Wednesday, January 28, 2026

साइप्रस यात्रा: तुर्की को पीएम मोदी का कूटनीतिक सामरिक जवाब

जब सवाल पूछा गया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की खुफिया सेवा भारत की कार्रवाई का अनुमान क्यों नहीं लगा पाई, तो प्रधानमंत्री मोदी का ठहाके के साथ दिया गया उत्तर एक रणनीतिक व्यंग्य था, जिसने विरोधियों की परंपरागत सोच और दुश्मनों की सीमित समझ को मात देना सीख लिया है।

यह वही मोदी हैं जिनके शासन में भारत की विदेश नीति ‘प्रतिक्रिया’ से बदलकर ‘रणनीति’ में रूपांतरित हो चुकी है, वह भी बिना शोर किए, बिल्कुल उस एकलव्य की तरह जो अपने लक्ष्य पर निशाना लगाता है, न कि सबको बताता है कि वह लक्ष्य साध रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर और उसकी छाया में तुर्की की भूमिका

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारत के सीमांत क्षेत्रों में तुर्की-निर्मित “सोनगार ड्रोन” से कई हमले किए, जो भारतीय वायु रक्षा प्रणाली के सामने असफल सिद्ध हुए। इन हमलों के पीछे तुर्की की प्रत्यक्ष सैन्य साझेदारी थी।

यह वही तुर्की था जिसे भारत ने फरवरी 2023 के विनाशकारी भूकंप में मानवीय आधार पर सबसे पहले सहायता भेजी थी, विशेषज्ञों की टीम, राहत सामग्री के साथ। लेकिन जब अर्दोआन ने खुलेआम “पाकिस्तान-तुर्की दोस्ती ज़िंदाबाद” लिखा, तब यह भारत के मुंह पर तमाचा था।

तुर्की का अपमान और साइप्रस की पृष्ठभूमि

तब भारत ने न निर्णयों की घोषणा की, न मंचों पर आरोप लगाए। उसने चुपचाप प्रतीक्षा की, और फिर आया साइप्रस। भूमध्य सागर का यह द्वीपीय देश वर्षों से तुर्की के सैन्य अतिक्रमण से जूझ रहा है।

1974 में तुर्की ने यूनानी मूल की सरकार के विरुद्ध ‘संवेदनशीलता’ के नाम पर साइप्रस के उत्तर क्षेत्र पर आक्रमण किया था और वरोशा जैसे शहरों पर कब्ज़ा कर लिया था। आज भी तुर्की वहाँ 35,000 सैनिकों की उपस्थिति बनाए रखे हुए है और उस क्षेत्र को ‘स्वतंत्र राष्ट्र’ घोषित कर चुका है, जिसे तुर्की के अलावा कोई देश मान्यता नहीं देता।

मोदी की यात्रा: एक वाणिज्यिक योजना नहीं, एक कूटनीतिक प्रहार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कनाडा की यात्रा के रास्ते अचानक साइप्रस में रुकने का फैसला किया, यह तुर्की की पीठ में चुपचाप घुसेड़ा गया कूटनीतिक खंजर था। यह बताता है कि अब भारत केवल अपने दोस्तों को उपहार नहीं देता, वह अपने शत्रुओं को सजा देने की भी कुव्वत रखता है, जो दिखती नहीं लेकिन असर छोड़ती है।

साइप्रस: एक भू-राजनीतिक हथियार

भारत के लिए साइप्रस केवल यूरोप का एक छोटा द्वीप नहीं है। यह यूरोपीय संघ का सदस्य है और 2026 से उसका अध्यक्ष बनने वाला है, वह संघ जिसके साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता (FTA) वर्षों से रुका पड़ा है। ऐसे में साइप्रस को भारत द्वारा साधना, एक तीर से कई निशानों को भेदना है:

  1. यूरोप में भारत की मौजूदगी को मज़बूती देना
  2. तुर्की के अतिक्रमणग्रस्त शत्रु के पक्ष में खड़े होकर नैतिक आधार बनाना
  3. इज़राइल-साइप्रस-भारत की त्रिकोणीय रणनीति को सशक्त करना

इज़राइल का समर्थन और भारत की सौम्य आक्रामकता

तुर्की द्वारा साइप्रस पर किए गए कब्जे का इज़राइल वर्षों से विरोध करता रहा है। और यही इज़राइल, भारत का परम रणनीतिक साझेदार है, रक्षा, साइबर, कृषि और आंतरिक सुरक्षा सभी क्षेत्रों में।

ऐसे में भारत द्वारा साइप्रस को सार्वजनिक रूप से समर्थन देना, इज़राइल को और अधिक भारत के करीब खींचता है, यह दो घनिष्ठ सहयोगियों का साझा मोर्चा है।

भारत की जनता के लिए संकेत

प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा विदेश नीति के स्तर पर जितनी महत्वपूर्ण थी, उतनी ही भारत की जनता के लिए एक मनोवैज्ञानिक सन्देश भी थी। वह जनता जो तुर्की को लेकर रोष में थी, वह रोष जो भूकंप के समय मदद करने के बावजूद तुर्की द्वारा पाकिस्तान से दोस्ती दिखाने पर उत्पन्न हुआ।

इसी भावभूमि में भारतीय सैलानियों ने तुर्की के लिए बुक टिकटों को रद्द करना शुरू कर दिया था। मोदी की यात्रा ने उस नाराजगी को एक वैकल्पिक मार्ग दिया, साइप्रस। एक नया पर्यटन केंद्र, जहाँ हजारों भारतीय पहले से कार्यरत हैं, जहाँ भारत को सम्मान मिलता है, और जहाँ भारतीय संस्कृति का भी स्वागत होता है।

तुर्की को आर्थिक संदेश

तुर्की की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा पर्यटन से जुड़ा है। जब भारतीय सैलानी वहाँ जाना बंद करेंगे और साइप्रस जैसे देशों को प्राथमिकता देंगे, तो यह ‘सॉफ्ट इकोनॉमिक वारफेयर’ बन जाता है, जिसमें बम नहीं गिरते, लेकिन वित्तीय खंभे हिल जाते हैं।

मोदी का साइप्रस दौरा इसी दृष्टि से एक ‘आर्थिक उत्तर-प्रहार’ है, जो बिना किसी घोषणा के तुर्की की रीढ़ पर वार करता है।

भारत की रणनीतिक रीढ़ की पुनर्रचना

आज भारत की विदेश नीति सर्जिकल स्ट्राइक्स और ऑपरेशन सिंदूर तक सीमित नहीं है, वह अब शत्रु की ‘नरम नसों’ पर प्रहार करती है, उनकी कूटनीतिक गलियों में दबे पाँव दाखिल होकर उनके विश्वसनीय मित्रों को अपनी ओर खींच लेती है।

आज भारत चुपचाप साइप्रस की ओर कदम बढ़ाता है, और कल शायद यह संबंध यूरोपीय संघ में भारत की आर्थिक उपस्थिति को स्थायी बना दे।

भारत-मध्य एशिया-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर में साइप्रस की स्थिति

भारत के ‘IMEC’ (India–Middle East–Europe Corridor) योजना में साइप्रस एक लिंकेज पॉइंट बन सकता है। तुर्की की बेल्ट एंड रोड परियोजना को संतुलित करने के लिए भारत जिस व्यापारिक गलियारे को विकसित कर रहा है, उसमें भूमध्य सागर में साइप्रस का स्थान सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यहाँ से भारत, सऊदी अरब, UAE और यूरोप को जोड़ सकता है, बिना तुर्की या पाकिस्तान से गुजरे। यह कूटनीति दिखावे की उपेक्षा ज्यादा प्रभाव की है।

प्रधानमंत्री मोदी की साइप्रस यात्रा एक संकल्प थी, यह दर्शाने का कि भारत केवल उदार राष्ट्र नहीं, बल्कि ‘याद रखने वाला राष्ट्र’ है। वह उदारता के नाम पर न तो आत्मसम्मान गिरवी रखता है, न अपने सहयोगियों के विश्वास के साथ समझौता करता है।

तुर्की को अब यह एहसास हो चुका है कि भारत केवल सहायता नहीं करता, रणनीतिक जवाब भी देता है, वह भी बगैर गोली चलाए, बगैर झंडा फहराए।

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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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