Thursday, February 5, 2026

बंगाल बोंगो कुंभ: 700 साल बाद बंगाल की धरती पर, फिर होगा त्रिवेणी कुंभ महोत्सव

बंगाल बोंगो कुंभ: पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के बांसबेड़िया इलाके में स्थित त्रिवेणी एक बार फिर इतिहास से निकलकर वर्तमान में लौट रही है।

लगभग 700 वर्षों के लम्बे समय के बाद यह पवित्र भूमि फिर से कुंभ स्नान, साधु-संतों और लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनने जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 11 से 14 फरवरी 2026 के बीच आयोजित होने वाला बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं,

बल्कि भारत की भूली-बिसरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का पुनर्जागरण है।

त्रिवेणी : तीन नदियों का पावन संगम

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, त्रिवेणी वह पवित्र स्थल है जहां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है।

जैसे प्रयागराज का संगम सबसे पवित्र माना जाता है, वैसे ही बंगाल की त्रिवेणी को भी प्राचीन काल में अत्यंत पवित्र स्थान का दर्जा प्राप्त था।

यहां स्नान को आत्मशुद्धि, ज्ञान और आध्यात्मिक जागरण का माध्यम माना जाता था। इसी कारण त्रिवेणी को दक्षिण प्रयाग कहा गया।

सप्तग्राम और त्रिवेणी का ऐतिहासिक रिश्ता

त्रिवेणी का गहरा संबंध पास के ऐतिहासिक नगर सप्तग्राम से रहा है, जो कभी शिक्षा, व्यापार और तीर्थयात्रा का प्रमुख केंद्र था।

वैष्णव विद्वान वृंदावन दास और अन्य प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, सप्तऋषियों (मैत्रेय, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, व्यास, वशिष्ठ और विश्वामित्र) ने इसी क्षेत्र में तपस्या की थी।

माघ संक्रांति के अवसर पर यहां स्नान को अनुकुंभ कहा जाता था। गंगासागर मेले के बाद साधु-संत पैदल यात्रा करते हुए त्रिवेणी पहुंचते थे।

जब आक्रमणों ने परंपरा को रोक दिया

13वीं शताब्दी के अंत में, 1292 ईस्वी में इस्लामी शासक जफर खान गाजी के आक्रमण ने त्रिवेणी की धार्मिक परंपराओं को गहरा आघात पहुंचाया।

मंदिरों को तोड़ा गया, धार्मिक आयोजनों पर रोक लगाई गई और पाल वंश काल के प्राचीन विष्णु मंदिर को नष्ट कर दिया गया।

1288 से 1313 ईस्वी के बीच सप्तग्राम और त्रिवेणी इस्लामी शासन के अधीन आ गए, जिसके बाद कुंभ मेला और सामूहिक स्नान की परंपरा लगभग 700 वर्षों तक बंद हो गई।

क्या कहता है इतिहास?

प्रसिद्ध पुरातत्वविद राखालदास बनर्जी और प्रणब रॉय के शोध बताते हैं कि जफर खान गाजी की दरगाह के निर्माण में टूटे हुए हिंदू, जैन और बौद्ध मंदिरों के अवशेषों का उपयोग किया गया।

आज भी दरगाह के खंभों और संरचनाओं में प्राचीन मूर्तिकला और शिल्प के चिह्न देखे जा सकते हैं।

इतिहासकारों के अनुसार, 1319 ईस्वी में त्रिवेणी में अंतिम बार कुंभ मेला आयोजित हुआ था।

700 साल बाद परंपरा की वापसी

लगभग 703 वर्षों बाद, वर्ष 2022 में इतिहासकार कंचन बनर्जी, कोलकाता के प्रबीर भट्टाचार्य और त्रिवेणी कुंभ मेला समिति के प्रयासों से इस परंपरा को फिर से जीवित किया गया।

संतों के मार्गदर्शन और स्थानीय लोगों के सहयोग से माघ संक्रांति और भैमी एकादशी पर कुंभ स्नान आयोजित हुआ, जिसे बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव नाम दिया गया।

प्रधानमंत्री मोदी ने की सराहना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 फरवरी 2023 को मन की बात के 98वें एपिसोड में बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव का विशेष उल्लेख किया।

उन्होंने इसे भारत की सांस्कृतिक विरासत को बचाने का सराहनीय प्रयास बताया और कहा कि इसमें 8 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

इसके अलावा, फरवरी 2025 में तीसरे संस्करण से पहले प्रधानमंत्री ने आयोजकों को पत्र लिखकर शुभकामनाएं भी दीं।

आलोचनाओं के बीच ऐतिहासिक सच्चाई

कुछ मीडिया मंचों ने इस महोत्सव को राजनीतिक या नई परंपरा बताने की कोशिश की। लेकिन यह सच्चाई है कि आक्रमणों और युद्धों के कारण भारत के अनगिनत ऐतिहासिक दस्तावेज नष्ट हो गए।

केवल लिखित प्रमाण देर से मिलने का अर्थ यह नहीं कि कोई परंपरा कभी थी ही नहीं। त्रिवेणी कुंभ कोई नई कल्पना नहीं, बल्कि भूगोल, शास्त्र, आस्था और सामूहिक स्मृति से जुड़ी जीवंत परंपरा है।

2026 का बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव

11 से 14 फरवरी 2026 तक आयोजित होने वाले इस महोत्सव में 14 से 16 लाख श्रद्धालुओं के आने की संभावना है।

गंगासागर मेले में शामिल होने वाले साधु-संत भी त्रिवेणी पहुंचेंगे। आयोजकों के अनुसार यह अब तक का सबसे भव्य और ऐतिहासिक आयोजन होगा।

तीन दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव में अमृत स्नान, गंगा आरती, रुद्राभिषेक, यज्ञ और धर्मसभा, कीर्तन और काली कीर्तन, गौड़ीय नृत्य, बाउल और चौ नृत्य, बच्चों की कला प्रतियोगिता, साधु-संतों का भंडारा जैसे कई धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे।

यह आयोजन आस्था के साथ-साथ बंगाल की लोक-संस्कृति का भी उत्सव है।

सहयोग और दान की अपील

आयोजक एवं समन्वयक पल्लब मंडल के अनुसार, लाखों श्रद्धालुओं के लिए भंडारा, प्रसाद और व्यवस्थाएं करना एक बड़ी जिम्मेदारी है।

ऐसे में समाज और दानदाताओं का सहयोग अत्यंत आवश्यक है। यह आयोजन सिर्फ एक मेला नहीं, बल्कि बंगाल की खोई हुई आध्यात्मिक पहचान को फिर से स्थापित करने का सामूहिक प्रयास है।

बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव उस ज्वाला की तरह है जो बताती है कि भारतीय सभ्यता को दबाया जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता।

700 वर्षों बाद त्रिवेणी में लौटता कुंभ केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की शानदार वापसी है।

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Madhuri
Madhurihttps://reportbharathindi.com/
पत्रकारिता में 6 वर्षों का अनुभव है। पिछले 3 वर्षों से Report Bharat से जुड़ी हुई हैं। इससे पहले Raftaar Media में कंटेंट राइटर और वॉइस ओवर आर्टिस्ट के रूप में कार्य किया। Daily Hunt के साथ रिपोर्टर रहीं और ETV Bharat में एक वर्ष तक कंटेंट एडिटर के तौर पर काम किया। लाइफस्टाइल, इंटरनेशनल और एंटरटेनमेंट न्यूज पर मजबूत पकड़ है।
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