अजित अनंतराव पवार बायोग्राफी: महाराष्ट्र की राजनीति के इतिहास में ऐसे नेता बहुत कम हुए हैं, जिन्होंने अपनी दूरदर्शिता, साहस और राजनीतिक कौशल से न केवल अपने परिवार की राजनीतिक विरासत को संभाला, बल्कि उसे नए आयाम तक पहुँचाया।
अजीत पवार उन्हीं नेताओं में से एक थे। आज, 28 जनवरी 2026 को उनके निधन की खबर ने पूरे महाराष्ट्र को स्तब्ध कर दिया।
उनके राजनीतिक जीवन, संघर्ष और उपलब्धियों की कहानी सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि रिश्तों, निष्ठा और जनता के प्रति समर्पण की भी है।
सहकारी आंदोलन से की राजनीति की शुरुआत
पवार का राजनीतिक सफर महज 23 साल की उम्र में शुरू हुआ। वर्ष 1982 में उन्होंने बारामती के सहकारी चीनी मिल बोर्ड के चुनाव में हिस्सा लिया और जीत हासिल की। यह केवल एक शुरुआत थी।
इसके बाद उन्होंने पुणे जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष के रूप में 1991 में कार्यभार संभाला और करीब 16 वर्षों तक बैंक और सहकारी क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की।
सहकारी क्षेत्र में उनकी यही सक्रियता उन्हें राजनीति में एक मजबूत और भरोसेमंद नेता के रूप में स्थापित करती है। किसानों और स्थानीय उद्योगपतियों के साथ उनका जुड़ाव उनकी लोकप्रियता का आधार रहा।
चाचा की छांव में जमाया राजनीतिक पांव
1991 में अजित पवार ने पहली बार बारामती से लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद में कदम रखा। लेकिन उन्होंने तुरंत ही यह सीट अपने चाचा, एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार के लिए खाली कर दी।
यह कदम उनके परिवार और राजनीति के प्रति उनकी समर्पित सोच का प्रतीक था। उसके बाद अजित पवार स्थानीय विधानसभा चुनावों में खड़े हुए और बारामती को अपना राजनीतिक गढ़ बनाया। यही गढ़ बाद में महाराष्ट्र की राजनीति में उनके प्रभाव की नींव साबित हुआ।
पवार की जिम्मेदारियों की लंबी कड़ी
अजित ने अपने राजनीतिक जीवन में हमेशा सकारात्मक और महत्वपूर्ण विभागों को संभाला। जून 1991 से नवंबर 1992 तक वे कृषि और बिजली राज्य मंत्री रहे।
इसके बाद नवंबर 1992 से फरवरी 1993 तक जल आपूर्ति, बिजली और योजना राज्य मंत्री रहे। 1999 से 2009 तक उन्होंने सिंचाई, बागवानी, ग्रामीण विकास और जल संसाधन जैसे विभागों में कार्य किया।
उनका काम हमेशा जनता-केंद्रित रहा और जल संसाधन परियोजनाओं, खासकर कृष्णा घाटी और कोकण सिंचाई परियोजनाओं में उनकी भूमिका सराहनीय रही।
2010 में मिली नई उड़ान
2010 में अजित पवार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बने। वित्त, योजना और ऊर्जा विभाग की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी।
उनके काम करने का तरीका बेहद अनुशासित था, अलसुबह से ही कार्यालय में रहना और अधिकारियों के साथ कड़ा अनुशासन बनाकर रखना उनकी सख्त लेकिन न्यायपूर्ण छवि का हिस्सा था।
इसके बाद उन्होंने 2012 तक लगातार इस पद पर रहते हुए राज्य की योजनाओं और विकास कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई।
राजनीति बनी चाचा-भतीजे में विवाद का कारण
पवार की राजनीतिक यात्रा में सबसे नाटकीय मोड़ आया 2019 में, जब उन्होंने शरद पवार की पार्टी एनसीपी से अलग होकर बीजेपी और एकनाथ शिंदे शिवसेना के साथ गठबंधन किया।
उन्होंने सुबह-सुबह उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन केवल तीन दिनों में ही इस्तीफा देना पड़ा, क्योंकि शरद पवार की मजबूत पकड़ और उनके समर्थकों ने इस बदलाव को पलट दिया।
हालांकि, उन्होंने इस दौरान व्यक्तिगत रिश्तों में दूरी नहीं आने दी। परिवार और रिश्तेदारों के साथ उनका संबंध हमेशा मजबूत रहा, और यही उन्हें एक अद्वितीय नेता बनाता है।
फिर जुलाई 2023 में एक बार फिर उन्होंने चाचा शरद पवार से पूरी तरह अलग होकर 40 से अधिक विधायकों के साथ नई सरकार में उपमुख्यमंत्री पद संभाला।
इस बार उन्होंने NCP का नाम और चुनाव चिन्ह घड़ी भी कानूनी रूप से अपने नाम कर लिया।
राजनीति के साथ निजी जीवन को भी बनाया बेहतर
अजित पवार अपने पीछे पत्नी सुनेत्रा पवार, बड़े बेटे पार्थ पवार और छोटे बेटे जय पवार को छोड़ गए। पार्थ ने लोकसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन जीत नहीं पाई।
परिवार के साथ उनके रिश्ते हमेशा मजबूत रहे। भले ही राजनीति में उन्होंने अपने चाचा से दूरी बनाई हो, लेकिन बहन सुप्रिया सुले और भतीजे रोहित पवार के साथ उनके संबंध कभी नहीं टूटे। यह उनकी व्यक्तिगत और राजनीतिक समझदारी को दर्शाता है।
राजनीतिक विवादों से नाता
अजित पवार का राजनीतिक जीवन विवादों से भी अछूता नहीं रहा।
2013 में उनके “अगर बांध में पानी नहीं है तो क्या पेशाब करके भरें?” वाले बयान ने खूब सुर्खियां बटोरीं। बाद में उन्होंने इसके लिए माफी भी मांगी।
2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान मतदाताओं को धमकाने के आरोप लगे। भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के आरोप भी समय-समय पर सामने आए।
लवासा लेक सिटी प्रोजेक्ट में मदद और अन्य मामलों को लेकर भी उन्हें विवादों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उनकी लोकप्रियता और राजनीतिक पकड़ पर कोई असर नहीं पड़ा।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
| विवरण | जानकारी |
|---|
| पूरा नाम | अजित अनंतराव पवार |
| जन्म तिथि | 22 जुलाई 1959 |
| जन्म स्थान | अहमदनगर जिला, महाराष्ट्र |
| आयु (जनवरी 2026 तक) | 66 वर्ष |
| पिता | अनंतराव पवार |
| माता | आशाताई पवार |
| पत्नी | सुनेत्रा पवार |
| पुत्र | पार्थ पवार, जय पवार |
| राजनीतिक दल | राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) |
| प्रमुख पद | महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री (कई कार्यकाल) |
| अनुमानित संपत्ति | कई करोड़ रुपये (चुनावी हलफनामों के अनुसार, समय-समय पर बदलती रही) |
उन्होंने बारामती के महाराष्ट्र एजुकेशन सोसायटी हाई स्कूल से अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की।
कॉलेज के दौरान उनके पिता का निधन हो गया, जिसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़कर राजनीति की राह पकड़ ली।
उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा अधूरी हो सकती है, लेकिन सीख और संघर्ष पूरी तरह जीवन को दिशा दे सकते हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे लंबा सफर
अजित पवार महाराष्ट्र के उन नेताओं में शामिल थे जिन्होंने सबसे ज्यादा बार उपमुख्यमंत्री का पद संभाला।
| क्रम संख्या | उपमुख्यमंत्री कार्यकाल की अवधि |
|---|---|
| 1 | 10 नवंबर 2010 – 25 सितंबर 2012 |
| 2 | 25 अक्टूबर 2012 – 26 सितंबर 2014 |
| 3 | 23 नवंबर 2019 – 26 नवंबर 2019 |
| 4 | 30 दिसंबर 2019 – 29 जून 2022 |
| 5 | 2 जुलाई 2023 – 2024 |
| 6 | दिसंबर 2024 – 28 जनवरी 2026 |
इससे स्पष्ट है कि अजित पवार की राजनीतिक विश्वसनीयता और अनुभव महाराष्ट्र में कितने महत्वपूर्ण थे।
उनके इसी अच्छाई और सच्चाई के कारण महराष्ट्र की जनता उन्हें प्यार से ‘दादा’ कहकर पुकारती थी।
पवार की अंतिम यात्रा
28 जनवरी 2026 को बारामती में उनका चार्टर्ड विमान क्रैश हुआ, जिसमें उनके साथ सवार सभी लोगों की मौत हो गई। इस हादसे ने महाराष्ट्र की राजनीति को गहरा झटका दिया।
अजित पवार का जीवन सिर्फ राजनीति की कहानी नहीं है यह समानता, रिश्तों और निष्ठा की कहानी भी है। वे एक ऐसे नेता थे जिनका कोई दुश्मन नहीं था और जिनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा।
उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता, साहस और जनसेवा के प्रति समर्पण उन्हें महाराष्ट्र और भारत के राजनीतिक इतिहास में हमेशा जीवित रखेगा।
अजित पवार का जीवन यह साबित करता है कि राजनीति केवल सत्ता का नाम नहीं, बल्कि सेवा, निष्ठा और रिश्तों की ताकत का नाम है।
सहकारिता से लेकर उपमुख्यमंत्री पद तक का उनका सफर, विवादों और संघर्षों के बावजूद, हर नेता और नागरिक के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
उनके निधन ने महाराष्ट्र को एक महान नेता से वंचित कर दिया, लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत और आदर्श हमेशा जीवित रहेंगे।

