Thursday, March 5, 2026

बांग्लादेश में सुलगती आग और भारतीय कूटनीति का शुतुरमुर्गी रवैया

बांग्लादेश

बांग्लादेश का संकट और भारत के समक्ष आसन्न अस्तित्वगत चुनौतियां

भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के विमर्श में लंबे समय से ‘टू एंड हाफ फ्रंट वॉर’ की अवधारणा प्रचलित रही है। इसका अर्थ था कि भारत को एक साथ चीन और पाकिस्तान जैसे दो बाह्य शत्रुओं और देश के भीतर पनप रहे आंतरिक विद्रोहियों या अलगाववादियों के आधे मोर्चे से निपटना होगा। किन्तु वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य और हमारे पूर्वी पड़ोसी बांग्लादेश में घटित हो रहे रोंगटे खड़े करने वाले घटनाक्रम ने इस समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है।

अब यह युद्ध ‘टू एंड हाफ’ नहीं, बल्कि ‘थ्री एंड हाफ फ्रंट वॉर’ में तब्दील हो चुका है। बांग्लादेश में जिस तरह से सत्ता परिवर्तन हुआ है और वहां कट्टरपंथी इस्लामी शक्तियों का नग्न तांडव चल रहा है, वह भारत के लिए पाकिस्तान से भी बड़ी और विकराल चुनौती बनकर उभर रहा है।

यह मात्र एक पड़ोसी देश की आंतरिक अशांति का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह उस ‘पोलिटिकल इस्लाम’ की विजय का उद्घोष है जिसकी जड़ें ढाका में उतनी ही गहरी हैं जितनी रावलपिंडी या इस्लामाबाद में। विडंबना यह है कि भारत का नीति-नियामक वर्ग और हमारा तथाकथित बौद्धिक समाज इस खतरे की भयावहता को या तो समझ नहीं पा रहा है या समझकर भी अनजान बने रहने का नाटक कर रहा है।

इतिहास के आईने में ढाका और मुस्लिम लीग की विरासत

हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि जिस ढाका को आज हम एक मित्र पड़ोसी की राजधानी के रूप में देखने के अभ्यस्त हो चुके हैं, वही ढाका 1905 में मुस्लिम लीग की जन्मस्थली रहा है। भारत विभाजन के विषबीज इसी भूमि पर बोए गए थे। यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश नामक एक नए राष्ट्र का निर्माण अवश्य हुआ, लेकिन वैचारिक धरातल पर वहां के समाज का एक बड़ा हिस्सा ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ और कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा से कभी मुक्त नहीं हो पाया।

शेख मुजीबुर रहमान, जिन्हें भारत में ‘बंगबंधु’ कहकर महिमामंडित किया जाता है, उनका भी वैचारिक रूपांतरण ध्यान देने योग्य है। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से पूर्व वे कहा करते थे कि वे पहले मनुष्य हैं, फिर बंगाली हैं और अंत में मुसलमान हैं। किन्तु सत्ता प्राप्त करते ही और पाकिस्तान से अलग होते ही उनका स्वर बदल गया और वे अपनी इस्लामिक पहचान को प्राथमिकता देने लगे।

1974 में जब उन्होंने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को ढाका आमंत्रित किया, तो उनका स्वागत भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति वी.वी. गिरि के स्वागत से कहीं अधिक भव्य और आत्मीयतापूर्ण था। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि राजनीतिक भूगोल बदल सकता है, लेकिन ‘पंथिक निष्ठा’ और ‘मज़हबी भाईचारा’ राष्ट्रवाद से ऊपर रहता है। आज 2024 में हम उसी मानसिकता का एक और वीभत्स रूप देख रहे हैं, जहाँ 1971 की मुक्ति की विरासत को पैरों तले रौंदकर फिर से उसी कट्टरपंथ को गले लगाया जा रहा है।

पश्चिमी शक्तियों का दोमुंहापन और लोकतंत्र के नाम पर अस्थिरता

बांग्लादेश के वर्तमान संकट में पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका की भूमिका का विश्लेषण करना अत्यंत आवश्यक है। अमेरिका और पश्चिमी ताकतें पिछले काफी समय से बांग्लादेश में ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिख रही थीं। इसका मूल कारण लोकतंत्र या मानवाधिकार की चिंता नहीं, बल्कि विशुद्ध भू-राजनीतिक स्वार्थ था।

अमेरिका को यह रास नहीं आ रहा था कि शेख हसीना भारत के साथ अपने सामरिक संबंधों को संतुलित करते हुए चीन के साथ आर्थिक साझेदारी बढ़ा रही थीं। चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका ने वहां अस्थिरता पैदा करने का जो खेल खेला, उसका परिणाम यह हुआ कि सत्ता अब उन तत्वों के हाथ में जाने की कगार पर है जो भारत के घोर विरोधी और जिहादी मानसिकता के पोषक हैं।

यह पश्चिमी शक्तियों की पुरानी फितरत है कि वे ‘लोकतंत्र की बहाली’ के नाम पर दुनिया भर में तख्तापलट करवाते हैं, और अंततः उन देशों को अराजकता या तानाशाही की आग में झोंक देते हैं। अरब स्प्रिंग से लेकर अफगानिस्तान तक, इतिहास गवाह है कि जहां-जहां अमेरिका ने ‘डेमोक्रेसी’ बचाने का प्रयास किया, वहां-वहां कट्टरपंथी इस्लाम और जिहादी तत्वों का उदय हुआ। बांग्लादेश भी अब उसी सूची में शामिल हो गया है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि भारत के कूटनीतिज्ञ इस खेल को समय रहते भांप नहीं पाए या इसे रोकने में अक्षम सिद्ध हुए।

शेख हसीना का भ्रम और तुष्टीकरण की राजनीति

भारत में एक बहुत बड़ा वर्ग शेख हसीना को भारत का स्वाभाविक मित्र मानता रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि उन्होंने भी अपनी सत्ता बचाने के लिए तुष्टीकरण का वही खेल खेला जो भारत में ‘सूडो-सेक्युलर’ दल खेलते आए हैं। 2008 से पहले ढाका में मदरसे इक्का-दुक्का दिखाई देते थे, लेकिन हसीना के शासनकाल में आज वहां हर गली-कूचे में मदरसे खुल गए हैं।

उन्होंने ‘हिफाजत-ए-इस्लाम’ जैसे कट्टरपंथी संगठनों के साथ समझौते किए और जिहादी तत्वों के खिलाफ कार्रवाई में ‘पिक एंड चूज़’ की नीति अपनाई। यह भारत की कूटनीतिक विफलता है कि हमने यह मान लिया कि यदि हम बांग्लादेश को बिजली, पानी और आर्थिक सहायता देंगे, तो वह हमारा कृतज्ञ रहेगा। हम यह भूल गए कि वैचारिक शत्रुता और मज़हबी उन्माद को आर्थिक पैकेजों से नहीं खरीदा जा सकता।

जिस तरह शुतुरमुर्ग रेत में गर्दन गड़ाकर तूफान के गुजर जाने की प्रतीक्षा करता है, ठीक उसी तरह भारतीय कूटनीति भी ‘भाई-भाई’ के भ्रमजाल में फंसकर बांग्लादेश के भीतर पनप रहे भारत-विरोधी ज्वार की अनदेखी करती रही। आज जब वहां भारत के प्रतीकों को नष्ट किया जा रहा है और ‘भारत आउट’ के नारे लग रहे हैं, तो यह हमारी उस ‘सॉफ्ट स्टेट’ वाली नीति का ही परिणाम है।

हिन्दुओं का नरसंहार और जनसांख्यिकीय बदलाव का संकट

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक पीड़ित और प्रताड़ित वर्ग वहां का अल्पसंख्यक हिन्दू समाज है। जिहादी उन्माद के लिए हिन्दू हमेशा से ‘सॉफ्ट टारगेट’ रहे हैं। 1941 की जनगणना के अनुसार पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में हिन्दुओं की आबादी लगभग 28 से 29 प्रतिशत थी, जो आज घटकर 8 प्रतिशत से भी कम रह गई है।

विभाजन के समय लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने एक अत्यंत दूरदर्शी सुझाव दिया था कि पूर्वी पाकिस्तान से जितने हिन्दू निष्कासित किए जा रहे हैं, उनके पुनर्वास के लिए पाकिस्तान से उतनी ही जमीन की मांग की जानी चाहिए। उनका विचार था कि पूर्वी पाकिस्तान का एक-तिहाई भू-भाग लेकर वहां एक ‘हिन्दू होमलैंड’ बनाया जाए। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भी इसका समर्थन किया था।

किन्तु तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ‘सूडो-सेक्युलरिज्म’ और पाकिस्तान प्रेम ने इस विचार को कभी फलीभूत नहीं होने दिया। आज फिर वही स्थिति उत्पन्न हो गई है। बांग्लादेश के चटगांव हिल्स और आसपास के इलाकों में, जहां अभी भी कुछ हिन्दू आबादी शेष है, भारत सरकार को एक सुरक्षित क्षेत्र या ‘बफर स्टेट’ के निर्माण पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं, तो आने वाले समय में हमें एक और बड़े शरणार्थी संकट और अपनी ही सीमाओं पर जनसांख्यिकीय आक्रमण का सामना करना पड़ेगा।

इजरायल से सीख और नागरिकता कानून की विफलता

आज जब हम बांग्लादेशी हिन्दुओं की दुर्दशा देख रहे हैं, तो हमें इजरायल से सीखने की आवश्यकता है। इजरायल का ‘लॉ ऑफ रिटर्न’ दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले यहूदी को यह अधिकार देता है कि वह इजरायल आए और उसे तत्काल नागरिकता मिले। भारत, जो दुनिया भर के सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए एकमात्र स्वाभाविक शरणस्थली है, के पास ऐसा कोई ठोस कानून नहीं है।

सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) के नाम पर जो कानून बना, वह भी नौकरशाही के जाल और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण निष्प्रभावी सिद्ध हो रहा है। आंकड़े बताते हैं कि अब तक मात्र 157 लोगों को ही इसके तहत नागरिकता मिल पाई है, जो कि ऊंट के मुंह में जीरा भी नहीं है।

भारत सरकार को सीएए से आगे बढ़कर एक ऐसा व्यापक कानून बनाना चाहिए जो घोषित करे कि प्रताड़ित हिन्दू यदि भारत की शरण में आता है, तो उसका स्वागत है। सुरक्षा जांच आवश्यक है, लेकिन नौकरशाही की लालफीताशाही में फंसाकर अपने ही लोगों को मरने के लिए छोड़ देना किसी भी सभ्य राष्ट्र को शोभा नहीं देता। नेपाल अब वैसा हिन्दू राष्ट्र नहीं रहा और विश्व में सनातन धर्मियों के लिए भारत के अतिरिक्त कोई और घर नहीं है। यह समझना होगा कि यह लड़ाई केवल सीमाओं की नहीं, बल्कि सभ्यता के अस्तित्व की है।

शत्रुबोध का अभाव और इतिहास की विस्मृति

भारतीय समाज, विशेषकर हिन्दू समाज की सबसे बड़ी समस्या ‘शत्रुबोध’ और ‘इतिहासबोध’ का अभाव है। हम अपने शत्रुओं को पहचानने में भूल करते हैं और इतिहास की कड़वी सच्चाइयों को बहुत जल्दी भुला देते हैं। इसके विपरीत, ‘इस्लामिज्म’ अपनी शिकायतों और इतिहास को सदियों तक याद रखता है। उदाहरण के लिए, 1946 में मुस्लिम लीग ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के लिए 16 अगस्त की तारीख चुनी थी। यह कोई सामान्य तारीख नहीं थी।

इस्लामी इतिहास में 16 अगस्त का विशेष महत्व है क्योंकि इसी दिन ‘जंग-ए-बद्र’ लड़ी गई थी, जो इस्लाम की पहली निर्णायक विजय मानी जाती है। जिहादी ताकतें अपने ऐतिहासिक प्रतीकों का प्रयोग करके लामबंदी करती हैं, जबकि हम ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के झूठे नशे में अपने ही इतिहास से कटते जा रहे हैं।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 800 साल की गुलामी के बाद भी यदि हमारे मन में आक्रांताओं के प्रति रोष नहीं है, तो यह हमारी उदारता नहीं, बल्कि हमारी आत्म-विस्मृति है। आज बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह उसी ‘डायरेक्ट एक्शन’ का आधुनिक संस्करण है। वहां राष्ट्रीय प्रतीकों को नष्ट किया जा रहा है, मुजीब की मूर्तियों को तोड़ा जा रहा है और भारत के साथ 1971 के संबंधों को नकारा जा रहा है।

कूटनीतिक जड़ता तोड़ने की आवश्यकता

समय आ गया है कि भारत अपनी रक्षात्मक और प्रतिक्रियावादी विदेश नीति को त्यागे। हमारे राजनयिकों और नौकरशाहों को अपनी वातानुकूलित कूटनीति से बाहर निकलकर जमीनी हकीकत को समझना होगा। यह कहना कि “हमें नई सरकार के गठन का इंतजार करना चाहिए” या “यह उनका आंतरिक मामला है”, आत्मघाती सिद्ध होगा।

79 सालों से हम पाकिस्तान के साथ यही प्रयोग कर रहे हैं और परिणाम शून्य रहा है। बांग्लादेश भारत के लिए पाकिस्तान से भी अधिक खतरनाक मोर्चा बनता जा रहा है क्योंकि हमारी सीमाएं वहां अधिक छिद्रित हैं और सांस्कृतिक घुसपैठ अधिक आसान है। यदि भारत ने अब भी कठोर कदम नहीं उठाए, और यदि हमने बांग्लादेश के हिन्दुओं के पक्ष में और वहां पनप रहे जिहादी तत्वों के विरोध में स्पष्ट और निर्णायक स्टैंड नहीं लिया, तो पश्चिम बंगाल और असम सहित पूरा पूर्वोत्तर भारत इसकी चपेट में आएगा।

यह आग अब पड़ोसी के घर तक सीमित नहीं है, इसकी लपटें हमारी चौखट तक आ चुकी हैं। हमें ‘थ्री एंड हाफ फ्रंट वॉर’ के इस नए यथार्थ को स्वीकार करना होगा और इसका सामना करने के लिए सामरिक, कूटनीतिक और वैचारिक, तीनों स्तरों पर युद्धस्तर की तैयारी करनी होगी। राष्ट्रहित सर्वोपरि है, और उसकी रक्षा के लिए कठोरतम निर्णय लेना ही एकमात्र विकल्प है।

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Samudra
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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