इन 7 चुनाव आयुक्तों पर मेहरबान थी कांग्रेस: भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा आधार है, चुनाव आयोग की निष्पक्षता।
लेकिन बीते दशकों में कई बार विपक्षी दलों और राजनीतिक विशेषज्ञों ने यह सवाल उठाया है कि क्या कांग्रेस के लंबे शासनकाल में चुनाव आयोग पर किसी प्रकार का प्रभाव था?
क्या चुनाव आयुक्तों को “वफादारी के इनाम” दिए गए? कांग्रेस काल में नियुक्त हुए कुछ प्रमुख मुख्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों और बाद में मिले पदों-पुरस्कारों का विवरण इसी बहस को दोबारा जीवित कर देता है।
के. सुंदरम: पद्म विभूषण का इनाम?
इन 7 चुनाव आयुक्तों पर मेहरबान थी कांग्रेस: कांग्रेस शासन के शुरुआती दौर में महाठन बंधन और के. सुंदरम जैसे चुनाव आयुक्तों को उनके कार्यकाल के बाद देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्म विभूषण, प्रदान किया गया।
के. सुंदरम (1958–1967) को चुनाव आयोग छोड़ने के बाद यह सम्मान मिला।
इससे राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठा कि क्या यह सम्मान उनकी निष्ठा या सरकार के प्रति उनकी “सुविधाजनक भूमिका” का परिणाम था?
नागेंद्र सिंह: अल्प कार्यकाल, लेकिन बड़ा पुरस्कार
इन 7 चुनाव आयुक्तों पर मेहरबान थी कांग्रेस: नागेंद्र सिंह (1972–1973) का कार्यकाल बेहद छोटा रहा लेकिन उन्हें भी पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
कांग्रेस विरोधी तबकों ने इसे “सरकारी मेहरबानी” बताया और दावा किया कि पार्टी अपने पसंदीदा अधिकारियों को बड़े पुरस्कार देकर उन्हें अपने प्रति अनुकूल बनाए रखती थी।
आर.के. त्रिवेदी और वी.एस. रामादेवी: चुनाव आयोग से राज्यपाल तक
कांग्रेस शासन में यह भी परंपरा देखी गई कि चुनाव आयोग के शीर्ष पदों से निकलने के बाद सीधे राज्यपाल जैसे राजनीतिक पद दिए गए।
आर.के. त्रिवेदी (1982–1985)—कार्यकाल के तुरंत बाद गवर्नर नियुक्त हुए।
वी.एस. रामादेवी (1990)—मुख्य चुनाव आयुक्त बनने वाली पहली महिला, बाद में गवर्नर बनाई गईं।
यह दर्शाता है कि चुनाव आयुक्तों को संवैधानिक कुर्सी से सीधे सत्ता से जुड़े पदों तक लाया जा रहा था।
टी.एन. शेषन: कांग्रेस से चुनाव लड़ने तक का सफर
इन 7 चुनाव आयुक्तों पर मेहरबान थी कांग्रेस: चुनाव सुधारों के लिए प्रसिद्ध टी.एन. शेषन (1990–1996) को कांग्रेस ने इतना पसंद किया कि 1996 में उन्होंने कांग्रेस से चुनाव लड़ लिया।
यह सवाल उठता रहा कि क्या चुनाव आयोग का शीर्ष पद उन्हें राजनीति की मुख्यधारा में लाने का रास्ता था?
एम.एस. गिल: मंत्री पद तक पहुंचे
इन 7 चुनाव आयुक्तों पर मेहरबान थी कांग्रेस: एम.एस. गिल (1996–2001) को कांग्रेस सरकार ने बाद में केंद्रीय मंत्री (2009–2011) बनाया।
एक मुख्य चुनाव आयुक्त का सीधा राजनीति में जाना हमेशा से विवाद का विषय रहा है और इससे आयोग की निष्पक्षता पर गहरा सवाल खड़ा होता है।
एन गोपालास्वामी को भी पद्म विभूषण
एन गोपालास्वामी 2006 से 2009 तक UPA सरकार के समय चुनाव आयुक्त रहे, इन्हें भी कांग्रेस की कृपा से पद्म विभूषण मिला।
क्या यह महज़ संयोग था या “मेहरबानी” का खेल?
इन 7 चुनाव आयुक्तों पर मेहरबान थी कांग्रेस: उपरोक्त सात चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों और उन्हें बाद में मिले सम्मान/पदों को देखने के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या
चुनाव आयोग कांग्रेस शासन में पूरी तरह स्वतंत्र था?
या फिर यह वाकई “सरकारी वफादारी का इनाम” था?

