वैली ऑफ किंग्स: मिस्र की प्रसिद्ध “वैली ऑफ किंग्स” यानी राजाओं की घाटी में पुरातत्वविदों को लगभग 2000 साल पुराने 30 शिलालेख मिले हैं,
जिनसे भारत और मिस्र के बीच प्राचीन संपर्क और व्यापार के ठोस प्रमाण सामने आए हैं।
इन शिलालेखों में तमिली (प्राचीन तमिल-ब्राह्मी), संस्कृत और प्राकृत भाषाओं के शब्द दर्ज हैं।
इससे यह संकेत मिलता है कि उस समय भारतीय उपमहाद्वीप के लोग समुद्री मार्ग से मिस्र तक यात्रा करते थे और व्यापारिक गतिविधियों में सक्रिय थे।
छह कब्रों में मिले शिलालेख
रिपोर्ट्स के अनुसार ये शिलालेख छह अलग-अलग रॉक-कट कब्रों में पाए गए। इनमें से 20 तमिली भाषा में हैं, जबकि बाकी 10 संस्कृत और प्राकृत में हैं।
इसका मतलब है कि उस दौर में केवल दक्षिण भारत ही नहीं बल्कि उत्तर-पश्चिम और पश्चिम भारत के लोग भी मिस्र जाते थे।
यह क्षेत्र प्राचीन शहर थेब्स के पास स्थित है, जहाँ पहली से तीसरी सदी के बीच मसालों और अन्य वस्तुओं का बड़ा व्यापार होता था।
सम्मेलन में सार्वजनिक हुई जानकारी
इस महत्वपूर्ण खोज की जानकारी स्विट्जरलैंड की लॉजेन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर इंगो स्ट्राउच और फ्रांस के EFEO संस्थान की प्रोफेसर शार्लोट श्मिड ने 11 फरवरी 2026 को तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा आयोजित सम्मेलन में दी।
इस कार्यक्रम में दुनिया भर के शोधकर्ता और विशेषज्ञ शामिल हुए थे, जहाँ पहली बार इन शिलालेखों को लेकर विस्तार से जानकारी साझा की गई।
‘सिकाई कोर्रान’ नाम ने खींचा ध्यान
शोधकर्ताओं को शिलालेखों में एक नाम बार-बार मिला “सिकाई कोर्रान”। यह नाम पांच कब्रों में कुल आठ बार अंकित मिला।
माना जा रहा है कि वह तमिलगम क्षेत्र का व्यापारी था, जो जहाज के जरिए मिस्र पहुँचा था।
इतिहासकारों के अनुसार “कोर्रान” नाम प्राचीन देवी “कोर्रवाई” से जुड़ा हो सकता है, जिनका उल्लेख तमिल महाकाव्य “शिलप्पदिकारम” में मिलता है।
शाही दूत का भी उल्लेख
एक अन्य शिलालेख में संस्कृत भाषा में एक व्यक्ति का जिक्र है, जिसे “क्षहरात राजा का दूत” बताया गया है।
इससे संकेत मिलता है कि उस समय भारत से केवल व्यापारी ही नहीं बल्कि शाही प्रतिनिधि भी विदेश यात्राएँ करते थे। यह खोज प्राचीन काल के राजनयिक और व्यापारिक संबंधों की झलक भी देती है।
मिस्र में तमिली शिलालेख मिले
प्रोफेसर इंगो स्ट्राउच ने बताया कि मिस्र में तमिली शिलालेख मिलना उनके लिए आश्चर्यजनक था, क्योंकि इन कब्रों को हर साल लाखों लोग देखते हैं, फिर भी पहले किसी ने इन लेखों पर ध्यान नहीं दिया।
कब्र नंबर 14 की करीब छह मीटर ऊँची दीवार पर “सिकाई कोर्रान” का नाम अकेले लिखा मिला। उन्होंने 2024 में पहला शिलालेख पहचाना और बाद में प्रोफेसर श्मिड के साथ मिलकर कुल 30 शिलालेख खोज निकाले।
भारत-रोम व्यापार के नए प्रमाण
विशेषज्ञों का मानना है कि उस दौर के व्यापारी कई भाषाएँ जानते थे और ग्रीक भी पढ़ सकते थे, क्योंकि व्यापारिक समझौते अक्सर ग्रीक में लिखे जाते थे।
तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग के सलाहकार प्रोफेसर के. राजन के अनुसार भारत का समुद्री व्यापार सिंधु घाटी सभ्यता से शुरू हुआ और बाद में गुजरात और तमिलगम के बंदरगाहों से तेज़ी से बढ़ा।
उस समय भारत से पश्चिमी देशों को बड़ी मात्रा में सामान भेजा जाता था, खासकर काली मिर्च जैसी वस्तुएँ रोमन लोगों में बहुत लोकप्रिय थीं।
यह खोज भारत और प्राचीन रोमन-मिस्री दुनिया के बीच मजबूत व्यापारिक रिश्तों का अहम प्रमाण मानी जा रही है।
साथ ही यह तमिल-ब्राह्मी लिपि, समुद्री व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर नए शोध के रास्ते भी खोलती है, जिससे इतिहास के कई अनसुलझे पहलुओं पर नई रोशनी पड़ सकती है।

