Thursday, January 29, 2026

तुगलक लेन का नाम बदलकर सांसदों ने किया स्वामी विवेकानंद मार्ग, जानें कौन था सनकी शासक तुगलक

दिल्ली की तुगलक लेन के नाम को लेकर विवाद नया नहीं है। कई राष्ट्रवादी संगठन विदेशी आक्रमणकारियों के नामों पर रखी गई जगहों के नाम बदलने की माँग करते रहे हैं। ऐसे में दिल्ली की तुगलक लेन का नाम कुछ सांसदों ने अपने ही स्तर पर ‘स्वामी विवेकानंद मार्ग’ अपने घरों पर लगी नेम प्लेट्स पर लिख दिया है।

तुगलक लेन का नाम बदलकर किया स्वामी विवेकानंद मार्ग

यूपी के पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने गुरुवार को अपने नए घर में गृहप्रवेश किया और घर की नेमप्लेट में एड्रेस में ‘तुगलक लेन’ की जगह ‘स्वामी विवेकानंद मार्ग’ लिख दिया, हालांकि ब्रैकेट में छोटे अक्षरों में तुगलक लेन भी लिखा है। इसके साथ उन्होंने एक्स पर अपनी फोटो भी शेयर की।

नाम बदलने के मामले पर दिनेश शर्मा ने कहा कि – “आक्रांताओं के नाम पर सड़कों के नाम रखे गए। तुगलक लेन नेम प्लेट से हटाया नहीं। नेम प्लेट पर ही स्वामी विवेकानंद मार्ग लिखाया। नाम बदलना सरकार और नगर निकाय का काम। गूगल सर्च में भी तुगलक लेन नहीं आता। औरंगजेबी, तुगलकी सोच को कोई पसंद नहीं करता”

Dinesh Sharma

केवल राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा ने ही नहीं बल्कि केन्द्रीय मंत्री कृष्णपाल गुर्जर ने भी अपने आवास की नेमप्लेट पर ‘तुगलक लेन’ को ब्रैकेट में डालकर ‘स्वामी विवेकानंद मार्ग’ बड़े अक्षरों में। आसपास के अन्य आवासों ने भी ऐसा ही किया। धीरे धीरे ‘तुगलक लेन’ को हटाने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।

Krishnapal Gurjar tuglaq lane

ऐसे नामों को बदलने का यही सही समय

उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भाजपा राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा और केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गुर्जर द्वारा अपने-अपने तुगलक लेन आवास की नेमप्लेट बदलकर स्वामी विवेकानंद मार्ग करने पर कहा कि, “दिनेश शर्मा हमारे वरिष्ठ नेता हैं, उन्होंने अथवा किसी और नेता ने तुगलक रोड का नाम बदलकर स्वामी विवेकानंद जी का नाम लिखने का काम किया है तो मुझे लगता है कि ऐसे नामों को बदलने का दिल्ली में भी सही समय आ गया है। दिल्ली में डबल इंजन की सरकार है, तुष्टीकरण वाली सरकार नहीं…”

उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने भी इस मुद्दे पर बयान देते हुए कहा कि, “मोहम्मद बिन तुगलक के बारे में लोग अच्छी तरह जानते हैं कि, वो एक सनकी राजा थे, ऐसे सनकी व्यक्ति के नाम से मार्ग का नाम बदलकर स्वामी विवेकानंद के नाम पर रखकर उन्होंने बहुत अच्छा नाम सोचा है। स्वामी विवेकानंद ने भारत माता के ध्वज को दुनिया में पहुंचाया…”

मुहम्मद बिन तुगलक कौन था?

मुहम्मद बिन तुगलक का नाम इतिहास में उसकी क्रूरता और सनकीपन के लिए मशहूर है। इसलिए आज भी ‘तुगलकी फरमान’ जारी करना कहावत बनी हुई है। उसने अपनी मनमानी में कन्नौज में व्यापक नरसंहार का आदेश दिया था, जो कि इतिहास के पन्नों में एक भयानक अध्याय के रूप में अंकित है। मुहम्मद गोरी और अलाउद्दीन खिलजी जैसे क्रूर शासकों के साथ मुहम्मद बिन तुगलक ने भी अत्याचार और बर्बरता की नई पराकाष्ठा को छुआ।

उसने अपनी सनक में कन्नौज को पूर्ण रूप से नष्ट कर दिया और फिर अपनी राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद (देवगिरि) स्थानांतरित करने का दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय लिया। तुगलक ने केवल अफसरों और राजधानी ही नहीं, बल्कि समस्त जनता को भी तलवार की नोक पर जबरदस्ती स्थानांतरित करने की कोशिश की, जिसके कारण असंख्य निर्दोष लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।

आप कल्पना करें कि किसी शासक के पास असीमित शक्तियां हों, वह सत्ता में हो, कोई उसे चुनौती न दे पा रहा हो, और वो मनमाने फैसलों से अपने देश को संकट में डालकर अपनी ही जनता की जान का दुश्मन बन जाए, तो उसकी तुलना मुहम्मद बिन तुगलक से कर सकते हैं। यूक्रेन में जेलेंस्की अपनी जिद के कारण कुछ ऐसा ही तुगलकी रवैया अपनाकर अपने ही देश और जनता की बाजी लगाए हुए हैं। ऐसे सनकी शासकों का दंश देश को लंबे समय तक भुगतना पड़ता है। अच्छा यही है कि समय रहते देश से उनका नामोनिशान मिटा दिया जाए।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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