Thursday, February 5, 2026

बच्चों को नहीं रही ‘ना’ सुनने की आदत, ‘Six Pocket Syndrome’ से बर्बाद हो रही नई पीढ़ी

बच्चों की आदतें

हर हँसी मज़ाक या ट्रोलिंग के पीछे एक सच्चाई छिपी है जिसे हम रेत में सिर छिपाए शुतुरमुर्ग की तरह अनदेखा कर रहे हैं।

नई पीढ़ी में आ रहे गहरे बदलावों को अब समझना और समय रहते कठोर निर्णय लेकर रोकना होगा, वरना आने वाले वर्षों में समाज को इसका भारी मूल्य चुकाना पड़ेगा।

सब कुछ होने के बाद भी आज का बच्चा खुश क्यों नहीं?

घर में AC कमरा, ब्रांडेड कपड़े, गेमिंग सेटअप और महँगे खिलौने हैं, फिर भी आज का बच्चा बार बार कहता है, मैं बोर हो रहा हूँ।

उसके चेहरे से चमक गायब है, आँखों में न उत्साह है, न संतोष। सवाल यह है कि इतनी सुविधाओं के बावजूद भीतर इतनी खालीपन क्यों है?

‘Six Pocket Syndrome’, नई पीढ़ी की सबसे बड़ी गलती

पहले बच्चे एक जेब से चलते थे, अब उनके पास छह जेबें हैं, माँ, बाप, दादा, दादी, नाना और नानी की। इकलौती संतान पर सबका प्यार और पैसा तो बरसता है, पर संस्कार नहीं।

हर जेब से निकलता है पैसा, लेकिन हर चाह के साथ बढ़ता है असंतोष और अधूरी इच्छाओं का बोझ।

सुविधा ने मेहनत को निगल लिया, मोबाइल ने बचपन को

अब घरों में बच्चों को संस्कार नहीं, बल्कि सुविधाएँ दी जाती हैं। बच्चा रोया तो मोबाइल दे दिया, पढ़ाई में मन नहीं लगा तो ट्यूटर रख दिया।

परिणाम यह हुआ कि मेहनत अब उन्हें सज़ा लगती है और आराम उनका सबसे बड़ा नशा। एक्सट्रीम कम्फर्ट ज़ोन ने उन्हें अंदर से खोखला कर दिया है।

दिखावे की दुनिया में खो गया आत्मसम्मान

स्कूल में किसी दोस्त के पास नया फ़ोन है तो उसे भी चाहिए, इंस्टाग्राम पर किसी की विदेश यात्रा दिखी तो वही चाहिए।

उन्हें चीज़ों की कीमत नहीं, बस उनकी चमक चाहिए। और जब सब कुछ मिल जाता है, तब शुरू होता है ख़ालीपन, गुस्सा और असंतोष का सिलसिला।

सुविधाओं की नदी में डूबती पीढ़ी

आज के बच्चे सुविधाओं की नदी में डूब रहे हैं, पर उस पानी में गहराई नहीं, बस सतही चमक है।

उन्हें ना सुनने की आदत नहीं रही, और जब ज़िंदगी पहली बार ना कहती है, तब वे टूट जाते हैं। यह भावनात्मक नाजुकता अब एक सामाजिक संकट का रूप ले रही है।

बच्चों को दोबारा सिखाएँ कमी और संयम का मूल्य

कमी से ही मेहनत का बीज अंकुरित होता है, सीमाओं से ही संस्कार जन्म लेते हैं। हर माता पिता को याद रखना चाहिए, पैसा बच्चों का भविष्य नहीं बनाता, बल्कि बिगाड़ता है। भविष्य तब बनता है जब घर में संस्कार पैसों से पहले बोलते हैं।

अब समय है ‘Six Pocket Syndrome’ रोकने का

जरूरत है बच्चों को देने से पहले उन्हें पाने की प्रक्रिया सिखाने की। जब वे अपनी मेहनत से पहली बार कुछ कमाते हैं, तब वही पसीने की खुशबू उन्हें आत्मसम्मान सिखाती है।

जेबें चाहे छह हों या साठ, अगर दिल में अनुशासन और आदर नहीं, तो वह बच्चा कभी अमीर नहीं बन सकता, बस महँगी चीज़ों का कैदी बनकर रह जाएगा।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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