Sunday, January 11, 2026

सीआईए का नैरेटिव वारफेयर और हमारे ‘बौद्धिक’ जयचंद, भारत के विरुद्ध अदृश्य युद्ध

सीआईए

युद्ध का बदलता स्वरूप और भारत की संप्रभुता पर प्रहार

इतिहास गवाह है कि भारत की पवित्र भूमि पर आक्रमण करने के लिए शत्रुओं ने समय-समय पर अपनी रणनीतियों में बदलाव किया है। कभी यह आक्रमण तलवारों और तोपों के बल पर हुआ, तो कभी औपनिवेशिक व्यापार के माध्यम से। परन्तु इक्कीसवीं सदी में युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। अब शत्रु सीमा पर खड़ा होकर ललकारने के बजाय, हमारे समाज के भीतर ही अदृश्य रूप से घुसपैठ कर चुका है।

अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) द्वारा भारत के विरुद्ध चलाए जा रहे ऑपरेशन्स का इतिहास पुराना है, किन्तु वर्तमान परिदृश्य में इसका स्वरूप अत्यंत घातक और चिंताजनक हो गया है। एक समय था जब सीआईए की गतिविधियां भारत की नौकरशाही, सैन्य प्रतिष्ठानों, खुफिया एजेंसियों और रक्षा उत्पादन इकाइयों जैसे डीआरडीओ और इसरो तक सीमित थीं।

उनका उद्देश्य भारत की सामरिक क्षमता में सेंध लगाना होता था। परन्तु वर्ष 2008 के बाद से, विशेषकर भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के दौर से, सीआईए ने एक नई और अधिक खतरनाक रणभूमि चुनी है, जिसे हम ‘नैरेटिव वारफेयर’ या विमर्श के युद्ध के नाम से जानते हैं। यह युद्ध अब फाइलों और हथियारों से नहीं, बल्कि मानवाधिकार, लोकतंत्र और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे शब्दों को हथियार बनाकर लड़ा जा रहा है।

अमेरिका का दोहरा चरित्र और 2008 का टर्निंग पॉइंट

वर्ष 2008 में जब भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अमेरिका के साथ परमाणु समझौते की ओर बढ़ रहा था, तब अमेरिकी संसद के भीतर एक विशेष लॉबी सक्रिय हो गई थी। अमेरिकी कांग्रेसमैन लॉयड डोजेट (Lloyd Doggett) ने उस समय भारत के वैश्विक उत्थान को रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था।

उनका तर्क था कि भारत के उत्थान को किसी भी रूप में पोषित नहीं किया जाना चाहिए। जब भारत की बाह्य खुफिया एजेंसी ‘रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ (R&AW) ने डोजेट की पृष्ठभूमि खंगाली, तो यह स्पष्ट हुआ कि उनके तार सीआईए से जुड़े हुए थे। वे सीआईए के एक ‘कोवर्ट प्रोपेगेंडा’ का हिस्सा थे, जिसका एकमात्र उद्देश्य अमेरिकी नीति-निर्माताओं को प्रभावित कर भारत की प्रगति में बाधा उत्पन्न करना था। यह घटनाक्रम केवल एक शुरुआत थी, जिसके बाद सीआईए ने भारत के विरुद्ध अपने ऑपरेशन्स को और अधिक संगठित और संरचनात्मक रूप देना शुरू कर दिया।

टूलकिट गैंग का उदय: मानवाधिकारों की आड़ में भारत विरोधी षड्यंत्र

इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल और 2010 की रिपोर्ट

सीआईए की कार्यप्रणाली को समझने के लिए हमें उन संस्थाओं को पहचानना होगा जो मानवाधिकारों के संरक्षण का मुखौटा पहनकर भारत की छवि को धूमिल करने का कार्य करती हैं। ऐसी ही एक संस्था है ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC)। वर्ष 2010 में इस संस्था ने “एडवांसमेंट्स ऑफ ह्यूमन राइट्स, चैलेंजेस एंड ओपोरर्चुनिटीज इन इंडिया” नामक एक रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह था कि भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव हो रहा है और उन पर अत्याचार बढ़ रहे हैं।

यह वही समय था जब भारत में एक विशेष राजनीतिक वातावरण तैयार किया जा रहा था। हमारी खुफिया एजेंसियों के विश्लेषण से यह तथ्य सामने आया है कि IAMC के तार भारत में प्रतिबंधित संगठन ‘स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया’ (SIMI) से जुड़े हुए हैं। सिमी, जिसे गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत प्रतिबंधित किया गया है, उसके विचारों को अमेरिका में बैठकर एक ‘सिविल राइट्स ग्रुप’ के नाम पर प्रचारित करना सीआईए की गहरी साजिश का हिस्सा है। 2010 से 2014 तक यह समूह छोटे स्तर पर सक्रिय रहा, लेकिन 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद इन्होंने अपने हमलों की धार को तेज कर दिया।

चार सूत्रीय एजेंडा और घरेलू ‘स्लीपर सेल्स’ की भूमिका

वर्ष 2017 के बाद से सीआईए और उसके फ्रंट संगठनों ने एक विशेष ‘टूलकिट’ को आक्रामक रूप से लागू करना शुरू किया। इस टूलकिट के चार मुख्य स्तंभ हैं: मानवाधिकार, लोकतंत्र का ह्रास, धार्मिक स्वतंत्रता का हनन और अल्पसंख्यकों का दमन। इनका उद्देश्य भारत में यह नैरेटिव स्थापित करना है कि देश में बहुसंख्यकवाद (Majoritarianism) हावी हो रहा है और संवैधानिक संस्थाएं खतरे में हैं। जैसे ही अमेरिका से इस टूलकिट का संकेत मिलता है, भारत में बैठे उनके वैचारिक एजेंट सक्रिय हो जाते हैं।

हमने देखा है कि कैसे ‘अवार्ड वापसी’ गैंग और तथाकथित बुद्धिजीवियों ने एक सुर में भारत में असहिष्णुता का राग अलापना शुरू कर दिया। यह कोई संयोग नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित अभियान था। इन लोगों ने भारतीय समाचार पत्रों और मीडिया में लेख लिखकर यह माहौल बनाने की कोशिश की कि भारत अब रहने लायक नहीं बचा है। यह वही वर्ग है जिसे हम ‘फिफ्थ कॉलम’ या आस्तीन का सांप कह सकते हैं, जो खाता भारत का है लेकिन गाता विदेशी आकाओं का है।

कानून के शासन पर प्रहार और आर्थिक संप्रभुता

एमनेस्टी इंटरनेशनल और एफसीआरए का उल्लंघन

वर्ष 2018 में भारत की प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं पर शिकंजा कसना शुरू किया। जांच में पाया गया कि एमनेस्टी इंटरनेशनल ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के नियमों का उल्लंघन करते हुए विदेशी धन प्राप्त किया। इन्होंने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड नाम से एक व्यावसायिक इकाई बनाकर विदेशी चंदा लेने का प्रयास किया, जो कि भारतीय कानूनों का सीधा उल्लंघन था।

जब भारत सरकार ने वित्तीय धोखाधड़ी और कानून के उल्लंघन के आरोप में इनके खातों को फ्रीज किया, तो वैश्विक स्तर पर सीआईए और पश्चिमी मीडिया ने इसे ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और ‘मानवाधिकारों’ पर हमले के रूप में प्रचारित किया। वे यह भूल गए कि कानून का शासन किसी भी संप्रभु राष्ट्र की पहली प्राथमिकता होती है। किसी भी विदेशी एनजीओ को भारत के आंतरिक कानूनों से ऊपर नहीं माना जा सकता। यह स्पष्ट रूप से भारत की आर्थिक संप्रभुता को चुनौती देने का प्रयास था, जिसे मानवाधिकारों की आड़ में छिपाने की कोशिश की गई।

सीएए और अनुच्छेद 370: अमेरिकी हस्तक्षेप की पराकाष्ठा

वर्ष 2019 भारत के संवैधानिक इतिहास में एक निर्णायक वर्ष था। जब भारतीय संसद ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पारित किया, तो इसका उद्देश्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देना था, न कि किसी की नागरिकता छीनना। परन्तु, अमेरिका में बैठे जिम मैकगवर्न (Jim McGovern) जैसे सांसदों ने तुरंत यह झूठ फैलाना शुरू कर दिया कि यह कानून भारत के मुसलमानों की नागरिकता छीनने के लिए लाया गया है।

इस झूठे नैरेटिव को आधार बनाकर भारत में शाहीन बाग जैसे प्रदर्शन आयोजित किए गए। इसी प्रकार, जब भारत ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त कर उसे पूर्ण रूप से भारतीय संविधान के दायरे में लाया, तो प्रमिला जयपाल (Pramila Jayapal) जैसी अमेरिकी सांसदों ने अमेरिकी सदन में प्रस्ताव पारित कर भारत को मानवाधिकारों का पाठ पढ़ाने की कोशिश की। यह भारत के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप था। एक संप्रभु राष्ट्र अपनी सुरक्षा और अखंडता के लिए क्या निर्णय लेता है, इस पर टिप्पणी करने का अधिकार किसी विदेशी शक्ति को नहीं है।

दिल्ली दंगे और ‘शाहीन बाग मॉडल’ का सच

शाहीन बाग: मासूमियत की आड़ में अराजकता

वर्ष 2020 के दिल्ली दंगे अनायास नहीं हुए थे, बल्कि वे एक सुनियोजित षड्यंत्र का परिणाम थे। शाहीन बाग का प्रदर्शन, जिसे ‘शांतिपूर्ण’ बताया गया, वास्तव में एक नए प्रकार के युद्ध का मॉडल था। इसमें आगे बच्चों और महिलाओं को ढाल बनाकर बैठाया गया, उनके हाथों में तिरंगा और संविधान की प्रतियां थमाई गईं, ताकि पुलिस और सुरक्षा बल उन पर कार्रवाई न कर सकें। लेकिन इस ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शन की आड़ में हिंदुओं के मोहल्लों को निशाना बनाने और राजधानी को बंधक बनाने की योजना तैयार की गई।

इस दौरान दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल रतन लाल और इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा की नृशंस हत्या कर दी गई। क्या यह मानवाधिकारों की लड़ाई थी? अंकित शर्मा के शरीर पर चाकुओं के सैकड़ों घाव क्या किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी का काम हो सकते थे? परन्तु पश्चिमी मीडिया और सीआईए के नैरेटिव में इन बलिदानों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। वहां केवल यह दिखाया गया कि भारत सरकार एक विशेष समुदाय का दमन कर रही है।

अपराधियों का महिमामंडन और न्यायपालिका पर दबाव

दिल्ली दंगों के बाद जब सुरक्षा एजेंसियों ने उमर खालिद, शरजील इमाम और गुलफिशा फातिमा जैसे षड्यंत्रकारियों को गिरफ्तार किया, तो एक नया खेल शुरू हुआ। इन आरोपियों को ‘छात्र कार्यकर्ता’, ‘स्कॉलर’ और ‘मानवाधिकार रक्षक’ के रूप में पेश किया जाने लगा। शरजील इमाम का वह वीडियो, जिसमें वह भारत के ‘चिकन नेक’ को काटकर पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने की बात कर रहा था, उसे जानबूझकर चर्चा से गायब कर दिया गया। गुलफिशा फातिमा, जिस पर सुरक्षा बलों की आंखों में मिर्च झोंकने और भीड़ को उकसाने के आरोप हैं, उसे एक मासूम कार्यकर्ता बताया गया।

यह प्रयास इसलिए किया जा रहा है ताकि न्यायपालिका पर दबाव बनाया जा सके और इन अपराधियों के प्रति सहानुभूति बटोरी जा सके। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उमर खालिद की जमानत याचिका को कड़े शब्दों में अस्वीकार करना और यह स्पष्ट करना कि उसे अगले एक वर्ष तक राहत नहीं मिलेगी, यह सिद्ध करता है कि भारत की न्यायपालिका तथ्यों पर काम करती है, नैरेटिव पर नहीं। पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने भी यह चिंता व्यक्त की थी कि कुछ वकील बार-बार अदालतों में तारीख मांगते हैं ताकि उनके केस किसी विशेष जज के पास लगें, जो ‘फोरम शॉपिंग’ की गंभीर समस्या को दर्शाता है।

भविष्य की चुनौतियां और भारत का रक्षण

आर्थिक युद्ध और निवेशकों को डराने की साजिश

सीआईए और अमेरिकी ‘डीप स्टेट’ का अंतिम लक्ष्य भारत के आर्थिक उत्थान को रोकना है। वे जानते हैं कि एक स्थिर और शक्तिशाली भारत उनके वैश्विक वर्चस्व के लिए चुनौती बन सकता है। इसलिए वे लगातार भारत को ‘अस्थिर’, ‘असहिष्णु’ और ‘कानूनविहीन’ देश के रूप में चित्रित कर रहे हैं। यूएससीआईआरएफ (USCIRF) जैसी संस्थाएं अपनी पक्षपाती रिपोर्टों के माध्यम से भारत को ‘कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न’ घोषित करने की मांग करती हैं। इसका सीधा असर वैश्विक निवेशकों पर पड़ता है।

जब किसी देश की छवि को बार-बार खराब किया जाता है, तो निवेशक वहां पूंजी लगाने से कतराते हैं। यह एक प्रकार का आर्थिक आतंकवाद है। वे चाहते हैं कि भारत की युवा पीढ़ी समस्याओं के समाधान खोजने के बजाय, केवल समस्याओं का महिमामंडन करती रहे। सोशल मीडिया पर रील बनाने और नकारात्मकता फैलाने की संस्कृति इसी मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा है, ताकि भारत का युवा रचनात्मक न होकर केवल विद्रोही बना रहे।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने ‘शत्रुबोध’ को जागृत करें। हमें यह समझना होगा कि अमेरिका, जो अपनी धरती पर खालिस्तानी आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नू को पनाह देता है और भारत को तोड़ने की उसकी धमकियों पर मौन रहता है, वह भारत का मित्र नहीं हो सकता। पन्नू जैसे तत्व खुलेआम भारतीय राजनयिकों और संसद को निशाना बनाने की बात करते हैं, फिर भी अमेरिकी एजेंसियां उन्हें ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का कवच प्रदान करती हैं। यह दोहरा मापदंड उनकी मंशा को स्पष्ट करता है।

भारत को अब रक्षात्मक मुद्रा छोड़कर आक्रामक कूटनीति अपनानी होगी। हमें अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं खोजना है और किसी विदेशी टूलकिट के बहकावे में नहीं आना है। जब तक हम अपने ही देश में बैठे ‘बौद्धिक जयचंदों’ और विदेशी आकाओं के इस गठजोड़ को नहीं पहचानेंगे, तब तक भारत की संप्रभुता पर यह अदृश्य युद्ध जारी रहेगा। यह समय सजग होने का है, क्योंकि अगला प्रहार किसी सीमा पर नहीं, बल्कि हमारे मस्तिष्क और हमारे समाज के ताने-बाने पर होने वाला है।

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Mudit
Mudit
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं और 9 वर्षों से भारतीय इतिहास, धर्म, संस्कृति, शिक्षा एवं राजनीति पर गंभीर लेखन कर रहे हैं।
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