशों की भूमिका स्वतन्त्र होगी या केवल प्रतिक्रियात्मक।
अज़रबैजान तक पहुँचे ड्रोन हमले के दावे
अज़रबैजान के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को बताया कि ड्रोन घटनाओं में चार लोग घायल हुए हैं और इस मामले पर ईरानी दूतावास के समक्ष आधिकारिक विरोध दर्ज कराया गया है। घटनाओं ने काकेशस क्षेत्र को भी इस युद्ध की परिधि में ला खड़ा किया।
अज़रबैजान का कहना है कि एक ड्रोन ने हवाई अड्डे के टर्मिनल भवन को निशाना बनाया, जबकि दूसरा नखचिवान एन्क्लेव के एक गाँव के पास स्कूल के निकट गिरा। दूसरी ओर ईरानी सशस्त्र बलों ने इन हमलों से इनकार करते हुए सभी देशों की संप्रभुता के सम्मान की बात कही।
संघर्ष को फैलाने की रणनीति की आशंका
सैन्य विश्लेषणों में यह आकलन उभर रहा है कि ईरान अपनी शेष क्षमता का उपयोग संघर्ष को अधिक देशों तक फैलाने के प्रयास में कर सकता है। इसका मकसद क्षेत्रीय दबाव बढ़ाना और अन्य देशों के माध्यम से अमेरिका पर युद्ध रोकने का दबाव बनवाना माना जा रहा है।
इसी कारण पश्चिम एशिया से बाहर के देश भी अब इस संघर्ष को केवल दूरस्थ संकट नहीं, बल्कि अपने लिए संभावित सुरक्षा और आर्थिक खतरे के रूप में देखने लगे हैं। समुद्री मार्ग, ऊर्जा बाजार और सामरिक अड्डे इस व्यापक टकराव के प्रमुख केंद्र बन गए हैं।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव
इस युद्ध का सबसे बड़ा आर्थिक असर होर्मुज जलडमरूमध्य पर दिखाई दे रहा है। ईरान के दक्षिणी तट के पास स्थित यह संकरा समुद्री मार्ग दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का लगभग पाँचवाँ हिस्सा गुजरने देता है और अनेक अन्य वस्तुओं के व्यापार के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आमतौर पर तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों से भरा रहने वाला यह मार्ग अब ईरानी हमलों की आशंका के कारण लगभग खाली पड़ने लगा है। इससे कच्चे तेल, गैस, एल्युमिनियम, चीनी और उर्वरक जैसी वस्तुओं की वैश्विक कीमतों पर दबाव बढ़ गया है।
श्रीलंका की अर्थव्यवस्था के लिए दोहरी चुनौती
श्रीलंका जैसे देशों के लिए यह संकट केवल सैन्य घटना भर नहीं, बल्कि आर्थिक असुरक्षा की गंभीर चेतावनी है। समुद्री व्यापार में रुकावट, ईंधन आपूर्ति पर दबाव और वैश्विक कीमतों में उछाल का सीधा असर उस देश पर पड़ सकता है जो हाल ही में आर्थिक उथलपुथल से गुजरा है।
स्थानीय चिंताओं में ऊर्जा महँगाई, समुद्री मार्गों की अनिश्चितता और विदेशी आय पर असर शामिल है। श्रीलंका की श्रम, व्यापार और समुद्री संपर्क संरचना वैश्विक नेटवर्क से गहराई से जुड़ी है, इसलिए पश्चिम एशिया में अस्थिरता यहाँ घरेलू दबाव में बदल सकती है।
दूसरे ईरानी जहाज ने और बढ़ाई बेचैनी
श्रीलंका के अधिकारियों ने संकेत दिया है कि आईआरआईएस डेना से जुड़ी बचाव घटना अकेली नहीं रह सकती। उनके अनुसार एक दूसरा ईरानी जहाज भी श्रीलंकाई क्षेत्रीय जल में प्रवेश कर चुका है, जिससे सुरक्षा एजेंसियों और प्रशासन की सतर्कता और बढ़ गई है।
कैबिनेट प्रवक्ता नलिंदा जयतिस्सा ने बताया कि उस जहाज को श्रीलंका में लंगर डालने की अनुमति नहीं दी जा रही, हालांकि मानवीय सहायता दी जा रही है। यह स्पष्ट नहीं किया गया कि जहाज वाणिज्यिक था या सैन्य, लेकिन स्थिति को संवेदनशील माना जा रहा है।
युद्ध से थका समाज फिर हिंसा नहीं चाहता
गॉल के स्थानीय टूर गाइड कासुन जयवर्धना के अनुसार, तटवर्ती शहर के लोग अपने समुद्र किनारे युद्ध की छाया देख कर असहज हैं। श्रीलंका पहले ही लगभग तीन दशक लंबे गृहयुद्ध का दर्द झेल चुका है, जो 2009 में समाप्त हुआ था।
यही कारण है कि स्थानीय समाज किसी भी रूप में हिंसा की वापसी नहीं चाहता, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या दूरस्थ संघर्ष के प्रभाव के रूप में आए। गॉल के तट पर पहुँची यह घटना दुनिया को याद दिलाती है कि आधुनिक युद्ध की सीमाएँ अब तेजी से मिट रही हैं।

