Tuesday, February 17, 2026

मिस्र की शाही समाधियों में मिले तमिल ब्राह्मी अभिलेख, 2000 साल पहले भारत से होता था व्यापार!

मिस्र में मिले तमिल ब्राह्मी अभिलेख

मिस्र के वैली ऑफ द किंग्स स्थित शाही मकबरों में लगभग 30 अभिलेखों की पहचान ने प्राचीन भारतीय सभ्यता की वैश्विक उपस्थिति पर नई रोशनी डाली है।

अभिलेखों में अधिकांश तमिल ब्राह्मी लिपि में हैं और ये पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी के बीच रोमन मिस्र में तमिलों की सक्रिय उपस्थिति की पुष्टि करते हैं।

यह खोज केवल समुद्री व्यापार के संकेत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रमाणित करती है कि तमिल यात्री और व्यापारी नील घाटी के भीतरी हिस्सों तक पहुंचे थे।

उन्होंने शाही समाधियों की दीवारों पर अपने नाम उकेरे, जो ग्रीक और लैटिन अभिलेखों के साथ आज भी संरक्षित हैं।

2024–25 के अध्ययन में छह समाधियों का सर्वेक्षण

इन अभिलेखों की पहचान 2024 और 2025 में किए गए एक गहन अध्ययन के दौरान की गई। इस शोध का नेतृत्व पेरिस स्थित फ्रेंच स्कूल ऑफ एशियन स्टडीज की प्रोफेसर शार्लोट श्मिड और लॉज़ेन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर इंगो स्ट्राउच ने किया। उन्होंने थेब्स के निकट थेबन नेक्रोपोलिस की छह समाधियों का दस्तावेजीकरण किया।

शोधकर्ताओं ने 1926 में वैली ऑफ द किंग्स का सर्वेक्षण करने वाले फ्रांसीसी विद्वान जूल्स बैयलेट के कार्य को आगे बढ़ाया।

बैयलेट ने दो हजार से अधिक ग्रीक ग्रैफिटी चिह्न दर्ज किए थे, किंतु भारतीय अभिलेखों की पहचान पहली बार अब हुई है।

लगभग 30 अभिलेख, जिनमें 20 तमिल ब्राह्मी में

दर्ज किए गए लगभग 30 अभिलेखों में से करीब 20 तमिल ब्राह्मी लिपि में हैं, जो तमिल भाषा के लेखन की सबसे प्राचीन ज्ञात लिपि मानी जाती है।

शेष अभिलेख प्राकृत, संस्कृत और गांधारी खरोष्ठी में पाए गए, जिससे स्पष्ट होता है कि भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न क्षेत्रों से लोग यहां पहुंचे थे।

इन अभिलेखों में उत्तर पश्चिमी, पश्चिमी और दक्षिणी भारत से आए व्यक्तियों की उपस्थिति दर्ज है, जिनमें दक्षिण भारत के तमिल क्षेत्र से आने वालों की संख्या अधिक रही।

यह व्यापक और परस्पर जुड़ी भारतीय महासागरीय व्यापारिक व्यवस्था की ओर संकेत करता है।

‘सिकै कोर्रन’ नाम की आठ बार उपस्थिति

तमिल ब्राह्मी अभिलेखों में ‘सिकै कोर्रन’ नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह नाम पांच अलग अलग समाधियों में आठ बार उकेरा गया है।

कुछ स्थानों पर यह प्रवेश द्वार के समीप और कुछ स्थानों पर आंतरिक दीवारों पर ऊंचाई पर अंकित मिला, जिनमें एक अभिलेख लगभग चार मीटर की ऊंचाई पर पाया गया।

एक अभिलेख में “आया और देखा” के अर्थ वाला वाक्यांश दर्ज है, जो ग्रीक अभिलेखों में प्रचलित सूत्र से मेल खाता है।

इसी प्रकार एक अन्य तमिल अभिलेख में “कोपान वरत कंतन” अंकित है, जिसका अर्थ है “कोपान आया और देखा”।

नामों का भाषिक और ऐतिहासिक संदर्भ

प्रोफेसर श्मिड के अनुसार ‘सिकै कोर्रन’ नाम का पहला भाग संस्कृत शब्द शिखा से संबंधित हो सकता है, जिसका अर्थ चोटी या मुकुट है।

दूसरा भाग ‘कोर्रन’ विशुद्ध तमिल मूल का है, जो ‘कोर्रम’ धातु से निकला है और जिसका अर्थ विजय तथा वध से जुड़ा है।

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मिस्र की शाही समाधियों में मिले तमिल ब्राह्मी अभिलेख, 2000 साल पहले भारत से होता था व्यापार! 2

इसी मूल से चेरा योद्धा देवी ‘कोर्रवई’ और ‘कोर्रवन’ शब्द जुड़े हैं, जिसका अर्थ राजा होता है। यह नाम संगम साहित्य में भी मिलता है, जहां ‘पुरनानूरु’ में प्रशंसित चेरा नरेश पिट्टांकोर्रन को सीधे ‘कोर्रन’ कहकर संबोधित किया गया है।

बेरनिके और अन्य पुरातात्विक साक्ष्य

‘कोर्रन’ नाम मिस्र में पहले भी मिला है। 1995 में लाल सागर तट के प्राचीन बंदरगाह शहर बेरनिके में एक मिट्टी के टुकड़े पर ‘कोर्रपुमान’ नाम अंकित पाया गया था।

बेरनिके रोमन मिस्र और हिंद महासागर विश्व के बीच एक प्रमुख द्वार के रूप में कार्य करता था।

अब वैली ऑफ द किंग्स जैसे आंतरिक शाही स्थलों पर तमिल ब्राह्मी अभिलेखों की उपस्थिति इस धारणा का विस्तार करती है कि तमिल उपस्थिति केवल तटीय व्यापारिक केंद्रों तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे सांस्कृतिक और राजकीय स्थलों तक भी पहुंचे थे।

संस्कृत अभिलेख में क्षहरात वंश का उल्लेख

एक संस्कृत अभिलेख में क्षहरात वंश के एक राजा के दूत के यहां आने का उल्लेख मिलता है। इससे संकेत मिलता है कि व्यापारी, दूत और शासकीय प्रतिनिधि सभी इन समुद्री और स्थलीय आदान प्रदान में शामिल थे। यह समुद्री वैश्वीकरण का प्रारंभिक रूप था, जो रोमन काल में सक्रिय था।

तमिलनाडु सरकार की प्रतिक्रिया

तमिलनाडु के वित्त और पुरातत्व मंत्री थंगम थेन्नारसु ने इस खोज को तमिल सभ्यता की वैश्विक पहचान का सशक्त प्रमाण बताया।

उन्होंने कहा कि दो हजार वर्ष पुराने तमिल ब्राह्मी अभिलेखों का मिस्र की शाही समाधियों में मिलना इस बात को रेखांकित करता है कि तमिल व्यापारी प्राचीन वैश्विक व्यापार नेटवर्क में गहराई से जुड़े थे।

उन्होंने इसे इस तथ्य का प्रमाण बताया कि रोमन काल के दौरान भी तमिल लोग समुद्र पार कर मिस्र पहुंचे थे और वैश्वीकरण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। यह खोज वैश्विक तमिल समुदाय की ऐतिहासिक जड़ों को और अधिक सुदृढ़ करती है।

सांस्कृतिक उपस्थिति और साक्षर परंपरा का प्रमाण

इन अभिलेखों का सामूहिक महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। ये तमिलों की साक्षरता, सांस्कृतिक सहभागिता और स्मारकों में उपस्थिति दर्ज करने की परंपरा का भी प्रमाण हैं।

ग्रीक और लैटिन ग्रैफिटी के साथ तमिल ब्राह्मी अभिलेखों की उपस्थिति एक साझा यात्रिक संस्कृति की ओर संकेत करती है।

इस प्रकार वैली ऑफ द किंग्स में मिले ये अभिलेख प्राचीन तमिल उपस्थिति का दुर्लभ और ठोस प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, जो भूमध्यसागरीय विश्व में उनकी सक्रिय भागीदारी, सांस्कृतिक संपर्क और ऐतिहासिक विस्तार को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।

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Samudra
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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