स्वास्थ्य विभाग
स्वास्थ्य व्यवस्था को भीतर से देखने वाले लंबे अनुभव ने एक कठोर सच्चाई सामने रखी है। गांवों से महानगरों तक और छोटे लैबों से बहुराष्ट्रीय कंपनियों तक पच्चीस वर्ष के काम ने दिखाया कि भारतीय स्वास्थ्य विभाग की अनेक समस्याओं के बीच छह ऐसे बिंदु हैं, जिन पर तुरंत सुधार जरूरी है।
इन छह मोर्चों को सही ढंग से समझकर समाधान निकाला जाए तो स्वास्थ्य विभाग से अस्सी प्रतिशत भ्रष्टाचार खत्म किया जा सकता है। देश का भविष्य सुरक्षित होगा। भारी निवेश नहीं, इच्छाशक्ति और नागरिकों में जिम्मेदारी चाहिए। यह बदलाव एक से दो वर्ष में संभव है।
इन परिवर्तनों की लागत बहुत बड़ी नहीं है। असली कमी नीतिगत दृढ़ता और सामाजिक सजगता की है। जब तक लोग अपने स्वास्थ्य और उससे जुड़ी सुविधाओं को निजी जिम्मेदारी की तरह नहीं लेंगे, तब तक व्यवस्था में सुधार की रफ्तार अधूरी रहेगी।
प्राथमिक चिकित्सालयों की मजबूती सबसे पहली शर्त
सबसे पहला सुधार प्राथमिक चिकित्सालयों पर केंद्रित होना चाहिए। भारत सरकार और अधिकांश राज्य सरकारें इस मोर्चे पर कमजोर दिखती हैं। दक्षिण भारत में यह व्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर है, इसलिए वहां का स्वास्थ्य ढांचा देश के अन्य राज्यों की तुलना में सक्षम नजर आता है।
प्राथमिक स्तर पर कुछ निजी कंपनियां भी उल्लेखनीय काम कर रही हैं। इससे स्पष्ट है कि इच्छाशक्ति, प्रबंधन और जवाबदेही के साथ बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार संभव है। मजबूत प्राथमिक ढांचा बनने पर ऊपर की व्यवस्था पर पड़ने वाला दबाव कम हो सकता है।
लैब रिपोर्ट सिर्फ आंकड़े नहीं, स्पष्ट डायग्नोसिस दे
दूसरा बड़ा सुधार लैबोरेट्री जांच से जुड़ा है। केवल आंकड़े थमा देने के बजाय हर टेस्ट के साथ डायग्नोसिस रिपोर्ट दी जानी चाहिए, ठीक वैसे जैसे पैथोलॉजी में हिस्टोपैथोलॉजी विभाग रिपोर्ट की व्याख्या करता है। यह बदलाव भ्रष्टाचार की जड़ पर चोट कर सकता है।
लोगों की भूमिका भी यहां निर्णायक है। जब भी कोई व्यक्ति लैब टेस्ट कराने जाए, वह सीधे पूछे कि क्या रिपोर्ट समझाई जाएगी। यदि लैब आनाकानी करे तो वहां जांच नहीं करानी चाहिए। ऐसी सख्ती शुरू होते ही स्तर पर चल रहे खेल टूटने लगेंगे।
नॉर्मल रेंज का खेल कैसे स्वस्थ लोगों को मरीज बना रहा है
तीसरा सुधार रिपोर्ट पर लिखी जाने वाली नॉर्मल रेंज और रेफरेंस रेंज से जुड़ा है। यह दायित्व लैबोरेट्री स्वयं निभाए। आज भारत में स्वस्थ लोगों को रोगी बनाकर दवाइयां खिलाई जा रही हैं, क्योंकि दी जाने वाली रेंज स्थानीय वास्तविकता पर आधारित नहीं होती।
अधिकतर पैथोलॉजी लैब जो रेफरेंस रेंज देती हैं, वह यूरोप और अमेरिका के आंकड़ों से ली जाती है और केमिकल किट इंसर्ट से नकल कर दी जाती है। NABL और CAP प्रमाणित लैब से अपेक्षा होती है कि वह दी गई रेंज का स्रोत लिखे।
हर लैब को अपनी नॉर्मल रेंज तय करने का अधिकार है, लेकिन इसके लिए पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड रखना पड़ता है। यही वैज्ञानिक जिम्मेदारी भारत में परीक्षण व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बना सकती है और बेवजह मरीज बनाए जाने की प्रवृत्ति को रोक सकती है।
क्वालिटी कंट्रोल के बिना लैब जांच भरोसेमंद नहीं
चौथा सुधार जनता की सतर्कता से जुड़ा है। लैब में जांच कराने से पहले पूछा जाना चाहिए कि वहां कौन सा क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम लागू है। IQC और EQC का पालन होता है या नहीं, और यदि होता है तो EQC प्रमाणपत्र दिखाया जाना चाहिए।
यदि ये व्यवस्थाएं मौजूद नहीं हैं, तो समस्या गंभीर है, क्योंकि तब लैब को यह भरोसा नहीं होता कि उसकी मशीन सही काम कर रही है या नहीं। जांच का परिणाम तभी विश्वसनीय माना जा सकता है, जब गुणवत्ता नियंत्रण दस्तावेजों के साथ साबित हो।
पैरामेडिकल स्टाफ का नॉलेज अपग्रेडेशन भी अनिवार्य हो
पांचवां सुधार डॉक्टरों की तरह पैरामेडिकल स्टाफ के नियमित नॉलेज अपग्रेडेशन से जुड़ा है। जैसे चिकित्सकों को मेडिकल काउंसिल में नवीनीकरण के समय अपने अद्यतन ज्ञान का विवरण देना पड़ता है, वैसे ही नर्स, लैब स्टाफ और अन्य कर्मियों के लिए अनिवार्य व्यवस्था होनी चाहिए।
NABL और NABH दिशानिर्देशों में स्टाफ को लगातार अपडेट रखने और आंतरिक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने की बात कही गई है, जिसका रिकॉर्ड नवीनीकरण के समय दिखाना होता है। इसके बिना जनता को पता नहीं चलता कि सामने काम कर रहा कर्मचारी प्रशिक्षित है या नहीं।
एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस अब स्वास्थ्य तंत्र का विस्फोटक संकट
छठा और गंभीर संकट AMR यानी एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस है। दुनिया इसे 2050 तक महामारी खतरे के रूप में देख रही है। औसतन हर वर्ष बीस लाख से अधिक मौतें सीधे इससे जुड़ती हैं, जबकि लगभग पचास लाख मौतों में इसका योगदान माना जाता है।
इसका असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। अनुमान है कि 2050 तक यह वैश्विक जीडीपी को तीन से चार प्रतिशत तक प्रभावित कर सकता है। इसलिए चिकित्सकों को एंटीबायोटिक्स का न्यूनतम इस्तेमाल करना चाहिए और त्वरित राहत देने की प्रवृत्ति पर लगाम लगानी चाहिए।
स्थिति इतनी गंभीर है कि भारत में पैंतीस से चालीस वर्ष की आयु तक पहुंचते पहुंचते कई लोगों पर सामान्य एंटीबायोटिक्स बेअसर होने लगते हैं। यह केवल अस्पतालों की समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा और उपचार व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन चुका है।
साल 2001 में जब इस क्षेत्र में काम शुरू हुआ था, तब कल्चर जांच में मुश्किल से दो या तीन एंटीबायोटिक्स ही रेजिस्टेंट मिलते थे। अब कई बार लगभग सभी एंटीबायोटिक्स रेजिस्टेंट मिलते हैं। 2009 और 2010 के बाद यह समस्या तेजी से बढ़ी है।
रोगी को तुरंत आराम देने और स्वयं के प्रदर्शन अंक बढ़ाने की होड़ में एंटीबायोटिक्स का बेतहाशा इस्तेमाल हुआ है। यही कारण है कि प्रतिरोध का संकट गहराता गया। उपचार को त्वरित संतोष के बजाय वैज्ञानिक संयम पर आधारित करना अब अनिवार्य हो चुका है।
दुनिया के वैज्ञानिक और चिकित्सक इस संकट पर शोध कर रहे हैं, लेकिन पहला कदम वही है जो उठाया जा सकता है, एंटीबायोटिक्स का न्यूनतम उपयोग। सरकार से अपेक्षा कम है। यदि जनता जागरूक हो जाए तो स्वास्थ्य विभाग को स्वस्थ बनाया जा सकता है।

