Sunday, January 11, 2026

डॉलर का दबदबा घटने की आहट से बौखलाए ट्रंप, नहीं झुक रहा भारत

डॉलर

वर्तमान विश्व व्यवस्था में अमेरिका का बदलता स्वरूप और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता

आज की वैश्विक भू-राजनीति एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है जहाँ पुराने समीकरण ध्वस्त हो रहे हैं और नई शक्तियों का उदय हो रहा है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और उनकी आक्रामक कार्यशैली ने विश्व पटल पर एक नई बहस छेड़ दी है। ट्रंप का व्यवहार, चाहे वह वेनेजुएला के प्रति हो या अपने ही सहयोगी राष्ट्रों के प्रति, यह स्पष्ट संकेत देता है कि अमेरिका अब अपनी वैश्विक पुलिसमैन की भूमिका से सिमटकर अपने स्वयं के अस्तित्व और आर्थिक हितों की रक्षा में जुट गया है।

यह केवल एक राजनीतिक परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह उस एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का अंत है जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित किया गया था। भारत के संदर्भ में देखें तो यह समय ‘शत्रुबोध’ और ‘आत्मबोध’ दोनों का है। एक ओर जहाँ अमेरिकी प्रशासन भारत के साथ व्यापार समझौतों को लेकर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत का नेतृत्व अपने स्वाभिमान और राष्ट्रहित के साथ कोई समझौता करने को तैयार नहीं है। यह भारत की बदलती हुई कूटनीतिक धमक है जो अब किसी के दबाव में नहीं, बल्कि बराबरी के स्तर पर बात करता है।

डी-डॉलराइजेशन और आर्थिक महाशक्ति का पूर्व की ओर स्थानांतरण

वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक अदृश्य किंतु व्यापक परिवर्तन चल रहा है जिसे मुख्यधारा का मीडिया अक्सर नजरअंदाज कर देता है। यह परिवर्तन है डॉलर के प्रभुत्व का अंत और सोने-चांदी जैसी वास्तविक संपदा का एशिया की ओर प्रवाह। वर्ष 2021 के मध्य से ही रूस और चीन जैसे देशों ने डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करनी शुरू कर दी थी।

यह केवल एक आर्थिक निर्णय नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित रणनीतिक चाल थी। जब हम आंकड़ों पर गौर करते हैं तो पाते हैं कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में, विशेषकर 2021 के बाद से, चांदी और सोने का आयात अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया है। एक समय था जब भारत ने वैश्विक चांदी उत्पादन का एक तिहाई हिस्सा अकेले खरीद लिया था।

यह इस बात का प्रमाण है कि पश्चिम अपनी कागजी मुद्रा यानी डॉलर के बल पर जो भ्रमजाल फैलाए हुए था, वह अब टूट रहा है और वास्तविक मूल्य अब धातुओं के माध्यम से पूर्व की ओर स्थानांतरित हो रहा है। इसे हम भारत की उस प्राचीन ‘सोने की चिड़िया’ वाली पहचान की वापसी के रूप में भी देख सकते हैं, जहाँ वास्तविक धन और संपदा का केंद्र भारतवर्ष हुआ करता था। यह ‘डी-डॉलराइजेशन’ की प्रक्रिया अंततः भारतीय रुपये को वैश्विक पटल पर मजबूत करेगी और पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के खोखलेपन को उजागर करेगी।

विभाजन की विभीषिका और डॉलर कूटनीति का ऐतिहासिक सत्य

भारत के इतिहास को ‘सूडो-सेक्युलर’ इतिहासकारों ने जिस तरह से प्रस्तुत किया है, उसने हमें कई कड़वे सत्यों से वंचित रखा है। हमें यह समझना होगा कि 1947 का भारत विभाजन केवल एक धार्मिक उन्माद का परिणाम नहीं था, बल्कि यह तत्कालीन वैश्विक शक्तियों की ‘टू बकेट थ्योरी’ का हिस्सा था।

स्टालिन, चर्चिल और रूजवेल्ट जैसे नेताओं ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व को अपने प्रभाव क्षेत्रों में बांट लिया था। ऐतिहासिक दस्तावेज और शोध यह बताते हैं कि भारत को सोवियत रूस के प्रभाव क्षेत्र (बकेट) में और पाकिस्तान को अमेरिका के प्रभाव क्षेत्र में धकेल दिया गया था। यह एक सुनियोजित षड्यंत्र था ताकि एशिया में हमेशा संघर्ष बना रहे और पश्चिमी शक्तियों का हथियार और डॉलर का व्यापार चलता रहे।

कश्मीर समस्या से लेकर आतंकवाद तक, सब कुछ इसी डॉलर-प्रेरित भू-राजनीति की देन है। आज जब हम इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समझते हैं तो स्पष्ट होता है कि भारत की गुटनिरपेक्षता या रूस की ओर झुकाव कोई संयोग नहीं था, बल्कि एक आरोपित व्यवस्था थी। अब जब डॉलर का प्रभुत्व समाप्त हो रहा है, तो ये कृत्रिम रूप से बनाए गए संघर्ष के बिंदु (हॉटस्पॉट्स) भी अपनी प्रासंगिकता खो रहे हैं और भारत अपनी शर्तों पर इतिहास को पुनर्लिखित करने की स्थिति में है।

यूरोप का पतन और नाटो का अस्तित्व संकट

जिस प्रकार डॉलर अपनी चमक खो रहा है, ठीक उसी प्रकार यूरोप और नाटो गठबंधन भी अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। अफगानिस्तान से अमेरिका की शर्मनाक वापसी ने यह सिद्ध कर दिया कि ‘आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध’ केवल एक धन शोधन का जरिया था, जहाँ डॉलर छापे जा रहे थे और डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर्स की जेबें भरी जा रही थीं।

यूरोप के देशों को अब यह समझ आ रहा है कि अमेरिका के साथ उनका गठबंधन उन्हें सुरक्षा नहीं, बल्कि आर्थिक बर्बादी की ओर ले जा रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा हाल ही में जर्मनी के संदर्भ में ‘वीमार’ शब्द का प्रयोग करना अत्यंत प्रतीकात्मक और कूटनीतिक रूप से गहरा अर्थ लिए हुए है।

यह इस बात का संकेत है कि यूरोप वापस उसी अस्थिरता की ओर बढ़ रहा है जो विश्व युद्धों के समय थी। ट्रंप की नीतियों ने स्पष्ट कर दिया है कि अब अमेरिका यूरोप की सुरक्षा का खर्च नहीं उठाएगा। ऐसे में यूरोप के पास रूस और चीन के साथ तालमेल बिठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। यह पश्चिमी सभ्यता के उस अहंकार का अंत है जो सदियों से शेष विश्व को उपदेश देता आया था।

प्रभुत्व के क्षेत्र और भारत की अखंडता का संकल्प

डोनाल्ड ट्रंप का यह कथन कि पश्चिमी गोलार्ध उनका इलाका है और वहां वे किसी बाहरी शक्ति को बर्दाश्त नहीं करेंगे, वस्तुतः ‘मुनरो सिद्धांत’ का ही एक उग्र रूप है। वे मेक्सिको, कनाडा और वेनेजुएला जैसे देशों को अपनी शर्तों पर चलाना चाहते हैं। इस वैश्विक अराजकता और ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली स्थिति में भारत के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है।

यदि अमेरिका अपने पड़ोसी देशों में अपना प्रभुत्व जमा सकता है, तो भारत को भी अपने ‘स्फीयर ऑफ इन्फ्लुएंस’ यानी प्रभाव क्षेत्र को सुरक्षित करने का पूर्ण अधिकार है। इसका सीधा अर्थ यह है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके), श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल जैसे क्षेत्रों में भारत की भूमिका निर्णायक होनी चाहिए।

अब वह समय बीत चुका है जब हम संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की ओर देखते थे, जो स्वयं अब अप्रासंगिक हो चुकी हैं। आज की कूटनीति शक्ति और सामर्थ्य पर आधारित है। भारत को अपने पड़ोस में अपनी रणनीतिक गहराई बढ़ानी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी बाहरी शक्ति, चाहे वह चीन हो या अमेरिका, हमारे क्षेत्र में हस्तक्षेप न कर सके। अनुच्छेद 370 का हटाया जाना इस दिशा में पहला कदम था, और अब हमें अपने खोए हुए भू-भाग और सांस्कृतिक अखंडता को पुनः प्राप्त करने के लिए तत्पर रहना होगा।

व्यापार समझौते और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौतों में आ रही बाधाएं केवल आर्थिक नहीं हैं, बल्कि यह भारत के सांस्कृतिक और स्वास्थ्य संबंधी मूल्यों की रक्षा का प्रश्न है। अमेरिका चाहता है कि भारत उनके जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएमओ) फसलों और डेयरी उत्पादों के लिए अपने बाजार खोल दे। यहाँ हमें यह समझना होगा कि अमेरिकी डेयरी उद्योग में गायों को मांसाहारी भोजन और रसायनों के बल पर पाला जाता है, जो भारतीय संस्कृति और ‘धर्म’ की मूल अवधारणा के विपरीत है।

हम अपने नागरिकों को मधुमेह और अन्य बीमारियों का शिकार नहीं बना सकते, केवल इसलिए कि अमेरिकी कंपनियों को मुनाफा कमाना है। प्रधानमंत्री मोदी का अमेरिकी दबाव के सामने न झुकना और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना एक सशक्त नेतृत्व का परिचायक है। यह ‘तुष्टीकरण’ की राजनीति का अंत है, चाहे वह घरेलू हो या अंतरराष्ट्रीय। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि हमारे लिए व्यापार से ऊपर हमारे नागरिकों का स्वास्थ्य और हमारी सांस्कृतिक मान्यताओं की पवित्रता है।

मल्टीपोलर विश्व और भारत का भविष्य

अंततः, हम एक बहुध्रुवीय (मल्टीपोलर) विश्व की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ भारत, रूस, चीन और अमेरिका शक्ति के प्रमुख केंद्र होंगे। ब्रिक्स जैसे मंचों का विस्तार और उसमें भारत की सक्रिय भूमिका यह बताती है कि भविष्य अब पश्चिम द्वारा नहीं लिखा जाएगा। ट्रंप का अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से मोहभंग और उनका अलगाववाद अनजाने में ही सही, लेकिन बहुध्रुवीयता को बढ़ावा दे रहा है। भारत के लिए यह एक स्वर्णिम अवसर है।

हमें अपनी आर्थिक नीतियों को सुदृढ़ करते हुए, अपनी सेना को आधुनिक बनाते हुए और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को गहरा करते हुए आगे बढ़ना है। इजरायल जैसे देशों का डॉलर को छोड़कर युआन और रुपये में व्यापार करने की ओर बढ़ना इस बदलाव की पुष्टि करता है। आने वाले समय में वैश्विक कूटनीति के नियम बदलेंगे और उन नए नियमों को लिखने में भारत की कलम सबसे महत्वपूर्ण होगी। यह समय है कि हम औपनिवेशिक मानसिकता से पूर्णतः मुक्त होकर एक समर्थ और सशक्त राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान को विश्व पटल पर अंकित करें।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं और 9 वर्षों से भारतीय इतिहास, धर्म, संस्कृति, शिक्षा एवं राजनीति पर गंभीर लेखन कर रहे हैं।
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