भारतीय रेलवे का LNG-डीजल ट्रेन ट्रायल सफल: भारतीय रेलवे ने पर्यावरण संरक्षण और लागत बचत की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है।
गुजरात के अहमदाबाद स्थित साबरमती में देश की पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल डीजल मल्टीपल यूनिट (DEMU) ट्रेन को यात्रियों के लिए नियमित रूप से ट्रैक पर उतार दिया गया है।
करीब 2000 किलोमीटर के सफल ट्रायल के बाद इस 8-कोच वाली ट्रेन ने यह साबित कर दिया है कि भविष्य की रेल यात्रा अब सस्ती, स्वच्छ और टिकाऊ होने वाली है।
नेट-जीरो लक्ष्य की ओर बड़ा कदम
यह नई तकनीक भारतीय रेलवे के नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी।
LNG (Liquefied Natural Gas) के उपयोग से न केवल डीजल की खपत में 40 प्रतिशत तक की कमी आएगी, बल्कि CO₂, NOx और पार्टिकुलेट मैटर जैसे खतरनाक उत्सर्जन में भी भारी गिरावट दर्ज की जाएगी।
इससे रेलवे लाइनों के आसपास रहने वाले लोगों को साफ हवा और बेहतर पर्यावरण मिलेगा।
रेलवे के ईंधन खर्च में मिलेगा बेहतर बदलाव
अहमदाबाद मंडल के अधिकारियों के अनुसार, इस डुअल-फ्यूल सिस्टम से रेलवे के ईंधन खर्च में क्रांतिकारी बदलाव आएगा।
जहां पहले 1 किलोमीटर में 1.4 लीटर डीजल की जरूरत पड़ती थी, वहीं अब सिर्फ 0.3 किलोग्राम LNG से वही दूरी तय की जा सकती है।
100 किलोमीटर के सफर में पहले लगभग ₹12,000 का खर्च आता था और अब सिर्फ ₹3,000 का खर्चा होगा। यानी बिना कोई परफॉर्मेंस से समझौता किए चार गुना तक की बचत होगी।
पारंपरिक डीजल इंजन जैसी होगी रफ़्तार
इस तकनीक की सबसे खास बात यह है कि इंजन की ताकत और विश्वसनीयता बिल्कुल पारंपरिक डीजल इंजन जैसी ही बनी रहती है।
परियोजना के तहत दो 1400 हॉर्सपावर वाली DMU पावर कारों को LNG-डीजल डुअल-फ्यूल सिस्टम में बदला गया है।
रेलवे अधिकारियों के अनुसार, ट्रेन की स्पीड, पिक-अप और संचालन क्षमता पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा है। बल्कि एक बार टैंक भरने पर ट्रेन पहले से ज्यादा लंबी दूरी तय कर पा रही है।
एक बार गैस भरने पर 2200 किलोमीटर का सफर तय
इस ट्रेन में 2200 लीटर क्षमता वाला LNG टैंक लगाया गया है, जिसमें करीब 950–1000 किलोग्राम LNG स्टोर की जा सकती है।
पूरी तरह भरा टैंक ट्रेन के 2200 किलोमीटर के दैनिक संचालन के लिए पर्याप्त है। इससे बार-बार ईंधन भरने की जरूरत कम होगी और ऑपरेशनल एफिशिएंसी और बढ़ेगी।
सबसे अहम बात यह है कि यह सिस्टम ईंधन उपलब्धता के अनुसार LNG और डीजल के बीच आसानी से स्विच कर सकता है।
हर साल होगी लाखों की बचत
टेस्ट डेटा के मुताबिक, एक पावर कार से सालाना बचत करीब ₹11.9 लाख होती है, वहीं पूरे 8-कोच DMU रेक से सालाना बचत करीब ₹23.9 लाख की बताई जा रही है।
साबरमती में लगी देश की पहली LNG किट से ही यह स्पष्ट हो गया है कि यह तकनीक रेलवे के लिए लंबी अवधि में गेम-चेंजर साबित होगी।
जहां बिजली नहीं वहां LNG बनेगा विकल्प
भारतीय रेलवे की योजना अब इस तकनीक को उन रूट्स पर विस्तार देने की है जहां अभी तक इलेक्ट्रिफिकेशन संभव नहीं हो पाया है।
इसके तहत आने वाले समय में 8 और पावर कारों को इसी डुअल-फ्यूल सिस्टम में बदला जाएगा, जिससे दूर-दराज़ इलाकों में भी स्वच्छ और किफायती रेल सेवा सुनिश्चित की जा सके।
RDSO की अंतिम मंजूरी और उत्सर्जन परीक्षण पूरे होने के बाद इसका बड़े पैमाने पर विस्तार किया जाएगा।
LNG-डीजल डुअल-फ्यूल ट्रेन सिर्फ एक तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे के भविष्य की झलक है।
यह पहल साबित करती है कि विकास, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक बचत तीनों साथ-साथ चल सकते हैं।
भारतीय रेलवे ने यह दिखा दिया है कि हरित भारत की ट्रेन अब चल पड़ी है, और इसकी रफ्तार थमने वाली नहीं है।
यह भी पढ़ें: नरेंद्र मोदी बायोग्राफी: चाय की केतली से देश की कमान तक

