Tuesday, February 17, 2026

​सीधी हत्याकांड: 75 वर्षीय पुजारी की ‘ISIS स्टाइल’ में गला रेतकर हत्या; वैचारिक नफरत और तुष्टिकरण की राजनीति पर उठे गंभीर सवाल

सीधी पुजारी हत्याकांड

मध्य प्रदेश का सीधी जिला, जो अपनी शांति और सांस्कृतिक धरोहर के लिए जाना जाता है, महाशिवरात्रि के पावन पर्व के ठीक बाद एक ऐसी नृशंस घटना का साक्षी बना जिसने पूरे हिंदू समाज की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है।

कुसमी इलाके में 75 वर्षीय पुजारी इंद्रभान द्विवेदी की हत्या केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि यह उस वैचारिक जहर का खूनी अध्याय है, जो अब भारत के गांवों तक पहुंच चुका है।

सोमवार की सुबह, जब एक वृद्ध पुजारी अपने आराध्य की सेवा कर लौट रहे थे, तब उन्हें उसी बर्बरता का शिकार होना पड़ा जो अक्सर हम कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार या ISIS के वीडियो में देखते आए हैं।

छाती पर पैर और गर्दन पर वार, क्रूरता की पराकाष्ठा

​प्रत्यक्षदर्शियों और पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक, यह वीभत्स घटना सोमवार सुबह करीब 9 बजे की है। 75 वर्षीय इंद्रभान द्विवेदी, जो स्थानीय हनुमान मंदिर में पुजारी थे, अपनी नियमित पूजा-अर्चना समाप्त कर घर लौट रहे थे।

तभी आरोपी कामता प्रसाद उर्फ लाला केवट, जो पेशे से मीट की दुकान चलाता है, मोटरसाइकिल पर सवार होकर आया और उन पर सुनियोजित हमला किया।

आरोपी ने पहले बुजुर्ग पुजारी को उनकी मोपेड से धक्का देकर गिराया। जब वे सड़क पर गिर पड़े, तो आरोपी ने उनकी छाती पर पैर रखकर उन्हें दबोच लिया और धारदार हथियार (बका) से उनकी गर्दन काट दी।

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नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट

हैवानियत यहीं नहीं रुकी; तड़पते हुए वृद्ध पुजारी के सीने और गले पर 8 से अधिक वार किए गए, जिससे मौके पर ही उनकी मृत्यु हो गई।

​आरोपी की मानसिकता: ‘जातिगत घृणा’ और वैचारिक कंडीशनिंग?

​स्थानीय निवासियों के अनुसार, आरोपी लाला केवट के मन में पूजा-पाठ और विशेषकर ब्राह्मण समाज के प्रति गहरी घृणा थी।

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मृतक पंडित इन्द्रभान द्विवेदी

बताया जा रहा है कि वह कथित तौर पर आम्बेडकरवादी, फूलेवादी, पेरियारवादी और जातिगत राजनीति की कट्टरपंथी विचारधारा से लंबे समय से प्रेरित था।

इस वैचारिक कंडीशनिंग ने उसके भीतर हिंदू रीति-रिवाजों और पूजा-पाठ करने वालों के प्रति अकारण घृणा भर दी थी, जिसे वह अक्सर गालियों और अपमान के रूप में व्यक्त करता था।

आरोपी लाला केवट के लिए एक निहत्थे बुजुर्ग पुजारी उसकी नफरत का प्रतीक बन गए थे। जब यह वैचारिक नफरत हिंसा में बदलती है, तो ऐसी बर्बरता होती है, जहाँ एक निर्दोष व्यक्ति को केवल उसके धार्मिक पहचान के कारण मार दिया जाता है।

तुष्टिकरण का ‘फ्रेंकस्टीन’ और असुरक्षित सामान्य वर्ग

​यह घटना मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था पर एक तीखा प्रहार है। विश्लेषकों का मानना है कि राजनीतिक दलों द्वारा वोट बैंक की खातिर जिस तरह का वातावरण तैयार किया गया है, उसने अपराधी तत्वों को निडर बना दिया है।

आज के दौर में तथाकथित सामाजिक न्याय की आड़ में एक ऐसा वर्ग तैयार किया जा रहा है, जिसके लिए सामान्य वर्ग और विशेषकर ब्राह्मणों के खिलाफ हिंसा करना एक सामान्य घटना बन गई है।

भाजपा जो धर्म की रक्षा का दम भरती है, वह भी अब सत्ता की राजनीति और सेक्युलर नैरेटिव को बनाए रखने के चक्कर में अपने ही मूल आधार को असुरक्षित छोड़ चुकी हैं।

कश्मीरी हिंदुओं के पलायन से लेकर सीधी में पुजारी की हत्या तक, राज्य मशीनरी सामान्य वर्ग की सुरक्षा करने में पूरी तरह विफल दिखाई देती है।

सरकार की UGC विनियम जैसी विभाजनकारी नीतियां और एट्रोसिटी एक्ट जैसे कानूनों का दुरुपयोग समाज में एक तरफा भय का माहौल पैदा कर रहा है।

नरेन्द्र मोदी की बदले की राजनीति से भड़का आक्रोश?

जानकारों के अनुसार मोदी सरकार द्वारा लगातार एट्रोसिटी लिटरेचर का प्रचार प्रसार इसमें बड़ी भूमिका निभा रहा है। खुद प्रधानमंत्री कई बार हिसाब चुकता करने की बात कर चुके हैं। उनका एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वे भारत माता की जय रुकवाकर उग्रता के साथ जय भीम का नारा लगवा रहे हैं,

वीडियो में पीएम नरेन्द्र मोदी कह रहे हैं, “एक महापुरुष जिसको इतना जुल्म सहना पड़ा हो, जिसका बचपन अन्याय उपेक्षा और उत्पीड़न से बीता हो, जिसने अपनी मां को अपना में अपमानित होते देखा हो, मुझे बताइए ऐसे व्यक्ति को मौका मिल जाए तो हिसाब चुकता करेगा कि नहीं करेगा? तुम तुम मुझे पानी नहीं भरने देते थे? तुम मुझे मंदिर नहीं जाने देते थे? तुम मेरे बच्चों को स्कूल में एडमिशन देने से मना करते थे? मनुष्य का जो लेवल है ना वहां यह बहुत स्वाभाविक है! लेकिन जो मानव से कुछ ऊपर है वह बाबा साहब अंबेडकर थे”

यहाँ पीएम मोदी कह रहे हैं कि सामान्य व्यक्ति को मौका मिल जाए तो वह हिसाब चुकता कर देगा! कहीं यही सोच तो ऐसे हिंसक बदले लेने को नहीं उकसा रही है? क्योंकि पीएम मोदी खुद मां रहे हैं कि डॉ. अम्बेडकर सामान्य नहीं थे इसलिए उन्होंने हिसाब चुकता नहीं किया! परन्तु हर किसी सामान्य मनुष्य से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती, जिसे ऐसी विषैली विचारधारा से भरा गया हो। यहाँ पीएम मोदी के चेहरे के हाव भाव भी बेहद उग्र और भडकाऊ नजर आ रहे हैं।

धर्म के खिलाफ युद्ध और भविष्य की चुनौती?

घटना के बाद से ही सामाजिक माहौल पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ा है। सोशल मीडिया पर ऐसे ट्वीट्स का अंबार है जो इसे धर्म के खिलाफ युद्ध के रूप में देख रहा है।

आक्रोशित भीड़ की मांग पर प्रशासन ने आरोपी के घर और मीट की दुकान को सील कर दिया है, लेकिन सवाल वही है कि क्या प्रशासनिक कार्रवाई उस मानसिकता को कुचल पाएगी जो एक बुजुर्ग पुजारी की छाती पर पैर रखकर गला रेतने की प्रेरणा देती है?

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Samudra
Samudra
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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