बांग्लादेश में फिर हिन्दू की हत्या: बांग्लादेश आज एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है, जहां लोकतंत्र के चेहरे पर कट्टरपंथ की काली स्याही पोत दी गई है। यहां हिंदू होना अब धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि “टारगेट” बन चुका है।
ऑटो-रिक्शा चलाने वाला 28 वर्षीय समीर कुमार दास इस सच्चाई का ताज़ा और खौफनाक उदाहरण है, जिसे इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने बेरहमी से पीट-पीटकर और चाकू गोदकर मार डाला।
यह हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक सुरक्षा के दावों की भी हत्या है।
कट्टरपंथी भीड़ ने की क्रूरता की सारी हदें पार
बांग्लादेश में एक और हिन्दू की हत्या: मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, समीर कुमार दास कोई नेता नहीं था, न कोई आंदोलनकारी, वह सिर्फ एक गरीब हिंदू था, जो बैटरी ऑटो चलाकर अपने परिवार को पालता था।
11 जनवरी 2026 की शाम वह घर से निकला और फिर कभी वापस नहीं लौटा। आधी रात को उसका शव खेत में खून से लथपथ मिला।
कट्टरपंथियों ने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए पहले तो हिन्दू युवक को बेहरमी से पीटा और फिर चाकु जैसे धारदार हथियारों से बार-बार हमला कर मौत के घाट उतार दिया।
उसके बाद मज़हबी भीड़ वहां से हिन्दू युवक का ऑटो रिक्शा लेकर भाग गई, लेकिन मोबाइल, कैश और सोने की चेन वही सुरक्षित थीं। यानी यह लूट नहीं थी, यह सिर्फ हिन्दुओं के ख़िलाफ़ नफरत की सुपारी थी।
यह वही नफरत है, जिसे बांग्लादेश के कट्टरपंथी “धर्म” कहकर बेचते हैं और सरकार चुप रहकर मानो उस पर मुहर लगा देती है।
पुलिस प्रशासन पर उठते सवाल
बांग्लादेश में एक और हिन्दू की हत्या: पुलिस हमेशा यही कहती है कि जांच जारी है, जबकि यह सुनियोजित हत्याएं लगती है। सवाल यह उठता है कि पिछले एक महीने में अब तक कई हिंदू मारे जा चुके हैं,
तब भी अगर सरकार को सिर्फ यह लगता है कि यह महज़ हादसे है तो ये कट्टरपंथियों की साज़िश कम और बांग्लादेश सरकार की योजना अधिक नजर आती है।
एफआईआर दर्ज होने से पहले ही परिवार वाले हिम्मत हार जाते है। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के प्रति यही न्याय की हकीकत है कि कागज़ों में जांच दिखाई जाती है और ज़मीन खून से रंगी होती है।
उस्मान हादी की मौत बनी हिंसा का तांडव
जानकारी के अनुसार, दिसंबर 2025 में कट्टरपंथी नेता उस्मान हादी की मौत के बाद जो हुआ, वह किसी सभ्य राष्ट्र में नहीं होना चाहिए।
पूरे देश में हिंसक प्रदर्शन भड़के और बदले की आग में हिंदुओं को झोंक दिया गया जबकि हादी की मौत के आरोपी तो स्वयं मज़हबी है तो फिर हिन्दुओं पर अत्याचार क्यों किया जा रहा है?
बेवज़ह उनके घर जलाए गए, मंदिर तोड़े गए, महिलाओं का बलात्कार हुआ और पुरुषों को सरेआम मार डाला गया। यह गुस्सा नहीं था, यह पूर्व नियोजित सांप्रदायिक आतंक है।
आखिर बांग्लादेश की यूनुस सरकार चुप क्यों?
बांग्लादेश में एक और हिन्दू की हत्या: दीपू चंद्र दास को पीटकर मारना और शव को पेड़ पर लटकाकर जलाना यह कोई दंगा नहीं, यह बर्बर प्रदर्शन था।
अमृत मंडल, बजेन्द्र बिस्वास, खोकन चंद्र दास, राणा प्रताप बैरागी, शरद चक्रवर्ती इन नामों की सूची लंबी होती जा रही है, और सरकार की संवेदनहीनता उससे भी लंबी हो गई है।
हर हत्या के बाद वही रटा-रटाया बयान, वही खोखले आश्वासन दे दिए जाते हैं। आखिर बांग्लादेश की यूनुस सरकार चुप क्यों बैठी है?
महिलाओं पर हमला कर दिखाया कट्टरता का असली चेहरा
बांग्लादेश में एक और हिन्दू की हत्या: कट्टरपंथियों का सबसे कायर चेहरा तब सामने आता है, जब वे महिलाओं को निशाना बनाते हैं।
झेनैदाह जिले में एक हिंदू विधवा के साथ गैंगरेप करना, उसे पेड़ से बांधना, उसके बाल काट देना यह सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि मानसिक आतंकवाद है।
यह संदेश है कि हम तुम्हारी देह, सम्मान और अस्तित्व तीनों पर कब्ज़ा कर सकते हैं और यह सब एक ऐसे देश में हो रहा है, जो खुद को उदार और प्रगतिशील बताने का ढोंग करता है।
लगभग 51 घटनाएं, लेकिन पैटर्न एक
बांग्लादेश में एक और हिन्दू की हत्या: लोगों का कहना है कि दिसंबर 2025 में ही हिंदुओं के खिलाफ 51 हिंसक घटनाएं दर्ज होना किसी संयोग का नतीजा नहीं है।
यह एक साफ पैटर्न है जिसमें हत्याएं, आगजनी, मंदिरों पर हमले, ज़मीन कब्ज़ा, झूठे आरोप, यातनाएं शामिल है।
हिंदू बुद्धिस्ट क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल के आंकड़े साफ बताते हैं कि यह कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं, बल्कि एक खतरनाक साज़िश है, जिसे सत्ता की चुप्पी और ढुलमुल रवैये ने और खतरनाक बना दिया है।
चुनाव आते ही क्यों हो जाता है हिन्दुओं का खून सस्ता
जैसे-जैसे बांग्लादेश में आम चुनाव नजदीक आते हैं, वैसे-वैसे हिंदुओं का खून सस्ता होता जाता है। कट्टरपंथी जानते हैं कि डर फैलाओ, ध्रुवीकरण करो और राजनीतिक फायदा उठाओ।
यहां सवाल यह नहीं कि हिंसा क्यों हो रही है बल्कि सवाल यह है कि इसे रोका क्यों नहीं जा रहा है?
इन घटनाओं की भारत सहित कई देशों ने इन घटनाओं की निंदा की है। भारत ने युनुस सरकार से साफ कहा है कि हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करो।
1.31 करोड़ हिंदू कोई आंकड़ा नहीं, बल्कि जीते-जागते इंसान हैं, लेकिन बांग्लादेश की सत्ता को शायद यह सिर्फ “डैमेज कंट्रोल” की खबर लगती है।
बांग्लादेश कर रहा है सबसे बड़ी भूल
बता दें कि आज अगर बांग्लादेश विश्व के नक्शे पर एक देश के रूप में मौजूद है, तो वह केवल भारत की बदौलत है। भारत उसे जन्म देने की क्षमता रखता है, तो उसकी गलतियों की कीमत चुकवाने की ताकत भी रखता है।
भारत की चुप्पी और सहनशीलता को कमजोरी समझना बांग्लादेश की सबसे बड़ी भूल है। शायद वह यह भूल गया है कि पाकिस्तान आज जिस तरह पानी और अस्तित्व के लिए तरस रहा है, उसकी भी वैसी स्थिति बनने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है, वह इस्लाम नहीं, बल्कि कट्टरपंथ की दरिंदगी है। समीर दास की हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि बांग्लादेश की अंतरात्मा की कठोर परीक्षा है, जिसमें वह बार-बार असफल हो रहा है।
अगर आज इस नफरत की आग नहीं बुझाई गई, तो कल यह पूरे समाज को अपनी चपेट में ले लेगी। इतिहास गवाह है कि जो देश अपने अल्पसंख्यकों की रक्षा नहीं कर पाता, अपने अस्तित्व को मिटाने का वह स्वयं जिम्मेदार बनता है।

