धर्मेंद्र बायोग्राफी: 1960 और 70 के दशक में हिंदी सिनेमा एक ऐसे नए नायक की तलाश में था जो एक तरफ ताकतवर योद्धा जैसा दिखे और दूसरी तरफ गांव के भोले-भाले लड़के जैसी सादगी भी रखता हो।
चौड़े कंधे, सादगी भरा व्यक्तित्व और आंखों में गहरी भावनाएं यही वो बातें थीं जिन्होंने दर्शकों को धर्मेंद्र से जोड़ दिया।
डायरेक्टर उनके अनुशासन की तारीफ करते थे, सह-कलाकार उनकी विनम्रता के कायल थे और दर्शकों के लिए वे एक ऐसे नायक बन गए जो मजबूत भी था और दिल से बेहद नरम भी।
वे कभी शांत अंदाज में संवाद बोलते तो कभी अन्याय के खिलाफ गरजते हुए दिखाई देते। गांव की पृष्ठभूमि वाली फिल्म हो, रोमांटिक कहानी हो, कॉमेडी हो या दमदार एक्शन धर्मेंद्र हर किरदार में पूरी तरह ढल जाते थे। उनकी स्क्रीन पर मौजूदगी ही इतनी प्रभावशाली होती थी कि दर्शकों की नजरें अपने-आप उन्हीं पर टिक जाती थीं।
पंजाब के एक छोटे से गांव से निकलकर भारतीय सिनेमा के शिखर तक पहुंचने वाले इस अभिनेता को दुनिया धर्मेंद्र के नाम से जानती है।
प्यार से लोग उन्हें “धरम” या “गरम धरम” भी कहते थे। उनकी सादगी, दिलदारी और जमीन से जुड़ा स्वभाव ही वह वजह था जिसने उन्हें सिर्फ एक सुपरस्टार नहीं बल्कि लोगों के दिलों का हीरो बना दिया।
व्यक्तिगत जानकारी
| पूरा नाम | धर्म सिंह देओल |
| उपनाम | धर्मेंद्र, धरम, गरम धरम, बॉलीवुड के ही-मैन |
| जन्म | 8 दिसंबर 1935 |
| जन्मस्थान | साहनेवाल, लुधियाना, पंजाब |
| निधन | 24 नवंबर 2025 (89 वर्ष की आयु में) |
| धर्म | सिख |
| पेशा | अभिनेता, फिल्म निर्माता, राजनीतिज्ञ |
| पहली फिल्म | दिल भी तेरा हम भी तेरे (1960) |
| प्रोड्यूसर के रूप में पहली फिल्म | बेताब (1983) |
| सम्मान | पद्म विभूषण (2026, मरणोपरांत), पद्म भूषण (2012) |
| पिता | केवल किशन सिंह देओल |
| माता | सतवंत कौर |
| भाई-बहन | अजीत सिंह देओल |
| जीवनसाथी | पहली पत्नी – प्रकाश कौर, दूसरी पत्नी – हेमा मालिनी |
| बच्चे (पहली पत्नी से) | सनी देओल, बॉबी देओल, विजेता देओल, अजीता देओल |
| बच्चे (दूसरी पत्नी से) | ईशा देओल, अहाना देओल |
पारिवारिक जड़ें: पंजाब का जट और मिट्टी का मोह
धर्मेंद्र बायोग्राफी: धर्मेंद्र का जन्म 8 दिसंबर 1935 को पंजाब के लुधियाना जिले के एक छोटे से गाँव नसराली में हुआ था। हालाँकि, उनका बचपन और पालन-पोषण साहनेवाल में हुआ, जिसे वह आज भी अपना असली घर मानते हैं।
पिता (केवल किशन सिंह देओल): वे एक स्कूल हेडमास्टर थे। धर्मेंद्र अक्सर बताते हैं कि उनके पिता काफी सख्त थे और चाहते थे कि उनका बेटा पढ़-लिखकर कुछ बने, लेकिन धर्मेंद्र का मन तो फिल्मों में बसता था।
माँ (सतवंत कौर): वह एक शांत और धार्मिक महिला थीं। धर्मेंद्र अपनी माँ के बेहद करीब थे और उनकी कहानियाँ सुनकर ही बड़े हुए।
भाई (अजीत सिंह देओल): धर्मेंद्र के छोटे भाई अजीत सिंह देओल भी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े थे (वह अभिनेता अभय देओल के पिता हैं)।
शिक्षा
शुरुआती पढ़ाई: धर्मेंद्र ने पंजाब के साहनेवाल में अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की, जहाँ उनके पिता खुद एक सरकारी स्कूल के हेडमास्टर थे।
मैट्रिक (10वीं): उन्होंने 1952 में फगवाड़ा के सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की।
कॉलेज: आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने फगवाड़ा के ही रामगढ़िया कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन वे अपनी ग्रेजुएशन (डिग्री) पूरी नहीं कर सके।
काम का अनुभव: फिल्मों में आने से पहले उन्होंने जीवन की व्यवहारिक शिक्षा हासिल की। उन्होंने एक अमेरिकी ड्रिलिंग कंपनी और सरकारी औषधालय (dispensary) में छोटी-मोटी नौकरियाँ भी कीं।
स्व-शिक्षित (Self-Taught): हालांकि उनके पास कॉलेज की बड़ी डिग्री नहीं थी, लेकिन आगे चलकर वे उर्दू शायरी और कविता के उस्ताद बने। आज वे हिंदी, पंजाबी और उर्दू भाषा पर बेहतरीन पकड़ रखते हैं।
संघर्ष
बिस्किट और पानी का सहारा: मुंबई में शुरुआती दिनों में उनके पास खाने तक के पैसे नहीं होते थे।
उन्होंने एक बार बताया था कि वे ग्लूकोज बिस्किट का पूरा पैकेट खाकर ढेर सारा पानी पी लेते थे ताकि पेट भरा हुआ महसूस हो और वे ऑडिशन के लिए लाइन में खड़े रह सकें।
शादीशुदा होने का बोझ: जब वे हीरो बनने मुंबई आए, तब वे पहले से ही शादीशुदा थे और एक बच्चे के पिता थे।
धर्मेंद्र बायोग्राफी: उस दौर में शादीशुदा अभिनेताओं को ‘रोमैंटिक हीरो’ के रूप में स्वीकार करना इंडस्ट्री के लिए मुश्किल था, इसलिए उन्हें अपनी पहचान बनाने के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ी।
हल्की शुरुआत: 1958 में टैलेंट हंट जीतने के बाद भी उन्हें काम के लिए दर-दर भटकना पड़ा। उनकी पहली फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ (1960) के लिए उन्हें मात्र 51 रुपये मिले थे।
मीलों पैदल चलना: टैक्सी या बस के पैसे बचाने के लिए वे मुंबई की तपती धूप में एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो तक मीलों पैदल चलते थे। कई बार वे रेलवे क्लर्क की नौकरी छोड़ने के फैसले पर पछताते थे, लेकिन सिनेमा का जुनून उन्हें वापस नहीं जाने देता था।
असफलता का दौर: शुरुआत में उनकी कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रहीं। लोग उन्हें सिर्फ एक “खूबसूरत चेहरा” समझते थे, लेकिन ‘बंदिनी’ और ‘अनुपमा’ जैसी फिल्मों में अपनी कला साबित करने के लिए उन्हें सालों तक संघर्ष करना पड़ा।
करियर टाइमलाइन
- शुरुआती दौर: सादगी और रोमांस (1960–1965): शुरुआत में धर्मेंद्र एक मासूम और सौम्य नायक के रूप में उभरे।
डेब्यू (1960): फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से शुरुआत हुई।
कलाकार की पहचान: बिमल रॉय की ‘बंदिनी’ (1963) ने साबित किया कि वे एक गहरे और संजीदा अभिनेता हैं।
सफलता का स्वाद: ‘आई मिलन की बेला’ और ‘हकीकत’ (1964) जैसी फिल्मों ने उन्हें स्टार्स की कतार में खड़ा कर दिया।
- ‘ही-मैन’ का जन्म (1966–1974)
यह वह दौर था जब धर्मेंद्र ने अपनी शर्ट उतारी और बॉलीवुड को उसका पहला असली एक्शन आइकन मिला।
फूल और पत्थर (1966): यह फिल्म ब्लॉकबस्टर रही और उनकी ‘मacho मैन’ वाली इमेज घर-घर में मशहूर हो गई।
सत्यकाम (1969): इसे उनके करियर की सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस माना जाता है, जहाँ उन्होंने एक बेहद ईमानदार व्यक्ति का किरदार निभाया।
हिट मशीन: ‘मेरा गाँव मेरा देश’ और ‘यादों की बारात’ जैसी फिल्मों ने उन्हें उस दौर के सुपरस्टार्स (राजेश खन्ना और अमिताभ) के बीच भी टॉप पर बनाए रखा।
- शिखर का दौर: ‘वीरू’ और कॉमेडी (1975–1979)
70 का दशक धर्मेंद्र के करियर का गोल्डन टाइम था।
शोले (1975): ‘वीरू’ के किरदार ने उन्हें अमर कर दिया। उनकी और अमिताभ (जय-वीरू) की जोड़ी इतिहास बन गई।
चुपके-चुपके (1975): इसी साल उन्होंने अपनी जबरदस्त ‘कॉमिक टाइमिंग’ दिखाई, जिसे आज भी लोग हँसते-हँसते देखते हैं।
धर्म-वीर (1977): इस मेगा हिट ने साबित कर दिया कि वे अकेले दम पर फिल्में चलाने की ताकत रखते हैं।
- एक्शन किंग और मेंटर (1980–1990 के मध्य)
जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, धर्मेंद्र ने अपनी इमेज को एक ‘रक्षक’ और ‘बड़े भाई/पिता’ के रूप में ढाला।
बेटों का लॉन्च: उन्होंने 1983 में सनी देओल को ‘बेताब’ और बाद में बॉबी देओल को ‘बरसात’ से लॉन्च किया।
हुकूमत (1987): इस फिल्म ने कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। उस साल उनकी 7 फिल्में रिलीज हुई थीं, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।
- वापसी और दूसरी पारी (2000–2025)
नई सदी में भी धरम पाजी का जादू कम नहीं हुआ।
अपने (2007): पहली बार सनी और बॉबी के साथ पर्दे पर आए और सबका दिल जीत लिया।
यमला पगला दीवाना (2011): इस सीरीज ने उनके सिग्नेचर ‘देसी’ कॉमेडी अंदाज़ को फिर से जिंदा किया।
शानदार विदाई (2023–2025): ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ में उनके रोमांटिक अंदाज़ और उनकी आखिरी फिल्म ‘इक्कीस’ (2025) ने उनके लंबे सफर को एक गरिमामय अंत दिया।
राजनितिक स्नैपशॉट
राजनीतिक दल और शुरुआत (2004): वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हुए और 2004 के लोकसभा चुनाव में राजस्थान की बीकानेर सीट से चुनाव लड़ा।
बड़ी जीत: अपनी जबरदस्त लोकप्रियता के दम पर उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता को लगभग 60,000 वोटों के भारी अंतर से हराया।
“लापता सांसद” का टैग: सांसद बनने के बाद उनकी संसद में उपस्थिति बहुत कम रही। आलोचकों ने उन्हें “लापता सांसद” कहना शुरू कर दिया क्योंकि वे दिल्ली के बजाय अपने फार्महाउस या फिल्म सेट पर ज्यादा समय बिताते थे।
विवादित बयान: चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने एक बार झुंझलाकर कहा था कि देश की समस्याओं को ठीक करने के लिए उन्हें “आजीवन तानाशाह” बना दिया जाना चाहिए। इस बयान पर काफी विवाद हुआ था।
घुटन और अफसोस: धर्मेंद्र ने बाद में कहा कि उन्हें राजनीति में आकर “घुटन” महसूस होती थी। उन्होंने इसे “पानी से बाहर निकली मछली” जैसा अनुभव बताया और कहा कि वह काम करते थे लेकिन क्रेडिट कोई और ले जाता था।
राजनीति से तौबा (2009): उन्होंने 2009 में दोबारा चुनाव लड़ने से साफ मना कर दिया और सक्रिय राजनीति छोड़ दी। हालाँकि, उनके बाद उनकी पत्नी हेमा मालिनी और बेटे सनी देओल ने बीजेपी की टिकट पर चुनाव लड़ा और जीता।
प्रमुख विवाद
द्विविवाह (Bigamy) और धर्म परिवर्तन: यह उनके जीवन का सबसे बड़ा विवाद था। 1980 में हेमा मालिनी से शादी करने के लिए उन्होंने अपनी पहली पत्नी प्रकाश कौर को तलाक नहीं दिया था। हिंदू कानून इसकी इजाज़त नहीं देता था, इसलिए कहा जाता है कि उन्होंने और हेमा ने इस्लाम कबूल कर ‘दिलावर खान’ और ‘आयशा’ नाम रखकर निकाह किया था।
शराब की लत: धरम पाजी ने खुद माना था कि एक दौर में उन्हें शराब की बुरी लत लग गई थी। इसकी वजह से उनके और सनी देओल के बीच काफी अनबन भी रहती थी। उन्होंने 15 साल पहले शराब पूरी तरह छोड़ दी थी।
अनीता राज के साथ नजदीकियां: 80 के दशक में एक्ट्रेस अनीता राज के साथ उनके अफेयर की खबरों ने काफी तूल पकड़ा था। कहा जाता है कि इससे उनके परिवार में काफी तनाव पैदा हो गया था।
राजनीतिक निष्क्रियता: जैसा कि हमने बात की, बीकानेर के सांसद रहते हुए उनकी अनुपस्थिति ने उन्हें “लापता सांसद” के पोस्टरों तक पहुँचा दिया था।
पुरस्कार एवं सम्मान
| श्रेणी | पुरस्कार | वर्ष | टिप्पणी |
|---|
| सर्वोच्च नागरिक सम्मान | पद्म विभूषण | 2026 | भारत का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान (मरणोपरांत) |
| नागरिक सम्मान | पद्म भूषण | 2012 | भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए |
| करियर सम्मान | फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट | 1997 | जब उन्होंने कहा था, “मैं सिर्फ प्यार का भूखा हूँ” |
| लोकप्रियता | वर्ल्ड्स 10 मोस्ट हैंडसम मेन | 70 के दशक | दुनिया के सबसे खूबसूरत पुरुषों में शुमार |
| राष्ट्रीय सम्मान | राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार | 1991 | फिल्म ‘घायल’ के प्रोड्यूसर के तौर पर |
| अंतरराष्ट्रीय सम्मान | “BAFTA In Memoriam” | 2026 | ब्रिटिश अकादमी ने उन्हें वैश्विक स्तर पर याद किया |
साथियो के साथ संबंध
दिलीप कुमार (आदर्श): दिलीप साहब उन्हें अपना छोटा भाई मानते थे और धर्मेंद्र उन्हें अपना गुरु। दिलीप साहब ने यहाँ तक कहा था कि खूबसूरती का दूसरा नाम धर्मेंद्र है।
अमिताभ बच्चन (जय-वीरू): दोनों के बीच सगे भाइयों जैसा प्यार रहा। धर्मेंद्र ने ही अमिताभ को ‘शोले’ के लिए रिकमेंड किया था। आज भी बिग बी उन्हें सम्मान से ‘धरम जी’ कहते है।
सलमान खान (फैन-फॉलोइंग): सलमान उन्हें अपना सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत मानते हैं। वे कहते हैं कि धर्मेंद्र जैसा “ही-मैन” और “मासूम चेहरा” पूरी दुनिया में दूसरा कोई नहीं।
सह-अभिनेत्रियां: मीना कुमारी से लेकर शर्मिला टैगोर तक, सब उन्हें सबसे शालीन और “जेंटलमैन” हीरो मानती थीं। मीना कुमारी ने ही उन्हें उर्दू और शायरी सिखाई थी।
व्यवहार: वे अपने सेट पर स्पॉट बॉय से लेकर डायरेक्टर तक, सबको एक ही नज़र से देखते थे और अक्सर सबको अपने घर का पंजाबी खाना खिलाते थे।
अंतिम दिन: फार्महाउस की शांति
अपने आखिरी सालों में धरम पाजी मुंबई की भीड़भाड़ से दूर लोनावला स्थित अपने फार्महाउस में ही रहते थे।
प्रकृति से प्रेम: वे अक्सर सोशल मीडिया पर वीडियो डालते थे, जिसमें वे कभी गायों को चारा खिलाते, कभी पेड़ों से आम तोड़ते, तो कभी अपनी उगाई हुई सब्जियां दिखाते। उन्होंने अपनी जड़ों को कभी नहीं छोड़ा।
शायरी का सहारा: उनके अंतिम दिन अकेलेपन में नहीं, बल्कि यादों और शायरी में बीते। वे अक्सर पुरानी बातों को याद कर भावुक हो जाते थे और अपनी भावनाएं कविताओं के जरिए लिखते थे।
स्वास्थ्य समस्या: 2025 के उत्तरार्ध में उन्हें उम्र संबंधी और सांस लेने में तकलीफ (Respiratory issues) के कारण मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
विदाई: जब पूरा देश रोया
24 नवंबर 2025: इस दिन भारत के “ही-मैन” ने 89 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली।
अंतिम यात्रा: उनके निधन की खबर मिलते ही पूरा बॉलीवुड और उनके लाखों फैंस शोक में डूब गए। उनके अंतिम संस्कार में फिल्म जगत के बड़े सितारों से लेकर आम किसान और पंजाब से आए उनके गांव के लोग शामिल हुए। यह उनके व्यक्तित्व का ही जादू था कि वे हर वर्ग के लिए “अपने” थे।
यादगार वन-लाइनर्स (जो आज भी गूँजते हैं)
शोले: “बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना!”
यादों की बारात: “कुत्ते, कमीने! मैं तेरा खून पी जाऊँगा!”
शोले (कॉमेडी): “मौसी, सुसाइड… सुसाइड!”
यमला पगला दीवाना: “ओए, इलाका कुत्तों का होता है… शेर का नहीं!”
विरासत और वसीयत
धर्मेंद्र अपने पीछे न केवल करोड़ों की संपत्ति, बल्कि एक बहुत बड़ा नाम और सम्मान छोड़ गए हैं:
पारिवारिक एकता: उनके जाने के बाद उनका पूरा परिवार (देओल खानदान) और भी एकजुट नजर आया। उनके बेटों—सनी और बॉबी ने हमेशा उनकी विरासत को सम्मान दिया।
मरणोपरांत सम्मान (2026): उनके निधन के ठीक बाद, 2026 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण (मरणोपरांत) देने की घोषणा की। साथ ही, लंदन में BAFTA अवॉर्ड्स में भी उन्हें विशेष श्रद्धांजलि दी गई।
‘इक्कीस’ (आखिरी फिल्म): 2026 की शुरुआत में उनकी अंतिम फिल्म ‘इक्कीस’ रिलीज हुई, जो उनके फैंस के लिए उनका आखिरी उपहार था।
By: Snigdha
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