सिक्किम
भारतीय संसदीय व्यवस्था में सिक्किम विधानसभा अपनी 32 सीटों के साथ एक विशिष्ट स्थान रखती है। इनमें से 32वीं सीट किसी भौगोलिक क्षेत्र से नहीं जुड़ी, बल्कि यह बौद्ध मठवासी समुदाय के लिए विशेष रूप से आरक्षित एक गैर-क्षेत्रीय सीट है।
सिक्किम संघ सीट क्या है
सिक्किम की शेष 31 सीटें राज्य के चार जिलों में फैले भौगोलिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जबकि संघ सीट पूरे राज्य को अपने दायरे में समेटती है। यह सीट सिक्किम की बौद्ध विरासत के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संरक्षकों को विधायी मंच पर उपस्थिति देती है।
चोग्याल काल से जुड़ी ऐतिहासिक विरासत
इस संस्था की जड़ें सिक्किम के पूर्व राजवंश चोग्याल के शासनकाल में हैं। उस दौर में इसे इसलिए स्थापित किया गया था ताकि संघ यानी मठवासी समुदाय की शासन व्यवस्था में औपचारिक भागीदारी सुनिश्चित हो सके। यह व्यवस्था सिक्किम की परंपरागत समाज में धर्म और राजसत्ता के गहरे समन्वय को दर्शाती थी।
जब 1975 में सिक्किम का भारत में विलय हुआ, तब इस विशेष प्रावधान को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371F(f) के तहत संरक्षित किया गया। इस संरक्षण से न केवल मठों के अधिकार बचे रहे, बल्कि भूटिया-लेप्चा समुदाय की विशिष्ट पहचान भी सुरक्षित रही।
यह सीट उस ऐतिहासिक 17-सूत्रीय समझौते की जीवंत कड़ी है, जिसने सिक्किम को भारत से जोड़ते हुए उसकी पारंपरिक संस्थाओं का सम्मान किया। यह समझौता सिक्किम की अस्मिता और भारत की एकता के बीच एक सेतु का काम करता रहा है।
मतदाता: संख्या में कम, महत्व में अपार
संघ सीट पर मतदान का अधिकार केवल सिक्किम के 111 मान्यता प्राप्त मठों में पंजीकृत भिक्षुओं और भिक्षुणियों को है। वे ही इस सीट पर चुनाव भी लड़ सकते हैं। 2024 में इस सीट पर कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 3,293 थी।
इस मतदाता वर्ग में लैंगिक असंतुलन स्पष्ट रूप से दिखता है। कुल मतदाताओं में 3,224 पुरुष भिक्षु हैं, जो करीब 97.9 प्रतिशत हैं, जबकि महिला भिक्षुणियों की संख्या मात्र 69 यानी 2.1 प्रतिशत है। इस अनुपात से मठवासी समाज की आंतरिक संरचना का स्पष्ट प्रतिबिंब सामने आता है।
मतदान की प्रक्रिया भी अनूठी है। राज्य के सभी छह जिलों में विशेष रूप से मतदान केंद्र स्थापित किए जाते हैं। ये मतदाता किसी एक क्षेत्र के निवासी के रूप में नहीं, बल्कि मठवासी समुदाय के सदस्य के रूप में अपना मत डालते हैं।
संघ सीट का प्रतिनिधित्व: 1974 से 2024 तक
इस सीट पर पिछले पांच दशकों में कई महत्वपूर्ण प्रतिनिधि चुने गए। 1974 में कर्मा ग्यात्सो लासो ने सिक्किम नेशनल कांग्रेस की ओर से यह सीट जीती। 1979 में लाचेन गोम्चेन रिनपोछी ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की।
1985 से 1994 के बीच सिक्किम संग्राम परिषद के नामखा ग्यालत्सेन ने लगातार तीन बार इस सीट पर अपना दबदबा बनाए रखा। 1999 में पाल्डेन लामा निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुने गए। 2004 से 2009 तक सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट की ओर से त्शेरिंग लामा और फेतु त्शेरिंग भूटिया ने प्रतिनिधित्व किया।
2014 से अब तक सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा के सोनम लामा लगातार तीन बार यानी 2014, 2019 और 2024 में इस सीट से विजयी रहे हैं। वर्तमान में वे राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में धार्मिक मामलों का दायित्व संभाल रहे हैं।
विधानसभा की संरचना में संघ सीट की स्थिति
सिक्किम विधानसभा की कुल 32 सीटों में 17 सामान्य सीटें हैं, 12 सीटें भूटिया-लेप्चा समुदाय के लिए आरक्षित हैं और 2 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए रखी गई हैं। इस पूरे ढांचे में एकमात्र संघ सीट गैर-क्षेत्रीय और पूरी तरह से मठवासी समुदाय के लिए समर्पित है।
यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि एक हिमालयी बौद्ध राज्य के रूप में सिक्किम की पहचान में मठवासी आवाज केंद्रीय भूमिका निभाती रहे। यह अनूठी सीट भारत के संघीय लोकतंत्र में धार्मिक-सांस्कृतिक विविधता के सम्मान का एक असाधारण उदाहरण है।

