Sunday, January 11, 2026

सोमनाथ में शौर्य का शंखनाद: गजनवी की तलवार टूटी पर शिव का संकल्प नहीं, पीएम मोदी ने लिखा नए भारत का सांस्कृतिक इतिहास

सोमनाथ में शौर्य का शंखनाद: गुजरात के प्रभास पाटन में अरब सागर के तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर भारत की केवल एक धार्मिक पहचान नहीं है,

बल्कि यह देश की आत्मा, स्वाभिमान और सभ्यतागत जागरूकता का प्रतीक है।

यह मंदिर उस भारत का प्रतिनिधित्व करता है जिसने सदियों तक आक्रमण, विध्वंस और अपमान सहा, लेकिन कभी अपनी आस्था नहीं छोड़ी।

सोमनाथ को बार-बार तोड़ा गया, पर हर बार वह पहले से अधिक दृढ़ता और भव्यता के साथ खड़ा हुआ। यही कारण है कि इसे भारत की अटूट सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक माना जाता है।

12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम: सोमनाथ का आध्यात्मिक महत्व

भारतीय शास्त्रों में भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों का वर्णन आता है और उनमें सबसे पहला नाम सोमनाथ का है “सौराष्ट्रे सोमनाथं च…”

इसका अर्थ यह है कि भारत की आध्यात्मिक यात्रा का प्रारंभ बिंदु ही सोमनाथ है। मान्यता है कि यहां शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति पापों से मुक्त होता है और आत्मिक शांति प्राप्त करता है।

प्राचीन काल में यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं था, बल्कि भारत की आर्थिक समृद्धि, समुद्री व्यापार और सांस्कृतिक वैभव का भी केंद्र था।

1026 ईस्वी: जब आस्था पर सबसे बड़ा प्रहार हुआ

सोमनाथ में शौर्य का शंखनाद: जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने सोमनाथ पर भीषण आक्रमण किया। यह हमला केवल लूट के उद्देश्य से नहीं था,

बल्कि इसका उद्देश्य भारत की आस्था और सभ्यता को तोड़ना था।

ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि मंदिर को ध्वस्त किया गया, हजारों श्रद्धालुओं की हत्या हुई और अकूत धन लूटा गया।

यह मानव इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक थी। लेकिन इसी विध्वंस ने सोमनाथ को पराजय का नहीं, प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया।

सदियों का संघर्ष: बार-बार टूटा, लेकिन फिर भी जीवित रहा

1026 के बाद भी सोमनाथ पर कई बार आक्रमण हुए। दिल्ली सल्तनत, खिलजी, मुगल और औरंगज़ेब के शासनकाल में मंदिर को बार-बार नष्ट किया गया।

लेकिन हर बार भारत के समाज ने यह साबित किया कि मंदिर तो गिर सकता है, लेकिन आस्था नहीं।

हर पीढ़ी ने अपने संसाधनों, श्रद्धा और साहस से सोमनाथ को पुनः खड़ा किया। यही निरंतरता भारत को दुनिया की सबसे प्राचीन जीवित सभ्यता बनाती है।

समय ने यह सिद्ध कर दिया कि जो शक्तियाँ सोमनाथ को मिटाने आई थीं, वे स्वयं इतिहास में विलीन हो गईं, जबकि सोमनाथ आज भी जीवित है।

यही निरंतर संघर्ष इसे भारत की अटूट आस्था और अमर चेतना का प्रतीक बनाता है।

स्वतंत्र भारत ने लिया पुनर्निर्माण का ऐतिहासिक निर्णय

सोमनाथ में शौर्य का शंखनाद: भारत की आज़ादी के बाद सोमनाथ के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया सरदार वल्लभभाई पटेल ने।

1947 में प्रभास पाटन की यात्रा के दौरान उन्होंने स्पष्ट कहा कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण राष्ट्रीय कर्तव्य है।

महात्मा गांधी की इच्छा थी कि इसका खर्च जनता उठाए, इसलिए एक ट्रस्ट बनाया गया और के.एम. मुंशी को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई।

सरदार पटेल के निधन के बाद भी मुंशी जी ने तमाम बाधाओं के बावजूद इस कार्य को पूरा किया।

1951: पुनरुत्थान के मध्य राजनीतिक टकराव

11 मई 1951 को सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण पूरा हुआ और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्राण-प्रतिष्ठा की। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस समारोह में सरकारी भागीदारी के पक्ष में नहीं थे।

वे मानते थे कि इससे भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि प्रभावित होगी। लेकिन राजेंद्र प्रसाद अडिग रहे। उन्होंने कहा कि यह उनकी व्यक्तिगत आस्था का विषय है।

यह घटना भारतीय लोकतंत्र में संविधान, संस्कृति और व्यक्तिगत विश्वास के संतुलन का उदाहरण बन गई।

वर्ष 2026 सोमनाथ के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस वर्ष 1026 के पहले आक्रमण के 1000 वर्ष और 1951 के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं।

इसी अवसर पर 8 से 11 जनवरी 2026 तक “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” का आयोजन किया जा रहा है। यह पर्व केवल स्मरण का नहीं, बल्कि आत्मगौरव और आत्मविश्वास का उत्सव है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश

सोमनाथ में शौर्य का शंखनाद: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ को केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का उद्घोष बताया है।

उनके अनुसार, सोमनाथ यह सिखाता है कि जो सभ्यताएं अपनी जड़ों से जुड़ी होती हैं, उन्हें कोई नष्ट नहीं कर सकता।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत को अपने इतिहास से शर्मिंदा नहीं, बल्कि उससे प्रेरणा लेनी चाहिए। उनका कहना है कि जो शक्तियां भारत की आस्था को मिटाने आई थीं,

वे इतिहास में केवल विनाश के प्रतीक बनकर रह गईं, जबकि सोमनाथ आज भी करोड़ों लोगों के विश्वास का केंद्र है।

प्रधानमंत्री के लिए सोमनाथ अतीत की पीड़ा नहीं, बल्कि भविष्य के आत्मविश्वास की नींव है।

वे इसे विकसित भारत 2047 की यात्रा से जोड़ते हैं जहां सांस्कृतिक गौरव, आर्थिक समृद्धि और वैश्विक नेतृत्व एक साथ आगे बढ़ते हैं।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व 2026

इस पर्व के दौरान कई ऐतिहासिक और आध्यात्मिक आयोजन हो रहे हैं। मंदिर परिसर में लगातार 72 घंटे तक ओंकार मंत्र का जाप,

सोमनाथ की रक्षा में बलिदान देने वाले वीरों की स्मृति में शौर्य यात्रा, भव्य ड्रोन शो और संतों का समागम इस आयोजन को ऐतिहासिक बनाते हैं।

प्रधानमंत्री स्वयं मंदिर ट्रस्ट की बैठक, पूजा-अर्चना और सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं।

इस पर्व के दौरान मंदिर प्रांगण में नागा साधुओं का दल और बड़ी संख्या में भक्त शामिल हो रहे हैं। मंदिर में 24 घंटे ‘ऊंकार नाथ’ का जाप चल रहा है।

सोमनाथ कार्यक्रमों के बाद प्रधानमंत्री वाइब्रेंट गुजरात क्षेत्रीय सम्मेलन में भाग ले रहे हैं, जहां निवेश, उद्योग और रोजगार पर फोकस है।

अहमदाबाद मेट्रो विस्तार और भारत-जर्मनी रणनीतिक संवाद यह दर्शाते हैं कि भारत अपनी संस्कृति को संजोते हुए आधुनिकता और वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर है।

जो आस्था से जुड़ा हो, वह अमर होता है

सोमनाथ में शौर्य का शंखनाद: सोमनाथ मंदिर हमें यह सिखाता है कि इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों के बाद भी पुनर्निर्माण संभव है।

यह मंदिर आज समुद्र के तट पर खड़ा होकर दुनिया से कहता है “मिटाने वाले मिट जाते हैं, लेकिन आस्था अमर रहती है।”

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व भारत को उसके गौरवशाली अतीत से जोड़ते हुए, आत्मविश्वास के साथ भविष्य की ओर ले जाने वाला एक राष्ट्रीय संकल्प है। यही सोमनाथ की शाश्वत गाथा है।

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Madhuri
Madhurihttps://reportbharathindi.com/
पत्रकारिता में 6 वर्षों का अनुभव है। पिछले 3 वर्षों से Report Bharat से जुड़ी हुई हैं। इससे पहले Raftaar Media में कंटेंट राइटर और वॉइस ओवर आर्टिस्ट के रूप में कार्य किया। Daily Hunt के साथ रिपोर्टर रहीं और ETV Bharat में एक वर्ष तक कंटेंट एडिटर के तौर पर काम किया। लाइफस्टाइल, इंटरनेशनल और एंटरटेनमेंट न्यूज पर मजबूत पकड़ है।
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