Saturday, March 14, 2026

साध्वी ऋतम्भरा: जिन्होंने हिला दी थीं मिशनरी आइकॉन मदर टेरेसा की चूलें

साध्वी ऋतम्भरा जी ने अपने जीवन में एक प्रतिज्ञा की कि मैं अनाथ बच्चों की सेवा करके मदर टेरेसा नाम के बुलबुले को फोड़ दूंगी। अनाथ बच्चों का धर्मान्तरण रोकना मेरे जीवन का लक्ष्य होगा, मैं वात्सल्य ग्राम की स्थापना करूंगी।

मदर टेरेसा अनाथों की आड़ में ज़बरन धर्मपरिवर्तन, गर्भपात, महिलाधिकारों का हनन, तानाशाही, अपराधियों का समर्थन कर उनसे पैसा लेना जैसे कृत्य करती थी। जियानलुइगी नुज़ी नाम की पत्रकार ने तो खुलासा किया था कि वेटिकन के एक बैंक में मदर टेरेसा ने चैरिटी के नाम पर अरबों डॉलर इकट्ठे कर रखे थे।

परन्तु अरबों डॉलर होने पर भी ग़रीबों का इलाज न कराकर उन्हें पीड़ा सहन करने को कहती थी, पर जब खुद बीमार पड़ीं सबसे उच्च अस्पताल में इलाज कराया। दुनिया भर से दान वसूलने के बावजूद टेरेसा के संस्थानों की हालत दयनीय थी। धर्मान्तरणकारी मदर टेरेसा को पश्चिम ने 1979 में नोबल से पुरस्कृत किया, और 1980 में उसे भारतरत्न दे दिया गया।

साध्वी ऋतंभरा हुईं थीं मदर टेरेसा की पोल खोलने पर गिरफ्तार

मदर टेरेसा के इस पाखण्ड को उसके जीवित रहते साध्वी ऋतम्भरा ने अप्रैल 1995 में इंदौर की सभा में एक्सपोज़ कर दिया और उसे जादू के नाम पर धर्मान्तरण करने वाली घोषित कर दिया। उस समय चर्च की भारतीय शाखा के समान कार्य करने वाली कांग्रेस के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का शासन मप्र में था, जिसे अपनी मदर टेरेसा का अपमान सहन नहीं हुआ और साध्वी ऋतम्भरा समेत 169 हिन्दुओं को जेल में ठूंस दिया।

image 4
साध्वी ऋतम्भरा: जिन्होंने हिला दी थीं मिशनरी आइकॉन मदर टेरेसा की चूलें 4

इसी मदर टेरेसा के इतने कुकृत्य होने के उपरान्त भी पोप ने उसे सन्त घोषित कर दिया और भारत में स्कूलों में जबरन उसे वात्सल्य की मूर्ति के रूप में पढ़ाया जाता रहा। मदर टेरेसा की छत्रछाया में भारत की हिन्दू विरोधी वामपंथी शक्तियां भी फलती फूलती रहीं इसलिए वर्तमान के सभी वामपंथी अपने आपको मदर टेरेसा का कर्जदार मानते हैं।

तब साध्वी ऋतम्भरा ने प्रतिज्ञा की कि पन्ना धाय के देश में एक कपटी स्त्री वात्सल्य की मूर्ति के रूप में स्थापित की जाए यह एक बहुत बड़ा षड्यन्त्र है और उन्होंने हिन्दुत्व की रेखा इस क्षेत्र में बड़ी करने की ठान ली, जिसमें सपा, कांग्रेस आदि सब रोड़े अटकाते रहे।

पर उन्होंने अपने आपको इस एक असहाय बच्चों व महिलाओं की सुरक्षा के कार्य में पूर्णतः झोंक दिया। उसी का परिणाम निकला वात्सल्य ग्राम। वह इंदौर, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश में त्यक्त शिशुओं, महिलाओं और विधवाओं के लिए आश्रम भी चलाती हैं ।

ये कैसा हिन्दू समाज है जो साध्वी ऋतम्भरा को न्यून करने की कोशिश कर रहा है, जिस साध्वी के प्रयास से मदर टेरेसा का प्रोजेक्ट न्यून हो गया, अनाथों के क्षेत्र में मिशनरियों के कथित अहसान से हिन्दू समाज को मुक्ति मिली।

image 2
साध्वी ऋतम्भरा: जिन्होंने हिला दी थीं मिशनरी आइकॉन मदर टेरेसा की चूलें 5

पर हिन्दू समाज इतना कृतघ्न है कि उनके एक सामान्य से बयान, जिसमें वे हिन्दू समाज के ही संघर्ष को, अपमान को याद कर रही हैं, उसके आधार पर उनके जाति, लिंग, चरित्र का ऐसा वीभत्स चीरहरण करने लगा। हर प्रकार से कैसे भी साध्वी ऋतम्भरा जिस एक छोटी पर हिन्दुत्व के प्रति समर्पित बालिका को उसके गुरु स्वामी परमानंद गिरिजी ने ऐसे दिव्य संकल्पों को पूरा कर देने वाली बना दिया, उस भगवती का चीरहरण निकृष्ट नराधमों ने किया।

यहां हिन्दू समाज का चरित्र भी दिख जाता है कि कैसे वेटिकन मदर टेरेसा जैसी कपटी को भी अपने लाभ के लिए सन्त घोषित कर देता है और कैसे कुछ हिन्दू एक परमवात्सल्यमयी माता का भी चरित्रहनन करते हैं। क्या यह भगवती के उपासकों का देश है?

वही खोखला अहं, वही ईर्ष्या, सम्मिलित होकर कार्य करने की शक्ति का अभाव, गुलाम जाति का स्वभाव है, परन्तु हमें इसे उखाड़ फेंकने की चेष्टा करनी चाहिए। यही terrible jealousy हमारे समाज की प्रधान characteristic है।

कौन हैं मां साध्वी ऋतम्भरा ?

अनुसूया, विश्ववारा, सती ब्रह्मवादिनियों को तो मैंने नहीं देखा, पर यह हमारा सौभाग्य है कि हमारे समय में मां साध्वी ऋतम्भरा विराजमान हैं।

उनकी वाणी के एक एक शब्द से करुणा टपकती है। शब्द प्रतिशब्द ऐसा लगता है कि अभी वे भावोद्रेक से रो पड़ेंगी। हृदय के भावतल में ही वे सदा आसीन रहती हैं। एक एक शब्द वे हृदय से बोलती हैं, करुणा से ओतप्रोत होकर बोलती हैं। कैसा भी रागद्वेष हानिलाभ यशोपयश का भाव उन्हें छू भी नहीं गया है।

विवेकानंद का वो भावनाओं से भरा हृदय यदि किसी स्त्री में होता, तो वे शायद ऋतम्भरा ही होतीं, जिसे अपने समाज के अनाथों और असहायों की चिंता थी, तीव्र धार्मिक स्वाभिमान के साथ, शेर के समान। ऋत से तो वे लबालब भरी हुई ही हैं, करुणा से भी आप्लावित हो रही हैं। पुराने समय में जो माँ आनंदमयी जैसी माताओं का वर्णन मिलता है, वह मैं मां ऋतम्भरा में ही देखता हूँ। ऐसी साध्वी की वाणी निष्फल भी नहीं जाती।

image 3

मेरे नानाजी ने बताया था कि राममन्दिर के लिए एक एक रुपया झोली फैलाकर इकट्ठा किया करती थीं साध्वी ऋतम्भरा जी गली गली धूप में घूम घूमकर, यह कहकर कि इतने हिन्दू एक एक रुपया दे दें तो भव्य मन्दिर निर्माण को इतने करोड़ रुपए हो जाएंगे…

आज जैसे आसान समय में नहीं बल्कि उस समय जब हिंदुत्व एक अपराध समझा जाता था, और “परिंदा भी पर नहीं मार सकता” कहकर धमकाने वाले शासन करते थे…

तभी मां ऋतम्भरा के आगे तो पूरा इतिहास डोल गया होगा, बोलीं, कितना अपमान सहकर यहां पहुंचे हैं। कभी महसूस नहीं कर पाओगे, कि कितने कष्ट के बाद उनके मुंह से ये बोल फूटा होगा, अनुभव नहीं किया ना वह इतिहास।

“स्त्रियाःसमस्तास्तव देविभेदाः।” कहा है, कठिन है बहुत। पर कोई कोई विभूति होती है जिसमें जगन्माता के दर्शन हो जाते हैं, मुझे मां साध्वी ऋतम्भरा में दर्शन होते हैं। उनके मुखमण्डल पर सिर्फ भोलापन ही दिखता है, सभी के लिए वात्सल्य ही दिखता है।

उनके गुरुदेव स्वामी श्री परमानंद गिरिजी महाराज बहुत बड़े वेदान्ती ब्रह्मवादी महात्मा हैं। वेदान्त के ऐसे ज्ञाता भी दुर्लभ ही हैं। उनका अद्वैत जीवंत अद्वैत है, क्षुद्र हृदय वालों जैसा नहीं कि सिद्धांत में कुछ और व्यवहार में उससे उलट।

WhatsApp Channel Join Now
Telegram Channel Join Now
Samudra
Samudra
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
- Advertisement -
- Advertisement -

Latest article