Wednesday, January 28, 2026

वसंत पंचमी: गोविंद देव जी का पाटोत्सव, जहाँ मूर्ति नहीं, स्वयं श्रीकृष्ण विराजते हैं

गोविंद देव जी वो नाम जिसे सुनते ही मन में भगवान श्रीकृष्ण का ऐसा मनमोहक, करुणामय और सजीव स्वरूप उभर आता है, जो केवल देखा नहीं जाता, बल्कि महसूस किया जाता है।

ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के परपोते वज्रनाभ अपने परदादा को साकार रूप में देखना चाहते थे, क्योकि उन्होंने अपनी दादी से श्रीकृष्ण के स्वरूप का बार-बार वर्णन सुना और उन्हीं स्मृतियों के आधार पर इस दिव्य विग्रह का निर्माण करवाया।

जब प्रतिमा बनकर तैयार हुई और दादी ने उसे देखा, तो उनकी आँखों से आँसू बह निकले — मानो स्वयं कृष्ण उनके सामने खड़े हों। यही वह विग्रह है, जिसे बाद में वृंदावन में प्रतिष्ठित किया गया।

औरंगज़ेब का काल और एक रहस्यमयी यात्रा

17वीं शताब्दी में जब औरंगज़ेब की धार्मिक नीतियों के चलते अनेक हिंदू मंदिरों को तोड़ा जाने लगा, तब वृंदावन के पुजारियों को गोविंद देव जी की दिव्य प्रतिमा की सुरक्षा की चिंता सताने लगी।

उन्होंने एक साहसिक और गुप्त निर्णय लेते हुए यह तय किया की प्रतिमा को सुरक्षित स्थान पर ले जाया जाएगा। रात के अंधेरे में, पूरी सावधानी और सुरक्षा के साथ, गोविंद देव जी को एक बैलगाड़ी में बैठाकर मथुरा से निकाला गया।

यह कोई साधारण यात्रा नहीं थी। लोककथाओं में कहा जाता है कि मानो कोई अदृश्य शक्ति उस गाड़ी के साथ-साथ चल रही हो। जहाँ मार्ग सुरक्षित होता, बैलगाड़ी तेज़ चलती और जहाँ संकट होता, स्वयं धीमी पड़ जाती। कई बार तो बैल अपने-आप दिशा बदल लेते, जैसे कोई उन्हें मार्ग दिखा रहा हो।

आमेर की धरती और ईश्वर का संकेत

जब यह दिव्य प्रतिमा पहली बार आमेर लाई गई, तो उसे कनक घाटी में रखा गया। लेकिन जैसे ही बैलगाड़ी आमेर की सीमा में पहुँची, वह अचानक रुक गई। चाहे जितना ज़ोर लगाया गया, गाड़ी आगे बढ़ने को तैयार नहीं हुई।

पुजारियों और सैनिकों को यह किसी संकेत जैसा लगा। यह समाचार आमेर के महाराजा जयसिंह द्वितीय तक पहुँचा। वे स्वयं वहाँ आए, प्रतिमा के सामने नतमस्तक हुए। उसी क्षण बैलगाड़ी एक-दो इंच आगे सरकी और फिर स्थिर हो गई।

लोगों का विश्वास है कि भगवान स्वयं यह संकेत दे रहे थे कि वे यहीं निवास करना चाहते हैं। जयसिंह द्वितीय समझ गए कि यह कोई साधारण मूर्ति नहीं, बल्कि उनके राज्य की आत्मा बनने वाली शक्ति है।

इसके जैसा मंदिर कोई और नहीं

महाराजा जयसिंह द्वितीय ने निश्चय किया कि गोविंद देव जी के लिए ऐसा मंदिर बनेगा, जो अद्वितीय होगा। जयपुर के हृदय में, राजसी वैभव और आध्यात्मिक गरिमा से युक्त एक भव्य मंदिर का निर्माण हुआ।

मंदिर को जानबूझकर चंद्र महल (सिटी पैलेस) की सीध में बनाया गया, ताकि महाराजा अपने महल की खिड़कियों से प्रतिदिन गोविंद देव जी के दिव्य दर्शन कर सकें।

राजस्थानी वास्तुकला में निर्मित इस मंदिर का पूजा-हॉल लगभग 119 फीट लंबा है और आश्चर्य की बात यह है कि इसमें एक भी खंभा नहीं है। इसी अद्भुत संरचना के कारण इस मंदिर का नाम गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है।

जहाँ प्रतिमा जीवंत मानी जाती है

मंदिर निर्माण के बाद एक और चमत्कारिक मान्यता प्रचलित हुई — यहाँ की प्रतिमा को जीवंत माना जाता है। जब कोई भक्त मंदिर में प्रवेश करता है और प्रतिमा की आँखों से उसकी दृष्टि मिलती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं कृष्ण उसे देख रहे हों, उसके मन का बोझ समझ रहे हों।

यह अनुभूति शब्दों से परे है — जैसे भगवान बिना बोले ही भक्त से संवाद कर रहे हों।

सात झांकियाँ और बदलते भाव

गोविंद देव जी के मंदिर में प्रतिदिन सात बार झांकी होती है — सुबह के जागरण से लेकर रात्रि विश्राम तक। भक्तों का कहना है कि इन झांकियों में जो भाव दिखाई देता है, वह किसी पत्थर की मूर्ति का नहीं, बल्कि जीवित बालक या युवक कृष्ण का आभास देता है।

कभी वे बाल रूप में प्रतीत होते हैं, कभी युवा, कभी भोले, कभी शरारती और कभी अत्यंत शांत — मानो हर भक्त से उसके भाव के अनुसार बात कर रहे हों।

मंगला आरती और भक्ति की ऊर्जा

जयपुर और आसपास के क्षेत्रों में यह दृढ़ विश्वास है कि गोविंद देव जी से की गई प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती। यही कारण है कि प्रतिदिन सुबह चार बजे होने वाली मंगला आरती में हज़ारों श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं।

शंख की पहली ध्वनि जैसे ही गूंजती है, पूरा वातावरण पवित्रता से भर उठता है। भक्त कहते हैं कि उस समय की ऊर्जा पूरे दिन मन को शांत और स्थिर बनाए रखती है।

“मैं यहीं रहूँगा” — एक अलौकिक संदेश

एक पुरानी कथा यह भी प्रचलित है कि एक बार प्रतिमा को जयपुर से बाहर किसी धार्मिक यात्रा पर ले जाने का प्रयास किया गया। लेकिन उसी रात मंदिर में विचित्र घटनाएँ होने लगीं।

घोड़े उछलने लगे, दीये अपने-आप बुझ गए और मानो किसी अदृश्य स्वर ने कहा — “मैं यहीं रहूँगा।” तभी से यह मान्यता और भी गहरी हो गई कि गोविंद देव जी जयपुर की आत्मा हैं और वे कभी इस नगरी को छोड़कर नहीं जाएंगे।

वसंत पंचमी और गोविंद देव जी का पाटोत्सव

गोविंद देव जी के मंदिर में वसंत पंचमी का विशेष महत्व है। इसी पावन दिन यहाँ भव्य पाटोत्सव मनाया जाता है। मंदिर को फूलों, रंगों और वसंत के उल्लास से सजाया जाता है।

मान्यता है कि इस दिन भगवान विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं। वसंत पंचमी का यह उत्सव न केवल धार्मिक है, बल्कि प्रेम, आनंद और नवजीवन का प्रतीक भी है।

इतिहास नहीं, सजीव आस्था

समय बदला, शासक बदले, लेकिन गोविंद देव जी की महिमा कभी नहीं बदली। आज भी जयपुर में बड़े गर्व से कहा जाता है — “हमारे शहर में भगवान स्वयं रहते हैं।”

जब कोई भक्त मंदिर के विशाल प्रांगण में खड़ा होकर प्रतिमा के दर्शन करता है, तो उसे एहसास होता है कि यह केवल इतिहास नहीं, बल्कि जीवंत आस्था है। यहाँ की भक्ति, यहाँ की ऊर्जा और यहाँ का वातावरण मिलकर ऐसी अनुभूति कराते हैं, जिसे शब्दों में पूरी तरह बाँध पाना संभव नहीं।

गोविंद देव जी का मंदिर केवल जयपुर की शान नहीं है, यह प्रेम, भक्ति और उस दिव्य शक्ति का प्रतीक है, जो अपने भक्तों को कभी अकेला नहीं छोड़ती।

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Karnika Pandey
Karnika Pandeyhttps://reportbharathindi.com/
“This is Karnika Pandey, a Senior Journalist with over 3 years of experience in the media industry. She covers politics, lifestyle, entertainment, and compelling life stories with clarity and depth. Known for sharp analysis and impactful storytelling, she brings credibility, balance, and a strong editorial voice to every piece she writes.”
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