Friday, April 4, 2025

सुधांशु त्रिवेदी का पूरा भाषण यहां पढ़िए, वक्फ पर धोया ऐसा कि विरोधी हुए चित्त! राज्यसभा के इतिहास में दर्ज हुआ ऐतिहासिक भाषण.

डॉक्टर सुधांशु त्रिवेदी जी, प्लीज। आप, आप बोलें

माननीय सभापति महोदय, आज इस पुराने वक्त की आखिरी रात में खड़े होकर, इस नए वक्त के आगाज़ की नई सुबह के दिन, मैं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, हमारे अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरण रिजिजू जी का मैं बहुत इस्तकबाल करता हूं।

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जब वक्त के ऊपर हम बात कर रहे हैं — वक्त की रुखसती का वक्त आ गया है, और नई वक्त की नई सुबह होने का वक्त आ गया है। अगर हमें इस पर बात करनी है तो मुझे चार दृष्टि से बात करनी पड़ेगी—

  1. एक, इस बिल के तकनीकी प्रावधान — जिस पर बहुत सारे लोग बहुत कुछ बोल चुके हैं,
  2. दूसरा है वक्त की अवधारणा,
  3. तीसरी है वक़्फ की राजनीति, और
  4. चौथा है वक़्फ की राजनीति के नाम पर होने वाली वह सांप्रदायिक बनाम सेकुलर की राजनीति।

सुधांशु त्रिवेदी: सबसे पहले, हमारे नेता सदन माननीय नड्डा जी ने बताया कि किस विस्तार के साथ इस वक़्फ कमेटी ने काम किया, किस शिद्दत के साथ हमारी सरकार ने काम किया। और चाहे वक़्फ कमेटी के जेपीसी के चेयरमैन हमारे उस सदन के सदस्य जगदंबिका पाल जी रहे हों, हमारे मंत्री जी रहे हों — सबने जिस शिद्दत से काम किया है, तो उनके लिए मैं माननीय प्रधानमंत्री जी, अपनी सरकार की तरफ से कहना चाहता हूं कि उन्होंने इबादत के भाव से काम किया है।

तो मैं कहना चाहता हूं —

“इबादतों की तरह मैं यह काम करता हूं,
अपने फर्ज को झुककर सलाम करता हूं।
फिर भी आप खिलाफत कर रहे हैं, तो
तेरी मुखालफत से निखरती है शख्सियत मेरी,
मैं सियासी दुश्मनों का भी बहुत एहतराम करता हूं।”

तो इस एहतराम के साथ मैं अब आगे का पयाम शुरू करता हूं। और मैं यह बताना चाहता हूं कि एक बड़ी सिंपल सी बात है — जो अभी माननीय नड्डा जी ने भी कहा।

दुनिया के तमाम मुस्लिम देश बता दिए — इस्लाम की धर्मस्थली सऊदी अरब, सबसे बड़ा मुस्लिम देश इंडोनेशिया, जहां खिलाफत रही — वहां टर्की, और हां, आईएसआईएस का इलाका — वहां इराक और सीरिया, वहां कहीं भी कुछ भी नहीं ऐसा। फिर भी हमारे यहां क्यों है, कैसा?

तो मैं कहना चाहूंगा, सभापति महोदय — एक हिंदी में कहावत होती है:
“नया मुल्ला प्याज ज्यादा खाता है।”
परंतु यहां तो जो गैर-मुल्ला है, प्याज बहुत खा रहा था — और इतना खा रहा था कि आंसू निकल रहे थे — गरीब मुसलमान के भी और देश के भी।

इसलिए मैं कहना चाहता हूं, सभापति महोदय — अगर छोड़ दीजिए भारत की बात, करिए तो क्या ऐसी कोई शक्ति सिखों के पास है? ईसाइयों के पास है? यहूदियों के पास है? पारसियों के पास है? नहीं है।

सुधांशु त्रिवेदी: छोड़ दीजिए, इस्लाम के अंदर आइए। अगर इतना भाईचारा है, तो यह सुन्नी वक़्फ बोर्ड और शिया वक़्फ बोर्ड अलग क्यों है, मेरे भाई? ज़मीन पर एक-दूसरे को तबार नहीं है। सिर्फ सियासत के लिए साथ में आने की बात है — यह भी ज़रा सोचने की बात है।

और जो अल्पसंख्यक में भी अल्पसंख्यक हैं — आगा खानी हैं, बाकी हैं, जो बोहरा हैं — उनकी तो कोई गिनती नहीं है। हमारी सरकार ने पहली बार मुस्लिम समाज के अंदर भी ईमानदारी से सबको समान प्रतिनिधि देते हुए, एक नई सुबह के नए वक्त का आगाज़ किया है। इसके लिए मैं सरकार को बधाई देना चाहता हूं।

और सिर्फ ऐसा ही नहीं है। मुस्लिम समाज के अनेक लोग इस प्रकार के नियमों से बहुत प्रभावित हुए और बहुत प्रताड़ित हुए — जिसके अनेक उदाहरण बहुत लोगों ने बताए होंगे:

  • मोहम्मडन एजुकेशन सोसाइटी, कोल्हापुर का केस है।
  • ईदगाह मैदान, हुबली का केस है — जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ उसको हुबली दवार म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन को वापस कर दिया।
  • अनीसा अयासा वर्सेस तमिलनाडु वक्फ बोर्ड का केस है।
  • तेलंगाना स्टेट वर्सेस मोहम्मद मुज़फ्फर का केस है।
  • हिमाचल प्रदेश वक्फ बोर्ड वर्सेस ख्वाजा खलील उल्ला का केस है।

और सभापति महोदय — ताजमहल पर भी दावा कर दिया गया।

अब तो मैं पूछना चाहता हूं — और सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में कहा कि,
“भाई, शाहजहां के ज़माने का लिखा फरमान लेके आइए, तब हम मानेंगे कि इस पर कोई दावा है या नहीं।”

आप सोचिए कि अगर यह वक्फ का कानून इसी ढंग से चला होता तो क्या होता?

अभी हमारे जॉन बटास जी और मनोज झा जी ने बहुत सारी बातें बोली थीं। एक प्यास की बात बोली थी। उन्होंने उड़ीसा के ग्राम स्टोर्स का ज़िक्र किया था — तो उसमें तो कांग्रेस की सरकार सीबीआई की इन्क्वायरी नहीं कर पाई थी।

मगर जब ताजमहल का उल्लेख आता है, सभापति महोदय — तो एक प्यास मुझे याद आ जाती है।

जब शाहजहां जेल में था और दूर से उस ताजमहल को देखता था, और उसे सिर्फ एक सुराही पानी मिलता था, और उसने औरंगज़ेब से कहा — एक सुराही पानी और भिजवा दो — तो जानते हो, उसने मना कर दिया।

तो दुखी होकर शाहजहां ने फारसी में लिखा —

“ऐ पिसर तू अजब मुसलमानी,
जे पिद्र जा आप तर सानी।
आफरीन हिंदूआन सद बार,
जे देहन् पदरा मुर्दा देव।”

मतलब:

“तू कैसा मुसलमान है, जो ज़िंदा बाप को पानी के लिए तरसा रहा है?
तुझसे तो आफरीन 100 बार उन हिंदुओं को है,
जो पितृ पक्ष में मरे हुए बाप को भी पानी देते हैं।”

सुधांशु त्रिवेदी: और सभापति महोदय — मैं बताना चाहता हूं कि ये हमने ईमानदारी से मुस्लिम समाज के कल्याण के लिए बात की है। क्योंकि एक तरफ खड़ा हुआ है ईमानदार मुसलमान — जो शराफत के साथ ईमान को गले से लगाए हुए है। और दूसरी तरफ कुछ चंद सरमायेदार हैं, जो उस अमानत में खयानत करके शरारत के साथ उसके झंडा बरदार बनना चाहते हैं।

तो यह मुकाबला किसके बीच में है?

यह शराफत अली और शरारत खान के बीच में मुकाबला है।
हमारी सरकार शराफत अली के साथ खड़ी है।
हम गरीब मुस्लिम के साथ खड़ी है।
ये गरीबो-गुरबत वाले ‘गुरबत अली’ और सरमायेदार वाले ‘ग़ाज़ी खान’ के बीच का इलाका है।

मगर मैं कहना चाहता हूं, महोदय — एक बात मैं बहुत स्पष्ट रूप से कहना चाहूंगा।

इन ज़रूरतमंद मुसलमानों की लड़ाई के लिए, मैं कह सकता हूं कि यह गरीब मुसलमानों के दिल की कसक और कट्टरपंथी वोट के ठेकेदारों के मन की ठसक के बीच में — हमारी सरकार ने उस “कसक” का साथ दिया है। जिसके लिए मैं मानता हूं — गरीब और पसमांदा मुसलमान निश्चित रूप से उनका आभारी होगा।

सुधांशु त्रिवेदी: माननीय सभापति महोदय, हां, मगर जब इसकी बात आती है तो अभी माननीय खड़गे जी भी बोल रहे थे, माननीय संजय सिंह जी भी बोल रहे थे, मनोज झा जी भी बोल रहे थे — कि साहब, आपके यहां वो कितने पुजारी हैं और कितने किस वर्ग के पुजारी हैं।

तो मैं उनको बताना चाहता हूं — केवल अकेले जूना अखाड़े ने पिछले साल 71 एससी एसटी लोगों को महामंडलेश्वर बनाया है। अरे आपको हमारे इस सदन में बैठे हुए बाल योगी उमेश नाथ जी नहीं दिखते? वैसे तो कहा जाता है “जात ना पूछो साधु की”, मगर मैं बताना चाहता हूं — विश्व हिंदू परिषद के 50,000 से अधिक पुजारी ट्राइबल में, जो शेड्यूल कास्ट हैं, काम कर रहे हैं।

मगर मैं हद अदब से पूछना चाहता हूं — बताइए, मुल्ला, मौलवी, मुफ्ती, मुकर्रम, कारी, हाफिज — इनमें से कितने पसमांदा हैं? उसमें कितने जुलाहा, अंसारी, गोसी — बताइए, मेरासी कितने हैं? बाकी छोड़िए, पर्सनल लॉ बोर्ड में हैं क्या? अरे, वक्फ बोर्ड में हैं क्या?

इसीलिए मैं कहता हूं: “ख़ुद मियाँ फज़ीहत, दूसरों को नसीहत।”

अगर ईमानदारी से बात करनी है तो उस पर आगे…

मगर मैं एक बात और कहना चाहूंगा — कि हमारी जो सरकार ने नाम दिया है, इसको “उम्मीद” नाम दिया है। और यह उम्मीद है किसके लिए? उस ईमानदार मुसलमान के लिए और देश के हर खास-ओ-आम के लिए यह उम्मीद है।

सुधांशु त्रिवेदी: मगर सभापति महोदय, कुछ लोग वो हैं जो “उम्मा” का ख्वाब पाले हुए थे। उम्मा — शायद हमारे बहुत से लोग समझते हों, ना समझते हों — पूरी एक एनटायर इस्लामिक खलीफ़ा का राज्य होता है, उसको उम्मा कहते हैं।

उम्मीद वालों को तो उम्मीद की नई रोशनी दिख रही है, उम्मा वालों की उम्मीद पर पानी फिर रहा है।
तो यह उम्मीद और उम्मा के बीच का भी मामला है।

परंतु मैं यह भी कहना चाहूंगा, सभापति महोदय — इसके बाद सिर्फ ऐसा ही नहीं था। प्रॉपर्टीज के ऊपर, तमाम सरकारी प्रॉपर्टीज पर — जिसमें बहुत डिटेल में हमारे साथी लोग गए — मैं डिटेल में नहीं जाना चाहता।

सुधांशु त्रिवेदी: भोपाल का विषय है, हैदराबाद का विषय, मुंबई का है, लखनऊ का है, पटना का है — बहुत प्रकार से हैं। माननीय लालू प्रसाद यादव जी का विषय जब बताया गया था तो बहुत ज़्यादा हमारे मनोज झा जी बोल रहे थे। तो अब मैं उसके डिटेल में नहीं जाना चाहता हूं। सबने वह वीडियो देखा है।

बस एक लाइन में उनके लिए कहना चाहूंगा:

“वो कुछ भी बोल लें — इसे कहते हैं,
बिगड़ी बात बने नहीं लाख करो किन कोए,
रहीमन बिगड़े दूध को मथे न माखन होए।”

अब जो बोलना था, वह बोल चुके। सबके सामने वह आ चुका।

सुधांशु त्रिवेदी: अब एक बात और है — दूसरे धर्म स्थलों के बारे में विषय आता है, तो मैं याद दिलाना चाहता हूं — केरला के कैथोलिक चर्च ने 31 मार्च 2025 को जो लिखा, सिर्फ उसकी लास्ट की दो लाइनें बोलना चाहता हूं:

“We request the Central Government to get the Amendment Bill passed as early as possible so that the tears of thousands of suffering people in the places like Munambam can be wiped out only by a legal amendment that can provide a permanent solution to their suffering. We urge all the MPs from opposition party to support the Bill so that this historic legislation can become unanimity.”

किस माइनॉरिटी के साथ आना है, किसके साथ नहीं आना है — यह देखना है।

सुधांशु त्रिवेदी: और मैं एक और बात कहना चाहता हूं — तमिलनाडु के तेरी मंदिर की बात आई, यमुनानगर में गुरुद्वारे की बात आई, केरल में क्रिश्चियन कम्युनिटी की ज़मीन की बात आई। बहुत सारे लोग Places of Worship Act की बात करते हैं।

तो As per Places of Worship Act, तमिलनाडु का मंदिर का तो स्टेटस नहीं चेंज हो सकता, भाई।
15 अगस्त 1947 के बाद किसी Place of Worship का स्टेटस नहीं चेंज हो सकता।

तो वक्फ बोर्ड को क्लेम फॉरफीट कर देना चाहिए —
Because it is in contrast to the Places of Worship Act.

परंतु अब सुनिए — यही गुरुद्वारे के बारे में भी होना चाहिए।

सुधांशु त्रिवेदी: मगर, सभापति महोदय — चाहे वक्फ बोर्ड का एक्ट हो, चाहे Places of Worship Act हो — एक ही को फायदा होना है। जिसे कहावत में कहते हैं:

“खरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी खरबूजे पर गिरे,
आख़िर में कटना भगवे रंग के खरबूजे को ही होता है।”

अब मैं यह भी बताना चाहता हूं — कि इन संपत्तियों के द्वारा जो कुछ हुआ — उन्होंने इतनी चीज़ों को लिया है, इतनी चीज़ों को लिया है…

एक पुराना उर्दू का शेर है:

“मिटे नाम-ओ-निशाँ कैसे कैसे,
और यह ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे…”

इस ज़मीं ने कैसे-कैसे लोगों को अपने में समा लिया — इसकी तमाम तारीख़ गवाह है।
अगर मैं इसमें बहुत डिटेल में जाऊंगा, तो सदन का बहुत सारा वक्त जाएगा।

सुधांशु त्रिवेदी: परंतु मैं एक बात यह कहना चाहता हूं — कि जब इतना ज़्यादा आगे बढ़ गया, तो फिर कोर्ट ने आगे इंटरवेंशन करना शुरू किया। मैं डिटेल में नहीं जाना चाहता हूं — अभी कार्तिकेय शर्मा जी, बहुतों ने बोला:

  • सैयद फजल का केस वर्सेस यूनियन ऑफ गवर्नमेंट — इलाहाबाद हाईकोर्ट का केस,
  • मगर बशीर वर्सेस स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल केस में उन्होंने बहुत क्लियर कट कहा है:

“Waqf is not a religious denomination in accordance with Article 26 of the Constitution,
so the matter regulating to the restricting the economic, financial, political and other sector activities that may be associated with religion under Article 252A of the Constitution can be regulated by the State.”

तो मुझे लगता है — इसके बाद कोई किंतु-परंतु का स्कोप नहीं रह जाना चाहिए। परंतु उसके बाद भी, सभापति महोदय — जो कानून को ना माने, जो कहे कि संविधान को नहीं मानेंगे, और जो यह कहे कि साहब अदालत के आदेश को भी नहीं मानेंगे — तो फिर इसका मतलब उसके मन में तो एक ऐसी बादशाही आ गई है…

सुधांशु त्रिवेदी: इसके लिए मुझे, सभापति महोदय, वो पुरानी वाली फ़िल्म “मुग़ल-ए-आज़म” का वह सीन याद आता है — जब अकबर ने अनारकली को क़ैद कर लिया तो कहता है:

“ज़ब्त मैं करूं जिसकी कि ज़मीन वीरान हो गई है —
ज़ब्त वो ना करें जिनके सिर्फ शौक़े-इश्क़ को ठेस पहुंची है —
यह ज़िल्ले इलाही की बादशाही नहीं बल्कि खुदाई है।”

मैं कहना चाहता हूं — जो संविधान को ना माने, कानून को ना माने — इसका मतलब वह अपनी खुदाई में जी रहा है।

सुधांशु त्रिवेदी: तो यह वो लोग हैं। और वैसे मैं, सभापति महोदय — “खुदाई” से आजकल बहुत से लोगों को डर लगता है, क्योंकि जहां-जहां खुदा है, वहां-वहां भगवान है। बाकी आप सब बहुत बुद्धिमान हैं।

अब मैं यह भी बात कहना चाहता हूं — और वैसे, आख़िर में उस अनारकली को कैद से छुड़ाने के लिए सलीम का एक हिंदू साथी दुर्जन सिंह ही आया था।

मैं कह सकता हूं — कि वक्फ की इस मुकद्दस ज़मीन को अगर क़ैद करके रखा है तो उन चंद लोगों ने —
जिनके दिमाग आज भी उन चीज़ों में भरे हुए हैं कि —
कोई समझता है हम तो किसी ज़माने में हुक्मरान वक्त थे,
कोई कहता है हुज़ूर नवाब थे,
कोई कहता है बादशाह आलमगीर थे,
कोई कहता है पादशाह ग़ाज़ी ज़िंदा पीर थे।

तो नदीम-उल-हक़ साहब ने जो बोला था ना —
“किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है!”

बिल्कुल मैं कहना चाहता हूं —
जिन्होंने इस देश के लिए खून बहाया — उनके बाप का हिंदुस्तान है।
उस गरीब मुस्लिम कारीगर के बाप का हिंदुस्तान है।

पर जो यह कहते हैं कि:

“आगरे का लाल किला किसके बाप ने बनवाया?
आगरे का किला किसके बाप ने बनवाया?
दिल्ली का किला किसके बाप ने बनवाया?
हैदराबाद का चार मीनार किसके बाप ने बनवाया?”

उसके बाप का यह हिंदुस्तान नहीं है।

और उसके बाद भी जो आप करना चाहते हैं,
अगर इस रास्ते में आप कांटे बिछाना चाहते हैं —
तो उनके लिए एक लाइन कहना चाहता हूं…

सुधांशु त्रिवेदी आगे बोले….

सुधांशु त्रिवेदी: माननीय सभापति महोदय,

“तेरी तमन्ना है पर हम ख़ार ना बोने देंगे…”
“ख़ार” कांटों को कहते हैं।
“तेरी तमन्ना है पर हम ख़ार ना बोने देंगे,
तुझे हम राह की दीवार ना होने देंगे,
तू सबको रौंद कर आगे जो निकलना चाहे,
हम तेरी इतनी भी रफ़्तार ना होने देंगे।”

और इसीलिए हमारी सरकार ने इस विषय के ऊपर एक सही और सटीक प्रयोग करने का प्रयास किया है।

सुधांशु त्रिवेदी: मैं दूसरी बात यह भी बताना चाहता हूं — हमारे डीएमके के तुच शिवाजी ने अनायास, अकारण यह बात बोली थी कि उस समय जब जिन्ना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा — कि पार्टीशन के समय…

तो मैं उनके सुलभ संज्ञान के लिए बता देता हूं — 1946 की कांस्टिटuent असेंबली में मद्रास प्रेसिडेंसी में 30 आउट ऑफ 30 सीट जो थीं वो मुस्लिम लीग ने जीती थीं — विद 95% वोट — और एक भी मुस्लिम वहां के बाद बाहर नहीं गया।

सुधांशु त्रिवेदी: इसलिए मैं ईमानदारी से कहना चाहता हूं — फैक्ट को समझिए। और जो मद्रास प्रेसिडेंसी के मुस्लिम लीग के अध्यक्ष थे — और बीजे पोकर साहब बहादुर और मोहम्मद इस्माइल — वही बाद में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बने। और उन्होंने 28 अगस्त 1947 को सेपरेट ट्रेड मांगे — जो कोई जाकर कांस्टिटuent असेंबली की डिबेट में, पार्लियामेंट की वेबसाइट पर, पेज नंबर 270 पर जाकर पढ़ लीजिएगा।

सरदार पटेल ने बड़े गुस्से में इस बात को कहा — “अब जो हो गया, सो हो गया — एक रात में दिल नहीं बदल गया।”
मगर अब देश के लिए कैसे आगे बढ़ना है — उसके लिए ईमानदारी से आगे आओ।

और खैर, मैं अंबेडकर जी और पटेल जी के बहुत सारे कोट कर सकता हूं — सारी बातों को छोड़िए।
मगर अफ़सोस की बात यह है, सर — कि मनोज झा जी ने बोला था, “हम में से कोई शक है, कोई हूण है…” और यह करी?

अरे भैया, ज़माने चले गए — अब जेनेटिक सीक्वेंसिंग का ज़माना आ गया है।

और जेनेटिक सीक्वेंसिंग ने क्या प्रूफ किया है?
दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश इंडोनेशिया के राष्ट्रपति आए थे — और राष्ट्रपति भवन में उन्होंने डिनर के दौरान कहा:

“A few weeks back I got my genetic sequencing done, and I was told that I am an Indian genetically.”

अरे साहब, कहां गुलामी की मानसिकता में पड़े हुए हैं!

सुधांशु त्रिवेदी: सभापति महोदय, और यहां गुलामी की मानसिकता इस कदर पैबस्त है लोगों के दिमाग में — किसी सदन के एक सदस्य यहां विराजमान हैं — वो उस समय महाराणा सांगा का उल्लेख कर दिए।

मैं ईमानदारी से कहता हूं — एक भी इंडियन सोर्स में इसका उल्लेख नहीं है। सारे के सारे फॉरेनर्स और लुटेरों के सोर्स में उल्लेख है। इसलिए मैं कहता हूं — ये गुलामी के जिन्होंने गुलाम बनाया, उनके सोर्सेस पर यकीन ना करिए।

और वैसे थोड़ा सा आउट ऑफ कॉन्टेक्स्ट हो तो ये भी बोल दूं — हमारे सदन के बहुत सदस्यों को नहीं पता होगा — एलेक्जेंडर के आक्रमण का किसी भारतीय सोर्स में कोई उल्लेख नहीं है, पोरस नाम के किसी राजा का उल्लेख नहीं है — सिर्फ और सिर्फ ग्रीक में है।

सुधांशु त्रिवेदी: इसलिए गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलिए — तब इन चीज़ों को आप सही ढंग से समझने में सफल होंगे। मेरा अब यह भी अनुरोध अपने सदस्यों के साथ है — वक़्फ़ की अवधारणा के बारे में बहुत कुछ बोला जा चुका है — कि ओरिजिनली कहां से आया।

पर मैं इतना कहना चाहूंगा — सबसे पहले वक़्फ़ का उल्लेख आता है जब ससनीद एंपायर को खलीफा उमर ने कैप्चर किया। तो आज का जो सदन इराक है — उसके इलाके को उन्होंने वक़्फ़ डिक्लेयर किया और वो स्टेट के द्वारा कंट्रोल होता था। स्टेट के बारे में माननीय नड्डा जी ने अभी बताया कि बड़े-बड़े देशों में किस ढंग से होता था।

सुधांशु त्रिवेदी: सर सैयद अहमद खान ने भी वक़्फ़ को मूल इस्लाम का हिस्सा ना मानते हुए — इसके लिए मुजारी के अंतर्गत आता है — और इसी के लिए उन्होंने फतवा आलमगिरी को भी कोट किया था। और इसीलिए 1894–96 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित किया — कि प्रिवी काउंसिल के जजमेंट में कुछ गलती है, इसे बदलना चाहिए। क्योंकि 1904 में जिन्ना कांग्रेस को जॉइन कर चुके थे — इसलिए मैं कहना चाहता हूं — फिर 1913 में वो जजमेंट बदला गया।

हमारे सदन के बहुत से सदस्यों ने इस सदन और दूसरे सदन में बोला है — मैं एक सेंटेंस बोलता हूं — लगेगा जैसे वही लोग बोल रहे हैं।
वर्ड यह है, कोर्ट है:

“Since the Bill was introduced to administer the Muslim Law for Muslims, so the question of public policy does not arise.”

लगता है जैसे हमारे कोई सदस्य में बोल रहा हूं!

सर, यह मोहम्मद अली जिन्ना ने अप्रैल 1913 में ही यूज़ किया था — while moving the report of the Select Committee to the Imperial Legislative Council।

सुधांशु त्रिवेदी: सर, 1913 से 2013 तक भाषा ही नहीं बदली — और आज भी भाषा नहीं बदल रही है। हमें ईमानदारी से — और उस समय यूपी और बंगाल ने उसका विरोध किया था। आज यूपी और बंगाल के लोग किस तरीके से साथ में हैं — वह पूरी तरीके से दिखाई पड़ता है।

इसलिए हम यह कहना चाहते हैं…

हाँ, एक प्रश्न बहुत उठाया जाता है — कि केवल मुस्लिम ही वक़्फ़ को क्यों दान दे सकता? ऐसा वक़्फ़ बोर्ड में क्यों संशोधन किया गया?

सुधांशु त्रिवेदी: मैं ईमानदारी से कहना चाहता हूं — ऐसा नहीं कि कोई मैं इस्लामिक मामलों का बहुत बड़ा आलिम-फाज़िल जानकार हूं, मगर इस्लाम में बहुत साफ मान्यता है — कि जो गैर-मुस्लिम है, उसकी इबादत अल्लाह कबूल नहीं कर सकते। उसकी दुआ कबूल नहीं होगी — तो दान कैसे कबूल होगा, साहब?

हम इस्लामिक भावना का सम्मान कर रहे हैं।
हमारे अचक मंत्री गए थे — तो वो मदीना में डेफिनेट लेवल तक जा सकते हैं — उसके आगे नहीं जा सकते।
अगर इबादत की इजाज़त नहीं है — तो साहब, ज़ायादाद की इजाज़त कैसे हो सकती है?

मुस्लिम भावना का सम्मान है। और अगर है — तो कोई मुल्ला, मौलवी, मुफ्ती, मुकर्रम, कारी — आज आके बता दे कि कबूल हो सकती है दुआ — तो हम दान भी कबूल करने के लिए तैयार हैं।

सुधांशु त्रिवेदी: और तो और छोड़िए साहब — जब आप कहते हैं कि हर चीज़ हलाल होनी चाहिए, तो साहब, हलाल करने की प्रक्रिया नहीं — हलाल करने वाला भी मुस्लिम होना चाहिए — तब वो हलाल होता है।

तो मैं पूछना चाहता हूं साहब — काटने के लिए तो हलाल होने के लिए मुस्लिम ज़रूरी है, और बांटने के लिए बगैर मुस्लिम के भी हलाल होगा? ऐसा तो नहीं हो सकता। तो जो हमारी सरकार ने किया है — वो मुस्लिम भावना के सम्मान के लिए किया है।

सुधांशु त्रिवेदी: और जहां तक मैं कहना चाहूंगा — हिंदू समाज के बारे में बात करते — हमारे यहां कोई प्रॉब्लम नहीं है। हमारे यहां कोई ऐसा नहीं कि हज पर कोई गैर मुस्लिम नहीं जा सकता। हमारे देखिए — कुंभ में 50 लाख विदेशी आए थे, और किसी से नहीं कहा गया — “कन्वर्ट हो जाओ”।

इसलिए मैं कहना चाहता हूं — हिंदुइज़्म की धारणा और बाकी धारणा का जो तुलना करने का प्रयास करते हैं — वो बहुत उचित नहीं है।

सुधांशु त्रिवेदी के धारदार तर्क इसके बाद भी जारी रहे

सुधांशु त्रिवेदी: माननीय सभापति महोदय, मगर सभापति महोदय, इस वक़्फ़ ने कई अद्भुत नज़ारे दिखाए। इस्लाम में जो “काफ़िर” से ज़्यादा “मुशरिक” और “शिर्क” को बुरा माना गया — यानी जो भगवान को माने ही नहीं — यहाँ देखिए, वो लेफ्ट के लोग जो कहते थे “धर्म एक अफ़ीम है”, वो आज “ख़ुदाई ख़िदमतगार” बन के खड़े हो गए।

सोचिए कैसा बदलाव आया है।

और सर, मुझे एक और चीज़ नज़र आती है — एक पुराना गीत था —
“वक़्त ने किया क्या हसीं सितम…”
तो आज मैं कहना चाहूंगा:
“वक़्फ़ ने किया क्या हसीं सितम — कि मुस्लिम लीग और शिवसेना मिलकर हो गए हम!”

और मैं कहना चाहता हूं — यह मुस्लिम लीग वह है जिसने सेपरेट इलेक्टोरेट की मांग की थी।
और इस शिवसेना के उबा के हमारे इस सदन के एक सदस्य हैं।

सुधांशु त्रिवेदी: और सर, हमारे साथ मुरली जी बैठे हैं। मुरली देवड़ा जी ने मुझे याद दिलाया — उन्होंने, मिलिंद देवड़ा जी ने याद दिलाया — उन्होंने कहा: एक ज़माने में उन्होंने कहा “मुसलमानों की नागरिकता छीन लेनी चाहिए।”

इसीलिए मैं कह रहा हूं — “वक़्फ़ ने किया क्या हसीं सितम — यह दोनों मिलकर हो गए हम!”

और सर, इसके बाद एक टेक्निकल बात करना चाहता हूं: जब इन्होंने टाइम ड्यूरेशन हटा दिया था और बैक में पीछे जा सकते थे — तो मैं पूछना चाहता हूं सर — कि जब ब्रिटिश हुकूमत आई, तो उसने तो मुग़लों से सारी हुकूमत ले ली थी, तो उनका मालिकाना हक़ कैसे हुआ?

सुधांशु त्रिवेदी: सर, 1707 के बाद तो इस्लामी हुकूमत दिल्ली से खत्म हो गई थी। आख़िरी मुग़ल बादशाह शाह आलम के लिए तो बोला जाता था: “सल्तनत शाह आलम — दे लाल किले ते पालम” — यानी आज का IGI एयरपोर्ट।

तो साहब, उसके बाद यह गुजरात के सूरत से लेकर लखनऊ तक उनका मालिकाना हक़ निकलने कहां से लगा? अरे भाई, जब दिल्ली को कैप्चर किया था अंग्रेजों ने — तो सारी ज़मीन अंग्रेजों की थी।

तो मैं कांग्रेस के मित्रों से पूछना चाहता हूं — जब Government of India Act में पावर डीट ट्रांसफर की थी, तो पढ़े नहीं थे क्या? या खोखले कागज़ पर साइन कर लिए थे? या कागज़ सही था — आप खोखला करने की बात है?

सुधांशु त्रिवेदी: मैं पूछना चाहता हूं — जब 250 साल तक वो हुकूमत नहीं रही — तो उस हुकूमत के फरमान की लेजिटिमेसी कैसे हो सकती है? यह मैं कानूनविदों के लिए भी एक ‘फूड फॉर थॉट’ रखने की बात करता हूं। और दूसरी बात मैं कहना चाहता हूं — ये किन हुकूमतों की बात कर रहे हैं, सभापति महोदय?

अगर सूरत नगर निगम पे दावा है मुग़ल के ज़माने का — और तमिलनाडु के मंदिर पर कटक के नवाब का…

सभापति महोदय — ये वो हुकूमत थी जो जज़िया लगाती थी। ये वो हुकूमत थी जो जिम्मी का कांसेप्ट रखती थी। ये वो हुकूमत थी जो ग़ाज़ी की बात करती थी।

क्या भारत के संविधान में उन हुकूमतों के फरमान को सही मान्यता देना सही है? बिल्कुल ग़लत है।

सुधांशु त्रिवेदी: मैं कहता हूं — बाबा साहब अंबेडकर के संविधान में यदि आप ऐसी हुकूमतों के फरमान को रखने की कोशिश करते हैं —
तो “This is fraud on Constitution”

और हमारी सरकार ने अगर बैक डेट से वो बंद किया है — तो उस फ्रॉड को रोकने की पूरी व्यवस्था की है।

और यहाँ पर मैं यह भी कहना चाहता हूं, सभापति महोदय — ज़मींदारी उन्मूलन 1948 में हो गया, मगर यह बाद में ज़मींदार कैसे क्रिएट हो गए?

हमने बचपन में विनोवा भावे… हम लोगों के जन्म से बहुत पहले की बात है… विनोवा जी के भूदान आंदोलन की बात सुनी थी, जिसमें ज़मींदारों से ज़मीन लेकर ग़रीबों को दी जाती थी।

सुधांशु त्रिवेदी: पर सभापति महोदय — कभी आपने सुना कि ग़रीबों की ज़मीन ज़मींदारों को मिल जाए? वो 2013 के बोर्ड ने वो व्यवस्था कर रखी थी।

यानि वो भूदान आंदोलन था — गांधी जी के शिष्य विनोवा जी का। तो आज के गांधी के नेतृत्व में “भू-हड़प आंदोलन” शुरू हो गया। अगर वो भूदान आंदोलन था — तो ये भू-हड़प आंदोलन था।

इसलिए मैं एक और बात भी कहना चाहूंगा, सभापति महोदय: कि जिन हुकूमतों के फरमान की बात की जाती है — एक और फैक्ट है — इसे कोई अन्यथा न ले —

जितने मुस्लिम बादशाह — अलाउद्दीन खिलजी के बाद — उन्होंने बगदाद की खलीफा का ख़ुतबा पढ़ा है — That is a foreign rule. It’s on record. कैसे उसको भारत सरकार मान्यता दे सकती है?

सुधांशु त्रिवेदी: इसलिए मैं कहना चाहता हूं — ज़रा सा ग़ौर से देखेंगे तो हक़ीक़त आपके सामने आ जाएगी। और क्या कभी किसी ने कल्पना की — किसी क्रिश्चियन ने तो नहीं कहा कि इंडिया गेट हमारा है, गेटवे ऑफ इंडिया हमारा है — और चर्च नहीं सही, फिर भी “चर्चगेट” हमारा है?

तो फिर यह केवल किसी एक के दिमाग में क्यों आती है? हमने जो Evacuee Property Act के तहत दे दिया था — पाकिस्तान के गए लोगों को —
क्या हमारे जो सिख और हिंदू भाई आए थे — उनकी ज़मीनें मिलीं?

अरे, महाराजा रणजीत सिंह की राजधानी लाहौर थी और काबुल तक था राज — तो क्या उन्होंने ज़मीनें नहीं दान दी होंगी गुरुद्वारों और मंदिरों को? वो मिलीं? अरे वो तो छोड़िए — ननकाना साहब और करतारपुर साहब तक नहीं मिला था।

सुधांशु त्रिवेदी: इससे दिखाई पड़ता है — कि कितनी एक तरफ़ा हम लोगों ने किया — कोई negotiation ही नहीं किया — और उसे करने की बात कही थी।

इसलिए मैं कह सकता हूं, सर —
अब हमारी सरकार ने जो संशोधन किए हैं —
अब यह मजहबी हुकूमत के फरमान से नहीं —
बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान से चलने वाला है।

सुधांशु त्रिवेदी: अब मैं अंत में उस विषय के ऊपर आता हूं — “यह सांप्रदायिक राजनीति बनाम सेकुलर राजनीति” — इसके ऊपर कहा जाता है। सभापति महोदय — मैं बताना चाहता हूं: कि जब आज़ादी मिली — उसके बाद क्या किसी ने डिमांड किया था कि हमें वक़्फ़ बोर्ड चाहिए? नहीं किया था। फिर क्यों 1954 में दिया गया? किसी मुस्लिम ने डिमांड किया क्या — कि मदरसे चाहिए? फिर क्यों दिया गया?

मुस्लिम समाज तो राष्ट्र की मुख्यधारा में आने को तैयार था।

यूसुफ़ ख़ान — दिलीप कुमार के नाम से आने में उन्हें कोई प्रॉब्लम नहीं थी।
महज़बीं बानो को मीना कुमारी के रूप में आने में प्रॉब्लम नहीं थी।
मुमताज़ बेग़म को मधुबाला बन के आने में प्रॉब्लम नहीं थी।
हामिद अली को अजीत के रूप में आने में प्रॉब्लम नहीं थी।

मगर… और मैं यह भी बताना चाहता हूं —
मुस्लिम समाज में बहुत बड़ा तबक़ा उस समय इस बात को सोच रहा था।

और अभी कपिल सिब्बल साहब बोले — ये उस चीज़ के वकील हैं —
उन्हें पता होना चाहिए — पता होगा कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ़ बोर्ड राम मंदिर में 1961 में मुद्दा ही बना है — 12 साल के बाद।

क्योंकि K.K. मोहम्मद ने लिखा है — कि एक बहुत बड़ा तबक़ा था जो यह मानता था कि हमें इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए।

मगर अफ़सोस — कि वही लेफ्ट सेक्युलरिस्ट्स ने उनको समझा-समझाकर इस मुकाम तक लाकर खड़ा कर लिया।

अब यहाँ मैं एक और बात कहना चाह…

(ख़र छोड़िए उन सरकारों ने बाद में क्या दिया…)

मगर उसके बाद सुनिए:

  • इंदिरा जी के ज़माने में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड आया
  • राजीव जी के ज़माने में शाहबानो केस आया
  • नरसिंह राव के ज़माने में 1995 का एक्ट आया
  • मनमोहन सिंह जी के ज़माने में 2013 का एक्ट आया

मगर इलाज नहीं निकला।

तो इसे एक शेर में कहूंगा:

“मरीज़-ए-सैक्युलर इश्क़ पर लानत ख़ुदा की,
मर्ज़ बढ़ता गया जो-जो दवा की…”

सुधांशु त्रिवेदी: अब मैं, सभापति महोदय, एक और बात कहना चाहता हूं: शुरू के 20–22 साल में मुस्लिम समाज के बारे में मैं कहना चाहता हूं: आज जब आज़ादी मिली — तो मुस्लिम समाज के प्रतीक कौन थे?

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान,
उस्ताद फ़ैयाज़ुद्दीन डागर,
उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली,
उस्ताद ज़ाकिर हुसैन
— जिनकी अभी कुछ दिन पहले डेथ हुई।

बड़े-बड़े नग़मा-निगार:

हसरत जयपुरी,
मजरूह सुल्तानपुरी,
साहिर लुधियानवी,
कैफ़ी आज़मी,
जोश मलीहाबादी,
जिगर मुरादाबादी।

अफ़सर क्या हो गया तब? मुस्लिम समाज इन अदब के शाहगंज जाता था। आज मुस्लिम समाज का नेतृत्व किन लोगों के साथ जोड़ता है? इशरत जहाँ, याक़ूब मेमन, मुख़्तार अंसारी, अतीक़ अहमद, दाऊद इब्राहिम।

कौन जोड़ रहा है यह? तब से, सर, जब से यह सेक्युलर हो गया देश — 1976 से। और सेक्युलर सियासत शुरू हुई — उसने ले जाकर इनको इस मुकाम तक पहुंचाया।

सुधांशु त्रिवेदी: माननीय सभापति महोदय, अब मैं एक-एक कर बता देता हूं। अरे सुनो ना भाई, आप सुनो तो। अरे दिग्विजय सिंह, सुनिए — मैं खड़ा हूं ना अपने पैर पर।

मान्यवर सुधांशु जी ने कहा — इसरत जहां… यही एनसीपी पार्टी ने इसरत जहां के घर पर जाकर रुपयों का इनाम भी दिया था और उसको शहीद बताया था। दूसरा कहा — अतीक अहमद किस पार्टी से थे? इंडिया एलायंस की। दूसरा कहा — अंसारी किस पार्टी से? कांग्रेस और इंडिया एलायंस के।

यह सारे नाम आपके साथ जुड़े हैं भाई! उल्टा उन्होंने तो मुसलमान कम्युनिटी से तो ढेर सारे शायरों का नाम दिया — जिन्होंने साहित्य की सेवा की और ढेर सारे साहित्य की रचना की।

मैं सुधांशु ही हूं, not tongue now।

सबसे पहले मैं तमिलनाडु का जवाब देना चाहता हूं।

Waqf Bill Pass Sudhanshu Trivedi Speech in Rajyasabha, Waqf Bill, सुधांशु त्रिवेदी राज्यसभा वक्फ

सुधांशु त्रिवेदी: यस, सभापति महोदय — तमिलनाडु से ही डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम थे। और मैं सारे सदन से कहना चाहूंगा — डॉक्टर कलाम का नमाज-ए-जनाज़ा और याकूब मेमन का नमाज जनाज़ा एक ही दिन हुआ।

कितने लोग याकूब मेमन के नमाज जनाज़ा में गए, और कितने डॉक्टर कलाम के जनाज़ा में गए? डॉक्टर कलाम मेमोरियल पर कितने लोग फ़ोटो हुए? दिखाइए मुझे, सोशल मीडिया पर पोस्ट की हो।

सुधांशु त्रिवेदी: मगर अफज़ल हालात का मारा था — आपके एक मंत्री का ऑफिशियल ट्वीट है। वो सदन के सदस्य नहीं, तो मैं नहीं बोल रहा हूं। याकूब मेमन की जुडिशियल किलिंग हुई — आपके एक नेता, मंत्री का ऑफिशियल ट्वीट है। सदन के सदस्य नहीं हैं, इसलिए नहीं बोल रहा हूं।

और सर — “261 आरएसएस ने कराया” — सदन के सदस्य बैठे हुए हैं। हाफ़िज़ साहब और… और सुनिए — ज़ाकिर नायक — शांति का मसीहा! सदन में सदस्य बैठे हुए हैं। सर, किसने जोड़ा? मैं नहीं कह रहा हूं — जोड़ा। हमने किससे जोड़ा — मैं बताना चाहता हूं।

दिग्विजय सिंह और अमित शाह में हुई नोंकझोंक

दिग्विजय सिंह: मैं अपनी बात… सर, मैंने नाम किसी का नहीं लिया।

सुधांशु त्रिवेदी: सर, आपने उड़ता तीर क्यों पकड़ लिया? सर, मैंने नाम नहीं लिया — उड़ता तीर क्यों पकड़ लिया? सर, मैं पूरी बात करूं — सर, मैं कहना चाहता हूं — हमारी सोच मुस्लिमों के बारे में और इनकी सोच में क्या अंतर है — देखिए: जिन लोगों ने मुस्लिम हिस्ट्री नहीं पढ़ी — उन्हें मैं बताना चाहता हूं एक-दो… सभापति महोदय, मैं थोड़ा उन लोगों को इस्लामिक इतिहास के बारे में बताना चाहता हूं…

दिग्विजय सिंह: माननीय सभापति महोदय, जो माननीय सदस्य ने बात कही है — मैं सुन रहा था डॉक्टर त्रिवेदी की बात। उन्होंने कहा था — ऐसे-ऐसे मुसलमान हम लोगों के साथ हैं, और वैसे-वैसे मुसलमान इन लोगों के साथ हैं।

बात यह है कि आपने जिस तरह से इस पूरी बात को कहा है — यह घोर आपत्तिजनक है, अपमानित करती है। और जो माननीय सदस्य ने भी मेरे बारे में भी कहा है — मैं उनकी निंदा करता हूं।

ऑनरेबल होम मिनिस्टर। ऑनरेबल होम मिनिस्टर, एक सेकंड — एक सेकंड — वन सेकंड… वन सेकंड… योर माइक विल बी ऑन। जी महोदय, मुझे यह सब कहने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन जो गुजरात में दंगे और फ़साद हुए — कौन-कौन उसके लिए ज़िम्मेदार थे? बताइए मान्यवर — मैं ध्यान से, बारीकी से पूरे संवाद को सुन रहा हूं।

अमित शाह: माननीय सदस्य सुधांशु जी ने दिग्विजय सिंह का नाम नहीं दिया। अब वह खड़े होकर कहें — “मेरे बारे में कहा” — इससे साबित हो गए! और अभी भी मौक़ा है… अभी भी मौक़ा है। आपने नहीं कहा है कि 261 के हमले में आरएसएस का हाथ था — तो अभी खड़े होकर, माइक चालू कराकर, बुलावा…

दिग्विजय सिंह: और आपत्तिजनक बात है। मैंने यह बात कभी नहीं कही है — यह आप लोगों का प्रचार है। मेरी आपत्ति इस बात की थी — कि सभी माननीय सदस्य ने और बात कही है — कि अब हमारी तरफ ऐसे-ऐसे मुसलमान थे और वैसे-वैसे मुसलमान हम लोगों की तरफ थे। यह पूरे समाज के साथ — पूरे अल्पसंख्यक समाज के साथ — अपमानजनक बात है।

और माननीय सभापति महोदय आप बताएं: माननीय गृहमंत्री जी — आप वहां पर जब गृहमंत्री थे — जब दंगे हुए थे — तो आप लोगों का क्या रोल था? जन… जाकर जन… लो होम मिनिस्टर, मान्यवर… इनको मेरा हवा ऐसा है कि मैं ही दिखाई पड़ता हूं।

अमित शाह: आपकी सुनिए… सुनिए… आप सुनिए ना, दिग्विजय सिंह, सुनिए। एक मिनट सुनिए। दंगे शांत होने के बाद — 18 महीने के बाद — मैं गृहमंत्री बना। दंगा हुआ, तब मैं गृहमंत्री नहीं था।

सुधांशु त्रिवेदी ने फिर संभाला मोर्चा

सुधांशु त्रिवेदी: अंदर में किसी का नाम नहीं लिया। अजीज बर्नी की किताब थी — 261 and RSS Conspiracy. कोई जाकर चेक कर ले — उसमें कौन-कौन, कहां-कहां था। अब मैं मुसलमानों के बारे में कहना चाहता हूं।मुस्लिम समाज के लिए बहुत से लोग ऐसे हैं — जिनको मुस्लिम समाज की हिस्ट्री नहीं पता है।

मैं बताना चाहता हूं — भारत से जब न्यूमेरिक सिस्टम सबसे पहले गया, तो अल-जहर थे — सबसे पहले जिन्होंने जाकर 1793 में जो सूर्य सिद्धांत था — उसका अरबी में ट्रांसलेशन हुआ। सिंध, हिंद… और हम बता रहे हैं — हम किस तरह के मुस्लिम को साथ रखते हैं।

डॉ. कलाम से बड़ा आलिम इस्लाम में साइंस में नहीं हुआ। और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान साहब, जो बिहार के गवर्नर हैं — उनसे बड़ा आलिम-फ़ाज़िल मुसलमान आज सियासी जमात में तो नहीं होगा — यह मैं दावे के साथ कह सकता हूं।

मगर मैं बताना चाहता हूं सर — उसके बाद, उसके बाद…उन्होंने एक किताब लिखी। एक सर 10वीं सदी के मुस्लिम लेखक थे — जिन्होंने किताब लिखी — उसका नाम था:“The Compendious Book of Balancing and Completion According to Hindu Calculation” जिसको शॉर्ट में अल-जबर कहा गया — और वहां से अलजेब्रा निकला। और सर, उसके बाद अल-ख्वारिज्मी आया।

सुधांशु त्रिवेदी: और सर, आज मेरे ख्याल से — सदन के बहुत से लोगों को नहीं पता होगा — यह जो एल्गोरिदम शब्द है — ये अल-ख्वारिज्मी से ही निकला। इस्लाम में बैतुल हिकमत था — यानी वो सबसे बड़ा हिकमत का केंद्र था, जब एक से एक लोग होते थे। बहुतों को नहीं पता होगा — कि कोलंबस ने जिस नक्शे के थ्रू दुनिया ट्रैवल किया था — वो बनाने वाला भी एक मुसलमान था — अल-इदरीसी

सुधांशु त्रिवेदी: मगर सर, एल्गोरिदम आज ऐसा बदला — ऐसा बदला कि K एज में दलगत भावना से ऊपर उठकर औरंगज़ेब के साथ खड़े हो गए। सर, ये एल्गोरिदम किसने बदल दिया — यह मैं बताना चाहता हूं। इस पर थोड़ा सोचने की ज़रूरत है।

इसलिए मैं कहता हूं — मुस्लिम पॉलिटिक्स की सोच क्या थी? हमने किन मुसलमानों का साथ दिया है — मैं बताना चाहता हूं।वीर अब्दुल हमीद की शहादत की 50वीं वर्षगांठ — 2015 में हुई — प्रधानमंत्री मोदी जी ने उनके पूरे परिवार को और उनकी पत्नी को बुलाकर सम्मानित किया। और इन लोगों ने उस यासीन मलिक को — जिसके ऊपर तीन एयरफोर्स के ऑफिसर्स को हत्या करने का आरोप था — वह प्रधानमंत्री आवास में!

सर, साफ़ दिखाई पड़ता है — कौन किसके साथ खड़ा हुआ है — कौन किस तरह के मुसलमान के साथ खड़ा हुआ है।

और सर, मैं यह भी कहना चाहता हूं —

[अपने-अपने टर्न पे बोलिए, सर]

पिछले 30–35 सालों से हौआ खड़ा किया जा रहा है।

सुधांशु त्रिवेदी: 1990 में जब राम मंदिर आंदोलन हुआ — कहा गया: “बीजेपी आएगी, उत्तर प्रदेश में खा जाएगी…” सर, बीजेपी आने के बाद उत्तर प्रदेश में जानते हैं क्या हुआ? 22 साल से शिया-सुन्नी के बीच में जो दंगे चलते थे — और मदे-साबा का जुलूस नहीं निकलता था — शिया समुदाय का ‘मदे-आबा’ का जुलूस लखनऊ में हमारी सरकार में निकलना शुरू हुआ।

और उसके बाद कहा गया: “केंद्र में भाजपा आएगी तो खा जाएगी…” सर, अटल जी की सरकार आई — इतनी शानदार स्थिति रही। उसके बाद कहा गया — गुजरात में आएगी तो भाजपा कहाँ जाएगी? सर, गुजरात का मुसलमान — आज सबसे समृद्ध मुसलमान है। सबसे ज़्यादा ज़कात वहीं से आता है।

सुधांशु त्रिवेदी: उसके बाद कहा गया मोदी जी की सरकार आएगी तो क्या होगा। सर, मोदी जी की सरकार आने के बाद हमारे साथियों ने बताया है कि अल्पसंख्यक समुदाय के 70 प्रतिशत लोग हैं, जिनको किसी न किसी एक योजना का लाभ जरूर मिला है। और सर, फिर कहा गया कि सीएए आएगा तो नागरिकता छिन जाएगी। उसके बाद भी आपने सब देखा।

और सर, हम बचपन में सुनते थे कि राम मंदिर बनने लगेगा तो मिडिल ईस्ट के देश पेट्रोल देना बंद कर देंगे। सर, राम मंदिर भी बन रहा है और भारत मिडिल ईस्ट कॉरिडोर भी बन रहा है और अबू धाबी में भी मंदिर बन रहा है और चार-चार मुस्लिम देशों ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान मोदी जी को दिया हुआ है।

सुधांशु त्रिवेदी: इसलिए मैं कहना चाहता हूं सर, मर्ज हो तो उसका इलाज किया जा सकता है। जैसे हमारे यहां वैद धन्वंतरि हुए हैं — इस्लामी अकीदे में कहा गया है: “अरेस्ट है जो तू, आन के पास बदगुमां, वहम की दारू नहीं लुकमान के पास।” यानी मर्ज का इलाज है, पर वहम का इलाज तो हकीम लुकमान भी नहीं कर सकते जो आपने पाल कर रखा है।

मैं कहना चाहता हूं, हम किन मुसलमानों की बात करते हैं। आप गंगा-जमुनी तहज़ीब की बात करते हैं। सर, दारा शिकोह औरंगज़ेब का बड़ा भाई था। उसने उपनिषदों का अध्ययन किया, संस्कृत में अनुवाद कराया और नाम रखा सिर्र-ए-अकबर यानी Words of God। मैंने किसी को दारा शिकोह की जयंती मनाते हुए नहीं देखा। मैं पूछना चाहता हूं — बीबी ताज के घर पर कोई गया? किसी ने सुना? सर, ये बताइए आलम शेख इतने बड़े कृष्ण भक्त हैं — कवि — किसी ने सुना उनके घर पर जाते हुए?

सुधांशु त्रिवेदी: मलिक मोहम्मद जायसी जिन्होंने पद्मावत लिखा, उत्तर प्रदेश के रहने वाले — उनके घर पर कोई गया? ये बताइए, ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान के घर पर कौन गया? आजमगढ़ में, गाज़ीपुर के रहने वाले थे। आज तक जाने वालों में नहीं दिखे। और मैं सर, बताना चाहता हूं एक और बात — एक सय्यद इब्राहिम रसखान हुए हैं, बहुत बड़े कृष्ण भक्त के कवि। सर, उन्होंने क्या लिखा? उन्होंने कहा — मेरा अगला जन्म हो तो भी मैं कृष्ण भक्त बनना चाहूंगा, मनुष्य तो ग्वाल वाले के रूप में, और पशु बनूं तो गाय के रूप में। उन्होंने कहा:

“मानुष हो तो वही रसखान बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वार,
जो पशु हो तो कहा बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मझार।”

सुधांशु त्रिवेदी: सर, उन्होंने कहा — गायों के बीच में, नंद बाबा की गायों में जन्म लेना चाहूंगा। मगर सर, आज एक ऐसे नेता आए हैं इस देश में, जिनको गायों से बदबू आने लगी है। तो उनके लिए मेरे मन में भाव आता है:

“श्रीरामचंद्र कह गए सिया से — ऐसा कलयुग आएगा,
गोपालक श्री यदुकुल में — एक ऐसा नेता आएगा,
जिसे बकरे कटने में खुशबू मिलेगी,
गौ माता में बदबू पाएगा।
रामचंद्र कह गए सिया से — कैसा कलयुग आएगा।”

सुधांशु त्रिवेदी: अब सर, मैं एक और बात भी कहना चाहता हूं। हम किनको मानते हैं? सर, नज़ीर अकबराबादी को सुनिए। कृष्ण भक्त के लिए क्या कहा? सर, मैं एक बोलना चाहता हूं — बुल्ले शाह ने क्या कहा? बुल्ले शाह ने कहा — अभी होली गुज़री है — उसने कहा था: “आज होली खेलूंगी मैं कर बिस्मिल्लाह।” उन्होंने आगे कहा:

“अस्तु प्रीतम बोले, सब सखियों ने घूंघट खोले,
नाम नबी की रतन चढ़ी, और बूंद पड़ी अल्लाह अल्लाह,
आज होली खेलूंगी मैं कर बिस्मिल्लाह।”

सुधांशु त्रिवेदी: तो मैं भी कहता हूं — अब बिस्मिल्लाह करिए और उसके बाद हमारे इस सहयोग का सहयोग करिए, इस सकारात्मक उसूल का। वरना अल्हम्दुलिल्लाह — जो हम मुसलमानों के लिए और देश के लिए करना चाहते हैं, उसमें हमें सफलता ज़रूर मिलेगी।

अंत में मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं सर — तमाम प्रकार की बातें यहां पर हुईं — सकारात्मक और नकारात्मक। मगर अफ़सोस की बात यह है कि 1913 के “वक्फ़ वल औलाद” से लेकर 2013 के “वक्फ़ वल औलाद” तक इनकी फितरत नहीं बदली। क्योंकि सर, यह तो पार्टियां ही “अल औलाद” हैं — तो इनको तो उससे बहुत ज़्यादा असर होना ही होना है।

सुधांशु त्रिवेदी: पर मैं सिर्फ अंत में कहना चाहता हूं — सर, अपनी सोच बदलिए। आप जिस कश्ती पर सवार होकर इस दरिया को पार करने की कोशिश कर रहे हैं — पिछले 75 साल में नहीं कर पा रहे हैं। 10–12 साल में बहुत हिचकोले खा रहे हैं। तो कश्ती और रास्ता बदलिए। तो इनके लिए अंत में एक पंक्ति कहते हुए बात समाप्त करना चाहूंगा:

“इन्होंने कश्ती भी नहीं बदली, दरिया भी नहीं बदला,
पर इन डूबने वालों का जज़्बा भी नहीं बदला,
पर है शौक़-ए-सफ़र ऐसा —
एक उम्र हुई, हमने मंज़िल भी नहीं पाई,
रास्ता भी नहीं बदला।”

सुधांशु त्रिवेदी: अब अगर नई मंज़िल पानी है, नई मंज़िल की नई सुबह देखनी है — तो मैं कहना चाहता हूं — आइए, सबको साथ लेकर चलिए।

सुधांशु त्रिवेदी: और एक ऐसा वक़्त आया है — जब, जो हमारे किरण रिजिजू जी ने कहा था: “मैंने शम्मा जलाई हवाओं के ख़िलाफ़।”

तो मैं प्रधानमंत्री मोदी जी की तरफ से कहता हूं:
“हमें इल्ज़ाम मत दीजिए — बहुत अफ़सोस होता है।
हमें इल्ज़ाम मत दीजिए — बहुत अफ़सोस होता है।
बड़ी तरकीब से कश्ती यहां तक लेकर आए हैं,
और बदल देते हैं हम दरिया की लहरें अपनी हिम्मत से —
आंधियों में भी अक्सर चिराग़ हमने जलाए हैं।”

धन्यवाद।

राधामोहन दास अग्रवाल का पूरा भाषण पढ़िए, वक्फ के बारे में सब कुछ खोल दिया!

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