6G Spectrum: जल्द ही दुनिया को 6G मिलने वाला है, जो सिर्फ 5G का अपग्रेडेड वर्शन नहीं बल्कि एक ऐसी एडवांस टेक्नोलॉजी है जो इंसानी जिंदगी को पूरी तरह से बदलने का काम करेगी।
पिछले 30 वर्षों में मोबाइल और सेलुलर कम्युनिकेशन तकनीकों ने हमारी ज़िन्दगी को पूरी तरह से बदल दिया है। हर मोबाइल जनरेशन की तकनीक ने नए फायदे दिए हैं। फिर चाहे वो हमे चलते-फिरते बात करने और एक-दूसरे से जुड़े रहने की आज़ादी देने वाला 2G और 3G हो, जिसकी वजह से हम कभी भी, कहीं भी अपने परिवार और दोस्तों से संपर्क कर सकते थे।
या फिर इंटरनेट और सोशल मीडिया तक आसानी से पहुंच बनाने वाला 4G। जिससे हम वीडियो देख सकते थे, जानकारी खोज सकते थे और सोशल मीडिया पर दोस्तों से जुड़े रह सकते थे। या फिर 5G,जिसने मशीनों, सेंसरों और डेटा के उपयोग में एक नई क्रांति लाई। स्मार्ट शहरों, ऑटोनॉमस गाड़ियों और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) जैसी टेक्नोलॉजी का विकास इस तकनीकी उन्नति का रिजल्ट था।
अब 6G के आने से यह बदलाव और भी तेज़ होने वाला है। 6G असली दुनिया और डिजिटल दुनिया के बीच की सीमा को मिटाएगा। इसके आने से वर्चुअल रियलिटी (VR) और ऑगमेंटेड रियलिटी (AR) का एक्सपीरियंस और बेहतर होगा, जिससे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल काफी ज़्यादा आसान और प्रभावी हो जाएगा।
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6G Spectrum: कब तक आएगा?
6G Spectrum: अक्सर, नई मोबाइल तकनीकें लगभग 10 वर्षों में तैयार हो जाती हैं। ऐसे में 6G की शुरुआत इस दशक के अंत तक देखने को मिल सकती है, और अगले दशक की शुरुआत तक यह पूरी तरह से तैयार हो सकती है। इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन के तहत वर्ल्ड रेडियोकम्युनिकेशन कॉन्फ्रेंस (WRC) के माध्यम से 6G के लिए फ्रीक्वेंसी बैंड और नियम तय किए जाएंगे। इसके साथ ही 3rd जनरेशन पार्टनरशिप प्रोजेक्ट को भी इसके मानक स्थापित करने होंगे।
क्या 6G के लिए अलग स्पेक्ट्रम की जरूरत होगी?
6G Spectrum: हर नई मोबाइल जनरेशन को अपना अलग स्पेक्ट्रम चाहिए होता है। उदाहरण के लिए, 3G के लिए 2GHz, 4G के लिए 2.6GHz और 5G के लिए 3.5GHz बैंड्स का उपयोग किया गया। इसी तरह, 6G Spectrum के लिए भी नई स्पेक्ट्रम जरूरतें होंगी। WRC-23 में इन बैंड्स के बारे में निर्णय लिया जाएगा, ताकि 2030 तक मोबाइल ट्रैफिक को समग्र रूप से सपोर्ट किया जा सके।
हर साल मोबाइल ट्रैफिक में वृद्धि हो रही है, और यह बढ़ने का सिलसिला इस दशक में भी जारी रहेगा। स्टडीज बताती हैं कि 2022 से 2027 तक मोबाइल ट्रैफिक तीन गुना बढ़ने की संभावना है। ऐसे में, इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए और अधिक स्पेक्ट्रम की जरूरत पड़ेगी, ताकि यह फाइनेंसियल और एनवायर्नमेंटल तरीके से और टिकाऊ बन सके।
कौन से बैंड्स इस्तेमाल होंगे?
6G Spectrum: भारत सरकार ने लोकसभा में लिखित उत्तर में बताया है कि 6G के लिए विभिन्न फ्रीक्वेंसी बैंड्स पर काम चल रहा है। ITU, 4400-4800 MHz, 7125-8400 MHz और 14.8-15.35 GHz बैंड्स पर रिसर्च कर रहा है और इन बैंड्स का उपयोग 6G के लिए इंटरनेशनल मोबाइल टेलीकम्युनिकेशन्स (IMT) के तहत किया जाएगा।
भारत में 2G से 6G तक का मोबाइल स्पेक्ट्रम
6G Spectrum: भारत में मोबाइल सेवाओं के लिए कई फ्रीक्वेंसी बैंड्स पहले ही तय किए जा चुके हैं, जैसे कि 600 MHz, 700 MHz, 800 MHz, 900 MHz, 1800 MHz, 2100 MHz, 2300 MHz, 2500 MHz, 3300 MHz और 26 GHz बैंड्स। इन बैंड्स का उपयोग टेलीकॉम कंपनियां अपने डिवाइस की उपलब्धता के अनुसार करती हैं और 2G से लेकर 6G तक की किसी भी तकनीक को लागू कर सकती हैं।
भारत में 6G Spectrum को शुरू करने के लिए मौजूदा बैंड्स का उपयोग किया जा सकता है, बशर्ते कि डिवाइस और तकनीकी इकोसिस्टम इसके लिए तैयार हों।
6G Spectrum: 6G के लिए स्पेक्ट्रम की आवश्यकता
6G Spectrum: 6G के कई उपयोग मामलों में भारी डेटा ट्रांसफर होगा, जिसके लिए अधिक स्पेक्ट्रम की आवश्यकता पड़ेगी। एक रिसर्च के अनुसार, हर नेटवर्क को कम से कम 1 GHz स्पेक्ट्रम चाहिए होगा। इसके अतिरिक्त, 7-15 GHz रेंज में 500-750 MHz का अतिरिक्त स्पेक्ट्रम भी चाहिए होगा। हालांकि, 6G को शुरू करने के लिए मौजूदा बैंड्स का ही उपयोग हो सकता है, लेकिन पुराने बैंड्स पर कई जनरेशन के साथ काम करना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
भारत में 5G का विकास
6G Spectrum: भारत में 5G की सेवा अब लगभग पूरे देश में उपलब्ध है। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 5G शुरू हो गया है, और 28 फरवरी 2025 तक 4.69 लाख 5G बेस ट्रांसीवर स्टेशन स्थापित किए गए हैं। सरकार ने 5G सेवा के लिए स्पेक्ट्रम की नीलामी की और इसके लिए आवश्यक वित्तीय सुधार किए।
सारांश में, 6G Spectrum का आगमन मोबाइल कम्युनिकेशन के नए युग की शुरुआत करेगा, और इसके साथ दुनिया भर में नेटवर्क क्षमता और तकनीकी विकास में नई ऊंचाइयां देखने को मिलेंगी।