Sindh: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के हालिया बयान ने सिंध को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि भले ही आज सिंध भारत की राजनीतिक सीमाओं में शामिल नहीं है, लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से यह हमारी सभ्यता का अभिन्न अंग रहा है।
साथ ही उन्होंने इशारा किया कि सीमाएँ कब बदल जाएँ, यह कोई नहीं जानता। इस बयान ने पाकिस्तान के भीतर पहले से मौजूद बेचैनी को और बढ़ा दिया है, खासकर ऐसे समय में जब देश के कई प्रांत अलगाव की मांगों से जूझ रहे हैं और सिंध उनमें प्रमुख है।
सिंध: इतिहास, राजनीति और अलगाव की शुरुआत
Sindh: 1947 के विभाजन के बाद सिंध पाकिस्तान के हिस्से में चला गया। विभाजन से पहले सिंध में मुस्लिम आबादी लगभग 71% और सिंधी हिंदू करीब 26% थे।
पार्टिशन के दौरान बड़ी संख्या में हिंदू भारत आ गए, और जो बचे, उनकी संख्या समय के साथ और घटती चली गई। आज सिंध पाकिस्तान का तीसरा सबसे बड़ा प्रांत है, जिसकी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और भाषाई विरासत सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ती है।
परंतु सिंधियों को शुरुआत से ही यह शिकायत रही कि पाकिस्तान बनने के बाद उनके राजनीतिक अधिकार कम होते गए। यही असंतोष धीरे-धीरे एक आंदोलन का रूप लेता गया, जिसे आज हम सिंधुदेश मूवमेंट के नाम से जानते हैं।
नाराज़गी की जड़ें: संसाधन, पहचान और राजनीतिक हाशिये पर धकेलना
Sindh: सिंधी समुदाय की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि प्रांत की प्राकृतिक संपत्तियाँ —
तेल, गैस, खनिज और कराची बंदरगाह — इन सबकी कमाई पर पाकिस्तान का केंद्रीय नेतृत्व कब्ज़ा कर लेता है।
सिंधी नेताओं के अनुसार:
Sindh: सिंध की भाषा और संस्कृति को पाकिस्तान ने कभी वह दर्जा नहीं दिया, जो पंजाब को प्राप्त है।
कराची और हैदराबाद जैसे शहरों में उर्दूभाषियों के बसने से सिंधियों का सामाजिक और राजनीतिक संतुलन बिगड़ा।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सिंधी राष्ट्रवादियों के गायब होने की घटनाओं ने असंतोष को और गहरा कर दिया।
इन सबने मिलकर सिंधी जनता में “पहचान के संकट” को मजबूत किया, जिसने अलगाव की आवाज को और तीखा बना दिया।
सिंधुदेश की अवधारणा: कब शुरू हुई और किन्होंने नेतृत्व किया
1970 के दशक में जी.एम. सैयद के नेतृत्व में पहली बार सिंधुदेश की मांग ने तेज़ रूप लिया। दिलचस्प बात यह है कि इस आंदोलन की शुरुआत सिंधी मुस्लिमों ने की थी, जो यह महसूस कर रहे थे कि पाकिस्तान की सत्ता संरचना में उनकी पकड़ कमजोर होती जा रही है।
सैयद का कहना था कि “पाकिस्तान बनने के बाद से सिंधियों को उनका हक नहीं मिला।”
इस दौरान इस्लामाबाद ने आंदोलन को तोड़ने के लिए बड़ी संख्या में उर्दूभाषी आबादी को सिंध भेजा, जिससे स्थानीय सिंधियों की हिस्सेदारी और कम हो गई।
इसके विपरीत, आज आंदोलन का भावनात्मक केंद्र सिंधी हिंदू समुदाय के बीच अधिक दिखता है—क्योंकि वे लगातार हिंसा, भेदभाव, अपहरण और जबरन धर्मांतरण की घटनाओं का सामना करते रहे हैं।
सिंधुदेश की प्रस्तावित सीमा और प्रतीक
Sindh: सिंधुदेश की मांग करने वाले समूह आमतौर पर पूरे सिंध प्रांत को इस कल्पित राष्ट्र का हिस्सा बताते हैं। इसमें शामिल क्षेत्र:
कराची,हैदराबाद,लरकाना,सक्खर,मीरपुर खास,खैरपुर,बदीन,थट्टा,उमरकोट और आसपास के इलाके;
इन राष्ट्रवादी समूहों के पास एक प्रतीकात्मक झंडा भी है — लाल पृष्ठभूमि पर नीला हिस्सा, जो सिंधु नदी का प्रतीक माना जाता है।
सिंध में हिंदू समुदाय: कम होती आबादी और बढ़ते खतरे
आज सिंध में हिंदू आबादी लगभग 7% बताई जाती है, हालांकि यह आंकड़ा अक्सर विवाद में रहता है।
समस्याएँ जिनकी रिपोर्टें लगातार आती हैं:
नाबालिग लड़कियों का अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन,जमीनों पर जबरन कब्जे,बंधुआ मजदूरी,पुलिस और अदालतों द्वारा पर्याप्त संरक्षण न मिलना
यही वो कारण हैं जिनके चलते सिंध में अल्पसंख्यक समुदाय लगातार असुरक्षा महसूस करता है।
क्या सिंध भारत के साथ आने की इच्छा रखता है?
सिंध के कई संगठन एक स्वतंत्र देश की मांग करते हैं। कुछ समूहों की यह भी सोच है कि सांस्कृतिक रूप से वे भारत के बेहद करीब हैं, और यदि पाकिस्तान उनकी आवाज नहीं सुनेगा तो भारत उनका समर्थन कर सकता है।
हालांकि- यह आधिकारिक मांग नहीं है
भारत ने कभी खुलकर सिंधुदेश आंदोलन का समर्थन नहीं किया
कूटनीतिक रूप से भारत पाकिस्तान के “आंतरिक मामलों” में दखल का संकेत नहीं देना चाहता
इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए भारत हमेशा ऐसी मांगों पर औपचारिक टिप्पणी करने से बचता रहा है।
लेकिन राजनाथ सिंह के बयान ने पाकिस्तान के भीतर यह आशंका जरूर बढ़ा दी है कि भारत भविष्य में सिंध को लेकर कोई राजनीतिक रुख बदल सकता है।
क्या सिंध भविष्य में पाकिस्तान से अलग होगा?
अलगाववाद की भावना मौजूद है, आंदोलन भी ज़िंदा है, और असंतोष भी बढ़ा है।
लेकिन वास्तविकता यह है कि:
पाकिस्तान की सेना इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी
अंतरराष्ट्रीय मंच भी तत्काल अलगाव का समर्थन नहीं करता
सिंधुदेश की नेतृत्व-एकजुटता अभी कमजोर है
इसलिए, स्थिति जटिल है, लेकिन पूरी तरह असंभव भी नहीं — और यही बात पाकिस्तान को सबसे ज्यादा परेशान करती है।

