Friday, February 6, 2026

स्वतंत्रता दिवस पर राहुल-खड़गे की ‘रॉयल अनुपस्थिति’

इस बार के स्वतंत्रता दिवस समारोह में संसद के दोनों सदनों के नेता प्रतिपक्ष, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे, नदारद रहे।

इस शाही अनुपस्थिति ने पूरे समारोह के माहौल में एक सवालिया सन्नाटा भर दिया, आख़िर क्या वजह थी कि देश के सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच के विपक्षी सरदारों ने तिरंगे के सम्मान में कदम नहीं बढ़ाए?

शायद इनके लिए असली भारत ‘इंदिरा भवन’ की चारदीवारी के भीतर ही शुरू होकर वहीं समाप्त हो जाता है, और वहाँ ये खुद को ‘राजा’ मानकर ही चलते हैं।

राष्ट्रगौरव बनाम ‘फ्रंट रो’ की कुर्सी

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राहुल-खड़गे की असली समस्या तिरंगा या राष्ट्रगौरव नहीं, बल्कि कुर्सी की पंक्ति है।

अगर इन्हें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले या राष्ट्रपति भवन में फ्रंट रो में स्थान न मिले, तो ये अपने शाही साए तक को कार्यक्रम में नहीं भेजते।

मानो राष्ट्रप्रेम का मापदंड केवल इस बात पर निर्भर हो कि कैमरे के सामने कितनी देर और किस एंगल से दिखा गया।

कांग्रेस की ‘वंशवादी’ विरासत का मोह

पुराने कांग्रेसी नेताओं को याद करते हुए कई लोग कहते हैं कि नेहरू जी ने संविधान में यह प्रावधान क्यों नहीं जोड़ा कि चाहे पार्टी सत्ता में हो या न हो, झंडा फहराने का सम्मान और सबसे आगे बैठने का अधिकार सिर्फ नेहरू-गांधी खानदान के ‘राजकुमारों’ के लिए आरक्षित होगा।

इंदिरा गांधी भी अगर यह ‘संशोधन’ कर देतीं, तो शायद आज राहुल और खड़गे को इतने अपमानजनक ‘बैक रो’ का सामना ही न करना पड़ता।

जनता से दूर और राजनीति में खोई चमक

यह वही कांग्रेस है, जिसने कभी जनता की नब्ज़ पर हाथ रखा था, और अब वही जनता मान रही है कि पार्टी के नेता देश के गौरवमयी अवसरों से अधिक अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और शाही तामझाम को अहमियत देते हैं।

अगर स्वतंत्रता दिवस जैसा राष्ट्रीय पर्व भी इनकी ‘प्रोटोकॉल पॉलिटिक्स’ की भेंट चढ़ जाए, तो जनता इन्हें राष्ट्रहित में कैसे गंभीर माने?

जब तक कांग्रेस यह ‘दरबारी मानसिकता’ नहीं छोड़ेगी, तब तक उसकी राष्ट्रीय राजनीति में वापसी महज़ एक सपना ही रहेगी।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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